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अरुण जैमिनी: एक नाम नहीं, एक किरदार

“छोड़ ना यार, क्या फरक पड़ता है।” -यह वाक्य कोरा तकियाक़लाम ही नहीं, अपितु अरुण जी के जीवन का मूल सिद्धान्त भी है। जीवन की बड़ी से बड़ी भँवर से भी वे इसी एक वाक्य की डोर थामकर किनारे आ लगते हैं। पहले मुझे ऐसा लगता था कि वे दूसरों की समस्या को छोटा समझते हैं, इसीलिए सामनेवाले की परिस्थिति और तनाव के पहाड़ को अपने इस एक वाक्य से छोटा साबित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन बाद में मैंने देखा कि वे ख़ुद की समस्याओं को भी अपने इसी एक वाक्य से छोटा साबित कर देते हैं।
उन्हें जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगता है अपना कम्फर्ट ज़ोन। इसीलिए ज्यों ही उनके कम्फर्ट ज़ोन में कोई तनाव प्रवेश करने लगता है तो वे ‘किसी भी कीमत पर’ उससे अपने कम्फर्ट को सुरक्षित निकाल लाते हैं। अपने कम्फर्ट ज़ोन की रक्षा के लिए वे धन, सिद्धान्त, यश, लाभ और एक सीमा के बाद सम्बन्ध तक से मोहभंग कर लेते हैं। कई बार मुझे उनके मापदण्ड बदलने पर बहुत आश्चर्य होता था, लेकिन अब महसूस होता है कि समय की किसी एक इकाई में किसी एक मापदण्ड की अनदेखी कर देने से यदि आप एक लम्बी अवधि के तनाव से मुक्त हो जाते हैं, तो यह सौदा खरा कहा जा सकता है, बशर्त उसका उद्देश्य किसी को धोखा देना न हो।

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अरुण जैमिनी जी से पहली बार मैं उस कवि-सम्मेलन में मिला था, जो एक श्रोता और कवि, दोनों रूपों में मेरा पहला कवि-सम्मेलन था। उसके बाद उनके कवि-सम्मेलनीय कद के कारण आगे से बढ़कर उनसे सम्पर्क बढ़ाने में संकोच होता रहा। लेकिन उनका व्यक्तित्व और उनके चेहरे की कांति मुझे हमेशा आकृष्ट करती थी। कई वर्ष तक मैं उनके अस्तित्व को दूर से ही देखता रहा, फिर न जाने कब वे मित्र हो गए; न जाने कब उन्होंने मेरे संकोच की दीवार गिराकर अपनत्व का सूत्र बांध लिया।
मुझे जहाँ तक याद है, वर्ष 2011 में जब मैंने जम्मू में नौकरी की थी, तब अरुण जी से मेरा रिश्ता सुदृढ़ होने लगा। 2012 में जब नौकरी छोड़कर आया, तो वह स्थिति जन्मी कि हम दिन में कम से कम एक बार बात ज़रूर करते थे। तब से अब तक यह क्रम अनवरत ज़ारी है। जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुःख… सब कुछ हम परस्पर साझा कर लेते हैं।
मेरी सर्जरी के दौरान उन्होंने जिस शिद्दत से मित्रता निर्वहन किया, वह मैं कभी नहीं भूल पाता। मुझे याद है कि जब मेदांता में वे मुझसे मिलने आए तो मैंने कहा कि मेरे कारण सब परेशान हो रहे हैं। इस पर वे भावुक होकर बोले – ‘अर तू जो सबके लिए परेशान होता है हमेशा!’

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अरुण जी के साथ एक बात ख़ास है, वो ये कि वे एक बार में एक ही काम करते हैं। और जो काम करते हैं, उसे पूरी शिद्दत से करते हैं। जैसे उन्हें एक बार यह बात समझ आ गई कि कवि-सम्मेलन समिति के अधिवेशन में सबको गले में आईकार्ड ज़रूर लटकाना है तो इसके बाद वे मुख्य अतिथि को भी बिना कार्ड के अधिवेशन हाॅल में एंट्री नहीं करने देंगे। काम महत्वपूर्ण है या नहीं, ये अलग बात है, लेकिन अगर उसकी ड्यूटी अरुण जैमिनी ने ली है तो वह होगा ज़रूर। अपने हिस्से काम वे उतना ही लेते हैं, जितना वे कर सकें। और अरुण जी कितना काम कर सकते हैं, ये उन्हें जानने वाले अच्छी तरह जानते हैं। लेकिन जितना काम वे करते हैं, उसमें कोई कमी नहीं निकल सकती।
जून 2023 में मेरी और मनीषा की शादी थी। मैंने कहा, चाचा, अबकी बार मुझे अधिवेशन की तैयारी से मुक्त कर दो। अरुण जी का डायरेक्ट जवाब था, शादी में तैने क्या करना है। सब हो जाएगा। मैंने कहा, ‘भाईसाहब सबको निमंत्रण भेजना है, सारी तैयारी करनी है…।’ उन्होंने पूरी ज़िम्मेदारी उठाते हुए कहा- ‘तेरी शादी में कवियों के निमंत्रण की ज़िम्मेदारी मेरी।’ उन्होंने इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी ले ली तो मुझे थोड़ा सहारा मिला। मैंने हर वर्ष की तरह पूरा समय लगाकर जोधपुर अधिवेशन सम्पन्न किया। और कवि-परिवार से इतर सबको निमन्त्रण के लिए व्यवस्थित रूप से सूची बनाकर विवाह का निमन्त्रण भी भेजता रहा। 25 जून को विवाह का रिसेप्शन था। समय से पहले अरुण जी और भाभी आयोजन स्थल पर उपस्थित थे। कवि-परिवार भी प्र्याप्त संख्या में उपस्थित था, लेकिन अनेक महत्वपूर्ण नाम दिखाई नहीं दिये। …मैंने अरुण जी से कुछ लोगों के न आने का कारण पूछा तो पता लगा कि अरुण जी ने कवियों के व्हाट्सएप ग्रुप पर सबको सामूहिक निमंत्रण दे दिया था कि चिराग़ और मनीषा के ब्याह में सभी आमंत्रित हैं, चिराग़ बहुत व्यस्त है, अलग से निमंत्रण का इंतज़ार न करें।’
अब जो-जो उस ग्रुप में था, वो-वो निमंत्रित हो गया और जो जो उस ग्रुप में नहीं था, वो आज तक मुझे ताना देता है। …मुझे अरुण जी की इस हरक़त पर क्रोध नहीं आया क्योंकि मैंने देखा है कि वे अपने घर के ब्याह-टेलों में भी कवि-समाज को निमंत्रित करने का ‘दायित्व’ ऐसे ही निभाते हैं।

