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शरद पूर्णिमा

शरद रात्रि का चंद्रमा, किसे सुनावे पीर
ना जमना में नीर है, ना अंगना में खीर

सखी! शरद की पूर्णिमा, मन हो गया अधीर
मैं तरसूं निज श्याम को, दुनिया खाए खीर
✍️ चिराग़ जैन

माखनचोर

कान्हा के किरदार का, कोई ओर न छोर
इक पर वो जगदीश है, इक पल माखनचोर

गोपी, ग्वाले, बांसुरी, रास, नृत्य, बृजधाम
ये सारा कुछ कृष्ण का, केवल इक आयाम

✍️ चिराग़ जैन

अंतर्मुखी

ख़ुशी की लाश उठती है ख़ुशी की चाह के नीचे
बहुत से ज़ख्म होते हैं ज़रा-सी आह के नीचे
हमारे दिल की बातें दिल में ऐसे दब के रहती हैं
कि जैसे पीर सोता हो कोई दरगाह के नीचे

✍️ चिराग़ जैन

बिटिया

शादी का जोड़ा चढ़ा, सजे सोलहों साज
इक छोटी-सी लाडली, बड़ी हुई है आज

विदा समय बाबुल कहे, जोड़े दोनों हाथ
मेरी लाज बंधी हुई, बिटिया तेरे साथ

बिन कारण ताने सहे, बिन मतलब संत्रास
पर उसने तोड़ा नहीं, बाबुल का विश्वास

बाबुल तेरी देहरी, जब से छूटी हाय।
तब से मन की बात बस, मन ही में रह जाय

दो नावों में ही रहें, बिटिया के दो पाँव
ना ये अपना घर हुआ, ना वो अपना गाँव

सहना, घुलना, सिसकना, सुनना बात तमाम
बिटिया के ससुराल में, कितने सारे काम

अब तू करना सीख ले, सब के संग निबाह
माँ ऑंखें भर-भर कहे, भरियो नहीं कराह

चिड़िया जब दुलहिन बनी, पेड़ हुआ कंगाल
सूनी-सूनी सी लगे, झूले बिन हर डाल

✍️ चिराग़ जैन

सावन

घन, पंछी, बरखा करें, गर्जन, कलरव, सोर
हृदय मयूरा झूमिहै, ज्यों सावन में मोर

जब मेघन का नेह जल, बरसत है चहुँ ओर
इस प्रेमी मन भीगता, उत बिरहन की कोर

✍️ चिराग़ जैन

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