Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
कवि होने की न्यूनतम अर्हताओं में एक अदद मन की आवश्यकता होती है। और मन भी साधारण नहीं; बल्कि ऐसा मन, जिसका करुणा-कोष अक्षय हो। जिसकी कल्पना का आकाश दिखाई तो सबको दे, लेकिन उस तक पहुँचना सहज संभव न हो। जिसकी दृष्टि विहंगम हो। जिसकी आकांक्षाओं में समस्त सृष्टि के लिए शुभ की कामना हो। जिसकी उत्कंठाओं में हर किसी के लिए स्वप्नपूर्ति का अवकाश हो। जो सपनीला हो… जो संगीतमयी हो…!
वैभव की तेज़ रौशनी कब किसी अश्रु में से गुज़रकर इंद्रधनुषी हो उठी है, यह जिसकी आँखों को अनायास दिखाई दे जाए, वह कवि है। कविता के किसी भी रस को साध लेने के लिए इन गुणों की साधना आवश्यक है। डॉ. कीर्ति काले की रचनाओं का मुख्य रस शृंगार है, इसलिए उनका रचनाकार, संवेदना के इस महीन अस्तित्व के प्रति अधिक उत्तरदायी है। वियोग शृंगार के लिए तो फिर भी करुणा की वीथियाँ उपलब्ध हो जाती हैं, किंतु सयोग शृंगार के लिए तो प्रेम के उद्वेग में अनदेखे रह जानेवाले पलों को लपकने का कौशल अपेक्षित है।
इसके लिए प्रेम को भरपूर जीना होता है। इसके लिए प्राप्ति के आनन्द को परत-दर-परत निहारना होता है। इसके लिए फूल की एक-एक पाँखुरी का, एक-एक पर्ण का निकट से अन्वेषण करना होता है। प्रेम की कविताएँ लिखने के लिए कवि को प्रेमियों का मनोविज्ञान भोगना होता है। और रचनाकार एक बार इस मनोविज्ञान को छू ले, तो फिर उसकी रचनाओं में उत्सव की जो खनक उतरती है, वह श्रोता के मन को सम्मोहित करने में सक्षम हो पाती है।
डॉ. कीर्ति काले के काव्यपाठ में मैंने दर्जनों बार यह खनक सुनी है। उनके बिम्ब और प्रतीक इस बात की गवाही देते हैं कि उनकी रचनाएँ पुरानी परंपरागत रचनाओं के प्रभाव से उत्पन्न प्रतिबिम्ब मात्र न होकर, बाक़ायदा सर्वहितकारी साहित्य में गणित होने योग्य हैं। मुझे आज भी याद है, वर्ष 2002 में दिल्ली के एक कवि-सम्मेलन में जब पहली बार डॉ. कीर्ति काले को सुना था, तो उनका पहला ही कवित्त ‘नीम की निंबोरी’ से प्रारंभ हुआ। इस बिम्ब से किसी अल्हड़ किशोरी की मनोदशा का चित्रण हो सकता है, यह मेरे लिए सुखद आश्चर्य का विषय था। निंबोरी जैसा सामान्य फल, जो धरती पर पददलित होकर उपेक्षित रहने को अभिशप्त था, उसे कविता में सजाकर सौंदर्य का उपमान बना देना कवयित्री का ऐसा कौशल था, जिसने मुझे उन्हें ध्यान से सुनने के लिए प्रेरित किया।
इसके बाद जब-जब भी इस सृजनात्मक हृदय की कविताओं का उपभोग किया तब-तब आश्वस्त हुआ कि मैंने इन्हें पढ़ने-सुनने के लिए समय की जो कीमत चुकाई है, वह कम ही है। मेरे भीतर के रचनाकार को डॉ. कीर्ति काले की लेखनी से सात्विक ऊर्जा प्राप्त हुई है। उनके कितने ही गीत ऐसे हैं, जिन्होंने मेरे एकाकी मौन के वातायन में गुनगुनाहट भरी है।
