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बापू के नाम पाती!

गांधी!
जब कोई तुम्हें गाली देता है
तब मुझे महसूस होता है
कि जिस देश को
तुमने दूसरा गाल आगे करने का
पाठ पढ़ाया था
उस देश के पास गाल है ही नहीं
सिर्फ़ हाथ हैं
जो तुम्हारे गाल पर
थप्पड़ मार-मार कर
तुम्हारा ही सबक याद करने का
ढोंग कर रहा है।

बापू!
तुम्हारा कृतज्ञता ज्ञापन करने
कोई नहीं आएगा
क्योंकि हम जानते हैं
कि तुमने उन्हें भी बद्दुआ नहीं दी
जिन्होंने तुम्हें पत्थर मारे
इसलिए तुम्हें गाली देने में
कोई ख़तरा नहीं है।

महात्मा!
तुम्हारे सिद्धांत
यतीम होकर भटक रहे हैं
स्वतंत्र भारत में
क्योंकि जिन्होंने तुम्हारे नाम को भुनाकर
सत्ता पाई है
उनके पास इन सिद्धांतों को देखने की
फ़ुर्सत नहीं है
और जो तुम्हारे नाम को भुना न सके
उनके पास इन सिद्धांतों को पालने का
सामर्थ्य नहीं है।

राष्ट्रपिता!
हम तुम्हें आज़ादी का नायक नहीं मानते
क्योंकि हम यह मानते हैं
कि तुम्हें नायक मान लेने से
बाकी सब नायकों का अपमान हो जाएगा
हम बाकी सबको भी
आज़ादी का नायक नहीं मानते
बल्कि हमने झुंड बनाकर
एक एक नायक चुन लिया है

अब हर झुंड
अपने नायक को महान बताते हुए
बाकी सबको गाली देता है
ताकि किसी भी नायक को ऐसा न लगे
कि उसके लिए इस देश में कोई लड़ नहीं रहा।

हे देवदूत!
मैं राजघाट पर तुम्हें पुष्पांजलि देने
कभी नहीं आऊंगा
क्योंकि मैं जानता हूँ
कि तुम वहाँ हो ही नहीं।
क्योंकि मैं जानता हूँ
कि तुम नज़रें झुकाकर जा चुके हो
ये देश छोड़कर

कई बार…।
कई बार तुम्हारी हताश उच्छ्वासों ने
उच्चारा है – “हे राम!”

✍️ चिराग़ जैन

स्वीकार

पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है
अधखुली-सी इक कली धीरज गँवाकर
पुष्प से प्रतियोगिता पर अड़ गई है

पंखुरी दर पंखुरी खिलना उचित है
डाल ने दिन-रात समझाया कली को
गंध निश्चित ही बिखरनी है हवा में
कौन-सी जल्दी पड़ी है बावली को
होड़ तज कर गंध को सींचो हृदय में
जो बसी भीतर, वही बाहर गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है

जब तलक संघर्ष है, जीवन तभी तक
राह की कठिनाइयों का मान करना
घुल गया मकरंद जिसका भी हवा में
उस कुसुम के धैर्य का सम्मान करना
साधना पथ पर नहीं विचलित हुआ जो
ख्याति उस इंसान की घर-घर गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है

मंद बहकर ही नदी सरगम बनेगी
वेग तो तटबंध को ही तोड़ देगा
रूह को महकाएँगी मंथर हवाएँ
और अंधड़ देह को झकझोर देगा
जो नियति की चाल से आगे बढ़ी है
वह कली अल्पायु में ही झर गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है

ताप सहकर ही बनेगी वज्र, माटी
फिर भला दहती लपट से रूठना क्या
कर्म का अधिकार ही हमको मिला है
स्वप्न की फिर सर्जना क्या, टूटना क्या
हठ पकड़ बैठा कोई जब भी नियति से
भाग्य की त्यौरी उसी क्षण चढ़ गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है

✍️ चिराग़ जैन

प्रतीक्षा की गली

प्रेम चलकर आएगा जब तक प्रतीक्षा की गली में
तब तलक संसार भर में प्रीति जीवित रह सकेगी
है समर्पण जब तलक तैयार सब कुछ हारने को
उस घड़ी तक भावना की जीत जीवित रह सकेगी

जब तलक बदली स्वयं बेचैन होकर झर न जाए
तब तलक चातक उसे तकता रहेगा प्यास लेकर
बदलियों की शुष्क लापरवाहियों को क्या पता है
कण्ठ में अटके हुए हैं प्राण इक विश्वास लेकर
मृत्यु से पहले बरस जाओ, पिघल जाओ अगर तुम
तो प्रणयगत साधना की रीति जीवित रह सकेगी

उम्र काटी है शिला ने भी यही विश्वास रखकर
एक दिन मझमें विधाता प्राण भर देंगे परस कर
बेर चख-चख कर कोई शबरी प्रतीक्षारत रही है
इस अभागे प्रेम को स्वीकार लेंगे राम हँसकर
चेतना में प्रीत के अमरत्व का उल्लास भर दो
देह भी हर नियति के विपरीत जीवित रह सकेगी

✍️ चिराग़ जैन

उस पल मुझको रोना आया

जब तुम चल दी राह बदल के
दो आँसू ना आँख से छलके
जब मैंने घर वापस आकर, ख़ुद घर का दरवाज़ा खोला
घर के भीतर घर ग़ायब है, ये घर का हर कोना बोला
जब तुमको आवाज़ लगाई
और न कोई उत्तर पाया

उस पल मुझको रोना आया
यादों के सौन्धे बिस्तर पर, मैं बिल्कुल एकाकी सोया
तब समझा, मैंने क्या खोया, तब मैं फफक-फफक कर रोया
पीठ दुखी तो बाम उठाकर
मेरा हाथ लेप ना पाया
उस पल मुझको रोना आया

जब मैंने अपना बोझा ख़ुद अपने ही कंधों पर ढोया
टूटा बटन लगाने को जब ख़ुद सूईं में धागा पोया
सुबह-सुबह भागादौड़ी में
बटुआ साथ नहीं ले पाया
उस पल मुझको रोना आया

देर रात घर वापिस आकर, जब-जब मैंने खाना खाया
फ्रिज से निकली दाल गर्म करने में मुझको आलस आया
जब भोजन के बाद किसी ने
जूठा बर्तन नहीं उठाया
उस पल मुझको रोना आया

जब इस जीवन से उकताकर, मरने की इच्छा हो आई
कहीं किसी ने आँखें पढ़कर मेरी थकन नहीं सहलाई
‘मरें तुम्हारे दुश्मन’ कहकर
मुझको ढांढस नहीं बंधाया
उस पल मुझको रोना आया

✍️ चिराग़ जैन

एक क़लम ऐसी

इस महफ़िल में चुपचुप बैठी एक क़लम ऐसी है जिसने
ग़ालिब से ग़ज़लें सीखी हैं, तुलसी से चैपाई ली है
अम्बर के उद्दीप्त सितारो, उसको किरणों से दुलराना
जिसने कविता के उपवन में अभी-अभी अंगड़ाई ली है
✍️ चिराग़ जैन

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