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प्यार को चंद मजबूरियाँ खा गईं

स्वप्न तो खो गए बुद्धि के द्वार पर
प्यार को चंद मजबूरियाँ खा गईं
बच गई साथ की झुंझलाहट जहाँ
उस जगह प्रीत को दूरियाँ खा गईं

पारलौकिक सुखों की बड़ी प्यास को
कंदरा का महानंद जकड़े रहा
सुन सको तो सुनो काव्य एकांत का
बस जिसे मौन का छंद पकड़े रहा
ज़िन्दगी की समूची हिरन चैकड़ी
प्राण में व्याप्त कस्तूरियाँ खा गईं

प्रीत का रंग वैधव्य ने धो दिया
अनकही पीर अभ्यर्थना हो गई
आँसुओं पर लगी चैकसी आंख की
चाहतें सत्य को ओढ़ कर सो गई
धीर जितना बंधा था उसे एकदम
रेहड़ियों पर टंगी चूड़ियां खा गईं

भूख का इक ठहाका चुभा देर तक
जब कभी भी सड़क पर बसौड़ा पुजा
रीतियाँ ढोंग की ओट में नग्न थीं
पेट आँतों के पीछे दुबककर तुजा
अन्न के मूल्य की हर प्रबल सूक्ति को.
चौंक पर सड़ रही पूरियाँ खा गईं
✍️ चिराग़ जैन

आलोचना-आमंत्रण

सिर्फ़ प्रशंसा से निश्चित ही धार बिगड़ती है लेखन की
तुम मेरे गीतों की अब से निर्मम-निठुर समीक्षा करना

बगिया के जो बिरवे माली की कैंची से दूर रहे हैं
वो बगिया की उर्वर भू से हटने को मजबूर रहे हैं
छँटने-कटने की पीड़ा से ही मिलता है रूप सुदर्शन
तुम बस घावों पर नव पल्लव उगने तलक प्रतीक्षा करना

मेरे अक्षर कवि-गुरुकुल में सद्य प्रविष्टित राजकुँवर हैं
इनके केशों का मुण्डन भी अंतर्मन पर इक पत्थर है
पर शिक्षा के अनुशासन हित इनको भिक्षुक बनना होगा
इन सुकुमारों की भी बाकी सब जैसी ही दीक्षा करना

लाड़-दुलार अधिक होने से पीढ़ी नष्ट हुई जाती है
धूल सना जीवन जीकर ही सौंधी महक सृजन पाती है
अलग नियम से राजकुँअर पर कायरता का दोष लगेगा
हो पाए तो इनकी, सबसे बढ़कर कठिन परीक्षा करना

✍️ चिराग़ जैन

विध्वंस के बाद

पेड़ की डालियो! नवसृजन में जुटो
पत्तियों को मिला टूटने का हुनर
रात भर मत बिलखियो री सूरजमुखी
सूर्य को भा गया रूठने का हुनर

जो गुंथे एक ही तार में वो सुमन
एक दिन सूखकर तो बिखर ही गए
किन्तु जब तक जिए, तब तलक़ यूं जिए
उत्सवों के सुअवसर संवर ही गए
तुम किसी फूल से सीख लेना प्रिये
मुस्कुराते हुए छूटने के हुनर

चाक ने ही अगर संतुलन खो दिया
प्यास का हर समाधान खो जाएगा
हर कलश, हर सुराही तड़क जाएगी
तृप्ति का साज-सामान खो जाएगा
व्यर्थ अवशेष चुभ जाएंगे याद में
पात्र सीखे न गर फूटने का हुनर

भाग्य की कुछ लकीरों के अवरोह पर
चाह की श्वास हर पल सिसकती रही
सत्य कटुता का बाना पहनता रहा
प्राण की डोर गर्दन जकड़ती रही
नियति की डुगडुगी पर दिखाता रहा
इक जमूरा खुशी लूटने का हुनर

✍️ चिराग़ जैन

घर कैसे बचेगा?

