Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
एक पहर ठहरी सखी, कान्हा जी के ठौर।
पहुँची कोई और थी, लौटी कोई और।।
योगेश छिब्बर जी का यह दोहा भारत में प्रेम के उत्कर्ष को समझने के लिये पर्याप्त हैं। भारत में प्रेम का चरम यह है कि मीरा ने जो प्रेमगीत रचे, वे भक्ति की मानक कविताएँ बनकर जग में प्रसिद्ध हुए। यह भारतीय संस्कृति ही है कि यहाँ प्रेम और भक्ति के बीच की योजक रेखा पर सर्वश्रेष्ठ साहित्य रचा जाता है।
यहाँ साकार और निराकार के भेद को समझने के लिये अकेले राधा का प्रेम समझना पर्याप्त हो सकता है। यहाँ सुभद्रा और अर्जुन के प्रेम का सम्मान करने के लिये स्वयं कृष्ण अपने वंश की परंपरा को तोड़ने का बीड़ा उठाते हैं। यहाँ शबरी का प्रेम, प्रतीक्षा की गहरी नदी में खड़े-खड़े इतना निश्छल हो जाता है कि स्वयं श्रीराम उसके कौतूहल का सम्मान करते हुए अतिथि सत्कार की टूटती हुई परंपरा को अनदेखा कर देते हैं।
यहाँ भक्ति कब प्रेम बन जाए और प्रेम कब भक्ति बन जाए, इसका अनुमान लगाना कठिन है।
हमारे यहाँ वसन्त का मौसम प्रेम का मौसम माना गया है, साथ ही वसन्त पंचमी का दिन ज्ञान की देवी सरस्वती को भी समर्पित है। मदनोत्सव के साथ सरस्वती के पूजन का यह संयोग भारतीय संस्कृति के संतुलन प्रमुख होने का सबसे बड़ा प्रमाण है।
प्रेम, मनुष्य होने की पहली अर्हता है, अतएव प्रेम के अभाव में मनुष्यता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। प्रेम और पवित्रता का अनुप्रास हमारे देश की अधिकतम प्रेम कथाओं में सहज ही घटित हो जाता है।
राधा और कृष्ण को प्रतीक मानकर रचा गया श्रृंगार हमारे प्रेम को सगुण और निर्गुण के मध्य ऐसे नखत की तरह जड़ देता है कि एक भी पंक्ति अपनी मर्यादा की धुरि से रंचमात्र भी इधर-उधर नहीं हो पाती।
प्रेम से आपूरित हृदय स्वयं तो सुन्दर होता ही है, साथ ही वह अपने आसपास के वातावरण को भी सुन्दर बनाता चलता है। वह पारिजात के उस वृक्ष के समान होता है जो अंधियारी रात जैसे जीवन में भी इस विश्वास के साथ भरपूर खिलता है कि यदि अंधियारे के कारण उसके सौंदर्य को कोई न भी भोग सका, तो भी उसकी सुवास से कुछ पहर तो रात का वीराना सँवर ही जाएगा। यही निस्पृहता हमारे प्रेम को विशेष बना देती है।
एक बात और, प्रेम कभी घटता-बढ़ता नहीं है। वह तो जब अपने पूरे सौष्ठव के साथ किसी सम्बन्ध में रम जाता है तो फिर धरती में गड़े किसी बीज के समान उस पर अपनत्व, अधिकार, विश्वास और दायित्व-बोध के फूल खिलते हैं। यह लौकिक प्रेम की सहज नियति है। जो लोग इस नियति को स्वीकार न करके इन फूलों को अनदेखा करके, उसी बीज की तलाश में सम्बन्ध की जड़ खोदने लगते हैं, वे सब कुछ खो बैठते हैं।
प्रेम, जीवन में घटित होनेवाली सबसे स्वाभाविक, सहज और सुन्दर घटना है। इसकी शाखाओं का विस्तार इसके बीज के अस्तित्व का साक्षी है, इसका पल्लवन इसके बीज के समर्पण का गवाक्ष है। इसे केवल समय और स्थान की आवश्यकता होती है, अपने हिस्से का धूप-पानी यह प्रकृति से स्वतः जुटा लेता है।
देह से विदेह तक विस्तृत प्रेम को अभिव्यक्त करता एक कबीराना दोहा और उद्धरित करना चाहूंगा-