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उनका किरदार उनकी सादगी से पोषित होता है। पंच और डांस को रोकने में वे हमेशा असमर्थ रहे हैं। मुझे याद है एक बार गौरव शर्मा और मैं काठमांडू के एक कार्यक्रम में थे। अरुण जी को इसी कार्यक्रम में कहीं और से आना था, तो वे दो घण्टे बाद होटल पहुँचे। होटल पहुँचने पर गौरव ने उन्हें बताया कि चाचा, चिराग़ ने रास्ते में मुझे बहुत शानदार गीत सुनाया।
गौरव की बात सुनकर चाचा के चेहरे पर भय मिश्रित आश्चर्य तैर गया। आँखें बड़ी हो गईं, फिर धीमे स्वर में गौरव से पूछा- इतनी देर में इसने गीत भी सुना दिया।
गौरव उनके व्यंग्य को समझकर झट से रुआँसा होकर बोला- ‘हाँ चाचा, एक नहीं तीन-तीन।’
अरुण जी ने चेहरा लाल करके मुझसे कहा- ‘साले, इन्हीं हरकतों से एक दिन तू अपने सारे दोस्त खो देगा।’
ठहाके का ऐसा निर्माण होता मैं पहली बार देख रहा था।

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कुल मिलाकर, तनाव से रहित जीवन जीने का जीवन्त उदाहरण है मेरा चाचा। आज ये सारी बातें इसलिए याद आ रही हैं क्योंकि आज चाचा का जन्मदिन है और चाचा अमरीका में है। अगर भारत में होते तो इतना लम्बा लेख लिखने का समय ही नहीं देते।
हैप्पी बर्थडे चाचा… लव यू।
✍️ चिराग़ जैन

माहेश्वर तिवारी: गीत का उदाहरण

एक सम्पूर्ण गीत को यदि मनुष्य बना दिया जाए तो उसका आचार-व्यवहार लगभग माहेश्वर दा जैसा होगा। संवेदना में डूबकर तरल हो उठी आँखें उनके गीतकार नहीं, ‘गीतमयी’ होने का प्रमाण थीं। आज वे आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।
मृदु वाणी किसे कहते हैं, इसका उदाहरण आज हमसे छिन गया। सौम्य व्यक्तित्व कैसा होता है; इसका सबसे सटीक दर्शन आज लुप्त हो गया। निश्छल मुस्कान का एक बिम्ब आज अलभ हो गया। गीतकार को कैसा होना चाहिए- इसका उत्तर देने के लिए दृष्टि तर्जनी का पीछा करते हुए जिस मनुष्य पर जाकर ठहरती थी वह मनुष्य आज परलोक सिधार गया।
अपनी सृजन प्रतिभा के वैभव को भोगते हुए भी अंतर्मुखी होने से चेहरा कितना सुदर्शन हो उठता है- यह अब केवल तस्वीर में ही देखा जा सकेगा।
आधुनिकता के किसी बिम्ब में करवट लेते गीत को चुनकर शब्दाकार करने का लुत्फ़ किस संतुष्टि को जन्म देता है- इसका अब केवल अनुमान लगाया जा सकेगा।
गीत के नए साधकों के सौभाग्य से आज गीत का एक जीवंत गुरुकुल मिट गया। माहेश्वर जी के देहावसान ने आज मुझे एक बार फिर इस एहसास से भर दिया है कि लौकिक व्यस्तता की टुच्ची आड़ में सृजन के जिन अलौकिक देवदूतों की संगत से स्वयं को वंचित कर रहा हूँ, उनके व्यक्तित्व की सुगंध दोबारा नसीब नहीं होगी।
मुरादाबाद से गुज़रते हुए अब हर बार एक टीस हरी हो जाएगी।
विदा दद्दू!