देहरी ने झूठ बोला है कपाटों से
सांकलों ने सी लिए हैं होंठ
घर कैसे बचेगा?

धूल आंगन की छतों के सिर चढ़ी है
और चैखट मूकदर्शक बन खड़ी है
नींव तक हर रोज़ पानी रिस रहा है
फर्श बेचारा निरंतर घिस रहा है
रोज़ टलता जा रहा विस्फोट
घर कैसे बचेगा?

नींव का बिसरा चुकी है प्यार देखो
दूसरों पर लद गई दीवार देखो
खिड़कियां घर से अभी रूठी हुई हैं
दूसरों की दृष्टि से जूठी हुई हैं
भा रहा मन को पराया खोट
घर कैसे बचेगा?

बिस्तरों पर सिलवटें संदेह की अब
एड़ियां फटने लगी हैं स्नेह की अब
दूर ले जाती सड़क को तक रहे हैं
साथ चलने में सभी अब थक रहे हैं
आन पर हर रोज होती चोट
घर कैसे बचेगा?

इक अहम का भाव घर में तन चुका है
अन्तरंगता में झरोखा बन चुका है
आपसी विश्वास भी जर्जर हुआ अब
चाय की चर्चा हमारा घर हुआ अब
उफ़! उघड़ती जा रही हर ओट
घर कैसे बचेगा?

✍️ चिराग़ जैन

मनोरंजक चुनावी रैलियाँ

सरकार चाहती है कि दिल्ली की जनता सड़क पर पार्किंग न करे। जनता भी चाहती है कि उसे अपनी गाड़ी अनाधिकृत स्थान पर खड़ी न करनी पड़े। लेकिन सरकार गाड़ी के लिए पार्किंग का स्थान मुहैया नहीं करवा पाती। वह जनता से कहती है कि अपने घर के भीतर गाड़ी खड़ी करो। जनता हाथ जोड़ कर कहती है कि छोटे-छोटे फ्लैट्स और बिल्डर फ्लोर्स में रहनेवाला शख़्स गाड़ी घर में कैसे खड़ी करे।
उत्तर सुनते ही सरकार तुरंत नहले पे दहला मारते हुए कहती है- ‘इत्ते छोटे घर में रहनेवाला आदमी गाड़ी ख़रीदता ही क्यों है?’
जनता रुआंसी होकर कहती है- ‘माई बाप! हम डीटीसी की बस में दफ्तर जाना चाहते हैं लेकिन बस में पैर रखना तो दूर, लटकने की भी जगह नहीं होती। ऊपर से सरकारी चेतावनी और लिखी होती है कि पायदान पर यात्रा न करें। …पायदान पर कर नहीं सकते, भीतर जगह नहीं है और लटकने का सामर्थ्य नहीं है। ऑटो-टैक्सीवाले खाल उतार लेते हैं। उनकी शिकायत करो तो पुलिसवाला ऑटोवाले के प्रति नमकहलाल बनकर तब तक नहीं पहुँचता, जब तक ऑटोवाला हमें मारपीट के फरार न हो जाए। ओला-ऊबर में इतना सरचार्ज लगता है कि तीन कर्मचारियों की तनख़्वाह मिला ली जाए तो भी एक कर्मचारी दफ्तर नहीं पहुँच सकता। मेट्रो में ऑफिस टाइम पर इतनी भीड़ होती है कि जब तक मेट्रो में घुस पाते हैं तब तक बायोमेट्रिक की मशीन हमें लेटलतीफ घोषित करके हमारी आधी दिहाड़ी चट कर जाती है। गाड़ी पूल करने की सोचें, तो उसके लिए गाड़ी होना ज़रूरी है और चार दिन में एक दिन नम्बर आवे तो बाकी तीन दिन गाड़ी खड़ी करने के लिए पार्किंग की जगह चाहिए।’
इतनी सारी कहानी सुनकर सरकार थोड़ी देर मौन रहती है। अचानक उसे ध्यान आता है कि दो महीने बाद राजस्थान में चुनाव है। सरकार मन ही मन स्वयं को कोसती है- ‘मूढ़मति, दिल्ली के लोगों की समस्याएँ कभी ख़त्म नहीं होंगी। ये थैंकलैस लोग एक नम्बर के आलसी हैं। इनके चक्कर में पड़ोगे तो राजस्थान हाथ से निकल जाएगा।’
सोच-विचार करके, सरकार जनता को आश्वासन देती है कि हमने एनसीआर कमेटी को बोलकर दिल्ली का विस्तार शामली तक करवा दिया है। लगभग सौ किलोमीटर दायर बढ़ जाएगा तो पार्किंग की समस्या हल हो जाएगी। फिर आप आराम से अपनी गाड़ी पार्क करना।
इससे पहले कि जनता इस आश्वासन को सुनकर सम्भल पाए, सरकार राजस्थान के दौरे पर निकल लेती है। जनता अपने घर पहुँचकर घर के बाहर गाड़ी पार्क करती है और टीवी पर सरकार की चुनावी रैली देखने लगती है। रैली के आश्वासनों को सुनकर जनता ठहाका मारती है और न्यूज़ चैनल का मनोरंजन त्याग कर पोगो चौनल के समाचार लगा लेती है।
✍️ चिराग़ जैन