जब मैं था, तब हरि नहीं, अब हरि हैं, मैं नाय।
प्रेम गली अति साँकरी, जा में दो न समाय।।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
सिस्टम… यह एक ऐसा शब्द है, जो किसी भी भारतीय भाषा में अनूदित होकर प्रपंच बन जाता है। ईश्वर को जब सृष्टि का सर्वाधिक दीन प्राणी बनाना था, तो उसने भारतीय सिस्टम में फँसा मनुष्य बना डाला।
हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को ‘समानता का अधिकार’ देता है; इसलिए हमारा सिस्टम भी अपनी गिरफ़्त में आए सभी नागरिकों को समान रूप से प्रताड़ित करता है।
इस सिस्टम में सबसे ऊपर है, विधायिका। स्कूली किताबों ने विधायिका के विषय में यह अफ़वाह फैलाई है कि विधायिका क़ानून बनाती है। जैसे ही स्कूल की आदर्शवादी रामचरितमानस से निकलकर मनुष्य व्यवहारिकता की महाभारत बाँचता है तो उसे समझ आ जाता है कि विधायिका को सामान्य भाषा में राजनीति कहा जाता है और उसका केवल एक ही काम है- चुनाव जीतना। इस काम में राजनीति अपना जी, और नागरिकों की जान भी दाँव पर लगाने से नहीं चूकती।
संसद में क़ानून बनाने से लेकर सड़क पर भाषण देने तक और हँसने-रोने से लेकर उठने-बैठने और यहाँ तक कि जीने-मरने तक का एक ही लक्ष्य होता है, चुनाव जीतना। जिस कार्य से चुनाव जीता जा सके, उसे करने में राजनीति कभी पीछे नहीं रहती। फिर वह कार्य किसी को जीवन देने का हो या किसी का जीवन लेने का। राजनेता चुनाव जीतने के लिए ही दंगा शुरू करवाते हैं और फिर चुनाव जीतने के लिए ही दंगा बन्द भी करवाते हैं। टीवी डिबेट में गाली-गलौज से लेकर अपने-आप पर जूते-चप्पल फिंकवाने में भी इन्हें कोई परहेज नहीं होता। चुनाव जीतने के लिए ही बयान दिये जाते हैं और चुनाव जीतने के लिए ही उन बयानों से पलटा जाता है। नेता उपलब्ध है अर्थात् उसे वोट चाहिए और नेता व्यस्त है, अर्थात् उसे वोट मिल चुका है। चुनाव जीतने की इस मारामारी में जनता के दुःख-दर्द की सुधि लेने की फुर्सत किस कम्बख़्त के पास है?
अतएव, हे पार्थ! किताबों में लिखी लोकतंत्र की परिभाषाओं से भ्रमित न होओ। लोकतंत्र में तुम्हारी देह की स्थिति एक उंगली से अधिक नहीं है। यदि वोट देने के बाद उस उंगली का प्रयोग करने का विचार भी मन में आया तो यह व्यवस्था तुम्हारी शेष देह को जीते जी ही नारकीय कष्टों से अवगत करा देगी और फिर तुम युग की समाप्ति तक अपनी आत्मा पर अपनी देह का बोझ लादे हुए जीवित रहोगे। चूँकि सिस्टम की आत्मा होती ही नहीं है इसलिए उसकी आत्मा कभी मरती भी नहीं है। और जनता की आत्मा महाराज कुंभकर्ण के सिंहासन पर पैर पसारकर सोई हुई है।
विधायिका के इस विराट स्वरूप को जानने के पश्चात भारतीय नागरिक के मन में न्यायपालिका के स्वरूप को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। चूँकि न्यायपालिका किसी के साथ भेदभाव नहीं करती अतः अपने द्वार पर आनेवाले सभी मुक़द्दमों को समान रूप से लटकाती है। काग़ज़ और औपचारिकताओं के भीषण जंजाल में फँसे न्यायालय की लय विलंबित प्रवृत्ति की है। इसलिए न्यायालय में एक बार प्रवेश करते ही मनुष्य