‘याद फिर बुनने लगी है मखमली स्वेटर’ -इस गीत ने रह-रहकर मेरे मन की रोमावली पर गुनगुनी धूप का लेप किया है। कविता जितनी बारीक़ होगी, उतना ही अधिक रस उलीचेगी। इस गीत में न केवल स्वेटर बुनने की याद बुनी गई है, बल्कि एक-एक फंदे और एक-एक सिलाई की बुनावट में उंडला प्रेम भी शब्दाकार हो गया है। ‘धीरे-धीरे घट रहे हैं रात के फन्दे, पोरुओं ने छू लिए दिनमान के कंधे…’ अहा! कविता का कल्पनालोक चाहे, तो स्वेटर के फंदों से पूरी प्रकृति का आलिंगन कर सकता है। यही तो कवि की शक्ति है। इसीलिए तो कवि को ब्रह्मा कहा गया है।
ज्यों-ज्यों आप कीर्ति जी को और पढ़ोगे, त्यों-त्यों आपको इस बात पर और विश्वास होता जाएगा कि वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान। ‘दूर तक दृष्टि जाकर सिहर-सी गई, देखते-देखते दृश्य ओझल हुआ’ -गीत की यह पंक्ति रचनाकार के भीतर के उस दृष्टा का अवधान प्रदर्शित करती है, जो अपनी ही दृष्टि को देखने के लिए भी अपने साक्षीभाव को सचेत रखता है। शोक के जिस पल में आँखों की पुतलियाँ अश्रु अतिरेक के कारण कुछ नहीं देख पातीं, ऐसे में उन अश्रुओं के उस पार दूर तक दृष्टि ले जाना बड़ा जीवट का काम है और उससे भी कठिन है इस पार आँसुओं से जूझती पुतलियों के संघर्ष की गवाही देना। किसी नाटक के बीच ही जब यवनिका पतन हो जाए, तो ऐसे में उस दुर्घटना से भी नाटक का एक दृश्य बुन लेना किसी विलक्षण प्रतिभा के बूते ही संभव हो सकता है। कीर्ति जी ने इस गीत में ऐसे ही असंभव को संभव कर दिखाया है।
उनका एक गीत और है- ‘जब भी मन की माला फेरी, मर्यादा ने आँख तरेरी’। इस गीत की इन दो पंक्तियों में एक पूरे उपन्यास का कथानक समाहित हो गया है। सृजन के लिए मन और मर्यादा के मध्य जो संघर्ष होता है, वह पूरा संघर्ष अनायास ही इन दो पंक्तियों में उतर आया है। ऐसी पंक्तियाँ रचने के लिए किसी कवि को ज्ञान की नहीं अपितु किसी अदृश्य शक्ति के आशीर्वाद की आवश्यकता होती है। मर्यादा की सीमा से बाहर जाकर जिन्होंने मन की माला फेरी है, उन सब पुरखों का वर्णन कीर्ति जी ने इस गीत में पूरे दम-ख़म के साथ किया है। इस गीत में एक जगह कीर्ति जी लिखती हैं- ‘ईश्वर की आँखों से छलके होंगे सूरज-चंदा-तारे।’ यह पंक्ति विज्ञान की तमाम पोथियों को चुनौती देती है। लेकिन यह चुनौती इतनी ख़ूबसूरत है कि एक बार तो स्वयं विज्ञान भी ठिठककर इस पंक्ति को सच मान बैठता है। यह कविता का सम्मोहन है।
डॉ. कीर्ति काले के सृजनलोक में ऐसे सम्मोहन की अनेक वेदियाँ विद्यमान हैं। उनकी लेखनी से निःसृत सहज रचनाओं में एक ऐसा चुम्बकीय गुण है जो रसिकों को सहज ही अपने पाश में जकड़ लेता है।
