+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

पतझर का मौसम

कई बार मैंने महसूस किया है कि पतझर का मौसम अन्य किसी भी मौसम से अधिक कवित्व भरा होता है। ऊँचे दरख्तों से सहसा झरते पीले पत्ते मन में अव्यक्त सी रूमानियत भर जाते हैं। डालियाँ थोड़ी खाली ज़रूर होती हैं लेकिन उन्हें बेनूर नहीं कहा जा सकता।
झरते हुए पत्ते सड़कों का सिंगार करने लगते हैं। किसी बाग की पगडण्डी पर जब दो मुसाफिर इन पत्तों को रौंदते हुए आगे बढ़ते हैं तो ऐसा लगता है ज्यों दोनों सहयात्रियों के पांव में प्रकृति ने पाजेब पहना दी हो।
बगीचों में खाली पड़े बेंच भी नीम के सूखे पत्तों से ऐसे लदे रहते हैं मानो उदासी के रीतेपन को अंगूठा दिखाकर अपने भरे होने का जश्न मना रहे हों।
पार्किंग में खड़ी गाड़ियां कदंब, पीपल, चम्पा और सहजन के पत्तों से घुलने-मिलने लगती हैं तो हवा इस मेलजोल को धूल-धूसरित कर डालती है। रोज़ सुबह गाड़ियां साफ़ करने वाले का चिड़चिड़ापन गाड़ियों की फटकार लगाता है तो शरारत में शामिल वृक्ष पत्रवृष्टि करके उस फटकार के विरुद्ध आंदोलन छेड़ देते हैं।
कंटीले झाड़ यकायक हज़ारों रंग के फूलों से खिल उठते हैं। ग्रीष्म की उमस दस्तक देने लगती है और मिट्टी के भीतर सोया जीवन अंकुरित होने लगता है।
दार्शनिक दृष्टि प्रकृति के इस रूप से जीवन का सार बटोरते हुए आनंद की अनुभूति करती है और आशा, हर टूटते पत्ते के पीछे फूटरही कोंपल को निहारने लगती है। सकारात्मकता पीली खरखराहट के भीतर पीपल की लाल-लाल कोंपलों की खनखन सुन लेती है और उत्साह के वेग से बौराई हवा, बांस के खोखलेपन में सरगम टटोलने लगती है।
प्रकृति की इस पतझरी साधना से प्रसन्न होकर आम की डालियों से मंजरियों का सौभाग्य झाँकने लगता है।
जिन्हें वसंत में गीत दिखते हों, वो देखा करें; मुझे तो पतझर का पूरा मौसम मुक्तछंद की कविता जैसा लगता है!

ज़र्द पत्तों की तरह राह सजाऊँगा तेरी
ले मेरे आख़िरी लम्हे भी तेरे नाम हुए

✍️ चिराग़ जैन

कुर्सी की खुमारी

सबने भर भर के अपनी पिचकारी, विरोधियों पे मारी
होली का चढ़ा रंग भाइयो!
कहीं लाठी बजी है कहीं गारी, कहीं कुर्सी की खुमारी
सभी का न्यारा ढंग भाइयो!

बच्चन जी ने खूब कहा था मेल कराती मधुशाला
पर सत्ता का कैसा-कैसा खेल कराती मधुशाला
शिक्षामंत्री जैसों को भी फेल कराती मधुशाला
अब जाकर ये ज्ञान हुआ है, जेल कराती मधुशाला
सीबीआई ने आरती उतारी, ईमान के पुजारी
हुए हैं कैसे तंग भाइयों

नई ख़बर चल पड़ी देश में, बात पुरानी भूल गए
उनका अन्ना याद रहा अपना अडवानी भूल गए
इनकी करतूतों में अपनी कारस्तानी भूल गए
मधुशाला का शोर मचा तो लोग अडानी भूल गए
उनकी झाड़ू की तीलियां बेचारी, कमल ने बुहारी
दिल्ली में छिड़ी जंग भाइयो!

मोदी पर आरोप लगाए सीधे-सीधे राहुल ने
संसद तक में घोटालों के पढ़े कसीदे राहुल ने
जिसे छुआ उसके ही तीनों लोक पलीदे राहुल ने
कहीं अडानी के शेयर तो नहीं खरीदे राहुल ने
किसने पंजे की ले ली सुपारी, न नकदी, न उधारी
दुबला हुआ ये अंग भाइयो!

ऐसा रंग खिला है सारे बने फिर रहे बंदर हैं
कोई डर कर बाहर भागे, कोई डरकर अंदर है
सबकी चाबी भरकर बैठा देखे खेल कलंदर है
जनता को बस इतना बोला, महँगा हुआ सिलेंडर है
सुन के जनता की छूटी सिसकारी, पर बोली न बेचारी
ठंडी हुई उमंग भाइयो!

