Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
ख़ुद को ख़ुदा के बन्दे और जेहादी कहने वाले खूंखारों ने ख़ुदा की इबादत और ख़ुदा से मुहब्बत का पैग़ाम देने वाली एक बेहतरीन आवाज़ को ख़ामोश कर दिया। रूह से उठने वाला वो अलाप जो सुनने वालों को सीधे रूहानियत के गलियारों तक लिए जाता था, वो अलाप स्वयंभू जेहादियों पर एक धिक्कार के साथ हमेशा के लिए बंद हो गया।
दहशतगर्दी की दुनिया रूहानियत को नहीं समझ सकती, क्योंकि रूहानियत का तअल्लुक़ रूह से होता है। ईश्वर, अल्लाह, ख़ुदा या जो भी कोई पारलौकिक सत्ता इस सृष्टि के पीछे है; उसके कोप की इस समय आवश्यकता है। अब इस दुनिया को समझना होगा कि संसार में सिर्फ दो ही तरीके के लोग हैं- 1) दहशतगर्द और 2) इंसान।
दहशतगर्दी के खिलाफ इंसानियत को एक होकर लड़ना होगा; तभी मुहब्बत के पैगम्बरों के लिए सुकून मुहैया हो सकेगा।
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Death of Amjad Farid Sabri
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी
संबंधों के तार तोड़ के
क्या तुम ख़ुद तक लौट सकोगी
अपनेपन की बाग़ छोड़ के
मेरे संदेशों की दस्तक
तुम सुनकर भी ध्यान नहीं दो
मेरे स्वर के आकर्षण को
अपने मन में मान नहीं दो
नदिया, नदिया ही रहती है
चाहे निकले धार मोड़ के
क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी
संबंधों के तार तोड़ के
तुम प्रतिबंध लगा सकती हो
सब तकनीकी संचारों पे
लेकिन कैसे रोक लगेगी
अंतर्मन वाली तारों पे
क्या हिचकी को रोक सकोगी
इक झूठी मुस्कान ओढ़ के
क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी
संबंधों के तार तोड़ के
संबंधों में खटपट होगी
मन बेचारा पीर सहेगा
किंतु कहीं संवाद रुका तो
हर अपनापन मौन रहेगा
दिल दुखने पर ऐसे चीखो
चुप्पी चल दे राह छोड़ के
क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी
संबंधों के तार तोड़ के
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
तुमने कड़वे शब्द कहे हैं, कैसे इस सच को झुठलाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ
वाणी कड़वी, मन खट्टा है और कसैला रूप-लवण है
किस आसन पर रख पाओगी, प्यार भरा जो मीठा क्षण है
कण-कण में विष व्याप्त हुआ है, किस कण पर अमृत टपकाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ
आँखों में अब तक ताज़ा है, प्रेम सुसज्जित पत्र तुम्हारा
पर कानों में गूँज रहा है, अपशब्दों का सत्र तुम्हारा
पाती पढ़-पढ़ मुस्काता हूँ, वाणी सुन-सुन बुझता जाऊँ
समझ नहीं आता इस इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ
गहरी खाई में ला पटका, तुमने मेरे मन-पर्वत को
सारी रात पढ़ा है मैंने, प्रेम सुधा में भीगे ख़त को
अपने हाथों से उस ख़त का कोई कोना फाड़ न पाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ
तुमको पीड़ा पहुँचाने का, मैं भी अगर इरादा रखता
तो भी वाणी पर संयम की, थोड़ी तो मर्यादा रखता
अंतर्मन पर घाव हुए हैं, कैसे इनकी टीस भुलाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ
कष्ट हुआ हो तो तुम मुझसे झगड़ा कर के रो सकती हो
मैं ये सोच नहीं सकता तुम तुम इतनी कड़वी हो सकती हो
अब मैं ख़ुद भी चाहूँगा तो, तुम तक शायद लौट न पाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
अब कवि सम्मेलन में आना-जाना मेरे लिए सामान्य हो चुका है। एक काम जैसा अनुभव रह गया है कवि सम्मेलनीय यात्राओं का। लेकिन आज भी मेरे घर लौटने पर मेरी अटैची से जब कोई प्रतीक चिन्ह मिलता है तो वे लपक कर उसे उठा लेते हैं और उसका एक एक अक्षर आद्योपान्त पढ़ जाते हैं। जब किसी निमंत्रण पत्र में छपता है मेरा नाम तो देर तक उसे निरखते रहते हैं। मुझे याद है, मेरी सातवीं किताब के प्रकाशन पर भी वे उतने ही ख़ुश थे जितना मैं अपनी पहली किताब के प्रकाशन पर था। कवि सम्मेलन में मिली मोतियों की मालाओं और दुशालों को आज भी वे सहेज कर उठाते हैं और जी भर निरखने के बाद हर बार बोलते हैं – “लो, इन्हें संभाल कर रख दो।” जब कभी मैं श्रृंखलाबद्ध यात्रा पर निकलता हूँ तो वे आह्लाद में सारे रूट मैप देखते हैं। मुझे कोई सम्मान मिलता है तो उनकी आँखों में वो चमक आती है जो शायद मेरी पहली किलकारी पर मेरी माँ की आँखों में आई होगी। …सच बताऊँ, मेरे पिता मेरी उपलब्धियों को भोगते हैं और मैं हर उपलब्धि पर उनके आह्लाद को।
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
सृजन की जाह्नवी
विभक्त होकर भी
गंगा ही रहेगी।
तुम देखना
उन्मुक्त बहती संवेदना से
विभक्त होती धार
मोक्षदायिनी होकर पुजेगी
…हर की पौड़ी पर।
कविता से विभक्त काव्यांश
सूक्ति हो जाते हैं
और श्लोक से विभक्त वर्ण
मंत्र बन जाते हैं।
एक सृजन ही तो है
जहां विभक्तियां
धातुओं को अर्थ की
पहचान देती हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
चीखने से
शोर बढ़ता है
सम्बन्ध नहीं।
सुकून की खटिया
बुनी जाती है
सहजता की बाण से;
इसमें प्रयास की गाँठें हों
तो मुक्त नहीं हो सकती नींद
चुभन से!
जताना
और बताना
व्यापार में होना चाहिए
व्यवहार में नहीं।
और प्यार में…
…वहाँ तो
आँखें मिलते ही
फिफ्थ गीयर लग जाता है
धड़कनों में!
ओंठ व्यस्त रहते हैं
कँपकँपाने और मुस्कुराने में।
शब्द और आवाज़
केवल शोर हैं
प्यार के सम्प्रेषण में।
✍️ चिराग़ जैन