Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हमने ऐसी हर कोशिश को नाकाम कर दिया, जिसने हमें ‘भीड़’ से ‘जनता’ बनाना चाहा। हमें भीड़ बने रहना पसंद है। हम भीड़ बनकर जीते हैं और भीड़ बनकर मर भी जाते हैं। इसीलिए हमारे अख़बारों की सुखिऱ्याँ हमारा नाम नहीं जानतीं। कभी यात्री, कभी श्रद्धालु, कभी किसान, कभी तीर्थयात्री, कभी विद्यार्थी, कभी मज़दूर, कभी आदिवासी और कभी पुलिसवाले बनकर हम मर जाते हैं; हमारा कोई नाम नहीं होता। हमें एक ‘भीड़’ के नाम से जाना जाता है।
अपराधियों के नाम होते हैं, लेकिन निरपराध का कोई नाम नहीं होता। अपराध तो छोड़िए साहब, हम शहर में गाड़ी लेकर निकलते हैं, कहीं किसी कारणवश गाड़ी सड़क के किनारे रोकते हैं तो पुलिसवाला हमें भीड़ की तरह यह कहकर खदेड़ देता है, ‘यहाँ गाड़ी खड़ी करना मना है’। हम पूछते हैं, ‘तो फिर कहाँ खड़ी करें?’
इस प्रश्न का उत्तर उसके पास नहीं होता। वह डाँट देता है, ‘यहाँ से आगे ले बे!’ हम आगे ले लेते हैं।
हमारे तंत्र ने जिन देशों की सड़कों के किनारे से ‘नो पार्किंग’ का डिज़ाइन टीपा है, उन देशों से हम व्यवस्थित पार्किंग सिस्टम की कॉपी करना भूल गए।
विश्व समुदाय भी हमें कोई विश्वगुरु नहीं मानता, उनके लिए भी हम केवल एक भीड़ हैं। एक भीड़, जिसे अपना माल बेचा जा सकता है। एक भीड़ जिसे सपने बेचे जा सकते हैं।
शुरुआत में राजनीति भी हमें ‘जनता’ कहकर ही संबोधित करती है लेकिन अंततः वह हमें ‘भीड़’ की तरह इस्तेमाल करती है। जिस मंच से वह हमें जनता कहकर हमसे वोट मांग रहे होते हैं, उसी मंच की रिपोर्टिंग में हमें भीड़ कहा जा रहा होता है और हम तालियाँ पीट रहे होते हैं।
अगर कहीं जनता के लिए राजनीति के हाथों कुछ हितकर्म हो भी जाए, तो हम भीड़ बनकर उस विकास की ऐसी धज्जियाँ उड़ाते हैं कि राजनीति को अपने किए पर क्रोध आने लगता है। फिर वह हमें साम्प्रदायिक भीड़ में बदल देती है, फिर वह हमें जातियों की भीड़ में बदल देती है। हम ख़ुशी-खुशी भीड़ बन जाते हैं और दूसरी भीड़ के विरुद्ध गालियाँ तलाशने लगते हैं।
हमें भीड़ बनकर लड़ने की आदत हो गई है। हमें जैसे ही कोई साइनबोर्ड मिलता है, हम तुरंत उसके नीचे भीड़ बनकर जुटने लगते हैं। ‘गांधी’; ‘लोहिया’; ‘अम्बेडकर’; ‘हेडगेवार’; ‘कांशीराम’; ‘जयप्रकाश’; ‘मोरारजी’; ‘वीपी सिंह’; ‘मुलायम’; ‘माया’; ‘जयललिता’; ‘करुणानिधि’; ‘ठाकरे’; ‘अन्ना’; ‘केजरीवाल’; ‘मोदी’; ‘राहुल’; ‘ओवैसी’… ये सब हमारे लिए साइनबोर्ड बन गए और हम इनके नीचे भीड़ बनकर जुटते रहे।
इन सबने हमें मनुष्य बनाना चाहा तो हमने इनको पूरी ताकत से यह एहसास कराया कि हमें इंसान समझने की ग़लती मत करना। हमें भीड़ समझो, वर्ना हम तुम्हारे खिलाफ़ खड़े होकर तुम्हें औंधे मुँह गिरा देंगे।