✍️ चिराग़ जैन

विदा आचार्य श्री

आज संतत्व का एक उदाहरण साकार से निराकार हुआ है। आज तपश्चर्या का एक बिम्ब अंतर्धान हुआ है। निश्छल दिगंबरत्व की एक गाथा का पटाक्षेप हुआ है। आज आस्था और विवेक के एक अद्वितीय संगम की समाधि हुई है। आध्यात्मिक ऊर्जा के विराट केंद्र का स्थानांतरण हुआ है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी का देह से विदेह हो जाना हमारी लौकिक आस्था को आहत कर रहा है। दुनिया के किसी भी कोने में रहते हुए आचार्य श्री का स्मरण यह एहसास कराता था कि एक देह में हमारे हिस्से के आशीष का वास इस धरती पर विराजमान है।
यह एहसास अभी भी यथावत रहेगा, किन्तु कल्पनाओं के चित्रपट पर अब वह चित्र नहीं उभरेगा जिसमें एक 77 वर्षीय बालक खिलखिलाता हुआ अपनी हथेलियाँ उठाकर आस्था को आशीर्वाद के अमृत से तृप्त कर देता था।
आचार्य श्री की हथेलियाँ जब आशीर्वाद के लिए ऊर्ध्वगामी होती थीं, तब उनकी उंगलियाँ जुड़ने की बजाय फैल जाती थीं। मानो, एक पिता अपने बालकों की समृद्धि के लिए अपना जी खोलकर वात्सल्य लुटा देना चाहता हो। उनके अधरों से मुस्कराहट कभी गौण नहीं होती थी, मानो एक बुज़ुर्ग अपनी फुलवारी को फलते-फूलते देखकर आह्लादित हुआ जाता हो।
…अब वह दिव्य मुस्कान अलभ हो गई। अब आचार्य श्री के अस्तित्व से भौतिक नयन वंचित हो गए हैं। अब आचार्य श्री की अनुभूति से भौतिक इन्द्रियाँ नदीदी हो गई हैं। अब आचार्य श्री तक पहुँचने के लिए लौकिक यातायात साधन असमर्थ हो गए हैं। अब तक आचार्य श्री को निहारनेवाली आँखों को उनके दर्शन के लिए अब मुंदना होगा। अब आचार्य श्री बाहर कहीं नहीं मिलेंगे। अब आचार्य श्री तक के लिए चलना नहीं, ठहरना होगा।
जैन आगम के अनुसार समाधि पर रोना नहीं चाहिए। जैन आगम के अनुसार मृत्यु को महोत्सव मानना चाहिए।
किन्तु मेरी आँखें रह-रहकर नम हुई जा रही हैं, मेरे लिए एक अनवरत महोत्सव की मृत्यु हुई है।
आचार्य परमेष्ठी को नमोस्तु!

