Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सिद्धांतों की बलिवेदी पर, अपनापन बलिदान हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है
लंका हो या अवधपुरी हो, सब ही ने ली अग्निपरीक्षा
धोबी के आक्षेपों की भी, मन में कर ली स्वयं समीक्षा
नष्ट सभी ने सीताओं का, सारा सुख-सौभाग किया है
रावण ने अपहरण किया था, राघव ने परित्याग किया है
जो मर्यादित थे उनका भी, पल में अलग विधान हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है
मथुरा जाने के निर्णय में, राधा की स्वीकृति भी थी क्या
राजपथों पर बढ़ते पग ने, पगडण्डी की पीर सुनी क्या
कौरव, पाण्डव, शकुनी, गीता, नगरी स्वर्ग लजाने वाली
याद नहीं आई पल भर भी, वो पगली बरसाने वाली
उदय किसी का तब ही संभव, जब कोई अवसान हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है
लक्ष्मण ने निजधर्म निभाया, उर्मिल भीतर-भीतर रोई
घिरा इधर अभिमन्यु अगर तो, उधर उत्तरा सिसकी कोई
गौतम की कुण्ठा को झेले एक अहिल्या पत्थर बनकर
रजवाड़ों की आन बचाई, पद्मिनियों ने जौहर रचकर
आधारों पर पैर टिकाकर, शिखरों का निर्माण हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सच जब किरच-किरच कर बिखरा
भावों का अवसान हो गया
उसको शब्दों तक लाने में
कवि भी लहूलुहान हो गया
सच के टुकड़े हाथ उठाए
जिसने उन्हें निकट से देखा
उसकी हुई हथेली घायल
भंग हुई जीवन की रेखा
अक्षर साथ छोड़कर भागे
वाणीकुल वीरान हो गया
सब सिद्धांत तड़ककर टूटे
झूठे पर्दों ने सुख लूटे
बड़े हुए तो हमने पाए
बचपन के सब किस्से झूठे
मछली जल की रानी है; ये
घड़ियालों को ज्ञान हो गया
मटके में जो कंकड़ डाले
उनने सारा पानी सोखा
प्यासा कौआ श्रम कर करके
अब भी खा जाता है धोखा
कछुओं के तप से भी ऊँचा
खरगोशों का स्थान हो गया
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
दो हज़ार पन्द्रह में किसने कैसा-कैसा किया कमाल
पाँच मिनिट में दिखलाता हूँ आओ तुमको पूरा साल
शुरू हुआ जब साल तो बीजेपी के दिल पर था कुछ भार
भूल नहीं पाए थे मोदी काश्मीर की आधी हार
लेकिन तभी पढ़ा मोदी ने ऐसा इक अमरीकी मंत्र
अतिथि बनकर आए ओबामा झूम उठा अपना गणतंत्र
गली-गली घूमे मोदी जी, ओबामा का थामे हाथ
करी रेडियो स्टेशन पर नए यार से मन की बात
विदा हुए ओबामा जिस पल उस पल आ पहुँचा चुनाव
अमित शाह ने झोंक दिया सब बीजेपी का लश्कर लाव
गली-गली में रैली करके मोदी जी ने मांगे वोट
लेकिन दिल्ली की जनता ने किया गज़ब का ही विस्फोट
कजरी की खांसी सुन ली पर नहीं सुनी मोदी की बीन
झाडू वाले सड़सठ आए बीजेपी के केवल तीन
पहली बार हुई भारत में राजनीति की ऐसी रेस
खाता तक भी खोल नहीं पाई राहुल जी की कांग्रेस
अच्छे दिन बीते तो आया ऐसा इक चैतरफ़ा खोट
जख़्मों में मिर्ची-सा लागा मोदी का लखटकिया कोट
अभी ठीक से थमा नहीं था दिल्ली वाला ये हड़कंप
उधर आ गया काठमांडु में दर्दनाक भीषण भूकंप
पशुपति की नगरी में ऐसा तांडव करती नाची मौत
धरती की इक करवट बन गई मानव की ख़ुशियों की सौत
हार गई पर मौत, देखकर मानवता का साथी भाव
सारी दुनिया मरहम लेकर भरने पहुँच गई जब घाव
