Chirag Jain Writings, Nazariya, Prose, Reviews
‘ये नाचणिये-गावणिये बावळे ही होवे सै।’ -फिल्म में यह संवाद दो बार प्रयोग किया गया और दोनों बार सिनेमा हॉल में ठहाका गूंज गया। लेकिन फ़िल्मकार ने यह संवाद चुटकुले की तरह नहीं बल्कि फलसफे की तरह प्रयोग किया है। यह फ़िल्मकार का कौशल है कि इससे फूटने वाले ठहाके में भी इसका फलसफा अपना पूरा प्रभाव छोड़ता है।
ये चमत्कार इस एक संवाद में ही नहीं, अपितु पूरी फिल्म में रह-रहकर उभरता है।
किसी के जीवन पर फिल्म बनाते समय पटकथा को स्तुतिगान बनने से बचाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है, और दादा लखमी का फ़िल्मकार इस चुनौती को साधने में काफ़ी हद तक सफल रहा है।
लगभग सवा सौ साल पहले का हरियाणा परदे पर उतारने के लिए कल्पना, अनुमान तथा शोध के बिल्कुल सही अनुपात के प्रमाण पूरी फिल्म में उपस्थित हैं।
जिन गांवों में दिन भर धूल उड़ती हो वहाँ पीले और सफेद रंग में ज़्यादा फर्क़ नहीं होता -यह बात फिल्म के कॉस्ट्यूम डिजाइनर से लेकर आर्ट डायरेक्टर तक सबको अच्छी तरह याद है। फ़िल्मकार जानता है कि थोड़ी ज़्यादा तपी हुई सुराही भी फेंकने की बजाय मंदिरों में प्रयोग कर ली जाती है। फ़िल्मकार अनुमान लगा सका है कि मसान के लिए अलग से ज़मीन अलॉट नहीं की जाती होगी इसलिए गांव की ओर आने वाली पगडंडी के पास ही एक संटी पर टँकी उल्टी हांडी गांव में उपलब्ध सुविधाओं का पूरा चित्र प्रस्तुत करने में सफल हुई है। सार्वजानिक सभाओं के बैनर सफेद कपड़े पर नील से लिखकर ही तैयार किए गए हैं और चारपाई बाण की ही बुनी हुई है। बायोस्कोप के विषय में उस समय की धारणा; गलियों में बीन बजाते जोगी; पोषमपा, खो-खो और पिट्ठू गरम जैसे खेल, चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाता बुढ़ापा, गालियों में हुड़दंग करते बच्चे और ऐसी दर्जनों बारीकियों ने परदे पर हरियाणवी संस्कृति को जीवंत कर दिया है। बर्तन से लेकर रपट वाली जूतियों तक, कहीं भी किसी चूक की गुंजाइश नहीं दिखाई देती।
ग्रामीण जीवन का दर्द भी मसखरा होता है -यह तथ्य रात मे पति को खाना खिलाती निर्धन गृहिणी के ठहाके में पूरी ताक़त के साथ गूँजता महसूस हुआ। ग़रीबी ने जिसकी बोली का रस सोख लिया था, वो माँ भी जब अपने पति को अपने मनमौजी बेटे से नरमी से पेश आने को कहती है तो दर्शकों की आह, सिसक कर पूरे हॉल को नम कर देती है। गूंगे बाबा तक की फूली हुई साँसें फिल्म की कहानी में बड़े सलीके से पिरो दी गई हैं। किसी शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण दिखाने के लिए ‘लाठी’ का जो इस्तेमाल किया गया है, वह संवेदना यह स्पष्ट करती है कि पण्डित लखमीचंद जैसे दार्शनिक कवि पर फिल्म बनाने के लिए ‘दादा लखमी’ फिल्म का फ़िल्मकार पूरी तरह सक्षम है।
फिल्म में सांग का संगीत अपनी पूरी भव्यता के साथ उतरा है। उत्साह में अत्याधुनिक वाद्य प्रयोग करने से एक सच्ची कहानी भी, बनावटी लग सकती थी -शायद यही सोचकर संगीत तैयार करते समय कहानी के काल और स्थान का पूरा ध्यान रखा गया है। और हाँ, ताशे भी बजे हैं तो उनका रूप-रंग वही है, एकदम ओरिजिनल! जिस रागणी का जहाँ प्रयोग किया गया है, वो ठीक उसी जगह के लिए रची गई महसूस होती हैं।
यशपाल शर्मा ने ‘मर-मर के हार गए’ गीत में जो अभिनय किया है, वह मन को आश्चर्य से और आँखों को आँसुओं से भर गया। मेघना मलिक ने हरियाणवी माँ की भूमिका के साथ शत प्रतिशत न्याय किया है। राजेंद्र गुप्ता ने भी अपने अभिनय के अनुभव को अपने किरदार में सलीके से प्रयोग किया है। किशोर लखमी जब गुरु की आवाज़ से बंधकर खिंचा चला जाता है, उस सीन में गूंगे फकीर का बेलौस नाच मन को घुँघरू कर गया।
थापा, सोहन, बेबे, वैद्य, दीपचंद, राजाराम, फेंकू -हर कलाकार ने अपने किरदार को पूरी शिद्दत से निभाया है। संवेदना, हास्य और करुणा की दीवारों पर फकीरी का छप्पर डालकर उस ढाँचे को जुनून और दीवानगी के रंग में रंगकर यशपाल शर्मा ने उस घरौंदे पर एक तख्ती लटका दी है, जिस पर स्वर्ण अक्षरों में लिखा है- “दादा लखमी”!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Purushottam
मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो!