✍️ चिराग़ जैन

मन रह गया अयोध्या में…

जहाज ने दिल्ली का रन-वे छोड़ा और मन राम के आचरण की कथा बाँचने लगा। खिड़की से बाहर झाँका, तो सूरज के तेज प्रकाश से आँखें चुंधिया गईं। भौतिक आँखें बंद हुई तो मन राम के नयनाभिराम चरित्र पर त्राटक करने लगा। अनायास ही राम से कुछ मांगने की उत्कंठा जगी तो याचना राम-आचरण की प्रार्थना के गीत में ढल गई।
अयोध्या विमानतल पर लैंडिंग की उद्घोषणा होने से पहले गीत पूरा हुआ। जहाज धरती पर उतर रहा था और मन सृजन के आनंद में उड़ान भर रहा था। आगमन हॉल में प्रवेश किया तो पुष्पक विमान के माध्यम से राम आगमन की भव्य पेंटिंग आँखों की चुंबक बन गई। जिधर दृष्टि जाती है उधर ही राम विराजमान हैं। एक दीवार पर मधुबनी शैली की पाँच पेंटिंग्स में राम की जीवन झाँकी प्रदर्शित है।
मैंने देखा कि कन्वेयर बेल्ट पर लगेज घूम रहा था और लोग अपने सामान की चिंता छोड़कर आगमन हॉल की चित्रकारी को कैमरे में क़ैद कर रहे थे।
हवाई अड्डे से निकलकर अपने प्रवास की ओर चले तो ऐसा लगा कि पूरा शहर किसी अनन्त उत्सव में संलग्न है। धूप तेज़ थी, लेकिन उत्साह में कोई कमी नहीं। सड़क के दोनों ओर जगह-जगह भित्तिचित्र, सूर्य-स्तम्भ और न जाने कितने नगर सिंगार दृश्यमान हैं। पूरी अयोध्या उस नारी की तरह इतरा रही है, जिसे पूरे जीवन के तिरस्कार के बाद पिया का संसर्ग मिल गया हो।
हमारे ठहरने की व्यवस्था नए बस अड्डे के पास बनी निषादराज गुहा टैंट सिटी में थी। हम अयोध्या को निहारते हुए गंतव्य तक पहुँचे।
टैंट सिटी क्या, एक छोटी-मोटी बस्ती बसी हुई है। प्रवेश करते ही एक बड़े से आँगन में ऊँचे चबूतरे पर खड़ाऊ की भव्य प्रतिकृति बनी है। उसके पीछे धनुर्धर श्रीराम स्वयं एक ऊँचे चबूतरे पर खड़े हैं। उसके पीछे सैंकड़ों टैंट कतारबद्ध तने हुए हैं। हर टैंट सुविधाओं से युक्त। एयर कंडीशनर भी मौजूद है और रूम हीटर भी; टीवी भी है और डबलबेड भी। कुल मिलाकर जब तक कोई याद न दिलाए, तब तक यह किसी शानदार होटल के कमरे से कम नहीं लगता।
भोजन के लिए शबरी रसोई है। पार्श्व में रामधुन का संगीत और थाली में सादा किन्तु स्वादिष्ट भोजन। हम सभी कवियों ने प्रसाद की तरह भोजन ग्रहण किया।
माहौल से मन का वातावरण प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। इसलिए हमारा मन भी आराम का विचार त्यागकर नगर भ्रमण और रामलला के दर्शन को आतुर हो गया। जहाँ हमें गाड़ी ने छोड़ा वहाँ बहुत बड़ा द्वार बना है, जिस पर सात घोड़ों पर सवार दिनकर उकेरे गए थे। इस द्वार से प्रारंभ हुई सड़क, सीधे लता मंगेशकर चौक तक जाती है। इस चौक पर एक बहुत बड़ी वीणा बनाई गई है। जब हम यहाँ पहुँचे तब इस्कॉन की एक मंडली ‘हरे कृष्णा हरे रामा’ गाते हुए नृत्यमग्न थी। उत्साह ने हमारे पैरों को भी सुरों का दास बना दिया। थोड़ी देर नाच-गाकर हम राम की पैड़ी पर जा पहुँचे। दिन, दोपहर की ड्योढी लाँघकर शाम के बगीचे में प्रवेश कर रहा था। सूरज शीतल हुआ जाता था और हवा मीठी। राम की पैड़ी पर सभी कवियों ने मस्तक पर चंदन-रोली से राम नाम लिखवाया। फिर सरयू की मुख्यधारा में नौका विहार किया। यहाँ नदी का जल इतना निर्मल है कि एक-एक लहर में आरपार झाँका जा सकता है। हम सरयू की अगम धार पर नौकायन कर रहे थे और मन के भाव लहरों से भी अधिक लहरा रहे थे।
