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अलविदा 2017

दो हजार सत्रह भी बीता समय अनवरत दौड़ा जाय
क्या क्या छूट गया है हमसे आओ देखें नजर घुमाय
साल शुरू ही हुआ अभी था उत्सव का माहौल जवान
छोड़ गए संगत सितार की अब्दुल हामिद जाफर खान
अभी सिसकियों से बाहर भी नहीं आ सका था इक साज
मौन हो गई ओमपुरी की दानेदार अलभ आवाज
उधर राजनीति की गलियों में भी मातम ने दी दाब
बरनाला सुरजीत बिछड़ गए, बिलख उठा पूरा पंजाब
उसी दिवस इक उज्ज्वल तारा अंतरिक्ष का टूटा हाय
वैज्ञानिक विश्वेश्वरैया ब्लैक होल में गए समाय
हफ्ते भर के भीतर-भीतर गजल सुबक कर करी पुकार
नक्श ल्यालपुरी जी बिछुड़े आँसू भर रोए अशआर
माह फरवरी चढ़ते चढ़ते रोया लेखन का आकाश
उर्दू की सलमा सिद्दीकीय हिंदी शर्मा वेदप्रकाश
तमिल सिनेमा के आंगन का बूढा बरगद हुआ उदास
वर्ष एक सौ तीन जिए फिर गए एंटनी मित्रादास
व्यंग्य मृत्यु के हत्थे आया उल्टा चश्मा लीना तान
गुजराती साहित्य ने देखा तारक मेहता का अवसान
कैंसर की बीमारी बन गई एक सफल जीवन की सौत
बॉलीवुड के आँसू छलके हुई विनोद खन्ना की मौत
दिल की धड़कन थमी रह गई खड़े रह गए खाली हाथ
रीमा लागू विदा हो गईं दिल ने छोड़ दिया था साथ
ब्यूरोक्रेसी ने खो दी ईमान धर्म की एक मिसाल
आंखें मूंद गए केपीएस गिल भारत माता के लाल
हास्य व्यंग्य ने खोया अपना तारा तेंदुलकर मंगेश
प्रोफेसर यशपाल गए तो फिर से रोया भारत देश
दग्ध हृदय के अंतरिक्ष पर पुनः लगा इक गहरा घाव
शोध कार्य को छोड़ बीच में विदा हुए उडूपी राव
आसमान रोया अगस्त में फूट फूट कर कितनी बार
गोरखपुर में नन्हा बचपन अनदेखी का हुआ शिकार
उन्मादों के आरोहों में ऐसा लिपटा अपना देश
अभिव्यक्ति के आरोपों में चली गईं गौरी लंकेश
आसमान पर जिसने घेरा दुश्मन को फैला कर रिंग
विदा हो गए भारत भू से एअर मार्शल अर्जन सिंह
बॉलीवुड के अंग्रेजी तड़के का पिघल गया सब मोम
कुल सड़सठ की अल्पायु में चले गए जब आल्टर टॉम
अक्टूबर में बॉलीवुड ने पुनः भरी इक और कराह
जाने भी दो यारो कहकर विदा हो गए कुंदन शाह
ठुमरी की लहरी पर रोया काशी जी का महामसान
गिरिजा देवी ने जब छेड़ी काल राग वाली सुर-तान
कला जगत का काल देव ने छीन लिया नयनों का नूर
पंचतत्व में लीन हो गए जब अभिनेता शशि कपूर
इसी वर्ष में हिम ने खाए सेना के दर्जनों जवान
इसी साल में अमरनाथ के यात्री त्याग गए थे प्राण
बाढ़ लील गई लोगों के जीवन, पशुधन, खेत, मकान
पश्चिम के तट पर प्रलयंकर बना रहा ओखी तूफान
रोहिंग्या सीमा पर आए शरण मांगने लिए गुहार
एक फिल्म पर खून-खराबा देखा हमने कितनी बार
धर्म आस्था चबा रहे थे अपमानों के कड़वे नीम
शर्मिंदा कर गया धर्म को सिरसा वाला राम रहीम
रेलों ने पटरी को त्यागा, हवा हो गई विष की खान
जीएसटी ने व्यापारों पर इसी साल ली भृकुटि तान
कुछ खुशखबरी भी आई जिससे जख्मों ने पाया चैन
तीन तलाक प्रथा पर न्यायालय ने लगा दिया है बैन
सुंदरता ने लोहा माना मिला मानुषी को जब ताज
अंतरिक्ष अनुसंधानों में गूंजी भारत की आवाज
इसरो को यूँ अंतरिक्ष का मिला एक ऐसा आशीष
एक सौ चार उपग्रह धारी पीएसएलवी-सी सैंतीस
नया साल अब द्वार खड़ा है इतना सा है अब अरमान
अगले वर्ष मिले भारत को आँसू कम, ज्यादा मुस्कान