✍️ चिराग़ जैन

बर्बरता का पहला आक्रमण

‘ख़ून का बदला ख़ून’ किसी सभ्य समाज के संचलन की नीति नहीं हो सकती। बर्बरता का पहला आक्रमण नैतिकता के आत्मबल पर होता है। और इस आक्रमण से बौखलाकर ज्यों ही आप अनैतिक हुए, उसी क्षण आपने बर्बरता का आत्मविश्वास दोगुना कर दिया।
भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों ने भाजपा विरोधियों की ट्रोलिंग प्रारंभ की। वे भाजपा, सरकार और प्रधानमंत्री के सम्मुख उठे हर सवाल पर गाली-गलौज तक उतरने लगे। इस प्रवृत्ति से विवेकशील और लोकतांत्रिक मस्तिष्क आहत हुए। लेकिन इनका आहत होना भाजपा की विजय नहीं थी। भाजपा की विजय उस क्षण प्रारम्भ हुई जब सत्य, तथ्य और लोकतांत्रिक तरीकों को छोड़कर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के समर्थक भी गाली-गुफ़्तार और चरित्र हत्या तक उतरते दिखाई दिए।
आज परिस्थिति यह है कि अगर आप किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सक्रिय हैं तो आप निष्पक्ष तथा लोकतांत्रिक नहीं रह सकते। आपको किसी एक दल अथवा व्यक्ति का अंध-समर्थन करना ही होगा। आप नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल में से किसी एक को भी देवदूत न मानकर तीनों को मनुष्य मानकर सरवाइव नहीं कर पाएंगे।
एक बार जिसके बैंक में आपने अपना विवेक समर्पित कर दिया उसकी स्तुति और उसके विरोधियों की भर्त्सना ही आपका धर्म है।
मैं आम आदमी पार्टी की किसी नीति या योजना पर प्रश्न पूछ लूँ तो यह मान लिया जाएगा कि मैं भाजपा का आदमी हूँ। मैं राहुल गांधी की यात्रा की प्रशंसा कर दूँ तो मुझे कांग्रेस का चमचा मान लिया जाएगा। मैं बग्गा की गिरफ्तारी के तरीके पर सवाल कर लूँ तो मुझे भगवंत मान और केजरीवाल का विरोधी घोषित कर दिया जाएगा। मैं बीबीसी के ऊपर हुई कार्रवाई का सवाल उठाने की सोचूँ तो मुझे कांग्रेसी मान लिया जाएगा।
मैं देश की महँगाई पर बोला तो मैं मोदी विरोधी और दिल्ली की ट्रैफ़िक व्यवस्था पर बोला तो केजरीवाल विरोधी। यहाँ तक कि आपराधिक मुआमलात पर चर्चा करने पर भी आपका राजनैतिक चरित्र जज किया जाने लगा है। आप हाथरस के बलात्कार कांड की भर्त्सना करो तो आप भाजपा विरोधी हैं। आप श्रद्धा-आफताब मुआमले के अपराधी को लानत भेजें तो आप भाजपा समर्थक हैं।
और आजकल तो लोग यहाँ तक लिखने लगे हैं कि दिल्ली का सीएम इतना पढ़ा-लिखा है, तेरी औक़ात नहीं है उसे कुछ कहने की’; ‘मोदी जी पर कुछ बोलने की औक़ात तेरी नहीं है’; ‘राहुल गांधी विदेश में पढ़ा है, उसकी सोच तू नहीं समझेगा -ये कैसा देश बना रहे हैं हम। ये किधर दौड़े चले जा रहे हैं हम?
देश का एक नागरिक अपने प्रतिनिधियों से सवाल क्यों नहीं पूछ सकता? वह अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को सलाह देने की औक़ात क्यों नहीं रखता? जिनका चुनाव मैं कर सकता हूँ उन्हें सुझाव क्यों नहीं दे सकता?
यदि विरोध की चरित्र हत्या करने की भाजपाई परम्परा को आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के समर्थकों ने पुष्ट न किया होता तो आज पवन खेड़ा और मनीष सिसोदिया के मुआमलात पर लोकतन्त्र इतना कमज़ोर न दिखाई देता। और भारतीय जनता पार्टी ने सिस्टम का उपयोग करके अपने विरोधियों की जड़ें खोदने का कार्य न किया होता तो किसी भी बग्गा की गिरफ्तारी से पहले पंजाब सरकार को लाख बार सोचना पड़ता।
मैं इस देश में लोकतांत्रिक मूल्यों को पुष्ट किए जाने का प्रबल समर्थक हूँ। मैं स्पष्ट देख सकता हूँ कि यदि अपने पक्ष में हो रही अराजकता का मैंने समर्थन किया तो मेरे विरुद्ध हो रही अराजकता का विरोध मैं स्वयं नहीं कर पाऊँगा।
मूलभूत प्रश्नों पर आँखों में आँखें डालकर बोलना आवश्यक है। अन्यथा वो आपके सिसोदिया को उठाएंगे और आप उनके बग्गा को उठाते रहना। अन्यथा वो पठान में भगवा के अपमान का मुद्दा गढ़ते रहेंगे और आप नोटों पर देवी-देवताओं के चित्र लगवाने का पुंछल्ला छेड़ते रहना। अन्यथा वो आपके समर्थकों को गाली दिलवाते रहेंगे और आप उनके समर्थकों को गाली दिलवाते रहना।
✍️ चिराग़ जैन