के जीवन में ठहराव-सा आ जाता है। छह महीने प्रतीक्षा करने के बाद एक तारीख़ आती है, उस तारीख़ पर कई घण्टे प्रतीक्षा करने के बाद प्रार्थी को अपने मामले का नाम सुनाई देता है। बंदा इस आवाज़ को सुनने की ठीक से ख़ुशी भी नहीं मना पाता, कि तब तक दूसरे मामले की आवाज़ लग जाती है। लटके हुए मुँह को लेकर प्रार्थी कोर्ट के बाहर आता है तो वक़ील अगली तारीख़ नोट करवाकर उससे अपने परिश्रम का मेहनताना वसूलने की भूमिका बनाने लगते हैं। घुटन भरे इन न्यायालयों के पास पीड़ित के लिए केवल टूटन है, जिसे बटोरने का लिए लोग अखण्ड ज्योत से भी अधिक निष्ठावान बनकर माननीय न्यायालय में हर तारीख़ पर उपस्थित रहने के लिए विवश हैं। स्वाधीनता के बाद से अब तक किसी न्यायाधीश ने ‘न्याय’ को समय पर उपस्थित होने के समन जारी किए होते तो कदाचित न्याय व्यवस्था की ओर उम्मीद से देखती करोड़ों आँखें पथरा न गई होतीं।
विधायिका से जर्जर हुई देह और न्याय की प्रतीक्षा में पथराई हुई आँखों के साथ भी यदि किसी नागरिक में साँस बच जाएँ, तो उसके लिए लोकतंत्र में कार्यपालिका की पर्याप्त व्यवस्था है। यह कार्यपालिका सुरसा माई के मुख की भाँति असीम है। वायुमण्डल में जहाँ-जहाँ तक वायु है वहाँ-वहाँ तक कार्यपालिका है। यह कार्यपालिका विधायिका द्वारा बनाए गए विधान के आधार पर नागरिकों से ‘प्रत्यक्ष कर’ वसूल करती है। अपराध रोकने में इसकी कोई रुचि नहीं है, अपितु इसका पूर्ण विश्वास है कि अपराध मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति का अंग है, इसलिए यह हर नागरिक को अपराधी मानते हुए उससे अभद्र तथा अपमानजनक व्यवहार करती है। क्लर्क से लेकर हवलदार तक और अधिकारी से लेकर चौकीदार तक; सब व्यवस्थित रूप से जनता को यह समझाते रहते हैं कि सिस्टम से उलझने की भूल मत कर बैठना… क्योंकि लोकतंत्र में तंत्र से अधिक महत्वपूर्ण तो लोक भी नहीं होता।
हमने अपने बुजुर्गों से शायद कभी नहीं पूछा, लेकिन अगर हमारी पीढ़ियों ने हमसे इस सिस्टम के इस हाल का कारण पूछ लिया, तो उस समय हमारी ख़ामोशी हमें ख़ुद को भीतर तक बेन्ध जाएगी।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हिन्दी साहित्य में दो क़िस्म के पाठक होते हैं। पहली श्रेणी है प्रशंसक पाठकों की। वे सोशल मीडिया पर खाता बनाते ही टटोल-टटोल कर लेखकों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते हैं। फिर उनकी हर पोस्ट को देखते ही उसके नीचे कुछ निश्चित शब्दयुग्म पेस्ट करके निकल लेते हैं। इस सबमें ये इतने व्यस्त होते हैं कि इन्हें रचनाएँ पढ़ने की भी फुर्सत नहीं मिल पाती। सुबह उठते ही वे पेंडिंग फाइल्स की तरह रचनाओं पर हस्ताक्षर करने बैठ जाते हैं। ‘वाह’; ‘अद्भुत’; ‘कालजयी’; ‘क़माल’; ‘लाजवाब’ और ‘निःशब्द’ जैसे अनेक शब्द इनके क्लिपबोर्ड पर हमेशा तैयार रहते हैं। इस प्रवृत्ति को देखते हुए फेसबुक ने ‘मान गए गुरु’; ‘सुपर’; ‘यू आर बेस्ट’ और ‘ब्यूटीफुल’ जैसे डिजिटल प्रशंसाक्षरों के एनिमेशन भी बना दिए हैं।