रामशरणदायीनी सरिता को प्रणाम करके हम हनुमानगढ़ी की ओर बढ़ चले। विनीत चौहान जी कह ही रहे थे कि “इतनी भीड़ में हनुमानगढ़ी के मुख्य महंत राजूदास जी अति व्यस्त होंगे, अन्यथा मैं सब कवियों को उनसे मिलवाता”; इतनी देर में रामायण धर द्विवेदी ने राजूदास जी को फोन मिला दिया। अगले 4 मिनिट में हम महंत जी के सामने थे। विनीत जी के पुराने परिचित महंत राजूदास जी ने सभी कवियों का सम्मान करके सबको रामनामी ओढ़ाई। अयोध्या के राजा के दर्शन से आनंद द्विगुणित हो गया। और हम अंजनिपुत्र को राम-राम बोलकर दशरथ महल आ पहुँचे। फिर कनक भवन में माँ जानकी की आरती की और नवनिर्मित राममंदिर की ओर बढ़ चले।
उत्साह और कदम एक दूसरे से होड़ कर रहे थे। अभय सिंह निर्भीक, बड़े मन से हमें राममंदिर तक लाए। फोन और जूते बाहर जमा करा दिये गए। जूते उतारकर हम ज़मीन से जुड़ गए और फोन छोड़कर हम अनावश्यक व्यस्तता से छूट गए।
ज्यों-ज्यों हम मंदिर के भीतर घुसते जाते थे, राम के विग्रह को देखने की लालसा और घनीभूत हुई जाती थी। मंदिर की नक्काशी में दर्जनों कलाकृतियाँ उपस्थित थीं किन्तु मन को राम से कम कुछ नहीं लुभाता था। आँखों ने देखा कि स्तम्भों पर शिव के विविध स्वरूप उकेरे गए हैं; कहीं यक्ष अंकित हैं तो कहीं हनुमान; कहीं गणपति हैं तो कहीं शक्ति; कहीं किसी दीवार पर पत्थर को छैनी से छूकर कलाकार ने प्राणवान कर दिया है। दरवाज़ों पर कनक मँढ़ाई थी और भीड़ के बावजूद धक्का-मुक्की बिल्कुल नहीं थी। आँखें सब कुछ देख रही थीं, किन्तु मन व्याकुल हुआ जाता था। अभय सिंह निर्भीक आस्था और उत्साह में भरकर राम नाम की जयकार करता था… कहीं कोई टोली कीर्तन करती बढ़ रही थी, तो कहीं किसी कोई राम दर्शन के लिए आँखों को अश्रु स्नान करा रहा था।
उत्सुकता और भक्ति के यह तमाम दृश्य जिस एक सूत्र में पिरोए जा रहे थे, उस सूत्र का नाम है – ‘प्रेम’। मैंने महसूस किया कि मेरे भीतर राम के प्रति जो आस्था थी वह प्रेम में रूपांतरित हो रही थी।
हम सब कवि सबसे बाईं लाइन में चल रहे थे। मुख्य गर्भगृह में सभी दर्शनार्थी तीन पंक्तियों में बँट गए थे। और ये तीनों पंक्तियाँ राम तक पहुँचती थी। मध्य पंक्ति में लगे लोग सबसे अधिक सौभाग्यशाली रहे। किंतु हमारे और राम जी के बीच एक स्तम्भ आ रहा था। बेचैनी बढ़ती जाती थी। मन करता था कि दृष्टि किसी तरह स्तम्भ के पार हो जाए। मध्य पंक्ति वाले भाव विभोर थे और मैं विकल हुआ जाता था। अचानक मेरे पैरों ने स्तम्भ के प्रभाव क्षेत्र को लांघकर मुझे राम के सम्मुख ला खड़ा किया। एक पल को धड़कन थम सी गई… ऐसा लगा राम के रूप को स्पर्श करके पलकें पत्थर हो गई थीं। क्या मज़ाल जो एक बार भी झपक जाएं! मूर्ति काफ़ी दूरी पर थी लेकिन मन ने दृष्टि के विमान पर बैठकर क्षणांश में यह दूरी तय कर ली। लगभग 4-5 सेकेंड के लिए मैंने बैकुण्ठ का अनुभव किया और फिर आँसुओं से आचमन करके दृष्टि लोक की ओर मुड़ गई। पलटकर देखने का मन हुआ, किन्तु देख न सका। सुनील व्यास फफककर रोते हुए दिखे। विनीत जी निःशब्द थे। पूनम वर्मा जी के पति मुकेश जी के चेहरे पर आनंद घुल गया था। निकुंज अपने मौन के साज पर कुछ गुन रहा था। अभय के चेहरे पर यह संतोष था कि उसने अपने सभी अतिथियों को अच्छे से दर्शन करवा दिए।
मन की तन्द्रा टूटी तो याद आया कि पांव काफी दुखने लगे थे। किंतु धमनियों में भक्ति और प्रेम प्रवाहित था, सो देह का कष्ट चेहरे तक न आ सका।
मन वहीं स्तम्भ की टेक लगाकर खड़ा रह गया और हमारे शरीर टैंट सिटी के बिस्तरों पर आकर पसर गए। सुबह उठे तो मौसम बदला हुआ था। सूरज की तीखी किरणों पर बादलों की चादर बिछ गई थी। हम नहा-धोकर नाश्ते के लिए चले तो आकाश ने बूंदों के हाथों से हमें छू लिया। हम नाश्ता करके गुप्तहार घाट की ओर रवाना हुए। मौसम ने तीर्थयात्रा को पर्यटन बना दिया था। हमारे होस्ट आशुतोष जी भी हमारे साथ थे। गुप्तहार घाट पर हमने ख़ूब फोटोग्राफी की। सरिता शर्मा जी ने बेर के पेड़ से बेर तोड़कर खाया; भुट्टे, चाय… अहा! आनंद ही आनंद हो रहा था। आशुतोष जी ने एक चायवाले की दुकान में घुसकर अपने हाथ से चाय बनाई। भीगा हुआ मौसम, नदी का किनारा और चाय-पकौड़े… स्वर्ग शायद इसी को कहते हैं।