✍️ चिराग़ जैन
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महाभारत के महाविनाश की दोषी न तो दुर्योधन की हठधर्मिता है, और न ही धृतराष्ट्र की नेत्रहीन महत्वाकांक्षा! महाभारत के युद्ध में जो रक्तपात हुआ उसका गोमुख उस पट्टी से निसृत है जो सनेत्रा गांधारी ने अपने विवेक की आँखों पर बांध ली थी।
ठीक इसी तरह वर्तमान दुर्घटनाओं के लिए न कुम्भ दोषी है, न धर्म और न ही सरकार। इन सब हादसों की अपराधी है अपना विवेक गंवा चुकी जनता।
राजनीति तो हमेशा ही विवेक की आंखें फोड़कर सत्ता पर अधिकार करती रही है। राजनीति की तो यह प्रवृत्ति ही है। किन्तु राजनीति के गलियारों से चलनेवाली उन्माद की आँधी में अपनी व्यवस्था की धज्जियाँ देखकर ताली पीटना आश्चर्यजनक है।
महाभारत इसलिए वीभत्स नहीं था कि उसमें शव गिरे थे, महाभारत इसलिए भयानक था कि उस युद्ध में मृतक के संबंधी शोकाकुल कम और उन्मादी अधिक हो रहे थे।
उन्माद किसी का हित नहीं कर सकता। उन्माद किसी की रक्षा नहीं कर सकता। श्रद्धा की भी एक मर्यादा होती है। नदी में बहता नीर अमृत कहलाता है, किन्तु यही अमृत जब तटबंध तोड़कर जीवन को लीलने लगता है तो इसे माथे नहीं चढ़ाया जाता। मर्यादाहीन नदी भी निंद्य हो जाती है। ऐसे में मर्यादाहीन आस्था कैसे हितकर हो सकती है।
जो लोग परस्पर कुम्भस्नान की याद दिला रहे हैं, वे ही शासन को व्यवस्थित संसाधनों की याद दिलाते रहेंगे तो कुंभकर्ण की नींद सोने वाले जाग सकते हैं। नई दिल्ली स्टेशन पर मरनेवालों के मन में अंतिम समय कुम्भ के प्रति आस्था अधिक रही होगी या व्यवस्था के प्रति क्रोध अधिक रहा होगा या फिर असभ्य नागरिकता के प्रति निराशा… यह तो कोई नहीं जानता, लेकिन यह सत्य है कि धर्म की ओट में खड़ी नाकारा व्यवस्था ने जिस कपड़े में अपना मुँह चुराया है, उसका रेशा-रेशा जनता के अविवेक से बना है।
किसी का कद नहीं ऊँचा हुआ है
मेरी आवाज़ छोटी हो गई है
✍️ चिराग़ जैन
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एक समय वह था, जब भारतीय राजनीति, ट्रेन की जनरल बोगी को कैटल क्लास कहती थी। राजनीति के इस स्टेटमेंट से हम आम भारतीयों को बहुत दुःख हुआ। हमने राजनीति को भरपूर गालियाँ दीं। हमने उन गंदे ट्रेन कोच को और सड़ांध मारते सिस्टम को सुधारने की जगह, उनमें यात्रा करनेवालों को बताया कि देखो तुम्हें मवेशी समझा जा रहा है।
