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याद का गीत

याद ने इक रेशमी-सा जाल फिर फैला लिया है
मन ज़रूरी काम सारे छोड़कर है गुम
याद फिर से आ रही हो तुम

त्यौरियां चिन्ताओं का बोझा सम्भाले फिर रही हैं
चेतना बरसों पुराने हर्ष में उलझी हुई है
हाथ में तो ढेर सारे काम हैं आधे-अधूरे
उंगलियाँ केवल तुम्हारे स्पर्श में उलझी हुई हैं
याद के उस छोर पर बाँहें पसारे तुम खड़ी हो
सज रही तुम पर वही कुमकुम
याद फिर से आ रही हो तुम

फिर तुम्हारी देह का मकरंद मन में घुल रहा है
आह, मेरे ओंठ आपस में अचानक गुंथ गए हैं
साँस बढ़-चढ़कर स्वयं सिसकारियाँ बनने लगी हैं
नैन फिर आनन्द की हद तक पहुँच कर मुंद गए हैं
कान में एहसास का संगीत गूंजे जा रहा है
सज उठी फिर याद की अंजुम
याद फिर से आ रही हो तुम

✍️ चिराग़ जैन

देह और प्राण

देह के कष्ट से जिनको परहेज है
प्राण का सुख उन्हें मिल सकेगा नहीं
संकुचित ही रहेगी अगर पाँखुरी
कोई गुल बाग में खिल सकेगा नहीं

सत्य है, जो खिले वो सभी एक दिन
पत्ती-पत्ती चमन में बिखर जाएंगे
पर बिखरने के डर से जिन्होंने सुमन
बंद करके रखा वो भी मर जाएंगे
प्रेम पिंजरा अगर बन गया तो तुम्हें
प्रेम का साथ भी झिल सकेगा नहीं

देह की पीर के पार आनंद है
भोग में, योग में, जोग में हर जगह
जो भी सुविधा जुटाते रहे काय की
वो घिरे हैं किसी रोग में हर जगह
देह के नेह में प्राण घुट जाएंगे
हो तुम्हें कुछ भी हासिल सकेगा नहीं

✍️ चिराग़ जैन

गिरगिट का कष्ट

नेता से अपनी तुलना का रिवाज
गिरगिट को बहुत खलता है
गिरगिट
केवल संकट देखकर रंग बदलता है
नेता तो
अवसर देखकर रंग बदलता है।

✍️ चिराग़ जैन

मेरी मौत की ख़बर

एक रात
एक न्यूज़ चैनल
स्पीड की सारी हदें पार कर गया
न्यूज एंकर ने
मेरे टीवी पर
मुझे ही बताया कि मैं मर गया

नेशनल चैनल की न्यूज़ थी
इसलिए संदेह भी नहीं कर सकता था
और मीडिया का इतना सम्मान करता हूँ
कि इस ख़बर को सच साबित करने के लिए
मैं सचमुच मर सकता था

मैंने भी एक झटके में
दुनिया के हर तेज़ चैनल को बीट कर दिया
और अपने ट्विटर हैंडल से
अपनी ही आत्मा की शांति का ट्वीट कर दिया

अब क्या था
मेरी अच्छाइयों की चर्चा
हर फेसबुक फ्रेंड करने लगा
डेढ़ घंटे में ही RIP CHIRAG का हैशटैग
सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा

मेरे बारे में ऐसी-ऐसी बातें लिखी गईं
जिनके बारे मैं मैं ख़ुद नहीं जानता था
उस दिन मैंने लगभग डेढ़ सौ ट्वीट उन अजनबियों के पढ़े
जिन्हें मैं अपना भाई मानता था

उस दिन मुझे पता चला
कि मैंने
अपनी हर नयी कविता को
किस-किस से ठीक करवाया
ढाई सौ लोग ऐसे मिले
जिन्होंने मदद करके
मेरा एक कमरे का मकान बनवाया

उस दिन हर इंसान के
बदले हुए किरदार दिख रहे थे
जो मुझसे उधार लिए बैठे हैं
वो भी मुझे कर्ज़दार लिख रहे थे

उस दिन इतनी ऊँची-ऊँची छोड़ी गई
कि छोड़ने वाले ख़ुद ही नहीं पकड़ पाए
तीन सौ लोगों ने मुझे उंगली पकड़ कर मंच पर चढ़ाया
और उनमें से ढाई सौ तो ख़ुद नहीं चढ़ पाए

एक ने तो यहाँ तक लिखा
कि मुझे हिन्दी का व्याकरण ही उससे ‘सिखा’

वो बहुत प्रतिभाशाली था
वो बहुत अच्छा था
हमेशा खरा बोलता था
मंच पर जादू करता था
हर ओर मेरे सद्गुणों की चर्चा ख़ूब होने लगी
कॉपी-पेस्ट टाइप की श्रद्धांजलियां पढ़-पढ़कर
मुझे मरने से ऊब होने लगी

जब लोगों ने मेरी बर्दाश्त से ज़्यादा
मेरा महिमामंडन कर दिया
तो मैंने अपने मरने की ख़बर का खण्डन कर दिया

खण्डन की ख़बर से
एक ओकेजनल फ्रेंड सचमुच उदास हो गया
कितनी मेहनत से श्रद्धांजलि की पोस्ट लिखी थी
तेरह सौ लाइक्स भी आ गए थे
सारी माइलेज का सत्यानाश हो गया