✍️ चिराग़ जैन

ओ विकलता!

ओ विकलता!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

नींद का तुझसे पुराना वैर है री!
श्वास ने लय खोई तेरे साथ चलकर
धड़कनों की ताल द्रुत होती अचानक
रह गई है शांति अपने हाथ मलकर
मान भी जा!
एक क्षण भीषण प्रतिज्ञा तोड़ दे तू!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

अनवरत मस्तिष्क में हलचल मची है
मौन के क्षण को कभी सम्मान तो दे!
तू समूची बुद्धि से मन तक बसी है
धैर्य टिक पाए कहीं पर स्थान तो दे!
या चली जा!
या हृदय को इक दफा झखझोर दे तू!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

दृष्टि को भीतर उतरने की गरज है
भंगिमा को सरल होने का समय दे!
मुस्कुराहट खिल उठे व्याकुल अधर पर
त्यौरियों को तरल होने का समय दे!
घूम-फिर आ!
भृकुटियों को सहजता से जोड़ दे तू!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

✍️ चिराग़ जैन

बलात्कार

फिर से एक प्रश्न पर
अटक गये हैं मिस्टर यक्ष;
कि सामान्यतया
बलात्कार के होते हैं दो पक्ष।

एक बलात्कारी,
जो बलात्कार करता है,
और एक बलात्कृता
जिसका बलात्कार होता है।

पहला पक्ष
यानि बलात्कारी
एक से लेकर
दस-बीस तक हो सकते हैं
अपनी संख्या
और बलात्कृता की लाचारी के अनुपात में
ये लोग
बलात्कार की सिचुएशन को
कुछ मिनिटों,
कुछ घंटों,
कुछ दिनों
और कुछ वर्षों तक
ढो सकते हैं।

यहाँ तक तो बात है बिल्कुल साफ़
लेकिन प्रश्न ये है
कि बलात्कार की सिचुएशन में
किसको कहा जाता है इंसाफ़!

जिसका हुआ है बलात्कार
उसका न कोई मुक़द्दमा
न कोई एफ़ आई आर
न कोई तारीख़
न कोई सुनवाई
…सीधी फ़ाइनल कार्रवाई

टिमटिमाते हुए बुझ जाती है
जीवन की ज्योत
उसके हिस्से आती है सज़ा-ए-मौत।

और जिसने किया है ये दुराचार
उसको
पहले तो पुलिस प्रोटेक्शन देती है सरकार
फिर पुलिस के सामने
सेलिब्रिटी की मुद्रा में बैठता है वो ढीठ
और उससे पूछ-पूछ कर पुलिस बनाती है चार्जशीट।

फिर अदालत, तारीख़ और जाँच
तब तक ठंडी हो चुकी होती है
पीड़ित लड़की की चिता की आँच।

फिर सही और ग़लत की खेंचम-खेंच
फिर क़ानून की ऊँची अदालतों के पेंच
जैसे-तैसे फाँसी तक पहुँचती है सरकार
तब तक सामने आ जाते हैं
दोषियों के मानवाधिकार।

कुल मिलाकर कैंसिल हो जाता है फाँसी का प्लान
कोई नहीं लेता फ़ैसले का संज्ञान
बार बार दोहराया जाता है यही स्टाइल
हर बार इसी तरह बंद हो जाती है
बलात्कार की फ़ाइल।

इस यक्ष प्रश्न पर सारा समाज मौन है
यक्ष समझ नहीं पा रहा है
कि सभ्य क़ानून की निगाह में
बलात्कार का असली दोषी कौन है।

