Article, Chirag Jain Writings, Prose, Seriously Funny
आपको अगर क्रिकेट का पूरा मज़ा लेना है तो स्टेडियम में जाने की बजाय किसी लोकल टाइप की क्रिकेट अकादमी में जाकर टीवी पर क्रिकेट का मैच देखिए। इसमें भी सावधानी यह कि आपको मैच नहीं देखना है, आपको तो मैच देख रहे लड़कों और उन लड़कों के गुरुजी को देखना है।
इस सिचुएशन में एक खेल तो स्टेडियम में चल रहा होता है, जिसका प्रसारण टीवी पर किया जाता है। और एक खेल लोकल क्रिकेट अकादमी के लोकल गुरुजी के मन में चल रहा होता है, जिसका प्रसारण उनकी भाव भंगिमाओं और हरकतों में हो रहा होता है। मुहल्ले के लड़कों को इकट्ठा करके ख़ुद को रवि शास्त्री समझनेवाले गुरुजी को क्रिकेट मैच देखते हुए देखना, मैच से अधिक मनोरंजक होता है।
वे टीवी के सामने ठीक इस मुद्रा में बैठते हैं जैसे भारत की टीम इलेवन का कोच पवेलियन में बैठकर अपने लड़कों की परफॉर्मेंस देख रहा हो। जब तक मैंच चलता है ये श्रीमान क्रिकेटगुरु टीवी स्क्रीन से साढ़े तीन फीट दूर अपनी कुर्सी पर स्थापित हो जाते हैं। इनकी तशरीफ़ सीडान कार की डिक्की की तरह थोड़ी पीछे की ओर निकल आती है। पीठ, टांगों से लगभग पचहत्तर डिग्री का एंगल बनाते हुए आगे को झुकती है लेकिन रीढ़ की हड्डी बिल्कुल सीधी रहती है। पीठ के ऊपरी छोर के बाद गर्दन कुछ ऐसे आगे को निकल आती है जैसे कोई राहु अपने केतु से अलग होकर हवा में लटक रहा हो। होंठ गोलाकार होकर कुछ चूसने की मुद्रा में यथासंभव आगे बढ़ जाते हैं और आंखें चुम्बक की तरह टीवी स्क्रीन पर चिपक जाती हैं। दोनों कुहनियां उनके भारी कंधों का बोझ उठाए हुए घुटनों पर दबाव बनाती हैं और उंगलियां पूरी टीम की चिंता में आपस में उलझती रहती हैं।
किसी भारतीय खिलाड़ी से कैच छूट जाए तो इस लोकल रवि शस्त्री की नाक सिकुडती है और सहसा उसके मुंह से ‘आइला’ या ‘शिट’ टाइप का कोई शब्द निकल पड़ता है। फिर वह अपने छोकरों की ओर देखकर सांत्वना देते हुए ‘कोई बात नहीं, कोई बात नहीं’ की ध्वनि के साथ अपने मैच्योर होने का प्रदर्शन करता है।
अच्छा शॉट लगने पर जब वह गर्वानुभूति के साथ आंखें मिचमिचा कर प्रसन्न होता हुआ ‘वेलडन वीरू वेलडन’ बोलता है, तो ऐसा लगता है कि किसी पट्ठे का दांव देखकर उस्ताद पहलवान की आत्मा मडोना बन गई हो।
भारतीय बल्लेबाज किसी बॉल पर बीट हो जाए तो लोकल रवि शास्त्री के चेहरे पर गहरी चिंता और भय का मिश्रित प्रभाव प्रकट होता है और वह जैसे-तैसे अपने होश संभालकर बोल पाता है, ‘क्या कर रहा है सचिन यार, थोड़ा संभलकर!’