एक बजते-बजते हम अपने ठिकाने पर लौट आए थे। दोपहर तीन बजे से कवि-सम्मेलन था। सुबह की बारिश की फुहार अब तक झमाझम बन चुकी थी। घनघोर बरसात के कारण सुरक्षा की दृष्टि से टैंट सिटी की लाइट काट दी गई थी। बिना रौशनी के जैसे-तैसे सब कवि सम्मेलन के लिए तैयार हुए। छप-छप पानी और कीचड़ से अपने कपड़े बचाते हुए हम कार्यक्रम स्थल तक पहुँचे।
कार्यक्रम स्थल पर मुख्य श्रोता स्वरूप राम दरबार का चित्र था। मंच पर विनीत चौहान, डॉ सरिता शर्मा, संजय झाला, पूनम वर्मा, शंभू शिखर, सुनील व्यास, मनीषा शुक्ला, निकुंज शर्मा, सुशांत शर्मा और मुझे मिलाकर कुल दस कवि थे। ऐसा लगता था मानो स्वयं राम जी को कविता सुनाई जा रही हो। सुबह से बरस रहा आकाश अब थम चुका था… बादलों की दीवार को पार करके सूरज की किरणें धरती को दुलार रही थीं। सभी कवियों ने राम शब्द के इर्द-गिर्द काव्यपाठ किया। सबको मन से सुना गया।
कार्यक्रम के बाद सबने भोजन किया और यह तय हुआ कि जो कवि कल दर्शन में उपस्थित नहीं थे, वे आज दर्शन करने जाएंगे। शंभू शिखर, डॉ सरिता शर्मा, संजय झाला, मनीषा शुक्ला और सुशांत शर्मा का कार्यक्रम बनने लगा। मैं और सुनील व्यास दोबारा दर्शन के लालच में इनके साथ हो लिए।
शंभू ने किसी को फोन करके विशेष व्यवस्था करवा ली। इसके कारण आज हमें बहुत पैदल नहीं चलना पड़ा। हम सीधे मुख्य मंदिर के निकट गाड़ी से उतरे और पीछे के रास्ते से रामलला के सम्मुख उपस्थित हो गए। लगभग दस-पंद्रह मिनिट तक बेरोकटोक राम जी को निहारा। न जाने क्यों, आँखें झरना बन गई थीं। ऐसा लगता था किसी ने दृष्टि को बांध लिया था। देह का रोम-रोम आँख बनकर इस अलौकिक रूप को निहारता था। अनवरत देखने पर ऐसा लगता था ज्यों कोई सलोना बालक खिलखिलाकर हँसता हो। मैंने सपत्नीक दर्शन किए। जी हटता ही नहीं था। श्याम पाहन पर राम के अस्तित्व की भंगिमा से विग्रह पर दमकते आभूषण मात खा रहे थे। तिलक पर सजे रत्नों की किरणें सलोने मुखमण्डल को सूर्य बना रही थीं। राजीव लोचन के नयन इतने जीवंत थे कि दृष्टि स्तंभित हो गई थी। दस-पंद्रह मिनिट तक इस रूप को आद्योपांत निहारता रहा। श्याम विग्रह के ठीक नीचे विराजित रामलला का स्वर्णिम स्वरूप भी पलकों में भरकर हम मंदिर से बाहर आ गए।
मैं चमत्कारों में विश्वास नहीं करता हूँ किन्तु सम्मोहन की अनुभूति मुझे दोनों बार हुई। मैं अंधविश्वासी नहीं हूँ किन्तु ऐसा विश्वास होता है कि उस मूर्ति में कुछ ऐसा है जो अन्यत्र कभी नहीं देखा। देर तक उन्हें निहारने के बाद भी मन मेरे साथ वापस न आ सका।
मंदिर से लौटकर हनुमानगढ़ी की ओर जाने लगे तो सीढ़ियों के बाहर खड़े पुलिसकर्मियों ने शंभू को पहचान लिया। दर्जनों लोग इकट्ठा हो गए। दर्जनों हाथ हवा में लहराकर उत्साह और उत्सव को रिकॉर्ड करने लगे। पुलिसकर्मियों ने भी कविताएं सुनाई। शंभू ने ख़ुद अपने कैमरे से सब रिकार्ड किया। कवियों ने भी चार-चार पंक्तियाँ इस अनियोजित कवि-सम्मेलन में सुनाई। हनुमानजी की सीढ़ियों पर राम जी की कविता हुई।
बरसात रात को फिर सक्रिय हो गई। टैंट पर बूंदों के संगीत के बीच बहुत मीठी नींद ली और सुबह नाश्ता करके हवाई अड्डे की ओर बढ़ आए। देह दिल्ली पहुँच गई है और मन अभी भी साकेत के एक तराशे हुए स्तम्भ से सटकर रामरूप को अपलक निहारे जा रहा है।
✍️ चिराग़ जैन

