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थैंक्स गाॅड

बीत गए वो दिन
जब मैं बहाने ढूंढ़ता था
तुमसे मिलने के।
अब तो
साफ़-साफ़ कह देता हूँ-
“मिलना है तुमसे।”

थैंक्स गाॅड
अब पूछती नहीं हो तुम
कि क्या काम है
वरना झूठ बोलना पड़ता था
कुछ भी
अल्लम-गल्लम-

“वो ज़रा
डिस्कस करना था
कल की मीटिंग के बारे में ।”

✍️ चिराग़ जैन

अच्छी कविता

अपनों से मिलने वाला दर्द
जन्म देता है
अच्छी कविता को।

शायद इसी कारण
मैं नहीं लिखना चाहता
कोई अच्छी कविता
तुम्हें ले कर।

✍️ चिराग़ जैन

पानी ही पानी

दिल्ली में
हर साल आती है बाढ़
हर साल
सिर के ऊपर से
गुज़रने लगता है पानी।

और
हर साल
ढिठाई के साथ
बयानबाज़ी करते हैं
सरकारी गलियारे।

…कमाल है
जहाँ देखो
पानी ही पानी है
सिवाय
सरकारी आँखों के।

✍️ चिराग़ जैन

अन्ना आंदोलन

आज मैंने
एक ग़ज़ब का नज़ारा देखा

मैंने देखा
एक होड़ सी लगी थी
बारिश के जज़्बे से
लोगों के जज़्बे की।

झमाझम बरसात में
दिल्ली की सड़कें
उफ़न आईं थीं लोगों के हुज़ूम से।

किसी को कोई डर ही नहीं था
बीमार पड़ने का
क्योकि
वे सब आए थे
देश की महामारी का
इलाज़ करने।

जहाँ तक निगाह जाती थी
सिर ही सिर नज़र आते थे।
…आज मैंने महसूस किया
कि किसी गांधी की एक आवाज़ पर
कैसे उठ खड़ा होता था
पूरा भारत!

✍️ चिराग़ जैन

संकुचन

हम फैलाना चाहते हैं
बाइबल को
गीता को
क़ुरआन को
जातक को
आगम को।

लेकिन समेट लेना चाहते हैं
अपने ईसा
अपने कृष्ण
अपने पैग़म्बर
अपने बुद्ध
और अपने महावीर।

हमने शास्त्र बना दिया है
किताबों को
विस्तृत करके।

और पुरखा बना दिया है
भगवान को
संकुचित करके।

✍️ चिराग़ जैन

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