यह जानकर तथाकथित मवेशी बहुत क्रुद्ध हुए। उन्होंने सींग मार-मारकर राजनीति का सिंहासन तोड़ दिया। सत्ता बदल गई। अब आरक्षित बोगी तक ‘ठुँसने’ की सुविधा मिल गई। नई राजनीति ने मवेशियों का धन्यवाद करते हुए उन्हें थ्री टियर एसी तक घुसने की सुविधा दे दी। आरक्षण करवानेवालों के अत्याचारों का बदला लेने के लिए आरक्षण करवाने पर तरह-तरह के कर लगा दिए गए। आरक्षित वरिष्ठ नागरिकों के लिए दी जानेवाली छूट समाप्त कर दी। वेटिंग की टिकट रद्द करवाने पर भी जुर्माना लगा दिया।
आरक्षण करवानेवालों से बदला लेने के लिए उनकी बोगी में नियुक्त अटेंडेंट की भर्ती को निजी कंपनियों को सौंप दिया। अब ये आरक्षित लोग फर्स्ट एसी में सारी रात अलार्म बजाये जाते हैं और ‘नौकरी जाने के भय से मुक्त’ अटेंडेंट कोच की कूलिंग बढ़ाकर सोता रहता है।
अब धीरे-धीरे स्थिति सुधर रही है। अमीर-ग़रीब के बीच की खाई पटने लगी है। व्यवस्था जानती है कि स्लीपर क्लास के शौचालयों को वातानुकूलित जैसा नहीं रखा जा सकता, इसलिए उन्होंने वातानुकूलित कम्पार्टमेंट के शौचालयों को जनरल क्लास जैसा रखना शुरू कर दिया। इसे कहते हैं, ‘समानता का अधिकार’।
निजी ट्रैवल पोर्टल पर रेल की टिकट कन्फर्म न होने पर दोगुने पैसे देने का दावा किया जा रहा है। मैंने एक सरकारी अधिकारी से पूछा, रेल्वे में सेटिंग किए बिना ऐसा दावा कैसे किया जा सकता है। अधिकारी बोले, ‘ऊपरवाला जाने’!
मैं ठहरा मूढ़बुद्धि, ईश्वर को ही ऊपरवाला समझता था, इसलिए सोचा कि उस कोर्पाेरेट कम्पनी के अधिकारी वेटिंग की टिकट को सामने रखकर ईश्वर से प्रार्थना करते होंगे, पाँच वक़्त दुआ मांगते होंगे, मोमबत्ती वगैरा जलाकर प्रेयर करते होंगे और टिकट कन्फर्म हो जाती होगी।
लोग हर समस्या को लेकर सरकार के पास पहुँच जाते हैं। अरे भई, सरकार देश चलाएगी या रेल की टिकटें बेचेगी? सरकार का काम व्यापार करना नहीं है। सरकार तो झंडी दिखाकर ट्रेनें चलाती है, व्यापार तो यार लोग करते हैं। सरकार जिन्हें स्टेशन बेचती है, वे भी कृतघ्न नहीं हैं। वे सरकार से ख़रीदे हुए प्लेटफॉर्म पर विज्ञापन, उद्घोषणा और अन्य तमाम माध्यमों से सत्ताधारी पार्टी के प्रचार करती है। प्लेटफ़ॉर्म पर वेटिंग रूम बंद होने लगे हैं। लेकिन इसमें सरकार क्या करे, सरकार व्यापार नहीं करती, सरकार तो प्रचार करती है। शिकायतों का पूरा तंत्र है, जिसमें शिकायतकर्ता बुरी तरह उलझकर अपना माथा पीटता है, लेकिन सरकार क्या करे, सरकार चुनाव लड़ेगी या गंदे बेडरोल्स और ख़राब खाने की शिकायतें सुनते रहेगी।
कुछ तो शर्म करो, जो अच्छा हुआ है वो नहीं दिखता। रेल्वे स्टेशनों के नाम बदल दिए गए हैं। इसकी तारीफ़ नहीं होती तुमसे! एक आदमी क्या-क्या करे।
जब देखो सरकार पर कीचड़ उछालते रहते हो, जानवर कहीं के! साइड हटो, सरकार को नहाने जाना है!