मैं महज किरदार जीता हूँ

एक मैं, कितना झमेला
विश्व मुझ जैसों का मेला
इस समूची सृष्टि को जो
साध लेता है अकेला
बस उसी के खेल का विस्तार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ

मैं वही जिसने जनम के साथ इक परिवार पाया
हार हो या जीत हो, परिवार सब स्वीकार पाया
जब जहाँ जो भी मिला सब भोगकर जीता रहा हूँ
प्यार और मनुहार और अधिकार और सत्कार पाया
जब मिले दुत्कार तो दुत्कार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ

मंच पर हूँ, मंच का मालिक मगर बेशक नहीं हूँ
पात्र भर हूँ, किन्तु मैं इस स्वांग का लेखक नहीं हूँ
जब मिले जो भूमिका, भरपूर उसको खेलता हूँ
क्यों कहानी की करूँ चिंता मैं निर्देशक नहीं हूँ
रोग का हो दृश्य तो उपचार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ

हर कोई है इस जहाँ में, हर किसी का इक जहाँ है
हर किसी को इस कथा का केंद्र होने का गुमाँ है
कौन जाने कौन किसका कब कहाँ पर्दा गिरा दे
मैं अभी तक मंच पर हूँ ये कृपा भी कम कहाँ है
जो निरंतर हो रहा उपकार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ

✍️ चिराग़ जैन

कविता और सत्ता

पौराणिक सन्दर्भों से लेकर आज तक गुरुकुल और कविता ने सत्ता का निर्देशन किया है। चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त हो या सिकंदर सरीखा विश्वविजेता; सभी ने गुरुकुल की तर्जनी का सम्मान किया है।
यह व्यवस्था इसलिए भी अपरिहार्य है कि सत्ता जनभावना से सीधे संपर्क में नहीं रह पाती। अवसरवादी चाटुकार सत्ता को भ्रमित करने में सदैव सक्रिय रहते हैं, ऐसे में कवि, ऋषि और कभी-कभी विदूषक; राजा से अभय प्राप्त करके राजा को जन-समस्याओं और अभिरुचियों से परिचित कराते हैं।
किन्तु वर्तमान समय में, प्रत्येक राजनैतिक दल ने कवियों और विचारकों को अपने इशारे पर चलाने का अभ्यास प्रारंभ कर दिया है।
कल राजस्थान के भवानीमंडी कवि सम्मेलन में एक पार्षद ने विनीत चौहान कवि को कविता-पाठ से इसलिए रोक दिया कि उनकी बातें कांग्रेस का राजनैतिक नुकसान कर रही थीं। ऐसा ही मामला राजस्थान के नौहर में छह महीने पहले भी घटा था, जहाँ गले में भगवा पटका डाले कुछ युवकों ने सुरेन्द्र शर्मा जी को इसलिए टोक दिया क्योंकि वे साम्प्रदायिक सद्भाव की बात कर रहे थे। उत्तर प्रदेश में पिछले वर्ष एक कार्यक्रम इसलिए रद्द करना पड़ा क्योंकि आयोजकों ने उसमें मुस्लिम कवियों को भी निमंत्रित किया था। एक व्यंग्यकार के साथ भी ऐसी घटनाएँ हुई हैं क्योंकि वे भाजपा की नीतियों पर कटाक्ष करते हैं!
कवि जन का प्रतिनिधि है। कवि समाज का हृदय और मस्तिष्क है, और राजनीति समाज का हाथ हैं जो शक्ति की तलवार से सज्ज है। यदि हृदय और मस्तिष्क हाथों को नियंत्रित न करें तो ये तलवार समाज को काट डालेगी। l
जो कवि इन दिनों किसी राजनैतिक दल के प्रचारक बनकर सत्ताओं का गुणगान करने में व्यस्त हैं, उन्हें समझना होगा कि कविता का कार्य सिंहासन को दर्पण दिखाना है। और जो आयोजक अपने आपको कवियों का नियामक समझकर उन्हें कविता लिखने-पढ़ने का सलीक़ा सिखाने निकले हैं, उन्हें समझना होगा कि नंदवंश और कुरुवंश क्यों नष्ट हुए!
कांग्रेस हो या भाजपा; आप हो या सपा… कवि-सम्मेलनों में हो रहे मनोरंजन और वैचारिक विमर्ष को सहिष्णु होकर सुनना आपकी नैतिकता नहीं आवश्यकता है। क्योंकि यदि मंच ने आपके मन मुताबिक आपको प्रसन्न करना शुरू कर दिया तो यह आपकी राजसत्ता को विनष्ट करने का उपाय होगा!
आपातकाल हो या बोफोर्स; कॉमनवेल्थ हो या अन्ना आंदोलन, कवि सम्मेलन का मंच हमेशा जनता के पक्ष में खड़ा दिखाई दिया है। राजनीति यह अच्छी तरह समझ ले कि कड़वा पचाने की क्षमता न रही तो सत्ता के चाटुकारों की मनपसंद बातें तुम्हारे लिए मधुमेह बन जाएगी।
✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!