हिन्दी कवि-सम्मेलन जगत् में तीन दशक से अधिक लम्बी यात्रा के बाद भी कीर्ति जी के स्वर की खनक और गीतों का प्रभाव कम नहीं हुआ है। इसका कारण यही है कि कवि-सम्मेलन के भीड़ भरे मेले में विचरते हुए भी वे अक्सर अपने रचनाकार का आश्रम सजाने के लिए मन का एकान्त खोजने में समर्थ हैं। सृजन के पारलौकिक शक्तिसूत्रों से यही अपेक्षा है कि वह डॉ कीर्ति काले जैसे रचनाकारों को उनके हिस्से का इतना एकन्त सदैव उपलब्ध कराएँ कि वे सरस्वती के इस असीम आकाश में अनवरत कुछ सितारे टाँकती रह सकें।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
आचमन, हिन्दी की वाचिक परम्परा का एक ऐसा नया पौधा है जो अपने शैशव काल में ही नन्हें अंकुरों के लिए वटवृक्ष की भूमिका निर्वाह कर रहा है। जिस दौर में कवि सम्मेलन की सरलता पर अव्यवस्थित चमक-दमक का आधिपत्य स्थापित होने लगा हो, उस दौर में सुव्यवस्थित सादगी से कवि सम्मेलन के मंच को कविता योग्य बनाने का उपक्रम है आचमन।
तीन वर्ष की छोटी सी यात्रा में आचमन ने यह पहचान कायम की है कि इस आयोजन में कविता से अधिक महत्वपूर्ण, कुछ भी नहीं है।
पिछली 18 तारीख़ को आचमन की तीसरी कड़ी लखनऊ में संपन्न हुई। मैं सुखद आश्चर्य से भर गया, जब मैंने भावना श्रीवास्तव और मनु वैशाली की वेशभूषा की सादगी देखी। मैं भीतर तक रस सिक्त हुआ जब योगी योगेश शुक्ल और विनोद श्रीवास्तव सरीखे रचनाकारों ने बिना किसी मंचीय टोटके के पूरे वातावरण में कविता का इत्र छिड़क दिया। हम रोज़ मंच पर बोलते हैं कि उर्दू और हिंदी दो बहनें हैं, लेकिन उस शाम जब इक़बाल अशहर अपना कलाम पढ़ रहे थे तो ऐसा लगता था कि मीर की मज़ार की कोई अगरबत्ती बाबा तुलसी की समाधि पर लगा दी गई हो।
…क्या-क्या बयान करूँ, उपदेश शंखधार जी जब गीत पढ़ रहे थे तो ऐसा प्रतीत होता था मानो हिन्दी कवि सम्मेलनों का चार-पाँच दशक पुराना दौर लौट आया हो, जब आयु के प्रभाव को अनदेखा करते हुए वयोवृद्ध गीतकार शृंगार के कोमल गीत बेहिचक पढ़ लेते थे।
चन्द्रशेखर वर्मा की शायरी और उसके बीच बीच में सहज चुटकियाँ मन को गुदगुदाने के साथ-साथ भिगो भी रही थीं।
यह आचमन के सत्व का ही सुयश था कि डॉ हरिओम पंवार का क्रुद्ध रश्मिरथी भी उस दिन शीतल होकर उर्वशी के पृष्ठ पलटते देखा गया।
डॉ सोनरूपा विशाल का संचालन ऐसा था मानो साहित्यिक कुनबे की एक सुगढ़ बिटिया पूरे परिवार को एक-एक कर जीमने के लिए पुकार रही हो।
मंच तो मंच, दर्शक दीर्घा तक में विलक्षणता विद्यमान थी। डॉ सर्वेश अस्थाना, शिखा श्रीवास्तव, रामायण धर द्विवेदी, अभय निर्भीक, प्रवीन अग्रहरि, मुनेन्द्र शुक्ल, अक्षत अशेष, स्वधा रवीन्द्र, पवन प्रगीत, अतुल वाजपेयी, गिरधर खरे और न जाने कितने ही सक्षम रचनाकार श्रोताओं के बीच विराजित थे!