इधर रंग लाया दिल्ली में रामदेव का बिज़निस जोग
पीएम ने जब किया राजपथ पर जाकर बाबा का योग
योग दिवस की धूम मच गई गूंज उठा दुनिया का व्योम
अमरीका अनुलोम कर रहा, रूसी उसका ठीक विलोम
नाॅर्थ-ईस्ट में इक दिन आई, इक ऐसी दुखियारी शाम
खड़े-खड़े अशरीर हो गए, डाॅक्टर एपीजे कलाम
इसी बीच हम सबने देखा न्याय नीति का अद्भुत मेल
दो घंटे में हाईकोर्ट से सलमानों को मिल गई बेल
मुम्बई हमलों के दोषी की दया याचिका हो गई फेल
शुरू हुआ फिर भारत भर में धर्म-सम्प्रदायों का खेल
शर्म आ रही है कहने में ऐसी घटिया ओछी बात
हत्यारे की रक्षा करने लगी अदालत आधी रात
उधर दादरी में छोरों ने गौरक्षा का चोला ओढ़
लगा दिया पूरे भारत को हिन्दू-मुस्लिम वाला कोढ़
हिन्दू-मुस्लिम, सपा-भाजपा से पाई भी ना थी पार
तभी सड़क पर आरक्षण का ढोल पीट गए पाटीदार
आसमान में जाकर बैठी, ऐसी तनकर तूअर दाल
आम आदमी सन्न रह गया, चांदी काटे फिरे दलाल
सहनशीलता के मुद्दे पर यकदम ऐसा उठा बवाल
सम्मानों को वापिस करने दौड़ पड़े वाणी के लाल
सहिष्णुता का डंका पिटते.पिटते हो गई काफी देर
दिल्ली में रैली करने आए ख़ुद चलकर अनुपम खेर
दुश्मन को कमज़ोर मानने की फिर से कर ली मिस्टेक
छोटे-मोटे, टेढ़े-मेढ़े सभी विरोधी हो गए एक
मोदी देख तलक़ ना पाए, इन सब बातों का रेफरेंस
पटना में रपटा औंधे मुँह अमित शाह का काॅन्फिडेंस
लालू ने मोदी को पटका, धरे रह गए सारे ठाठ
सांठगांठ ने उम्मीदों को दी चैड़े में धोबीपाट
टूट गए सब टिके हुए थे न्यायालय पर जो अरमान
हत्याओं के इल्ज़ामों से पूरे छूट गए सलमान
दिल्ली के सचिवालय में अब रहे केजरी खुलकर खाँस
लोकपाल फिर लटक गया पर वेतन का बिल हो गया पास
समझ लिया है स्वयं केजरी ने ख़ुद को ही सैमी गाॅड
पाॅल्यूशन पर रोक लगाने को ले आए ईवन-आॅड
लेकिन विचलित नहीं कर सका है पीएम को कोई कलेश
मोदी जी ने घूम लिए हैं छप्पन दिन में बाईस देश
मेमन, दाउद, काला धन और डाॅलर, सोना, कच्चा तेल
संथारा, पर्यूषण, अरहर, हिन्दू, मुस्लिम, जाट, पटेल
सिंगापुर, बैंकाॅक, बनारस, फ्रांस, जर्मनी, गांधीधाम
सारे मुद्दे फीके पड़ गए, साल रहा मोदी के नाम
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
आपकी प्रीत जबसे सुलभ हो गई
फिर किसी मीत की आरज़ू ना रही
प्यार में हार कर जो मिला है मुझे
अब किसी जीत की आरज़ू ना रही
साँवरे के लिए गीत गाती फिरी
एक मीरा दीवानी कहाती फिरी
क्षण समर्पण का जब तक न हासिल हुआ
तब तलक हर नदी गुनगुनाती रही
राधिका कुंजवन में मिली श्याम से
फिर उसे गीत की आरज़ू ना रही
शब्द आँखों में आकर ठहरने लगे
भाव चेहरे की लाली में ढलने लगे
कण्ठ में जम गए ज्ञान के व्याकरण
अर्थ अधरों पे आकर पिघलने लगे
श्वास का राग धड़कन से ऐसा मिला
मुझको संगीत की आरज़ू ना रही
अबकी सावन मिलेगा तो पूछूंगी मैं
मेघ पहले क्यों ऐसे न लाया कभी
बिजलियों ने न इतना प्रफुल्लित किया
कोयलों ने न यूँ मन लुभाया कभी
मन के चातक ने कैसा अमिय चख लिया
अब उसे छींट की आरज़ू ना रही
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
कैसा था वो अनुभव तुमने
सबसे पहले जब मेरे
संदेशों की अनदेखी की थी
