Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
पतझर का आना निश्चित था
पत्ते झर जाना निश्चित था
हरियाली की आशाओं पर, बादल ने आघात करा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है
दुःशासन ने चीर हरा तो ठीक समय आ पहुँचे माधव
भीष्म काल बनकर बरसे तो तोड़ प्रतिज्ञा पहुँचे माधव
एकाकी होकर जूझा अभिमन्यु अकेला षड्यंत्रों से
आस रही होगी उसको भी, माधव के अभिनव तंत्रों से
उसका घिर जाना निश्चित था
भू पर गिर जाना निश्चित था
पर उस दिन जो वीर मरा है, उम्मीदों के साथ मरा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है
जिस रानी ने जर्जर रथ की कील बना दी अपनी उंगली
दशरथ के रथ के पहिये के बीच फँसा दी अपनी उंगली
अंतर कभी नहीं रखती हो जो सौतन की संतानों में
ऐसी रानी रूठ गई तो क्या मांगेगी वरदानों में
राघव को वनवास; असंभव
रघुकुल को संत्रास; असंभव
पहले यह विश्वास मरा है, दशरथ उसके बाद मरा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
जिसको तुम नाकामी कहकर थककर बैठ गए हो ना
उससे केवल चार क़दम पर मंज़िल का दरवाज़ा है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
दुनिया का सारा वैभव है राजमहल की सुविधाओं में
फिर भी कान्हा को रह-रह कर वृंदावन की याद आती है
सोने-चांदी में भरकर जब इत्र बरसता है राहों में
मन को गोकुल के सीधे-सादे सावन की याद आती है
जब राजा के सैनिक घर से सारा माखन ले जाते थे
हम पानी के साथ चने खाकर तकते ही रह जाते थे
मजबूरी के तूफ़ानों में सारी मेहनत खो जाती थी
सारे घर की रोटी पोकर, माँ भूखी ही सो जाती थी
जब मक्खन की पूरी टिकिया फिंकने लगती है जूठन में
छींके की हाण्डी में पसरे रीतेपन की याद आती है
अनुशासन की याद दिलाने, बाबा की आहट काफ़ी थी
मर्यादा का पाठ पढ़ाने को घर की चैखट काफ़ी थी
औरों के दिल घायल कर दें, ऐसे जुमले याद नहीं थे
रास रचाते थे जी भर कर पर मन में अपराध नहीं थे
जब चैसर पर मर्यादा की सब सीमाएँ लाँघी जाएँ
गुल्ली-डण्डे से बहलाते उस बचपन की याद आती है
इस महफ़िल में ऐसे कपड़े, उस महफ़िल में वैसे कपड़े
आँखों से लज्जा ग़ायब है, तन पर कैसे-कैसे कपड़े
मन पर चिन्ताएँ हावी हों पर फिर भी मुस्काना होगा
हर जलसे में, हर महफ़िल में रस्म निभाने जाना होगा
जब नियमों की सीमाओं में इच्छाएँ घुँटने लगती हैं
बचपन के सँग पीछे छूटे पागलपन की याद आती है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
रीतियों को तोड़ने का बल जुटा पाना कठिन है
बल जुटा लो तो सभी से बात मनवाना कठिन है
तर्जनी पर न्याय ठहराना कठिन है रे।
कृष्ण हो पाना कठिन है रे।
हर किसी की पीर का संज्ञान होना खेल है क्या
शब्दहीना आस का अनुमान होना खेल है क्या
प्रश्न, जिज्ञासा, शिक़ायत ही मिलें सबके नयन में
कृष्ण से पूछो कभी; भगवान होना खेल है क्या
हर किसी का द्वंद सुलझाना कठिन है रे।
कृष्ण हो पाना कठिन है रे।
रीतना है देवकी के भ्रातृसुख का कोष तुम पर
और राधा की अधूरी प्रीत का है दोष तुम पर
शांति का हर यत्न तुम करते रहे हो; किन्तु फिर भी
हर नपूती माँ उतारेगी विकट आक्रोश तुम पर
शाप पाकर ओंठ फैलाना कठिन है रे।
कृष्ण हो पाना कठिन है रे!