लेकिन तुमने दे डाला है ख़़ुद को कितना त्रास सुनो!
तुमने त्याग दिया है मुझको, पर मुझमें बाक़ी हो तुम
मैं तुमको संग ले आयी हूँ, कितने एकाकी हो तुम
मुझको बस वनवास दिया है, ख़़ुद को कारावास सुनो!
मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो!
कैसे जनता सिंहासन की हर लाचारी समझेगी
दीवारें और छत भी कैसे बात तुम्हारी समझेंगी
थोड़ा दुःख ही साझा करती, रहती मैं यदि पास सुनो!
लेकिन तुमने दे डाला है ख़़ुद को कितना त्रास सुनो!
पहले उससे रण करना था, जिसने हमको कष्ट दिया
अब उसका पालन करना है, जिसने सब सुख ध्वस्त किया
तब वल्कल में शर साधा, अब महलों में संन्यास सुनो!
मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो!
राजमुकुट ने कब-कब काटा, मैं समझूँ या तुम समझो
इस सौदे में कितना घाटा, मैं समझूँ या तुम समझो
आदर्शों की क्या क़ीमत है, मुझको है आभास सुनो!
मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो!
छोड़ चलूँ इस राजमहल को, ख़़ुद से कहते तो होंगे
मुस्कानों के पीछे छिपकर, आँसू बहते तो होंगे
पर मर्यादा ही जीतेगी, है मुझको विश्वास सुनो
क्योंकि तुमने दे डाला है ख़़ुद को इतना त्रास सुनो!
मेरी पीड़ा ले जायेगी मुझको माँ के आँचल तक
तुम जलता मन ले जाओगे इक दिन सरयू के जल तक
साँसों के उस पार मिलेगी हमको सुख की साँस सुनो!
क्योंकि तुमने दे डाला है ख़़ुद को इतना त्रास सुनो!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
शेर कहने का सलीक़ा तो ज़रूरी है मगर
शेर सुनने के भी आदाब हुआ करते हैं
कविता सुनने वाले अगर कविता की हर पंक्ति से प्रस्फुटित रश्मियों के पीछे दौड़कर अर्थ के असंख्य बिम्ब देख पाएं तो कविता-पाठ करने वाले को आनंद आ जाता है। कवि की भावभूमि का पर्यटन यदि श्रोता न कर पाए, तो कविता-पाठ नाद बनने की बजाय शोर बनकर रह जाता है।
लेकिन बीते बुधवार अर्द्धचंद्र की संतुलित चांदनी में गुलाबी सर्दी की मीठी बयार के बीच, कविता के लिए सर्वाधिक उपयुक्त बैठक में सुनाने वालों को भी सुनने वालों से कम आनंद नहीं आया होगा।
यूँ समझ लीजिए कि खेत से निकलकर फसल मंडी में बिकने की बजाय बीज बन रही थी। श्रोता दीर्घा में श्रीमती ममता कालिया, डॉ सरिता शर्मा, गुणवीर राणा,
श्लेष गौतम, सुदीप भोला, राजीव राज, निकुंज शर्मा, रामायण धर द्विवेदी, स्वयं श्रीवास्तव, ज्ञान प्रकाश आकुल, गौरव दुबे, शिखा दीप्ति, शंभू शिखर, रमेश मुस्कान, मध्यम सक्सेना, ओम निश्छल, कुमार संजाॅय सिंह, सुमित अवस्थी, अरुण महेश्वरी, विमल त्यागी, आयुष और अदिति सरीखे सावचेत मन विद्यमान हों। काव्यपाठ के लिए कबीरी तेवर के यश मालवीय जी हों, किशन सरोज सरीखी गीतता से युक्त विनोद श्रीवास्तव जी हों और ऑलपिन पर शहद लगाने का हुनर रखने वाले शायर इक़बाल अशहर हों। संचालन के माइक पर कविता तिवारी हों। व्यवस्था को चाक चौबंद रखने के लिए प्रवीन पाण्डेय जैसे कुशल व्यवस्थापक हों और इस पूरे वृत्त के निर्माण का केन्द्रबिन्दु डॉ कुमार विश्वास का सम्मोहक व्यक्तित्व हो तो ऊर्जा और आनंद के लिए वहाँ घटित होना स्वाभाविक था।