एक रिश्तेदार ने गुस्से में फोन किया
ये क्या तरीक़ा है भाईसाहब
पहली बार तो आपकी मौत की न्यूज़ मिली थी
वो भी झूठ हो गयी
आपकी तो शोकसभा तक हूट हो गई
मैंने तो तेरहवीं के लिए
हलवाई भी बुक करवा दिया है
भाईसाहब आपने नहीं मर के
मुझे मरवा दिया है

एक ने तो गुस्से में यहाँ तक कह डाला
फिर बच गया साला।

थोड़ी ही देर में मैं जान चुका था
कि आज की दुनिया में
मौत की ख़बर का भी
मल्टिपल यूज़ है
ऐसी हर ख़बर
किसी के लिए पोस्ट
किसी के लिए ट्वीट
और किसी के लिए ब्रेकिंग न्यूज़ है

हम लोगों को एक-दूसरे के मर जाने का इंतज़ार है
ज़िंदा बच जाने का डर है
संवेदना की लाश पर खड़े लोगों के लिए
अब मौत भी एक अवसर है

✍️ चिराग़ जैन

पापा का जादू

न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

दिन भर दुनिया भर के सब आघातों को सहते हैं
रात ढले अपनी दुविधा बस अम्मा से कहते हैं
इतने सीधे-सच्चे हैं हर छल से हिल जाते हैं
जब अपने बच्चों से मिलते हैं तो खिल जाते हैं
झट से ग़ायब हो जाती है चिंताओं की लीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

छह दिन दफ्तर की चिक-चिक से थककर घर आते हैं
रस्ते से घर की ख़ातिर तरकारी भी लाते हैं
राशन, रिश्ते, आस-पड़ोसी, मंदिर, मेले-ठेले
इतना सब कुछ कर लेते हैं पापा सिर्फ़ अकेले
बिना थके एक्टिव रहते हैं पूरे-पूरे वीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

गर्मी के मौसम में मैंगो-शेक पिला लाते हैं
सर्दी में मम्मी से गर्म भटूरे बनवाते हैं
मौक़ा मिलते ही हमको पिकनिक पर ले जाते हैं
थोड़े से पैसों में सारी ख़ुशियाँ ले आते हैं
सुख की रोज़ कताई करते रहते हैं बारीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

नुक्कड़ के हर जमघट से निश्चित दूरी रखते हैं
लेकिन अपने घर की ख़ातिर सबसे लड़ सकते हैं
छुटकी की ट्यूशन के बाहर किस-किसका फेरा है
अख़बारों की हेडिंग के डर ने मन को घेरा है
ख़ुद डरकर भी हम बच्चों को रखते हैं निर्भीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

हम घबराएं तो हिम्मत का ग्राफ बढ़ा देते हैं
दुनियादारी के आवश्यक पाठ पढ़ा देते हैं
छत पर ले जाकर तारों का लोक दिखा देते हैं
खेल-खेल में जीवन के सब ढंग सिखा देते हैं
कभी कभी बस आँखों से ही दे देते हैं सीख
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

हुए रिटायर लेकिन घर के काम बहुत आते हैं
दूर-दूर के रिश्ते-नाते आप निभा आते हैं
ख़ुद जाकर निबटा लेते हैं सब पचड़े सरकारी
भात, सिंदारे, छूछक, मुंडन, श्राद्ध, मनौती सारी
उन्हें पता रहती है अब भी हिंदी की तारीख़
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

तेज़ दौड़ती दुनिया से कुछ आगे ही रहते हैं
फुलवारी की चिंता करते जागे ही रहते हैं
तन से बूढ़े हैं पर मन से ख़ूब तने रहते हैं
हब सब बच्चों के सिर पर आशीष बने रहते हैं
पर अब भी रहता है उनका हर अनुमान सटीक
न कोई ट्रिक है ना तकनीक
पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक

✍️ चिराग़ जैन

शेर का मुँह

पहले शेर ने दूसरे से कहा
यार इतना समृद्ध तो यह देश कभी नहीं रहा
हो न हो, अपने भारतीय
विकास की सबसे ऊँची सीढ़ी चढ़ रहे हैं
ज़रूरत के लिए नहीं
मूरत के लिए लड़ रहे हैं।

दूसरे का उत्तर सुनने से पहले
तीसरा शेर बीच में ही बोल पड़ा
जितना ये लड़ रहे हैं
उतना तो अपना अशोक भी कलिंग में नहीं लड़ा

तभी चौथे शेर ने टोका
तीनों शेरों को बोलने से रोका
चुप हो जाओ भाइयो
ज़रा-सा मुँह खुलने पर ही
विवाद बड़ा हो गया है
अपना बंद मुँह
अपने खुले मुँह के सामने खड़ा हो गया है
हमारे मुँह का मुद्दा ट्रोल आर्मी ने जी भरकर घिसा
हमारे फेस एक्सप्रेशंस का अर्थ समझने में
फेल हो गई मोनालिसा

तभी एक लाईक लोलुप देशभक्त
अपनी डिग्रियों पर पैर रखकर
शेर के सामने खड़ा हो गया
सीन इतना रोचक था
कि हर मुद्दे से बड़ा हो गया
शेर की ऊँचाई नापने के लिए
वो अपनी सीमाएँ भी भूल गया
और जोश-जोश में
महँगाई का ग्राफ पकड़ कर झूल गया।
जैसे-तैसे वो दोपाया
पहले शेर के मुँह तक आया
और मुँह में हाथ डालकर
गिनने लगा शेर के दाँत
देखनेवालों को याद आ गयी
एक और पुरानी बात
इतिहास की इस ऊहापोह में
वर्तमान के सवाल सिसक-सिसक कर मरते रहे
लोग खुले मुँह पर अटके रहे
और आँखों से आँसू झरते रहे।

✍️ चिराग़ जैन

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