सृजन की एक समर्थ साधिका: डॉ. कीर्ति काले

कवि होने की न्यूनतम अर्हताओं में एक अदद मन की आवश्यकता होती है। और मन भी साधारण नहीं; बल्कि ऐसा मन, जिसका करुणा-कोष अक्षय हो। जिसकी कल्पना का आकाश दिखाई तो सबको दे, लेकिन उस तक पहुँचना सहज संभव न हो। जिसकी दृष्टि विहंगम हो। जिसकी आकांक्षाओं में समस्त सृष्टि के लिए शुभ की कामना हो। जिसकी उत्कंठाओं में हर किसी के लिए स्वप्नपूर्ति का अवकाश हो। जो सपनीला हो… जो संगीतमयी हो…!
वैभव की तेज़ रौशनी कब किसी अश्रु में से गुज़रकर इंद्रधनुषी हो उठी है, यह जिसकी आँखों को अनायास दिखाई दे जाए, वह कवि है। कविता के किसी भी रस को साध लेने के लिए इन गुणों की साधना आवश्यक है। डॉ. कीर्ति काले की रचनाओं का मुख्य रस शृंगार है, इसलिए उनका रचनाकार, संवेदना के इस महीन अस्तित्व के प्रति अधिक उत्तरदायी है। वियोग शृंगार के लिए तो फिर भी करुणा की वीथियाँ उपलब्ध हो जाती हैं, किंतु सयोग शृंगार के लिए तो प्रेम के उद्वेग में अनदेखे रह जानेवाले पलों को लपकने का कौशल अपेक्षित है।
इसके लिए प्रेम को भरपूर जीना होता है। इसके लिए प्राप्ति के आनन्द को परत-दर-परत निहारना होता है। इसके लिए फूल की एक-एक पाँखुरी का, एक-एक पर्ण का निकट से अन्वेषण करना होता है। प्रेम की कविताएँ लिखने के लिए कवि को प्रेमियों का मनोविज्ञान भोगना होता है। और रचनाकार एक बार इस मनोविज्ञान को छू ले, तो फिर उसकी रचनाओं में उत्सव की जो खनक उतरती है, वह श्रोता के मन को सम्मोहित करने में सक्षम हो पाती है।
डॉ. कीर्ति काले के काव्यपाठ में मैंने दर्जनों बार यह खनक सुनी है। उनके बिम्ब और प्रतीक इस बात की गवाही देते हैं कि उनकी रचनाएँ पुरानी परंपरागत रचनाओं के प्रभाव से उत्पन्न प्रतिबिम्ब मात्र न होकर, बाक़ायदा सर्वहितकारी साहित्य में गणित होने योग्य हैं। मुझे आज भी याद है, वर्ष 2002 में दिल्ली के एक कवि-सम्मेलन में जब पहली बार डॉ. कीर्ति काले को सुना था, तो उनका पहला ही कवित्त ‘नीम की निंबोरी’ से प्रारंभ हुआ। इस बिम्ब से किसी अल्हड़ किशोरी की मनोदशा का चित्रण हो सकता है, यह मेरे लिए सुखद आश्चर्य का विषय था। निंबोरी जैसा सामान्य फल, जो धरती पर पददलित होकर उपेक्षित रहने को अभिशप्त था, उसे कविता में सजाकर सौंदर्य का उपमान बना देना कवयित्री का ऐसा कौशल था, जिसने मुझे उन्हें ध्यान से सुनने के लिए प्रेरित किया।
इसके बाद जब-जब भी इस सृजनात्मक हृदय की कविताओं का उपभोग किया तब-तब आश्वस्त हुआ कि मैंने इन्हें पढ़ने-सुनने के लिए समय की जो कीमत चुकाई है, वह कम ही है। मेरे भीतर के रचनाकार को डॉ. कीर्ति काले की लेखनी से सात्विक ऊर्जा प्राप्त हुई है। उनके कितने ही गीत ऐसे हैं, जिन्होंने मेरे एकाकी मौन के वातायन में गुनगुनाहट भरी है।
‘याद फिर बुनने लगी है मखमली स्वेटर’ -इस गीत ने रह-रहकर मेरे मन की रोमावली पर गुनगुनी धूप का लेप किया है। कविता जितनी बारीक़ होगी, उतना ही अधिक रस उलीचेगी। इस गीत में न केवल स्वेटर बुनने की याद बुनी गई है, बल्कि एक-एक फंदे और एक-एक सिलाई की बुनावट में उंडला प्रेम भी शब्दाकार हो गया है। ‘धीरे-धीरे घट रहे हैं रात के फन्दे, पोरुओं ने छू लिए दिनमान के कंधे…’ अहा! कविता का कल्पनालोक चाहे, तो स्वेटर के फंदों से पूरी प्रकृति का आलिंगन कर सकता है। यही तो कवि की शक्ति है। इसीलिए तो कवि को ब्रह्मा कहा गया है।
ज्यों-ज्यों आप कीर्ति जी को और पढ़ोगे, त्यों-त्यों आपको इस बात पर और विश्वास होता जाएगा कि वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान। ‘दूर तक दृष्टि जाकर सिहर-सी गई, देखते-देखते दृश्य ओझल हुआ’ -गीत की यह पंक्ति रचनाकार के भीतर के उस दृष्टा का अवधान प्रदर्शित करती है, जो अपनी ही दृष्टि को देखने के लिए भी अपने साक्षीभाव को सचेत रखता है। शोक के जिस पल में आँखों की पुतलियाँ अश्रु अतिरेक के कारण कुछ नहीं देख पातीं, ऐसे में उन अश्रुओं के उस पार दूर तक दृष्टि ले जाना बड़ा जीवट का काम है और उससे भी कठिन है इस पार आँसुओं से जूझती पुतलियों के संघर्ष की गवाही देना। किसी नाटक के बीच ही जब यवनिका पतन हो जाए, तो ऐसे में उस दुर्घटना से भी नाटक का एक दृश्य बुन लेना किसी विलक्षण प्रतिभा के बूते ही संभव हो सकता है। कीर्ति जी ने इस गीत में ऐसे ही असंभव को संभव कर दिखाया है।
उनका एक गीत और है- ‘जब भी मन की माला फेरी, मर्यादा ने आँख तरेरी’। इस गीत की इन दो पंक्तियों में एक पूरे उपन्यास का कथानक समाहित हो गया है। सृजन के लिए मन और मर्यादा के मध्य जो संघर्ष होता है, वह पूरा संघर्ष अनायास ही इन दो पंक्तियों में उतर आया है। ऐसी पंक्तियाँ रचने के लिए किसी कवि को ज्ञान की नहीं अपितु किसी अदृश्य शक्ति के आशीर्वाद की आवश्यकता होती है। मर्यादा की सीमा से बाहर जाकर जिन्होंने मन की माला फेरी है, उन सब पुरखों का वर्णन कीर्ति जी ने इस गीत में पूरे दम-ख़म के साथ किया है। इस गीत में एक जगह कीर्ति जी लिखती हैं- ‘ईश्वर की आँखों से छलके होंगे सूरज-चंदा-तारे।’ यह पंक्ति विज्ञान की तमाम पोथियों को चुनौती देती है। लेकिन यह चुनौती इतनी ख़ूबसूरत है कि एक बार तो स्वयं विज्ञान भी ठिठककर इस पंक्ति को सच मान बैठता है। यह कविता का सम्मोहन है।
डॉ. कीर्ति काले के सृजनलोक में ऐसे सम्मोहन की अनेक वेदियाँ विद्यमान हैं। उनकी लेखनी से निःसृत सहज रचनाओं में एक ऐसा चुम्बकीय गुण है जो रसिकों को सहज ही अपने पाश में जकड़ लेता है।
हिन्दी कवि-सम्मेलन जगत् में तीन दशक से अधिक लम्बी यात्रा के बाद भी कीर्ति जी के स्वर की खनक और गीतों का प्रभाव कम नहीं हुआ है। इसका कारण यही है कि कवि-सम्मेलन के भीड़ भरे मेले में विचरते हुए भी वे अक्सर अपने रचनाकार का आश्रम सजाने के लिए मन का एकान्त खोजने में समर्थ हैं। सृजन के पारलौकिक शक्तिसूत्रों से यही अपेक्षा है कि वह डॉ कीर्ति काले जैसे रचनाकारों को उनके हिस्से का इतना एकन्त सदैव उपलब्ध कराएँ कि वे सरस्वती के इस असीम आकाश में अनवरत कुछ सितारे टाँकती रह सकें।