जब सम्बन्ध प्रगाढ़ रहा था
सहज मिला करते थे हम-तुम
पहरों जाने कितनी बातें
रोज़ किया करते थे हम-तुम
तब भी मुझको डर लगता था
तब भी मैं सोचा करता था
आपस में दूरी आई तो
तुम उत्तर ना दे पाई तो
तब कैसे रातें काटेंगे
किससे अपना मन बाँटेंगे
तब भी तुमने बेफ़िक्री से
मेरे मन के ऐसे सब
अंदेशों की अनदेखी की थी
पहले सोचा व्यस्त हुई हो
दुनियादारी की बातों में
फिर जाना अभ्यस्त हुई हो
कोमलता पर आघातों में
जब संदेशा पहुँचा होगा
तुमने ये तो सोचा होगा
उत्तर बिना उदास रहेंगे
वो मुझसे नाराज़ रहेंगे
मैं उनको समझा ही लूँगी
कारण एक बना ही लूँगी
ख़ुद को लापरवाह बनाकर
तुमने उन अपनत्व भरे
आदेशों की अनदेखी की थी
जब मेरा सन्देश तुम्हारी
दिनचर्या में खो जाता हो
कुछ पल मेरी याद जगाकर
आख़िर धूमिल हो जाता हो
तब उत्तर की प्यास जगाए
हर आहट से आस लगाए
मन व्याकुल होता जाता था
सब धीरज खोता जाता था
खीझ, तड़प, चिंता, आकुलता
क्रोध, प्रलय, संशय, आतुरता
मत पूछो क्या क्या होता था
जब तुमने अधिकार भरे
परिवेशों की अनदेखी की थी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
किसी की बात में आकर बँटा आँगन बना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे
जहाँ के खेत में बंदूक बोते थे भगत बाबा
जहाँ की जेल में जगते थे, सोते थे भगत बाबा
जहाँ हमको मिला दुश्मन की दहशत का नमूना था
जहाँ फाँसी के फंदे को भगतबाबा ने चूमा था
उसी लाहौर को अब जुर्म का घर दिया तुमने
जहाँ पुरखों की यादें थीं वहाँ डर भर दिया तुमने
हमारे तीरथों को ख़ून से तर कर दिया तुमने
न जाने किसके बहकावे में ये अनबन बना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे
नहीं भूले अभी तुम चावड़ी बाज़ार की गलियाँ
कराची की हमें भी याद हैं दिन रात रंगरलियाँ
हुई तक़सीम तो जैसे ज़फ़र का ख़्वाब टूटा था
बिलख उट्ठे थे लाला लाजपत, पंजाब टूटा था
पुराने दिन करोगे याद तो ये पीर समझोगे
छिनी है प्यार की कितनी बड़ी जागीर समझोगे
तुम्हें क्योंकर नहीं देते हैं हम कश्मीर समझोगे
जहाँ ख़ुशियाँ मनानी थी वहीं मातम मना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे
ज़रा सी जि़द बड़ी कर ली, वतन छोटा बना डाला
खरी आज़ादी की ख़ुशियों को भी खोटा बना डाला
ख़ज़ाना छोड़ कर अब ठीकरों की मांग करते हो
ज़ेह्न में नफ़रतें रख दोस्ती का स्वांग करते हो
सभी गर सब्ज़ हैं तो फिर बताओ ज़र्द कितने हैं
करोड़ों प्यार वाले हैं तो दहशतगर्द कितने हैं
ये दहशतगर्द अपनी क़ौम के हमदर्द कितने हैं
अमां तुम पीतलों को सोच में कुन्दन बना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे
चलो छोड़ो ये बातें क्या हुआ होगा आज़ादी पर
किसे किस बात ने गहरे छुआ होगा आज़ादी पर
कहीं जिन्ना अड़े होंगे, कहीं नेहरू अड़े होंगे
मगर इक़बाल, गांधी और आगा रो पड़े होंगे
खुले आँगन में इक परिवार जब हारा सही था क्या
यहाँ जब भाई ने ही भाई को मारा सही था क्या
ज़रा सोचो हुआ था जो वो बँटवारा सही था क्या
अरे, ताउम्र ना मिलने का कैसे मन बना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे
✍️ चिराग़ जैन