अलविदा शशि कपूर साहब!

एक पूरा जीवन समाप्त हो जाने की एक और ख़बर आई। वे शशि साहब जो कभी चहकते हुए एक नौजवान थे, वे जिनका अंदाज़ “स्टाइल” कहलाता था, वे जिनका उठना-बैठना, खानपान, आना-जाना सब कुछ सुर्खियों में तब्दील हो जाता था; आज “हमेशा” के लिए विदा हो गए। वो शरारती आंखें अब कभी नहीं खुलेंगी। कितना जरूरी और बेतुका सत्य है मृत्यु! और कितना निष्ठुर है लोकप्रियता का भ्रम! जिनका फ़िल्म में मरण देख कर लोगों की पलकें भीग जाती थीं आज उनके महागमन की ख़बर भी केवल एक सिंगल कॉलम न्यूज़ से ज़्यादा कुछ नहीं है। सामाजिक लोगों का जीवन किसी खूबसूरत जश्न जैसा है। जब इस जश्न पर नूर बरसता है तो पूरी दुनिया मुँह बाये इसकी रौशनी से झिलमिलाते संसार को देखती है लेकिन जश्न का रंग उतरने के बाद वही जीवन कितना वीरान और बदरंग हो जाता है- इसकी सुधि लेने कोई नहीं जाता। शशि जी ने जीवन के अंतिम कुछ वर्ष बेहद कष्ट में गुज़ारे। राजेश खन्ना भी अवसाद के दंश से रोज़ घायल हुए और अंततः चल बसे। दिलीप साहब, अटल जी और भी अनेक दैदीप्यमान सूरज किसी गुमनाम अंधेरे में जीवन काट रहे हैं। ये सब घटनाएँ आज इसलिए संदर्भित हो गई हैं कि कभी हमारे मनोरंजन, खेल, विज्ञान, राजनीति, कला, उद्योग और अन्य क्षेत्रों की धुरि रहे व्यक्तित्व हमारे भविष्य की धरोहर हैं। उनके अनुभवों की ऊर्जा को व्हील चेयर पर घिसटने के लिए छोड़ देने की बजाय यदि भविष्य के निर्माण हेतु प्रयोग करने का उपक्रम किया जाए तो संभवतः निजी जीवन को तिरोहित कर अनवरत मेहनत करने वाले लोग अधिक जिजीविषा से मानव जाति की सेवा कर पाएंगे। अलविदा शशि साहब!
✍️ चिराग़ जैन

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