इस श्रेणी के पाठकों ने अनेक कानितकरों को तेंदुलकर होने का भ्रम पलवाया है। लेकिन इनसे भी ख़तरनाक़ होते हैं दूसरी क़िस्म के पाठक। ये भी फेसबुक पर प्रकट होते ही बाक़ायदा रचनाकारों को टटोलते हैं। लेकिन ये प्रथम दिवस से यह माने बैठे होते हैं कि यदि तुलसीदास जी ने मानस की प्रूफ रीडिंग इनसे कराई होती तो मानस आज ब्रह्मांड स्तरीय रचना बन गयी होती।
हर रचना पर प्रतिक्रिया देने की ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ इन्होंने भी उठा रखी होती है। किन्तु ये प्रथम श्रेणी के पाठकों की तरह आलस्य में बिना पढ़े रचना के नीचे अपनी टिप्पणी नहीं लिखते; बल्कि ये तब तक किसी रचना को पढ़ते हैं जब तक इनके भीतर का नामवर जागकर उस रचना से लंबी टिप्पणी तैयार न कर ले। एक बात तय है, इनकी टिप्पणी का सामान्यता एक स्थायी भाव होता है कि तुम बिना बात के कवि/लेखक बने डोल रहे हो और इस जनभावना में अपना स्वर मिलाकर मैं अपने भीतर के रामविलास शर्मा का गला नहीं घोंट सकता।
मेघनाद के निकुम्बरा यज्ञ की भाँति जब इनकी कठिन साधना को भंग करने इनके भीतर स्वयं लेखक बन जाने के वानर कुलबुलाने लगते हैं तब ये अपनी समस्त सृजनात्मक नेगिटीविटी का गट्ठड़ बनाकर मंचीय कवियों अथवा लेखकों के आचरण अथवा जीवन पर कुछ लिखते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि सृजन ‘चाहे कैसा भी हो’ उसके बिम्ब का आकाश रचनाकार की सोच से बड़ा नहीं हो सकता।
फिर अपने लिखे इस ‘कुछ’ की किसी स्थापित साहित्यिक विधा से तुलना करते हुए ये अपनी जंघा पीटने लगते हैं। मांसल जंघा पर हथेली की चपत से जो ध्वनि उत्पन्न होती है उसे ‘घनघोर तालियाँ’ समझकर ये प्रसन्न हो उठते हैं।
इसके बाद इनकी लेखनी यकायक ‘केवट की नौका’ से ‘पुष्पक विमान’ हो जाती है। जिसकी भी पंचवटी में ‘सीता’ सरीखी कोई स्त्री हो, उससे इनका स्वाभाविक वैर हो जाता है।
अब ये दिन भर अपनी शूपर्णखा को त्रिकालसुंदरी घोषित करने के प्रयास में रहते हैं और रात भर सीतायुक्त आंगनों पर पत्थर मारने में व्यस्त रहते हैं। इनके लिखे पर भी वाह-वाह करनेवालों की कभी कमी नहीं होती, क्योंकि प्रथम श्रेणी के पाठकों का क्लिपबोर्ड भी क़ानून की देवी की तरह सबको आँख पर पट्टी बांधकर देखता है।
लेकिन रात में जिन आंगनों पर इनके पत्थर बरसते हैं, उनकी मुस्कुराहटों पर इन निशाचरी खरोंचों के निशान देर तक दिखाई देते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
सभी राजनैतिक दल एक साथ मिलकर देश को एक निश्चित दिशा में ले जा रहे हैं। मीडिया वाच डॉग बनकर इस कारवां के पीछे दौड़ रहा है, ताकि देश द्रुतगति से उस दिशा में बढ़ता रहे। जनता अपने भविष्य को दाँव पर लगाकर इस कारवां में जीत-हार तलाश रही है।
यह तय करने की फ़ुरसत किसी के पास नहीं है कि सियासत ने पालकी कहकर अपने कंधों पर जो उठा रखा है, वह कहीं चकडोल तो नहीं है।
जब दर्शक-दीर्घा का उत्साह शांत होने लगता है तो कंधा दे रहा दल, जनता को जनार्दन कहकर संबोधित कर देता है। जनता, मूकदर्शक के पद से इस्तीफा देकर, पुनः शोरगुल करने लगती है। सब स्वयं को कंधा समझकर, देश का बोझ स्वयं पर महसूस करने लगते हैं और किसी न किसी दल का नाम लेकर चिल्लाने लगते हैं।