✍️ चिराग़ जैन

आचमन

आचमन, हिन्दी की वाचिक परम्परा का एक ऐसा नया पौधा है जो अपने शैशव काल में ही नन्हें अंकुरों के लिए वटवृक्ष की भूमिका निर्वाह कर रहा है। जिस दौर में कवि सम्मेलन की सरलता पर अव्यवस्थित चमक-दमक का आधिपत्य स्थापित होने लगा हो, उस दौर में सुव्यवस्थित सादगी से कवि सम्मेलन के मंच को कविता योग्य बनाने का उपक्रम है आचमन।
तीन वर्ष की छोटी सी यात्रा में आचमन ने यह पहचान कायम की है कि इस आयोजन में कविता से अधिक महत्वपूर्ण, कुछ भी नहीं है।
पिछली 18 तारीख़ को आचमन की तीसरी कड़ी लखनऊ में संपन्न हुई। मैं सुखद आश्चर्य से भर गया, जब मैंने भावना श्रीवास्तव और मनु वैशाली की वेशभूषा की सादगी देखी। मैं भीतर तक रस सिक्त हुआ जब योगी योगेश शुक्ल और विनोद श्रीवास्तव सरीखे रचनाकारों ने बिना किसी मंचीय टोटके के पूरे वातावरण में कविता का इत्र छिड़क दिया। हम रोज़ मंच पर बोलते हैं कि उर्दू और हिंदी दो बहनें हैं, लेकिन उस शाम जब इक़बाल अशहर अपना कलाम पढ़ रहे थे तो ऐसा लगता था कि मीर की मज़ार की कोई अगरबत्ती बाबा तुलसी की समाधि पर लगा दी गई हो।
…क्या-क्या बयान करूँ, उपदेश शंखधार जी जब गीत पढ़ रहे थे तो ऐसा प्रतीत होता था मानो हिन्दी कवि सम्मेलनों का चार-पाँच दशक पुराना दौर लौट आया हो, जब आयु के प्रभाव को अनदेखा करते हुए वयोवृद्ध गीतकार शृंगार के कोमल गीत बेहिचक पढ़ लेते थे।
चन्द्रशेखर वर्मा की शायरी और उसके बीच बीच में सहज चुटकियाँ मन को गुदगुदाने के साथ-साथ भिगो भी रही थीं।
यह आचमन के सत्व का ही सुयश था कि डॉ हरिओम पंवार का क्रुद्ध रश्मिरथी भी उस दिन शीतल होकर उर्वशी के पृष्ठ पलटते देखा गया।
डॉ सोनरूपा विशाल का संचालन ऐसा था मानो साहित्यिक कुनबे की एक सुगढ़ बिटिया पूरे परिवार को एक-एक कर जीमने के लिए पुकार रही हो।
मंच तो मंच, दर्शक दीर्घा तक में विलक्षणता विद्यमान थी। डॉ सर्वेश अस्थाना, शिखा श्रीवास्तव, रामायण धर द्विवेदी, अभय निर्भीक, प्रवीन अग्रहरि, मुनेन्द्र शुक्ल, अक्षत अशेष, स्वधा रवीन्द्र, पवन प्रगीत, अतुल वाजपेयी, गिरधर खरे और न जाने कितने ही सक्षम रचनाकार श्रोताओं के बीच विराजित थे!
आचमन की इस बेला में अपनी छोटी सी अंजुरी में कुछ बूंद रस लेकर लौटा हूँ, लेकिन ये कुछ बूंदें देर तक सृजन को तर रखेंगी।
✍️ चिराग़ जैन

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