पूरे खेल के दौरान इन गुरुजी का ब्लड प्रेशर ‘रनिंग बिटीवन द विकेट्स’ करता ही रहता है। ‘यॉर्कर डाल यार’, ‘स्ट्राइक दे’, ‘प्रेशर मत ले’, ‘आराम से’ और ‘गुड शॉट’ कहते हुए गुरुजी लगातार मैच में बने रहते हैं।
शुक्र है विज्ञान का, कि टीवी के सामने बैठकर बोलनेवालों की आवाज़ स्टेडियम में खेल रहे खिलाड़ियों के कानों तक नहीं पहुंच पाती। वरना वैभव सूर्यवंशी तय नहीं कर पाते कि उन्हें पहले बॉल को पीटना है या क्रिकेटप्रेमियों को।
एक कमेंट्री टीवी पर चल रही होती है और एक-एक कमेंट्री हर लोकल रवि शास्त्री कर रहा होता है।
पूरी दुनिया में किसी भी खेल के प्रशंसक होते हैं लेकिन हमारे देश में क्रिकेट के दीवाने होते हैं। हमारे यहां क्रिकेटर्स को खिलाड़ी नहीं, डायरेक्ट भगवान मानने की परंपरा है। ये और बात है कि जब वही क्रिकेटिया भगवान आउट ऑफ फॉर्म हो जाता है, तो हम उस भगवान के घर-वर तोड़ने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते। हमारे यहां क्रिकेटरों के लिए यह कहावत बहुत सूट करती है कि ‘एक गेंद पर निखरे इज्जत, एक गेंद पर होवे हुज्जत।’
इन दिनों वैभव सूर्यवंशी का प्रदर्शन देखकर सोशल मीडिया पर किसी ने उसे भविष्य का विश्वविजेता बताया तो किसी ने उसे अगला प्रधानमंत्री तक घोषित कर दिया। एक ज्योतिषी बता रहे थे कि इसकी राशि पर आज बृहस्पति गोचर कर रहे हैं, इसे अच्छा खेलना ही था। मैंने माथा पीट लिया, पूरा देश वैभव को बधाई दे रहा है, जबकि असली मेहनत पृथ्वी से करोड़ों किलोमीटर दूर बैठा बृहस्पति कर रहा था।
हम भारतीय भावनाओं में जीते हैं। खेल का मैदान हो या असल जीवन, जब तक तथ्य और सत्य बेचारे पैदल चलते-चलते हांफते हुए सबके सामने पहुंचते हैं, उससे काफी पहले भावनाएं दौड़कर मंच पर पहुंच जाती हैं और तांडव मचा चुकी होती हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
एक पत्रकार ने अध्यापकों की कौड़ी गिन दी और पूरा समाज उस पत्रकार के विरोध में खड़ा हो गया। एक प्रशासनिक अधिकारी ने ‘कॉकरोच’ शब्द का प्रयोग किया और युवाशक्ति ने रातोंरात एक डिजिटल क्रांति खड़ी कर दी।
शिक्षा के दोनों छोर एक साथ छेड़े गए और एक पूरे समाज के सिले हुए होंठ खुल गए। इस क्रांति का भविष्य क्या होगा यह तो कहना कठिन है, किन्तु इन दोनों प्रकरणों ने यह अवश्य सिद्ध कर दिया कि संभावनाएं और आशंकाएं क्षीण हो सकती हैं किन्तु समाप्त कभी नहीं होती।
सोशल मीडिया पर विचरण करते हुए पाता हूं कि देश में किसी क्रांति जैसा माहौल है। रवीश कुमार से लेकर खान सर तक कोई भी ऐसी बात नहीं कह रहा है, जो समाज जानता न हो, लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण यह है कि बातें कही जाने लगी हैं। कब तक कह पाएंगे और कहां तक सुनी जाएंगी… यह कहना जल्दबाज़ी होगी।
इस दौर में अट्टालिकाओं के अहंकार से त्रस्त समाज से मैं यह अपेक्षा अवश्य करूंगा कि इस बार अपने विवेक से समझौता मत करना। सिस्टम का विरोध ही सही, लेकिन किसी के भी पीछे चलने से पहले यह समझ लेना कि कहीं हमारा नेतृत्व करनेवाला भी अपने किसी हितसाधन के लिए हमें भीड़ की तरह ‘इस्तेमाल’ तो नहीं कर रहा है।