इस महफ़िल में हर पंक्ति पर प्रतिक्रिया थी। आँसू को भी कविता बना लेने वाले ये श्रोता कभी दर्द में डूबी हुई किसी ग़ज़ल पर ठठाकर हँस पड़ते थे, तो कभी किसी आनंद की अभिव्यक्ति को सुनकर उस आनंद के पार्श्व में विराजित टीस पर त्राटक करने लगते थे। कभी मिसरा-ए-सानी की अदायगी से पहले ही किसी चुटकी से महफ़िल में ठहाका गूँज जाता था तो कभी किसी गीत-सूक्ति पर कोई दो श्रोता आँखों ही आँखों में हज़ारों बातें कर गुज़रते थे। लेकिन श्रोता दीर्घा की यह जीवंतता कविता-पाठ के लिए व्यवधान न होकर संगत बनी जाती थी।
बहुत दिन बाद ऐसे कविता सुनी, जैसे आज से एक दशक पहले मंच पर बैठकर हम और हमारे वरिष्ठ सुनते थे। जीवंतता और आनंद की कोई कमी नहीं होती थी, प्रत्युत्पन्नमति के अस्त्र से कविता पाठ कर रहे कवि के साथ थोड़ी छेड़छाड़ और शरारत भी हो जाती थी लेकिन इस सबसे काव्यपाठ में व्यवधान नहीं होता था। लोगों का मानना है कि उस दिन केवी कुटीर में अच्छा कवि होने की झलकी दिखाई गई, जबकि मुझे लगता है कि इस कार्यक्रम की श्रोतादीर्घा वाले कैमरे को मास्टर बनाकर एडिटिंग की जाए तो दुनिया समझ पाएगी कि- “देखो, ऐसे सुनी जाती है कविता!”
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
याद ने इक रेशमी-सा जाल फिर फैला लिया है
मन ज़रूरी काम सारे छोड़कर है गुम
याद फिर से आ रही हो तुम
त्यौरियां चिन्ताओं का बोझा सम्भाले फिर रही हैं
चेतना बरसों पुराने हर्ष में उलझी हुई है
हाथ में तो ढेर सारे काम हैं आधे-अधूरे
उंगलियाँ केवल तुम्हारे स्पर्श में उलझी हुई हैं
याद के उस छोर पर बाँहें पसारे तुम खड़ी हो
सज रही तुम पर वही कुमकुम
याद फिर से आ रही हो तुम
फिर तुम्हारी देह का मकरंद मन में घुल रहा है
आह, मेरे ओंठ आपस में अचानक गुंथ गए हैं
साँस बढ़-चढ़कर स्वयं सिसकारियाँ बनने लगी हैं
नैन फिर आनन्द की हद तक पहुँच कर मुंद गए हैं
कान में एहसास का संगीत गूंजे जा रहा है
सज उठी फिर याद की अंजुम
याद फिर से आ रही हो तुम
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
देह के कष्ट से जिनको परहेज है
प्राण का सुख उन्हें मिल सकेगा नहीं
संकुचित ही रहेगी अगर पाँखुरी
कोई गुल बाग में खिल सकेगा नहीं
सत्य है, जो खिले वो सभी एक दिन
पत्ती-पत्ती चमन में बिखर जाएंगे
पर बिखरने के डर से जिन्होंने सुमन
बंद करके रखा वो भी मर जाएंगे
प्रेम पिंजरा अगर बन गया तो तुम्हें
प्रेम का साथ भी झिल सकेगा नहीं
देह की पीर के पार आनंद है
भोग में, योग में, जोग में हर जगह
जो भी सुविधा जुटाते रहे काय की
वो घिरे हैं किसी रोग में हर जगह
देह के नेह में प्राण घुट जाएंगे
हो तुम्हें कुछ भी हासिल सकेगा नहीं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Hasya Kavita, Poetry
नेता से अपनी तुलना का रिवाज
गिरगिट को बहुत खलता है
गिरगिट
केवल संकट देखकर रंग बदलता है
नेता तो
अवसर देखकर रंग बदलता है।
✍️ चिराग़ जैन