✍️ चिराग़ जैन
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मेरे एक परिचित हैं, जो पिछले कुछ महीनों से ख़ुद को सेलिब्रिटी मान बैठे हैं। अब वे दिन भर भीतर ही भीतर सेलिब्रिटी होने के भाव से भरकर अपने आसपास के सभी मनुष्यों को तुच्छ समझते हुए विचरते हैं और रात होने पर शेष विश्व को टुच्चा समझते हुए व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ सो जाते हैं।
उनकी सबसे बड़ी चुनौती यह है उनके परिवेश को इस बात की भनक तक नहीं है कि वे सेलिब्रिटी बन चुके हैं। उनके घरवाले, उनके दोस्त, उनके रिश्तेदार तथा उनके पड़ोसी अभी भी उन्हें मनुष्य समझकर उनसे सामान्य व्यवहार करते हैं।
स्वयं को सामान्य समझा जाना उन्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। वे इस बदतमीज़ी का बदला लेने के लिए वे तुरंत अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक शायराना स्टेटस पोस्ट करते हैं, जिसका भावार्थ लगभग यह होता है कि, ‘ज़ालिम ज़मानेवालो, आज तुम मेरी कद्र मत करो लेकिन एक दिन तुम मुझसे मिलने को तरस जाओगे।’
चूँकि शेष विश्व को वे ख़ुद से बात करने लायक नहीं समझते इसलिए समय बिताने के लिए वे सोशल मीडिया पर सेलिब्रिटी लोगों की प्रोफाइल, रील तथा स्टेटस देखते रहते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि सचमुच का सेलिब्रिटी बनने के लिए ऐसे स्टेटस डालना ज़रूरी होता है। वे यह बात मानने को तैयार नहीं हैं कि ऐसे स्टेटस डालने से पहले सचमुच का सेलिब्रिटी बनना आवश्यक होता है।
सेलिब्रिटीपना सीखने के चक्कर में वे टीपने में पारंगत हो गए हैं। पिछले दिनों उन्होंने देखा कि एक फिल्मस्टार ने अपनी किचन में मटर छीली। मटर छीलने की उसकी रील पर मिलियन व्यू देखकर हमारे स्वयंभू सेलिब्रिटी ने नहा-धोकर चकाचक पैंट-शर्ट पहनी, बालों को सूतकर बहाया, चेहरे पर थोड़ी लीपा-पोती की और रील बनाने निकल पड़े। शूटिंग की लोकेशन भी सेम थी, बस ज़रा-सा अन्तर ये था कि फिल्मस्टार की रसोई थोड़ी आलीशान किस्म की थी, और हमारे लोकल सेलिब्रिटी की रसोई की दीवार पर चिकनाई के स्वाभाविक निशान थे। फिल्मस्टार की रील किसी ने चुपके से बनाई थी और हमारे सेलिब्रिटी ने बाकायदा कॉलर माईक लगाकर शूटिंग करवाई थी। हमारे सेलिब्रिटी इतने स्वार्थी नहीं हैं कि मटर छीलने की गोपनीय रेसिपी से अपने विराट फैन क्लब को वंचित रखें इसलिए उन्होंने मटर छीलने जैसे वीरोचित कर्म की पूरी रेसिपी भी अपने फैन्स को बताई।
सेलिब्रिटी को अपने फैंस का ध्यान रखना पड़ता है, इसलिए हमारे लोकल ब्रांड सेलिब्रिटी हर राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय विषय पर किसी विद्वान की वीडियो सुनते हैं और फिर उसे अपने मुखारविंद से दोबारा रिकार्ड करके अपने फैंस क्लब के सामने विद्वान बनने का अभिनय करते हैं।
