Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
किसी की याद के
कुछ रंग
यक-ब-यक
बिखर जाते हैं
ज़ेहन के कॅनवास पर।
और
मैं ठहर कर
निहारने लगता हूँ
उस कलाकृति की
ख़ूबसूरती को।
बूझने लगता हूँ
अतीत के स्ट्रोक्स की
जटिल पहेलियाँ।
आज तक
समझ नहीं पाया हूँ
कि ये ऐब्स्ट्रेक्ट
बना
तो बना कैसे?
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
वे भी दिन थे
जब पुरानी दिल्ली की
तंग गलियाँ
अकारण ही मुस्कुरा देती थीं
नज़र मिलने पर
अजनबियों से भी।
दरियागंज की हवेलियाँ
अक्सर देखा करती थीं
एक कटोरी को
देहरी लांघकर
इतराते हुए
दूसरी देहरी तक जाते
कुछ दशक पहले तक।
शाहदरा के बेतरबीब मकान
चिलचिलाती धूप में अक्सर
दरवाज़ा खोलकर
बिना झल्लाए
तर कर देते थे
अजनबियों का गला
ठण्डे-ठण्डे पानी से।
करोल बाग़ की सड़कें
अनायास ही जुट जाती थीं
मुसीबत में खड़े
मुसाफ़िरों की मदद के लिए!
लेकिन अब दिल्ली
दो पल ठहर कर
किसी को रास्ता नहीं बताती है।
अब एक्सीडेंट देखकर भी
गाड़ियों की कतारें
(न जाने
कहाँ पहुँचने की जल्दी में)
फर्राटे से निकल जाती हैं।
अब कोई किसी प्यासे को
पानी नहीं पिलाता
और तो और
अब तो कोई प्यासा
पानी पीने के लिए
किसी का
दरवाज़ा भी नहीं खटखटाता।
शाहदरा और
उत्तम नगर की
कस्बाई गलियाँ
धड़धड़ाती मैट्रो में सवार होकर
गड्ड-मड्ड हो जाती हैं
साउथ-एक्स
और नेहरू प्लेस की
शहरी भीड़ में।
अब इन गलियों के पास
नहीं बचा है वक़्त
चाय की चुस्कियों के साथ
‘जनसत्ता’ पढ़ने का।
अब तो
फटाफट न्यूज़ का
दस मिनिट का बुलेटिन
देख पाते हैं
बमुश्किल।
दरियागंज की हवेलियों में
अब गोदाम हैं
किताबों के
काग़ज़ के
और रुपयों के।
पुरानी दिल्ली की तंग गलियाँ
अब तंग आ चुकी हैं
अजनबियों से।
हुक्के की गुड़गुड़ाहट पर
कब्ज़ा कर लिया है
‘आइए भैनजी,
सूट देखिये!’
-की आवाज़ ने।
मुद्दतों से
ग़ज़ल नहीं इठलाई है
बल्लीमारान की
गली क़ासिम में
अब यहाँ
जूतियों का
इंटरनेशनल बाज़ार है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
ग़रीबों के बच्चों की
भूखी आँखों में पलते कोरे स्वप्न
अनायास ही मिट जाते हैं
सागर-तट पर फैली रेत पर लिखे
नाम की तरह।
रेतीली चित्रकारी को मिटाने आयी लहर
हर बार दे जाती है
एक नया चित्र
सागर के तट को
ताकि
व्यर्थ न हो
यात्रा
भविष्य में आनेवाली लहर की!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
(एक)
आलीशान शोरूम के
चमचमाते शोकेस में
महंगी विग सिर पर लगाये
हज़ारों रुपये के लहंगे से सजा
इतरा रहा था पुतला।
(दो)
अंग्रेजी स्टाइल के
फास्ट-फूड कॉर्नर में
जगमगा रहा था
आकर्षक-स्वादिष्ट राजकचौरी से सजा
महंगा ख़ूबसूरत काउण्टर
…मद्धम नीले प्रकाश के साथ।
बोनचाइना के महंगे प्यालों में रखे
आइसक्रीम के सैम्पल
चांदी की प्लेटों में रखी मिटाइयाँ
और काँच के बाउल में सजी
महंगी नमकीन मिक्सचर
बढ़ा रही थी
दुकान की शोभा
और पेट की भूख!
(तीन)
चर्च की दीवार की ओट में
सिमट रही थी
बीस-बाइस साल की
सस्ती-सी ज़िन्दगी।
उलझे-बिखरे भूरे बाल
नक़ली नहीं थे
भद्दा-मैला
पुराना कुचला कुरता
ढँक नहीं पा रहा था
पाँच-साढ़े पाँच फुट का
गेहुँआ बदन।
बड़ी-बड़ी भूखी आँखें
देख रही थीं
फास्ट-फूड कॉर्नर के
आलीशान काउण्टर की ओर।
आसपास देख सहम जाती थी
लाचार जवानी
कमज़ोर हाथों से छिपा रही थी
अपना ग़रीब बदन
रह-रहकर।
और हाथ में दुपट्टा उठाए
मुस्कुरा रहा था
शोकेस में खड़ा पुतला।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
भले ही कभी
बाँहों में भरकर
दुलारा न हो मुझे
आपके नेह ने!
…लेकिन फिर भी
न जाने क्यों
काटने को दौड़ता है
आपका मौन!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
उम्मीद
टूट जाये
तो पीड़ा
…संत्रास!
और बंधी रहे
तो
टूट जाने की
आशंका।
✍️ चिराग़ जैन