उत्साह बढ़ने पर कभी-कभार दर्शक-दीर्घा में हंगामा हो जाता है। हंगामे को दंगे में तब्दील करने के लिए दर्शक-दीर्घा में बैठे भावी राजनेता पूरी ऊर्जा झोंक देते हैं। इससे उपजे धर्मयुद्ध में जो शव गिरते हैं, उनका अंतिम संस्कार करने के लिए कारवां में बढ़ रहे कर्णधार, देश का बोझ वहीं छोड़कर दर्शक-दीर्घा में प्रकट होते हैं। अपने-अपने समर्थकों की चिताएँ सजाकर, वे परस्पर विरोधियों की चिताओं पर जाकर दंगा करनेवालों को लताड़ते हैं। इस डाँट-डपट के बीच, जेब से टोटकों की लोई निकालकर, वे वोटों की रोटियाँ भी सेंक लेते हैं।
इस समय उत्तरदायी मीडिया भी मुख्य कारवां का लालच छोड़कर, दर्शक-दीर्घा के इस घटनाक्रम की कवरेज कर रहा होता है।
हंगामा थमते ही देश के मुद्दों, देश की जनता और देश की हालत को वहीं छोड़ते हुए, सभी दल पुनः देश का बोझ लेकर उसी दिशा में बढ़ने लगते हैं। मीडिया पुनः उनके पीछे दौड़ने लगता है। जनता पुनः दर्शक-दीर्घा में बैठकर इसे देश की पालकी समझकर दाँव लगाने लगती है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
आज भारतीय शासन-तंत्र के प्रति श्रद्धा उमड़ रही है। इतने बड़े देश को सही से चलाने के लिये हर समस्या का समाधान खोजने चले तो सिस्टम के पसीने छूट जायेंगे, इसीलिये इसका श्रेष्ठ उपचार यह है कि जो आपके पास समस्या लेकर आये उसे किसी और समस्या में उलझा दो। इससे उसकी समस्या का समाधान नहीं होगा, लेकिन नयी समस्या में उलझते ही वह मूल समस्या को भूल ज़रूर जायेगा।
आप अदालत में कोई मुक़द्दमा दर्ज कराओ, अदालत आपको प्रक्रियाओं और औपचारिकताओं के ऐसे जंजाल में उलझा देंगी कि अपनी मूल पीड़ा को बयान करना आपको याद ही नहीं रहेगा। इससे लाभ यह है कि जब आप किसी अन्याय अथवा उत्पीड़न के शिकार होते हैं तो थाने और कचहरी की उलझनों से मिलनेवाले कष्ट की मात्रा का आप कार्यवाहियों से मिलनेवाले कष्टों की मात्रा से तुलनात्मक अध्ययन करते हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जिसने आपके साथ बुरा किया है, उसे ईश्वर एक दिन दण्ड देगा। इससे मनुष्य में ईश्वर के प्रति आस्था पुष्ट होती है।
इसी शानदार विधि से सरकार ने किसानों के आन्दोलन को डील किया। जो किसान कृषि बिल वापस लेने की मांग लेकर घर से चले थे, उनको सरकार ने बताया कि बिल पर चर्चा तब करेंगे जब दिल्ली आकर हमसे बात करोगे। अब किसानों को दिल्ली में घुसना, कृषि बिल वापस लेने की मांग से ज़्यादा ज़रूरी लगने लगा। पूरे देश का ध्यान इस पर केंद्रित हो गया है कि किसान दिल्ली में घुस पाएंगे या नहीं। कृषि बिल के औचित्य पर चर्चा करना किसी को महत्त्वपूर्ण लग ही नहीं रहा।
अराजकता को रोकने के लिये राज्य का अराजक हो जाना प्रशंसनीय है। सरकार की मंशा किसानों का अहित नहीं है। वह चाहती है कि मंडी के दाम और मुनाफ़े जैसे भौतिक प्रश्नों से ऊपर उठकर किसान एक दिन अध्यात्म की ओर मुड़ें और ईश्वर पर भरोसा रखते हुए घर लौट जायें।
लाल बहादुर शास्त्री जी ने एक नारा दिया था – ‘जय जवान, जय किसान।’ किसान आंदोलन में इस नारे का जो स्वरूप देखने को मिल रहा है वह आश्चर्यजनक है।