कहीं श्वेत परिधानी बाबा का रिमोट किसी चालाक प्रशासनिक के हाथ में तो नहीं है। किसी के सुर में सुर मिलाने से पहले यह अच्छी तरह पड़ताल कर लेना कि कहीं इस सुरीले क्रांतिकारी के सुरों का कोई सप्तक किसी दूसरे आततायी के चरणों में जाकर विलीन तो नहीं हो रहा है।
‘जन’ एक महत्वपूर्ण शब्द है। दुनियाभर में अब राजनीति को इस ‘जन’ की आवश्यकता नहीं रह गई है। इस जन को एकत्रित करके शातिर लोगों ने जैसे-जैसे धोखे किए हैं, उनसे सबक लेकर इस बार कदम मिलाकर भी चलना आवश्यक है और कदम संभालकर भी…।
मुझे याद है कांग्रेस सरकार के समय राहुल गांधी ने एक बयान दिया था कि मध्यम वर्ग कैटल क्लास की तरह सफ़र करता है। इस बयान पर खूब हंगामा हुआ था। राहुल गांधी के विरुद्ध लोगों का गुस्सा फूटा था। उस समय कांग्रेस के सत्ताजनित अहंकार के परिणामस्वरूप प्रत्येक ख़बर लोगों की भावनाओं को आहत करती थी।
अब भी लगभग वही माहौल है। बस तब जनता बोलती थी, आज बोलने पर अनकही-सी मनाही है। पानी को अगर सही तरीके से निकलने का रास्ता न मिले तो वह पाइप फोड़कर निकलता है। हालांकि मैं फिर भी इस बात पर अडिग हूं कि किसी भी तरह की अराजकता अंततः हानिकारक ही सिद्ध होती है। यह बात सिस्टम को भी समझनी होगी और जनता को भी। सिस्टम को इस सोच से बाहर निकलना होगा कि अपेक्षा, बात और शिकायत दरअस्ल सिस्टम का विरोध ही हैं। ठीक इसी तरह जनता को भी यह समझना होगा कि प्रशासन चलाते समय कहा गया हर शब्द अभिधा नहीं होता।
एक और महत्वपूर्ण बात। यदि केवल अध्यापकों को राष्ट्रप्रेमी, ईश्वर के अवतार और ऐसे ही हाइपोथेटिकल विशेषणों से नवाज़ने का सिलसिला ज़ोर पकड़ गया तो मूल विषय धूमिल हो जाएगा। जैसे किसान आंदोलन के समय हुआ। जैसे डॉक्टरों की हड़ताल के समय हुआ। जैसे खिलाड़ियों के समय हुआ।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर मनुष्य में कुछ खामी हो सकती है। जिस देश में डॉ. सर्वपल्लि राधाकृष्णन और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे अध्यापक हुए हैं उस देश में कोई अध्यापक भ्रष्ट हो ही नहीं सकता, इस सामान्यीकृत धारणा से अपने समाज को बचाना आवश्यक है। और जिस देश में एक पत्रकार दारू पीकर लड़खड़ाती हुई एंकरिंग करता हुआ रिकॉर्ड हुआ है, उस देश में सभी पत्रकार दारुड़िये हैं, यह धारणा भी अपरिपक्व है। मेरा तो मानना है कि जो पत्रकार दारू पीकर न्यूज़ पढ़ता हुआ मिला है, वही पत्रकार कभी सत्ता की आंखों में आंखें डालकर प्रश्न करता हुआ मिल जाए तो उसका उस विशेष साहस के लिए सम्मान किया जाना चाहिए। और फिर वही पत्रकार किसी दिन पीत पत्रकारिता करता पाया जाए तो उसी पत्रकार की आलोचना होनी चाहिए।
पत्रकारों को यह बात समझनी पड़ेगी कि जनता का जो गुस्सा इस समय पत्रकारिता के विरुद्ध आंधी की तरह फूट रहा है, वह किसी एक पत्रकार की एक स्टेटमंेट का परिणाम नहीं है। पत्रकारों को यह याद करना होगा कि इस देश ने सुरेन्द्र प्रताप सिंह और प्रभाष जोशी सरीखे पत्रकारों को देखा है। इस देश की पत्रकारिता ने साहस और नैतिकता के इतने बड़े प्रतिमान खड़े किए हैं कि व्यावसायिकता और सत्ता के दबाव से उत्पन्न आपकी कोई भी विवशता यह देश नहीं समझ सकेगा। इसलिए अपनी रिपोर्टिंग में दबाव का अनुपात आटे में नमक जितना ही रखें। इससे अधिक दबाव दिखा तो खानेवाला आपकी रसोई के कौर को थूक देगा।