आचमन की इस बेला में अपनी छोटी सी अंजुरी में कुछ बूंद रस लेकर लौटा हूँ, लेकिन ये कुछ बूंदें देर तक सृजन को तर रखेंगी।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
वर्ष 2005 में हिंदी कवि सम्मेलन टेलिविज़न के परदे पर नए रूप में अस्तित्व खोज रहे थे। तमाम चैनल प्राइम टाइम में कवि सम्मेलन दिखा रहे थे, लेकिन कवि सम्मेलनों का परंपरागत प्रारूप टीवी के फॉर्मेट में फिट नहीं हो पा रहा था। ऐसे में सम्भवतः 2005 में talent hunt का प्रयोग करके कवि सम्मेलन का प्रारूप टीवी के अनुरूप बनाने का प्रयोग किया गया। प्रयोग बहुत सफल तो नहीं रहा लेकिन यहाँ से यह बात सिद्ध हो गई कि बिना स्वरूप परिवर्तन के कवि-सम्मेलन को अधिक समय तक टीवी पर दिखाना सम्भव नहीं है।
इस talent hunt में मैं भी एक प्रतिभागी था, निर्णायक मंडल में थे श्री ओमप्रकाश आदित्य, डॉ बशीर बद्र और उर्वशी ढोलकिया। एंकर थे शैलेश लोढा और तनाज़ करीम। शंभू शिखर, पवन आगरी और रमेश मुस्कान सरीखे कवि भी इस प्रतियोगिता में भाग ले रहे थे।
मेरा शैलेश भाई से पहला परिचय पहले हो चुका था, लेकिन इस शो के सेट पर उनकी लगभग सनकी धुन ने मुझे बहुत प्रभावित किया।
इसके बाद मैंने अनेक बार शैलेश भाई से मुलाकात की। हर समय शरारत से भरे रहना और हर क्षण सतर्क रहने का उनका कौशल देखकर, उन्हें और अधिक जानने की जिज्ञासा जी उठी।
समान्य दृष्टि से उन्हें समझ पाना सम्भव नहीं है। उनसे जब मिलो, वे किसी अलग मानसिकता अथवा दार्शनिक अवस्था में मिलते हैं। मुंबइया जीवन की रूखी व्यावसायिकता से घिरे हुए जब उन्हें कवि सम्मेलन का कोई पुराना साथी मिल जाता है तो वे एक झटके में ग्लैमर और सेलिब्रिटिज्म का कोट उतारकर, कवि सम्मेलन के देसी गमछे से मेकअप पोंछ डालते हैं। इस अनुष्ठान के उपरांत वे जोधपुर के बेहद भावुक और सरल इंसान बन जाते हैं। इस अवस्था में वे सिर से पाँव तक खालिस ‘दोस्त’ होते हैं। इस समय उन पर अधिकार जताया जा सकता है, इस समय उनसे बेतकल्लुफ बातचीत की जा सकती है, इस समय उनके साथ ‘जी लगदा यार फकीरी में’ का अनुभव लिया जा सकता है।
इसी समय में वे अपने सर्वाधिक ख़ूबसूरत पल जी रहे होते हैं। इस समय वे सर्वाधिक निश्चिंत होते हैं।
लेकिन इस निश्चिंतता में कोई ख़लल न पड़े, इसलिए इस निश्चिंत महफ़िल को संजोने में वे कई बार आवश्यकता से अधिक चौकन्ने रहने का प्रयास करते हैं। दोस्तों पर वे संदेह नहीं करते, लेकिन किसी को दोस्ती के दायरे तक लाने से पहले अच्छी तरह विचार अवश्य करते हैं।
उनकी भावुक आँखों में उतरी पनीली लकीरों में मुझे भावुकता के हाथों छले जाने के उनके कटु अनुभवों को कई बार लाली बिखेरते देखा है।
अतीत की यादों का सूरज जब आँखों में उगता है तो कड़वाहट से आंखें लाल हो जाती हैं और भावुकता से नम!