सृष्टि का हित ध्यान रक्खा, शेष बंधन तोड़ आए
जो हृदय को ढांप पाए, वस्त्र ऐसा ओढ़ आए
किस तरह अपनी सभी संवेदनाएँ मौन कर लीं
जो तुम्हारा मन समझती थी, उसे तुम छोड़ आए
प्रीत से मुख मोड़ कर जाना कठिन है रे।
कृष्ण हो पाना कठिन है रे।
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
जब तलक संघर्ष में थे, व्यस्तता के हर्ष में थे
दृश्य कितने ही मनोरम, कल्पना के स्पर्श में थे
स्वप्न जबसे सच हुआ, उकता रहे हैं हम
जीतकर पछता रहे हैं हम
जब हमें हासिल न थी, मंज़िल लुभाती थी निरन्तर
बाँह फैलाए हमें हँसकर बुलाती थी निरन्तर
पर पहुँच कर जान पाए, है निरी रसहीन मंज़िल
राह गति की सहचरी है, हलचलों से हीन मंज़िल
हम सरीखे युग-विजेता हर जगह बिखरे पड़े हैं
हम स्वयं को ही बड़ा समझे, यहाँ कितने बड़े हैं
हर किसी की कीर्ति गाथा से हुई है त्रस्त मंज़िल
हर घड़ी तोरण सजाए, स्वागतों में व्यस्त मंज़िल
राह के जिस मोड़ से गुज़रे वहाँ बाक़ी रहे हम
किन्तु मंज़िल पर पहुँचकर नित्य एकाकी रहे हम
रास्तों को याद अब भी आ रहे हैं हम
जीतकर पछता रहे हैं हम
याद आता है दशानन किस तरह टूटा हुआ था
याद है अभिमान का हर एक प्रण झूठा हुआ था
गूँजता है कान में वह युद्ध का जयघोष भीषण
याद सागर को रहेगा राम का आक्रोश भीषण
क्या ज़माना था हमारे नाम से पत्थर तिरे थे
मौत से टकरा गए सब यार अपने सिरफिरे थे
प्रेम मीठे बेर चखकर रोज़ रखता था, समय था
वाटिका में प्रीत का बूटा महकता था, समय था
हम अगर छू लें, शिलाएँ बोल उठती थीं, समय था
नाम भर से पापियों की श्वास घुटती थी, समय था
जंगलों में भी कभी सत्कार होता था, समय था
हम जिधर भी चल दिये, त्यौहार होता था, समय था
मन पुरानी याद से बहला रहे हैं हम
जीतकर पछता रहे हैं
हम खड़े थे साथ जिसके, जय उसी के द्वार आई
हर प्रखर संकल्प अपना सृष्टि हम पर वार आई
शास्त्र को छूकर न जाना, पर महाभारत लड़ा था
युद्ध के मैदान में भी धर्म का पोथा पढ़ा था
काज जो सम्भव नहीं थे, वो हमीं ने कर दिखाए
पर्वतों की ओट लेकर इंद्र को ललकार आए
कालिया के दाह में हम कूद जाते थे अकेले
खेल में सुलझा दिए थे, विश्व के कितने झमेले
मित्रता की रीत के प्रतिमान हम ही ने गढ़े हैं
और पावन प्रीत के उपमान हम ही ने गढ़े हैं
बाँसुरी की तान पर यौवन थिरकता था हमीं से
जब सुदर्शन धार लें तो पाप कँपता था हमीं से
पदकमल से व्याल को भरमा रहे हैं हम
जीतकर पछता रहे हैं हम
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
पीड़ा की तैयारी कर लो, सुख का आमंत्रण आया है
जब-जब कंचन मृग देखा है, तब-तब इक रावण आया है
ईश्वर का अवतार जना है, माता को अभियोग मिलेगा
कान्हा जैसा लाल मिला है, आगे पुत्रवियोग मिलेगा
नारायण के बालसखा ने निर्धनता के कष्ट सहे हैं
वंशी के रसिया जीवनभर, समरांगण में व्यस्त रहे हैं
राधा के जीवन में दुख से पहले वृंदावन आया है
जब-जब कंचन मृग देखा है, तब-तब इक रावण आया है
वरदानों का सुख पाया तो, सुख का फल अभिशाप हुआ है
तप का पुण्य कुमारी कुंती के जीवन का पाप हुआ है
जो शाखा फैली है उसने कट जाने की पीर सही है
अर्जुन जैसा वर पाया, फिर बँट जाने की पीर सही है
पहले रानी बनने का सुख, पीछे चीरहरण आया है
जब-जब कंचन मृग देखा है, तब-तब इक रावण आया है
सुख के पीछे दुख आएगा, हर क़िस्से का सार यही है
जितनी घाटी, उतनी चोटी, पर्वत का विस्तार यही है
यौवन आने का मतलब है, आगे तन जर्जर होना है
जिस धारा ने निर्झर देखा, अब उसको मंथर होना है
नदियों में ताण्डव उफना है, जब घिरकर सावन आया है
जब-जब कंचन मृग देखा है, तब-तब इक रावण आया है
✍️ चिराग़ जैन