जब कोई उनके स्टेटस पर आकर समर्थन या विरोध नहीं करता, तो वे विनम्रतापूर्वक स्वयं दूसरों के स्टेटस पर अबूझ टाइप के कमेंट्स करके ध्यानाकर्षण का प्रयास करते फिरते हैं।
कई महीनों के अथक प्रयासों के बाबजूद जब उनके फैंस क्लब की संख्या में वृद्धि नहीं हो पाई तो वे सपत्नीक सेलिब्रिटी बनने निकल पड़े। खाना खाने से लेकर आने-जाने तक वे अपनी हर गतिविधि की रील बनाते हैं और हर रील में अपनी पत्नी को गले लगाकर अपने फैंस को अपने खुशनुमा दाम्पत्य की झलक दिखाते रहते हैं।
पिछले दिनों उनके कुनबे में कोई बुजुर्ग दिवंगत हो गए। हमारे सेलिब्रिटी ने इस दुःख की घड़ी में भी अपने फैंस को नहीं भुलाया। अपने बाबाजी की मृत्यु का दुःख मनाने से पहले उन्होंने लाश का चेहरा खोलकर उसकी फोटो खिंची। फिर उसे तुरंत सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। ताकि उनका कोई भी फैन अंतिम दर्शन से वंचित न रह जाए। इस पोस्ट के बाद वे दिन भर रील डालकर अपने विराट फैन क्लब को यह बताते रहे कि सेलिब्रिटी रो रहा है।
सबको गाइज, दोस्तों और भाइयों कहकर संबोधित करते हुए वे अथक साधना कर रहे हैं। इतने महीनों में वे अपने परिवार को यह समझाने में सफल हो गए हैं कि एक दिन वे सोशल मीडिया के ज़रिये पूरे संसार में फेमस हो जाएंगे। शायद इसी कारण कल जब वे टूथपेस्ट करते हुए रील बना रहे थे तब उनकी पत्नी कैमरा लेकर वॉशबेसिन के सामने दम साधे खड़ी थी, और बाकी पूरा परिवार मुँह पर टेप लगाए चुपचाप बैठा था, कि कहीं कोई शोर हुआ तो इतनी महत्वपूर्ण रील की ऑडियो क्वालिटी ख़राब न हो जाए।
✍️ चिराग़ जैन
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हिंदी की कविता, जहाँ अपने सबसे सहज रूप में शास्त्रीय मर्यादा की लक्ष्मण रेखा के भीतर खड़ी दिखाई देती है, उस पंचवटी का नाम है, ‘गोपालदास नीरज’।
कवि-सम्मेलन की लोकप्रियता का कीर्ति स्तम्भ जहाँ तक पाखण्ड के मुलम्मे से अछूता दिखाई देता है, वहाँ तक नीरज की दमक साफ़ दिखाई देती है।
लौकिक लोभ और पारलौकिक कविताई के मध्य हर बार कविताई को वरीयता देने का स्वभाव जहाँ तक बचा रह गया, वहाँ तक नीरज का पता मिलता है।
जनता की रुचि के अनुरूप कविता ‘बनाने’ की बजाय, अपनी कविता के अनुरूप जनमानस को ढाल लेने का जादू जहाँ आकर ग़ायब होने लगता है, वह नीरज के कारवां का आख़िरी छोर है।
इन्टरनेट और सोशल मीडिया जनित, वैतण्डी स्टारडम के पीछे भागते हुए, कबीराई बेपरवाही की खुशबू से बहुत दूर निकल आई पीढ़ी, जब कभी उस कस्तूरी की तलाश में आत्ममग्न होगी, तब उसे नीरज की देहरी तक लौटना ही होगा।
चित्र से चरित्र तक आमूलचूल कवि होने का एहसास है नीरज। हिंदी कविता के इस सबसे लाडले बेटे का आज सौवां जन्मदिन है। 2018 में उनकी दैहिक रुख़सती के साढ़े पाँच साल बाद, आज एक बार फिर, उनके साथ बीते क़ीमती पल स्मृति पटल पर चलचित्र की भाँति तैर रहे हैं।