सरकार ने पुलिस के जवानों को निर्देश दिया है कि किसानों को दिल्ली में नहीं घुसने देना है। इस निर्देश का पालन करने के लिये पुलिस के जवान किसानों पर पानी की बौछार कर रहे हैं, आँसू गैस के गोले दागे जा रहे हैं। सीआरपीएफ, पुलिस और रेपिड एक्शन फोर्स मिलकर ‘किसी भी हाल में’ किसानों को राजधानी में घुसने से रोकने के लिये कटिबध्द हैं।
चूँकि भारत एक लोककल्याणकारी गणराज्य है इसलिये सरकार को यह क़दम किसानों की भलाई के लिये उठाना पड़ रहा है। सरकार जानती है कि इतनी बड़ी संख्या में किसान दिल्ली में इकट्ठा होंगे तो इससे कोरोना वायरस का संक्रमण बढ़ सकता है। इसलिये सरकार किसानों को दिल्ली में घुसने से रोक रही है। क्योंकि कोरोना वायरस हरियाणा और पंजाब में जाने से परहेज करता है।
कुछ मूढ़ लोग सरकार से पूछ रहे हैं कि हरियाणा उपचनाव, मध्य प्रदेश उपचुनाव और बिहार विधानसभा चुनाव में कोरोना फैलने का ख़तरा क्यों नहीं था। उन मूर्खों को इतनी-सी बात समझ नहीं आती कि चुनाव लोकतंत्र के लिये सर्वाधिक आवश्यक हैं किन्तु सरकार की नीतियों का विरोध करना लोकतंत्र में अब निषिद्ध हो चुका है।
लोकतंत्र की रक्षार्थ समर्पित पुलिस के जवान, क़ानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये लोकतंत्रात्मक तरीक़े से चुनी गयी सरकार के विरुद्ध सड़क पर उतरे किसानों को रोक रही है तो इसमें क्या ग़लत है।
उधर श्रम सुधार के एजेंडे पर लाखों मजदूर हड़ताल पर हैं लेकिन उनकी कोई ख़ास ख़बर दिखाने का समय मीडिया के पास नहीं है। क्योंकि सारे संवाददाता अभी किसानों को रोकने के लिये की जा रही पुलिस कार्रवाई की कवरेज में व्यस्त हैं। कोविड को लेकर इतनी सतर्कता तो बरतनी ही पड़ेगी कि जनता के बहुत सारे मुद्दों को एक साथ इकट्ठा न होने दिया जाये। मुद्दों में सोशल डिस्टेंसिंग बनाकर ही कोविड से लड़ा जा सकता है। सरकारों की इस सदाशयता पर किसी तथाकथित बुद्धिजीवी का ध्यान ही नहीं जाता।
दिल्ली सरकार ने कोविड से बचने के लिये मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का चालान दो हज़ार रुपये कर दिया है। बेचारे ग़रीब किसान दिल्ली में इतना महंगा चालान कैसे भरेंगे – इस चिंता के समाधान स्वरूप सरकार ने पुलिस को कहा है कि किसानों को दिल्ली में न घुसने दो ताकि दिल्ली की क्रूर सरकार उनसे दो-दो हज़ार रुपये न वसूल पाये। हमें केंद्र सरकार की इस सहृदयता की सराहना करनी चाहिये।
लाल बहादुर शास्त्री को इस बात का अनुमान भी नहीं रहा होगा कि भविष्य की राजनीति उनके नारे को इतना प्रचारित करेगी। आज अलग-अलग राजनेताओं ने अपनी-अपनी टीम बना ली है। सड़क पर दंगल चल रहा है। एक राजनैतिक दल जवानों को चीयर कर रही है और दूसरा राजनैतिक दल किसानों को। चैनल के स्टूडियो से रनिंग कमेंट्री चल रही है। ‘किसानों का जत्था बॉर्डर की ओर बढ़ा आ रहा है, पुलिस ने पानी की तेज़ बौछार से किसानों में अफरा-तफ़री मचा दी। पानी की बौछार तेज़ होती जा रही है और दर्शक दीर्घा के एक खेमे से ‘जय जवान’ का उद्घोष गूंजने लगा। उधर किसानों ने पानी की बौछार को पछाड़ते हुए बैरिगेट उठाकर फेंक दिये और पुलिस के जवानों पर पत्थरबाज़ी करनी शुरू कर दी। बैरिगेट के हवा में उठते ही दर्शक दीर्घा के दूसरे खेमे में जोश आ गया और वहाँ ‘जय किसान’ का नारा गूंजने लगा। अब पुलिस का पलड़ा भारी… अब किसान का पलड़ा भारी… दंगल रोमांचक होता हुआ… दर्शक दीर्घा में जोश बढ़ता हुआ… अब जय जवान के नारे गूंजने लगे… अब जय किसान के नारे गूंजने लगे…
दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर जो आँसू गैस के गोले चले उनके कारण लोकतंत्र और लाल बहादुर शास्त्री, दोनों की आँखों से आँसू बह रहे हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
देश बहुत विकट परिस्थितियों से गुज़र रहा है। राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं ने हमें मूलभूत आवश्यकताओं को अनदेखा करना सिखा दिया है। न्याय व्यवस्था स्वयं कठघरे में खड़ी है। जनता, अपराधियों से अधिक पुलिस से आक्रांत है। मीडिया, औद्योगिक घरानों की उंगलियों पर नाच रहा है और आद्योगिक घराने सत्तारूढ़ दल के इशारों पर… इस जंजाल में जनहित और लोकतंत्र दोनों मरणासन्न हैं।
सुव्यवस्थित प्रचार के ज़रिये राजनीति ने समाज में परस्पर विद्वेष बो दिया है। जब कोई एक व्यक्ति अपनी किसी समस्या को लेकर नम आँखों से तंत्र की ओर देखता है तब दूसरे लोग उसकी समस्या या उसके आँसुओं को सांत्वना देने की बजाय, उसकी कराह में राजनैतिक अर्थ टटोलने लगते हैं। उसके निवेदन, प्रलाप, उपालम्भ अथवा आक्रोश में किसी दल विशेष का समर्थन या विरोध तलाशने लगते हैं।
राजनीति आपस में लड़ते इन लोगों को देखकर आश्वस्त हो जाती है कि हम कुछ भी करें, जनता हमारा विरोध तब कर सकेगी जब उन्हें आपस में लड़ने से फ़ुर्सत मिलेगी।
जनता गाली देना सीख गयी है। जो व्यक्ति दक्षिणपंथ के पक्ष में बोलेगा, उसे वामपंथियों की गाली खानी पड़ेगी। जो वामपंथ के पक्ष में बोलेगा, उसे दक्षिणपंथियों की गाली खानी पड़ेगी। जो निष्पक्ष होगा, उसे दोनों की गाली खानी पड़ेगी।
दलितों के दम पर बने हुए राजनैतिक संगठन दलितों को यह सोचने का अवसर ही नहीं देंगे कि दलित संगठन का हित होने से दलित समाज का हित होना आवश्यक नहीं है। मुस्लिम समाज के दम पर बने राजनैतिक संगठन इस विषय पर कभी चर्चा ही न करेंगे कि इस्लामिक संगठनों के हित में तन-मन-धन न्यौछावर करने वाले मुसलमानों के जीवन पर किसी इस्लामिक लीडर के मंत्री बन जाने से क्या प्रभाव पड़ा।
राजनीति आपका यूज़ करती है। उसे विवेकशील और जिज्ञासु व्यक्ति पसंद नहीं होता। विवेकशील व्यक्ति राजनेताओं के लिये ख़तरनाक होते हैं। इसलिये आजकल बुद्धिजीवी व्यक्ति का उपहास किया जाने लगा है। बुद्धिजीवी होना किसी अपमान से कम नहीं रह गया है। ठीक इसी प्रकार ज्यों शांतिप्रिय व्यक्ति राजनीति के लिये व्यर्थ है। झगड़े नहीं होंगे तो राजनीति की महत्ता ही समाप्त हो जायेगी। सब लोग चैन से अपनी-अपनी रोटी कमाएंगे, छुटपुट विवाद हुए भी तो सभ्य पुलिस और सुव्यवस्थित न्यायालय में झटपट उनका निपटारा हो जाएगा; यदि ऐसा समाज बन गया तो कोई क्यों राजनेताओं को पूछेगा?