मैंने नमी और लाली के इस क्षितिज पर अपनी व्यस्तता से जूझकर अपने लिए मुट्ठी भर समय जीत लाने वाले शैलेश लोढा को हर बार दिल से प्यार किया है, और अपने मन की महफ़िल के सम्मोहन से मुख मोड़कर अपनी व्यस्तता के घने जंगल की ओर दौड़ जाने वाले शैलेश लोढा का जी भर आदर किया है।
✍️ चिराग़ जैन
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हम अक्सर राजनीति से नाराज़ रहते हैं कि राजनीति असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए फालतू के विवादों में क्यों उलझाती है; हमें स्वयं से भी यह प्रश्न पूछना चाहिए कि हम भी वास्तविक विषयों से भटककर फालतू विवादों में क्यों उलझते हैं।
राहुल गांधी गुरुद्वारे गए, मोदी जी मंदिर गए, फलाने जी ने दलित के घर खाना खाया, फलाने जी ने फलाने जी को जूता मारा, फलाने जी चीते ले आए, फलाने जी ने मोटरसाइकिल चलाई… क्या मतलब है हमारा इन सबसे? हमने भी तो इन्हीं सब पर पोस्ट लिख लिखकर सोशल मीडिया के ट्रेंड सेट किए हैं!
जितने लोगों ने भाजपा को साम्प्रदायिक सिद्ध करने के लिए ट्वीट किए हैं, उतने लोग यदि देश की सड़कों की बदहाली का सवाल उठाते तो राजनीति को हिन्दू-मुस्लिम छोड़कर सड़कों की मरम्मत के लिए विवश होना पड़ता। जितने लोगों ने राहुल गांधी को ‘पप्पू’ घोषित करने के लिए पोस्ट की हैं, उतने लोग यदि चिकित्सा व्यवस्था की हालत अपनी पोस्ट में बयां करते तो हर राजनैतिक दल के घोषणा पत्र में चिकित्सा तंत्र का उपचार प्रथम वरीयता पर होता। जितने ट्वीट केजरीवाल का मज़ाक बनाने पर पोस्ट हुए हैं, उसका कुछ अंश भी बदबूदार रेल्वे कम्पार्टमेंट, बास मारते प्लेटफॉर्म और ढीठ हो चुके कर्मचारियों पर होने लगते तो हम व्यवस्था को स्वस्थ रेल्वे उपलब्ध कराने के लिए विवश कर सकते थे।
लेकिन वास्तविकता यह है कि हमें स्वयं अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की कोई चिंता नहीं है। हमें भी राजनीति के खेल-तमाशे में बड़ा मज़ा आता है। इसीलिए राजनेताओं को भी अपना मज़ाक़ बनानेवालों से कोई फर्क़ नहीं पड़ता, क्योंकि वे जानते हैं कि जितनी देर हम राजनीति का मखौल बना रहे होते हैं, उतनी देर हम दरअस्ल अपनी ही परिस्थितियों की खिल्ली उड़ा रहे होते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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पुलिसकर्मी सड़क पर किसी रिक्शावाले को गरियाते हुए दिखाई देता है, तो हम पुलिसकर्मियों को राक्षस और रिक्शावाले को बेचारा मान बैठते हैं। लेकिन यही रिक्शावाले जब पूरी सड़क घेरकर आपको निकलने का रास्ता नहीं देते, तब हमें ये रिक्शावाले दुष्ट और पुलिसकर्मी रिश्वतखोर लगने लगते हैं। सारे ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करते हुए जब कोई रिक्शावाला जब चाहे, जहाँ चाहे घुस जाता है; दो-दो लेन घेरकर चलता है, रेड लाइट जम्प करता है; तब हमारा मन करता है कि उसे धक्का देकर सड़क से बाहर फेंक दें। उस समय हमें उसका ग़रीब होना दिखाई नहीं देता।