✍️ चिराग़ जैन
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सालों तक हम किसानों के लिए ‘अन्नदाता’, ‘धरती का भगवान’ और न जाने क्या-क्या विशेषण प्रयोग करते रहे। फिर एक दिन किसानों का राजनीति से पंगा हो गया। पंगा होते ही हम किसानों को ‘आतंकवादी’, ‘राष्ट्रद्रोही’, ‘दंगाई’, ‘अराजक’ और न जाने क्या-क्या कहने लगे। किसानों ने आंदोलन किया तो हमने ‘जय जवान, जय किसान’ के नारे को बांट दिया और अपने जवानों को आदेश दिया कि किसानों पर हमला करो।
इसी तरह हम डॉक्टरों को भगवान का प्रतिनिधि कहते रहे। फिर एक बार डॉक्टरों को सरकार के सामने अपनी कुछ मांगें रखनी पड़ी। चूंकि इतने सालों में डॉक्टर भी खुद को भगवान समझने लगे थे इसलिए उन्होंने सरकार को डांटने का दुस्साहस किया। सरकार ने दो मिनिट में डॉक्टरों को बता दिया कि बेटा, तुम्हें भगवान बनाना हमारी लीला है। भगवान दरअस्ल हम ही हैं।
यही हाल खिलाड़ियों का भी रहा। जिसका सरकार से पंगा हुआ, उसी को उसकी औक़ात बता दी गई। पत्रकारों ने समय पर ही सरकार की कुर्सी पर बैठे भगवान को पहचान लिया था। इसलिए उन्होंने समय से पहले ही सरकार की आरती गानी शुरू कर दी थी। सरकार ने शरणागतवत्सल की तरह पत्रकारों को अभयदान दिया।
ज्यों-ज्यों अलग-अलग वर्गों ने सरकार द्वारा दिए गए सम्मान को सरकार के विरुद्ध प्रयोग करना चाहा, तुरंत सरकार ने उन पर से दयादृष्टि हटाकर तीसरी आंख खोल दी। और एक बार जिस पर उस तीसरी आंख की ज्वाला पड़ी, उसकी प्रतिष्ठा जलकर भस्म हो गई।
जिन विद्यार्थियों को हम अब तक देश का भविष्य समझते रहे, वे सरकार के सिस्टम में खामी निकालते ही कॉकरोच बन गए। विद्यार्थियों ने कहा कि हम सरकार का विरोध नहीं कर रहे हैं, हम तो केवल चोट के दर्द से कराह रहे हैं। पत्रकारों ने बताया कि तुम्हारी कराह से सरकार की आरती का माहौल खराब होता है। यह भी राष्ट्रद्रोह ही है।
शिक्षकों ने सोचा, हमें तो गुरुपूर्णिमा, शिक्षक दिवस और ऐसे ही तमाम सम्मान प्राप्त हैं। हमें तो हर वर्ग ने हमेशा सम्मान की दृष्टि से ही देखा है। यहां तक कि हिन्दी फिल्मों में भी हम हमेशा सम्मानित ही रहे हैं। और फिर हमने जनगणना से लेकर सरकार के अन्यान्य कार्यों में भी कभी आनाकानी नहीं की। झोला लेकर गली-गली बंद और खुली नालियां गिनते फिरे हैं। पोलियो की दवाइयां पिलाई हैं। इसलिए सरकार हमारी बात अवश्य सुनेगी।
ऐसा विचार करके मास्टर जी पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने विद्यार्थियों को हुए कष्ट की दुहाई देते हुए रण में कूद पड़े। अबकी बार सरकार ने कुछ नहीं कहा। लेकिन पत्रकारों ने मास्टर जी की कौड़ी उठा दी। मास्टर बेचारा अपनी अदना सी पे-स्लिप को देखकर अपमानित होकर पानी-पानी हो गया। किसी ने मास्टर को ट्यूशनिया कहा तो किसी ने माफ़िया।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सरकार कभी ग़लत नहीं होती। जिसे सरकार में कोई ख़ामी दिखती है, वह या तो अहसानफ़रामोश है या फिर राष्ट्रद्रोही है। सरकार तो कृपानिधान है। वह तुम्हें समाज से इज़्ज़त दिलवाती है और तुम चले हो उसी पर उंगली उठाने…! हम्मम… बड़े आए!