यदि मुसलमान और हिंदुओं के बीच झगड़े न होंगे तो कट्टर हिन्दू नेता और कट्टर मुस्लिम नेताओं की शरण में कोई क्यों जायेगा। इसीलिये साम्प्रदायिक सद्भाव की बात करनेवाला व्यक्ति भी आजकल उपहास का पात्र बन गया है। जो लड़ाए वही योग्य व्यक्ति है। जो झगड़ा शांत कराने का उपक्रम करे, वह तो मूर्ख है।
राजनीति ने समाज का विवेकहरण कर लिया है। पुराने समय में हमारे घर में एक केबल कनेक्शन होता था। जिसमें लगभग सभी चैनल 50, 75, 100 या 150 रुपये में आराम से देखने को मिल जाते थे। घर पर दूसरा टेलिविज़न आये तो उतने पैसों में केबलवाला दोनों टीवी केबलयुक्त कर देता था। कोई चैनल यदि केबल से प्रसारित न हो रहा हो तो केबलवाले से कहकर उसे शुरू करवा लिया जाता था। आंधी, बारिश, बादल जैसी स्थितियों में भी केबल कनेक्शन जारी रहता था। फिर हमें बताया गया कि यह केबलवाला हमें लूट रहा है। यह उन चैनल्स के भी पैसे हमसे वसूल रहा है जो हम नहीं देखते। इसलिये बुद्धिमानी इसमें है कि सेट-टॉप बॉक्स लगवाकर केवल उन चैनल्स का भुगतान किया जाये जो हमें देखने हों। हमें बात अच्छी लगी। हमने प्रारम्भ में स्वेच्छा से सेट-टॉप बॉक्स लगवाये। बाद में सरकार ने सेट-टॉप बॉक्स आवश्यक कर दिये। अब हम केवल उन्हीं चैनल्स का भुगतान करते हैं, जो हम देखते हैं; यह और बात है कि तब हम 100 रुपये में सारे चैनल देखते थे अब तीन-चार सौ रुपये में चुनिंदा चैनल्स देखते हैं। यदि आपने कोई ऐसा चैनल देखना है, जिसका प्रसारण आपके घर पर लगे सेट-टॉप बॉक्स की कम्पनी से नहीं होता है तो आप चाहकर भी उस चैनल को सब्सक्राइब नहीं कर सकते। हाँ, यह लाभ अवश्य हुआ है कि जैसे ही बाहर बादल छाएँ, पुरवा या पछुआ की हिलोर आये अथवा बरखा रानी आपके अंगना में रुनझुन का संगीत बजाए तब आपका टेलिविज़न आपको बता देता है कि टीवी के सामने बैठकर आँखें मत फोड़ो, बाहर जाकर मौसम का लुत्फ़ उठाओ!
यह है राजनीति की विवेकहरण योजना।
प्यारे देशवासियों! राजनीति हमें हिन्दू-मुस्लिम, दलित-सवर्ण, बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक, स्त्री-पुरुष, बीपीएल-यूपीएल, शहर-गाँव, कांग्रेसी-भाजपाई और न जाने कितने वर्गों में बाँटकर इस स्थिति तक ले आयी है कि हम अपने हित-अहित के चिंतन से पहले राजनैतिक दलों की स्वार्थ-साधना का चिंतन करने लगे हैं। इस पथ पर न तो हमारे समाज का उत्थान होगा, न ही हमारे लोकतंत्र का..! हम एक बार ठहरकर विचार करें कि कहीं हम अपने आचरण से राजनीति को यह संदेश तो नहीं दे बैठे कि आप निश्चिंत रहें माई-बाप, हमें सब कुछ सहने की आदत है।
✍️ चिराग़ जैन