✍️ चिराग़ जैन

स्त्री-समर्पण

जब कभी
अपनी परेशानी की लेकर आड़
मैं तुमको बहुत मजबूर करता हूँ
कि तुम अपने सभी कष्टों को पल में भूल जाओ
और मेरी हर समस्या को बड़ा समझो!
हर बार झुंझला कर सही
पर मान लेती हो मेरी हर बात
ऐसा भला क्या खास है मुझमें
भला हर बार ऐसे क्यों पिघल जाती हो तुम?
जब कभी
अपने किसी आलस्य पर पर्दा किये
बीमारियों का, मूड का या काम का
मैं डाल देता हूँ तुम्हारे सिर
सदा हर एक लापरवाही अपनी
इन सभी अय्यारियों को जानकर भी
क्यों, भला किस बात से मजबूर हो
मेरे उन्हीं झूठे बहानों से
(जो तुम्हें अब तक यकीनन रट चुके हैं)
क्यों बहल जाती हो तुम?
सच बताऊँ
तुम ही हो
जो प्यार के कोरे छलावे में
निभाए जा रही हो
इस अभागे एक रिश्ते को
जहाँ उस प्यार की हर लाश
जल कर बुझ चुकी है
बह चुकी है भस्म भी उसकी
किसी उफनी नदी की बाढ़ में।
और तुम अब तक
उसी ठंडी लपट में जल रही हो,
मूर्ख हो शायद
जो इक अंधे सफर पर चल रही हो!
सच बताऊँ
मैं अगर होता तुम्हारी ही जगह पर
तो तुम्हें अब तक कभी का छोड़ देता!

✍️ चिराग़ जैन

जनता की ज़िम्मेदारी

अगर पूरी हक़ीक़त जानने की चाह रखते हो
अमां फिर मुल्क के हालात अख़बारों से मत पूछो
जहाँ तक हो सके हर शख़्स की बढ़कर मदद कीजे
तरक़्क़ी आएगी कैसे? -ये सरकारों से मत पूछो
हमें अब अम्न की बातें महज बकवास लगती हैं
वतन से प्यार करनेवालों की खिल्ली उड़ाते हैं
सियासत के नुमाइंदे वतन को खा रहे जमकर
कभी मुम्बई निगलते हैं, कभी दिल्ली उड़ाते हैं
हमारी फ़िक्र घुटकर रह गई है एक बुलेटिन तक
बसों में वक़्त कटने के लिए बातें भी करते हैं
महज फ़ीगर समझ बैठे हैं हम भी आदमी को अब
हमें सिहरन नहीं होती कहीं जब लोग मरते हैं
हमें मसरूफ़ करके रोज़ बेमतलब के मुद्दों में
सियासत चैन से अपनी ज़मीनें सींच आती है
हमें गंगाजली और आबे-ज़मज़म की क़सम देकर
हुक़ूमत पैग पटियाला लपककर खींच आती है
अगर हम आपसी नफ़रत का थोड़ा शोर कम कर दें
तो फिर अहले-रियाया की आवाज़ें मर नहीं सकती
अगर हम रोज़मर्रा के मसाइल को तवज्जोह दें
सियासत फिर कोई भी बदतमीज़ी कर नहीं सकती
✍️ चिराग़ जैन

कल्पना का रंग

जानती है हर नदी
जिस राह पर मैं बढ़ रही हूँ
उस सफर का अंत खारा है
किन्तु कैसे रोक लूँ मैं पाँव अपने
इस सफर का रास्ता आकृष्ट करता है
घाट है रंगीन इसके और
हर इक गाम प्यारा है

छू गया सूरज मुझे जब
तो पिघल कर बह चली मैं
फिर कभी पर्वत नहीं मिल पाएगा अब
सत्य यह भी सह चली मैं।
मैं इसी अनुभूति के रोमांच से अभिभूत हूँ
जिस ठौर पर संतृप्त होती है किसी की प्यास
वो मेरा किनारा है।

पत्थरों की देह का घर्षण मिलेगा
दृढ़ नुकीली पीर से यह तन छिलेगा
किन्तु उन सब अड़चनों को लांघ कर
जिस क्षण किसी निश्छल कन्हैया की सताई
गोपिका मुझमें दुबक लरजाएगी
उस कल्पना का रंग न्यारा है।

✍️ चिराग़ जैन

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