मैंने उनकी स्मृति, उनके अध्ययन, उनकी सादगी और उनकी लोकप्रियता का वैराट्य कई बार अपनी आँखों से निहारा है। मैंने उनके युग में साँस ली है। मैंने एकलव्य की भाँति उनके द्रोणाश्रम से ‘कवि होने का लुत्फ़’ लेना सीखा है। पहली बार बैरागी जी के संचालन में लालकिला कवि सम्मेलन के मंच पर नीरज जी को देखा था। वाइन कलर का, लगभग पठानी कुर्ता-पायजामा पहने, सिर पर टोपी लगाए एक वृद्ध काया जब मंच पर उपस्थित हुई तो हज़ारों लोगों से भरा तालकटोरा स्टेडियम खड़े होकर तालियाँ बजाने लगा। स्वास्थ्य कारणों से अध्यक्ष होने के बावजूद वे अंत तक नहीं बैठ पा रहे थे, सो संचालक महोदय ने बीच में ही नीरज जी को काव्यपाठ के लिए आवाज़ दी।
मसनद पर बैठकर छोटे माइक से जब नीरज जी की आवाज़ गुंजित हुई तो ऐसा लगा जैसे शरारत ने बहुत गंभीर होने का फ़ैसला कर लिया हो।
“इतने बदनाम हुए….” यही तीन शब्द गूंजे थे और श्रोताओं की तालियों से पूरा स्टेडियम उत्सवित हो उठा। शरारती मुस्कराहट के साथ उन्होंने कोई बीस-पच्चीस मिनिट काव्यपाठ किया और फिर जब उठकर चले तो एक बार फिर श्रोताओं ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया।
उस दिन नीरज सचमुच किसी देवदूत जैसे लगे। गीत का जीता-जागता कोई गंधर्व जिसके आगमन और प्रस्थान पर देवता पुष्प वृष्टि करते हों।
इसके बाद मैं सैंकड़ों बार उनसे मिला और हर बार उनके सान्निध्य को सौभाग्य मानकर उन पलों को भरपूर जिया। एक बार नैनीताल में उनके आभामंडल से मैं ऐसा सम्मोहित हुआ, कि उनके चरण स्पर्श करते हुए मैं बाकायदा उन्हें छूकर उनके पुद्गल परमाणुओं का वैभिन्नय महसूस कर रहा था।
‘नीरज जी मुझे जानते हैं’ -यह एहसास मेरे लिए कवि सम्मेलनीय जीवन का पहला सम्मान-पत्र था। अलीगढ़ नुमाइश का कार्यक्रम था। नीरज जी की अध्यक्षता थी। उससे पहले दो बार नीरज जी मेरे संचालन में काव्यपाठ कर चुके थे। अलीगढ़ में शशांक प्रभाकर ने मुझे कहा, “नीरज जी कह रहे हैं चिराग़ से संचालन करवाओ।” उस दिन यह वाक्य मेरे लिए किसी वरदान मिलने जैसी प्रसन्नता का कारण बना।
उसके बाद के अनेक संस्मरण हैं, उस गीतपुरुष के साथ। उन आँखों की जीवन्तता, रह-रहकर याद आती है। सफदरजंग अस्पताल में आख़िरी बार उनकी जिवित काया के चरण छुए थे। उस समय वे बेहोश थे। मैं उनसे मिलकर घर तक पहुँचा भी नहीं था, कि शशांक भाई ने उनके महाप्रयाण की सूचना दी। मैं उल्टे पाँव सफदरजंग अस्पताल पहुँचा। सम्भवतः मैं उनके चरण स्पर्श करने वाला आख़िरी मनुष्य रहा। मुझे आशीर्वाद भी मिला… मैंने अपने लेखन में नीरज जी की खनक सुनी है। मुझे आज भी महसूस होता है कि वह गीत गंधर्व मेरे लेखन का मापदण्ड बनता जा रहा है। मैं कह सकता हूँ कि नीरज का कारवां कभी नहीं गुज़रेगा। उसके गुबार में भी गीत उभर-उभर आएंगे।
✍️ चिराग़ जैन
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जिस कुर्सी की एक कील मुझे बहुत चुभती थी; उसी कुर्सी पर किसी और का बैठना
मुझे कील से ज़्यादा चुभता है।
✍️ चिराग़ जैन