✍️ चिराग़ जैन
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चूंकि हमें लीक पर चलना अच्छा नहीं लगता, इसलिए हम पेपर लीक कराने में कीर्तिमान बनाने लगे हैं। हम उस सिस्टम के ख़िलाफ़ हैं, जिसमें परीक्षाओं की घोषणा होते ही विद्यार्थियों की नींद उड़ जाए और अध्यापक तथा अधिकारी मज़े की नींद सोते रहें।
हमने अनवरत मेहनत और लगन से एक ऐसी व्यवस्था तैयार की है जिसमें परीक्षा की तिथि घोषित होते ही अधिकारी जागने लगते हैं। कुछ अधिकारी इस चिंता में जागते हैं कि कहीं पेपर लीक न हो जाएं। और कुछ अधिकारी इस जुगाड़ में जागते हैं कि पेपर लीक हो जाए।
जैसे ‘रस्सी के आने-जाने से सिल पर निशान पड़ जाते हैं’ वैसे ही हमारे विद्यार्थियों को भी व्यवस्था ने यह विश्वास दिलाया है कि परीक्षा हो या न हो, पेपर ज़रूर लीक होगा। मानसून के आने में देरी हो सकती है, गर्मी-सर्दी-बरसात के शिड्यूल में परिवर्तन हो सकता है। लेकिन पेपर के लीक होने का मौसम किसी सूरत नहीं टल सकता। परीक्षा टल सकती है पर लीकेज नहीं टलेगी।
परीक्षा घोषित होते ही परीक्षार्थियों में शर्त लगती है, ‘बताओ पेपर ठीक होगा या लीक होगा?’ सट्टा बाज़ार में ‘ठीक होगा’ मुफ़्त में भी कोई दांव नहीं लगा रहा है और ‘लीक होगा’ के दांव की कीमत आसमान छूने लगी है।
हमें याद है, हमारे समय में परीक्षाएं किसी युद्ध से कम नहीं होती थीं। परीक्षा की तैयारियों के लिए छात्र-छात्राएं अपने घर-परिवार के ब्याह-शादियों का मोह छोड़कर मन-मसोसकर किताबों से चिपके रहते थे। सड़ी गर्मी में दूर-दूर पड़नेवाले परीक्षा केन्द्रों पर जैसे-तैसे पहुंचते थे। और उसके बाद परीक्षा केन्द्र पर इतनी सघन चैकिंग होती थी, मानो पूरी दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष हमारे परीक्षा केन्द्र में घुसे बैठे हों। जेब से चूरण की पुड़िया तक निकलवा ली जाती थी।
इतनी सघन सुरक्षा के बीच पेपर लीक करानेवाले धुरंधरों को अंडरकवर एजेंट बनाकर पाकिस्तान भेज देना चाहिए। ये लोग देश की धरोहर हैं। इनकी प्रतिभा का सही उपयोग करने की ज़रूरत है।
पूरी धरती को काग़ज़ बनाकर, सातों समुद्रों को स्याही बना लिया जाए तो भी इन हुनरमंद लोगों के हुनर का बखान करना मुमकिन नहीं होगा। इसलिए मैं आजकल सीधे मोबाइल पर टाइप करने लगा हूं। कौन काग़ज़ और स्याही का टंटा पाले।
डिजिटल क्रांति से याद आया। हमारे यहां परीक्षा का फॉर्म भरते समय वेबसाइटों का सर्वर हांफने लगता है। तीन घंटे की फिल्म सवा दो मिनिट में डाउनलोड करनेवाले वाईफाई को भी दो पेज का फॉर्म भरने में तीन बार हार्टअटैक आ जाता है। पेमेंट गेटवे की कुशलता ऐसी है कि पेमेंट कटने के बाद नेटवर्क प्रॉब्लम उत्पन्न होती है और ट्रांज़िक्शन फेल हो जाती है। फिर कैप्चा कोड डालकर यह सिद्ध करना होता है कि हम रोबोट नहीं हैं।
फॉर्म भरने का किला फ़तह करने के बाद परीक्षार्थी फिंगर क्रॉस करके भगवान से मनाते हैं कि हे भगवान इस बार पेपर लीक न हो। परीक्षा करानेवाली एजेंसियां पेपर को किसी अनजान टापू पर किसी अंधेरी गुफ़ा में रखकर निश्चिंत हो जाती हैं। लेकिन परीक्षा के एक दिन पहले ही यह गोपनीय दस्तावेज, व्हाट्सएप्प पर फ्री डिलीवरी की तरह विचरण करने लगता है।
जिस देश में दूध की डिलीवरी फेल हो जाती है। रिटेल एप्लीकेशन्स की डिलीवरी लेट हो जाती है। लेकिन ‘पेपर लीक वॉरियर्स’ समय के इतने पाबन्द हैं कि आंधी आए या तूफ़ान इनके नेटवर्क कभी फेल नहीं होते। इसे कहते हैं डिजिटल क्रांति का सही उपयोग।
पेपर लीक होने के बाद जांच समितियों का गठन होता है। प्रभावित छात्र-छात्राएं बिलखते हुए प्रदर्शन करते हैं। अखबारों में बेरोज़गारी के आंकड़े छापे जाते हैं। टेलीविज़न पर बहस होती हैं कि कांग्रेस के शासन में ज़्यादा पेपर लीक हुए या भाजपा के ज़माने में। शोर-शराबा होता है। हंगामा मचने लगता है। लेकिन हमारी योग्य जांच समितियां बड़े सलीके से इस हंगामे को ठण्डे बस्ते में डाल देती हैं।
कुछ दिनों में परीक्षा में पूछे जानेवाले प्रश्न बदलने लगेंगे।
प्रश्न 1. वर्ष 2025 मे कुल कितने राज्यों में पेपर लीक हो पाया?