हम भारतीय अक्सर भावुकता में अपने मन की धारणाएं बनाते हैं। इसीलिए जब कोई नेता दिल्ली में आकर ई-रिक्शा वितरित करता है तो उसकी दरियादिली और भाषणबाज़ी से भावुक होकर हम तालियाँ पीटने लगते हैं। भावुकता के इस शोर में हमें उस नेता से यह पूछना याद ही नहीं रहता कि जिस शहर की सड़कों पर ई-रिक्शा का यह ज़खीरा छोड़ दिया गया है, उसके चौराहों पर इनके स्टैंड बनाने की कोई जगह ही नहीं है। जो रिक्शावाले इनको लेकर सड़कों पर लहरा रहे हैं, उन्हें लेन, रेड लाइट, जेब्रा क्रॉसिंग, इंडिकेटर जैसे शब्दों के मतलब ही नहीं पता।
सड़कें ट्रैफिक के बोझ से त्राहिमाम का उद्घोष कर रही हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के निवासी पाँच मिनिट में एक किलोमीटर की औसत से गाड़ी चला रहे हैं। मथुरा रोड, नोएडा, कालिंदी कुंज, जमुना बाज़ार, आईटीओ, मिंटो रोड, करनाल बाईपास, उत्तम नगर, पालम फ्लाईओवर, पंजाबी बाग़, आश्रम चौक, मायापुरी, पटेल नगर, भजनपुरा, लक्ष्मी नगर, लालकिला, गुरुग्राम, महिपालपुर, संगम विहार और ओखला जैसे दर्जनों स्थानों पर कभी भी ट्रैफिक जाम की प्रदर्शनी देखी जा सकती है। लेकिन हम इसी बात पर लड़ रहे हैं कि G20 से पहले दिल्ली को नयी बसें मोदी जी ने दी हैं या केजरीवाल ने। हमारे दिमाग़ में यह सवाल कौंधता ही नहीं है कि सवारियाँ लेने-छोड़ने के लिए इन बसों के जो स्टॉप बने हुए हैं उनके लिए सड़क पर “D” की व्यवस्था नहीं है। हमने यह प्रश्न ही नहीं पूछा कि पुरानी बसों के ड्राईवर सड़कों पर तांडव करना कब बंद करेंगे? जगह जगह ख़राब होकर खड़ी बसों को जल्दी से जल्दी हटवाने की सुविधा कब मुहैया की जाएगी?
इस समय इस देश की आवश्यकता केवल इतनी है कि यहाँ की जनता विवेक की साधना करे। कौन नेता मंदिर गया, किसकी पार्टी का नेता मस्जिद जाता है, किसने जनेऊ पहना है, किसने तिलक लगाया है… इन सब सवालों को छोड़कर एक बार इस बात की चिंता की जाए कि जब हम आस्था से भरकर मंदिर या मस्जिद की ओर चलें तो ट्रैफ़िक जाम में फँसकर हमारी आस्था मुरझा न जाए, किसी की रैश ड्राइविंग से प्रभावित होकर हमारे होंठ से ईश्वर-अल्लाह का नाम भूलकर किसी अपशब्द का उच्चारण न कर बैठें।
पेड़ की जड़ों से सड़ांध उठ रही है। इससे जनता का दिल घबराने लगता है तो राजनीति पेड़ की शाखाओं पर पेंट करवा देते हैं। हमें पेड़ स्वस्थ लगने लगता है। हम इस बात में भटक जाते हैं कि डाल पर हरा पेंट करानेवाला नेता अच्छा है या सन्तरी पेंट करानेवाला। जड़ों की सड़न से तना भी गल गया है। और हम इस गले हुए पेड़ की सूखी हुई डालियों पर पोते गए पेंट पर तालियाँ पीट रहे हैं।
लिजलिजे कीड़े पूरे वृक्ष को भीतर ही भीतर चाट रहे हैं। अब तने के ऊपर भी हज़ारों कीड़े रेंगते दिखाई देते हैं और हम इस बात पर खुश हो रहे हैं कि जहाँ से हम देख रहे हैं वहाँ से हमें केवल दूसरी डाल पर कीड़ों का अटैक दिख रहा है। सब अपनी आँखें मसलते हुए सामनेवाले को चिढ़ा रहे हैं कि देख तेरी आँख में कीड़ा घुस गया है।
