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सार्थकता

सच बोलने की भी जो हिम्मत जुटा न सके ऐसी निरी खोखली जवानी किस काम की शोषण को देख नहीं लहू में उबाल आए बोलो ऐसी ख़ून की रवानी किस काम की लाज, प्रेम, करुणा की नमी यदि सूख जाए भला फिर आँख बिन पानी किस काम की जिसके निधन पे न चार नैन नम हुए ऐसे आदमी की ज़िन्दगानी किस काम की...

काव्य

जिन शिखरों को हो पिघलने से ऐतराज़ उन्हें कभी नदी-सा बहाव नहीं मिलता अनुभूति अनकही रहती हैं जब तक अक्षरों से उनका स्वभाव नहीं मिलता जोड़-तोड़ करने से कविता तो बनती है किन्तु ऐसी कविता में भाव नहीं मिलता काव्य तो है ऐसी पीड़ाओं की प्रतिध्वनि जहाँ टीस उठती है पर घाव नहीं...

वसंत (दो चित्र)

परेशानियों में यदि उलझा हो अंतस् तो कैसा लगता है ये वसंत मत पूछिये एक-एक दिन एक युग लगता है; और कैसे होता है युगों का अंत मत पूछिये प्रेमगीत शोर लगते हैं और लिपियों के चुभते हैं कितने हलन्त मत पूछिये जल विच कमल सरीख़ा लगता है मन काहे बनता है कोई सन्त मत पूछिये धरती के...

छलना

मटक-मटक लट झटक-झटक; हिया- पट खटपट खटकाती है गुजरिया ठक-ठक-ठक खटकात नटखट मोरे हिवड़ा के पट, बतलाती है गुजरिया लाग न लपट, तज अंगना का वट झट जमना के तट, चली आती है गुजरिया लेवे करवट जब मन का कपट उस पल झटपट नट जाती है गुजरिया ✍️ चिराग़...

प्रभु की वन्दना

नानक, कबीर, महावीर, पीर, गौतम को पंथ-देश-जातियों का नाम मत दीजिए जिनने समाज की तमाम बेड़ियाँ मिटाईं उन्हें किसी बेड़ी का ग़ुलाम मत कीजिए मन के फ़कीर अलमस्त महामानवों को रूढ़ियों से जोड़ बदनाम मत कीजिए प्राणियों के प्रति प्रेम ही प्रभु की वन्दना है भले किसी ईश को प्रणाम मत...

पनिहारी

पानी भरने को पनिहारी पनघट चली मटकिया मटकती कटि में दबात है गोरी के बदन की छुअन ऐसी मदभरी मदहोश गगरिया झूम-झूम गात है अंग-अंग में सुगन्ध ता पे मतवारी चाल मोरनी भी नत है, हिरनिया भी मात है चूम-चूम पतली कमरिया गुजरिया की गगरिया गोरी संग ठुमका लगात है क्वारी पनिहारी लिए...
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