प्रश्न 2. यदि एक पेपर 10 लाख रुपये में लीक हुआ है, तो नीचेवाले बिचौलियों और उपरवाले साहबों के कमीशन के बाद मुख्य कर्मवीर को कितना मुनाफ़ा होगा?
प्रश्न 3. क्या महाभारत काल में पितामह भीष्म ने अर्जुन को अपनी मृत्यु का रहस्य बताकर पेपरलीक की महान परंपरा का प्रादुर्भाव किया था?
प्रश्न 4. जब पेपरलीक की प्रक्रिया कुछ दिनों में सम्पन्न हो जाती है, तो इसके दोषियों को सज़ा मिलने में दस-बीस साल क्यों लग जाते हैं?
वह दिन दूर नहीं जब परीक्षा की तैयारी करते परीक्षार्थी से उसका बेटा कहेगा, ‘इतनी टेंशन न लो यार पापा, भरोसा रखो, इस बार फिर पेपर लीक होगा।’
चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
ख़र्चा करते समय इधर-इधर देखनेवाला या तो डाकू से भयभीत होता है या फिर ख़ुद चोर होता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
परवानू से केबल कार में सवार होते ही रस्सियाँ हमें मोक्ष की ओर ले चलीं। मन आजकल अध्यात्म की यात्रा पर है, इसलिए ऐश्वर्य की वीथियों पर भी दृष्टि को दर्शन का योग मिल ही जाता है।
रूम चेक-इन करके बालकनी का दरवाज़ा खोला तो यकायक अपने आपको शिवालिक की पहाड़ियों से कुछ ऊँचा महसूस किया। सामने प्रकृति का विराट वैभव पसरा हुआ है। नीलाभ सौंदर्य के बीच श्वेत बादलों का अस्तित्व बड़े से कैनवास पर बेतरतीब किन्तु सार्थक ब्रश स्ट्रोक्स का आभास करा रहे हैं।
स्वयं को ऊंचाई पर देखकर अहंकार ने अंगड़ाई लेकर गर्दन ऊपर उठानी चाही ही थी, कि सूर्य की किरणों ने आँखों को छूकर सिर नीचा कर दिया।
मैं अपने बौनेपन से शर्मिंदा नहीं हुआ। बल्कि मन ही मन प्रकृति के गुरुत्व को प्रणाम किया।
अब हवाएं मेरे बालों में उंगलियां फिराती हुई मेरे साथ बालकनी में बैठी हैं। सामने एक प्याला चाय है। बादलों का अनवरत बदलता आकार कोई बिना स्क्रिप्ट का नाटक कर रहा है।
मैं ऊँची बालकनी में बैठकर विहंगम दृष्टि से विहंग विहार का सुख भोग रहा हूँ। सीढ़ीनुमा खेतों के बीच छिटकी हुई आबादी दिखाई दे रही है। एक सर्पिली सड़क एक पहाड़ को दूसरे पहाड़ से जोड़ती हुई सांप-सीढ़ी खेल रही है। दृष्टि एक क्षण में खेतों की सीढ़ियां चढ़ती है और दूसरे ही क्षण सड़क के घुमावदार फिसलाव पर फिसल जाती है।
सूरज की चमक अब शीतल होने लगी है। सामने अस्ताचल अपने यायावर का स्वागत करने को तैयार हो रहा है।
सन्नाटे में सुई की आवाज़ का तो नहीं पता लेकिन शांत मन में सांसों की आवाज भी स्पष्ट सुनाई दे रही है।
हवा की पालकी पर सवार अलग-अलग परिंदों के स्वर एक अलौकिक संगीत की सर्जना कर रहे हैं। तोतों और गौरैया के स्वर इस संगीत में अलग पहचाने जाते हैं।
एकाध टिटहरी और एक जंगली मुर्गा लगातार संगीत के बीच कुछ अलग राग अलाप रहे हैं।
और मैं एकांत में अपने अस्तित्व को भोग रहा हूँ!
हुआ एक मुद्दत के बाद आज तन्हा
लगा जैसे कोई बिछड़कर मिला है
✍️ चिराग़ जैन