✍️ चिराग़ जैन
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विश्वास कीजिए, राजनीति ने हमें वहाँ तक पहुँचा दिया है, जहाँ उम्मीद की हर लौ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।
विश्वास कीजिए, हमें अपनी संतानों को इस दौर के उस पार सुरक्षित पहुँचाना है तो हमें स्वार्थी होना पड़ेगा। पूरा देश डकार जानेवाली राजनीति हमें दशकों से यह नसीहत देती रही है कि हमें निजी स्वार्थों की चिंता छोड़कर समाज की चिंता करनी चाहिए। हमने भी यह वाक्य सूक्ति की तरह रट लिया। अब जब भी कभी हम व्यवहारिक धरातल पर खड़े होकर अपनी मूलभूत ज़रूरत का सवाल उठाते थे तो हमें स्वार्थी कहकर लानत भेजी जाने लगी।
हम समाज और राष्ट्र के समग्र विकास की प्रतीक्षा में टकटकी लगाए बैठे रहे और राजनेता ‘राष्ट्रहित’ की ओट में अपने हित साधते रहे। हम पाई-पाई जोड़कर भरपाई करते रहे और राजनीति के नुमाइंदे हज़ारों करोड़ के घोटाले करके विदेश निकल लिए।
शर्मनाक है ये कि जिस देश की जनता में भुखमरी और कुपोषण जैसे अभिशाप ज़िंदा हैं, उस देश के धन का बड़ा सारा हिस्सा विदेशी बैंकों में जमा है। इससे भी अधिक आश्चर्यजनक यह है कि स्वयं राजनेताओं ने यह स्वीकार किया है कि उन्हें इस काले ख़ज़ाने के विषय में जानकारी है। लेकिन इस धन को वापस लाने के लिए कोई सरकारी प्रयास दिखाई नहीं देता। उल्टे भारत के क़ानून द्वारा अपराधी सिद्ध हो चुके भ्रष्टाचारी, राजनीति के शीर्ष की कानूनी नुमाइंदगी करनेवालों की शादी में दारू पीकर नाचते ज़रूर दिखाई दे गए।
विश्वास कीजिए, राजनीति के इस दरिया में सत्ता और विपक्ष की कुल लड़ाई मगरमच्छों और घडियालों का आपसी संघर्ष है। इनमें से किसी की भी जीत-हार से जनता को कोई फर्क़ नहीं पड़ेगा। ये ऐसे ही है ज्यों खूँटे पर बंधी बकरियां दो शेरों की लड़ाई में किसी एक की जीत की दुआ मना रही हों। जबकि प्रतियोगिता की शर्त ही यह है कि ज़्यादा बकरियां जिसका साथ देंगी, अगली प्रतियोगिता तक वह जैसे चाहे, वैसे, बकरियों से पेट भरेगा।
विश्वास कीजिए, अब समय आ गया है कि जब भी कोई हमें परमार्थ और राष्ट्रहित की पट्टी पढ़ाकर हमारी खाल उतारने आए तो उसकी आंख में आंख डालकर पूछा जाए कि उसको अपनी खाल देने से हमारा पेट कैसे भरेगा?
विश्वास कीजिए, सब अपनी-अपनी ज़रूरतों के सवाल पूछने लगे तो हमसे पाई-पाई लूटकर कोई अपनी चारपाई पर सोने की मँढ़ाई नहीं करवा सकेगा।
विश्वास कीजिए, यदि हमने अपनी खाल उतारकर देनी बंद कर दी, तो पूरे देश के जिस्म पर तन ढंकने के लिए कपड़े उगने लगेंगे।
विश्वास कीजिए, यदि हमने अपनी थाली की दो रोटियों को वरीयता देनी शुरू कर दी तो काली तिजोरियों में बंद रोटियाँ ख़ुद-ब-ख़ुद भूखे पेटों तक पहुँच जाएंगी।
विश्वास कीजिए, अपनी बेहतरी के लिए दूसरों से उम्मीद लगाकर बैठने का वक़्त बीत चुका है। विश्वास कीजिए, अब अपने-आप पर विश्वास करने की ज़रूरत है।
✍️ चिराग़ जैन