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जिनस्य अनुयायी इति जैनः

महावीर मुसलमान थे।
क्योंकि उनके पास मुकम्मल ईमान थे।

महावीर सिख थे।
क्योंकि वे सितम करने से ख़बरदार करते थे।

महावीर हिन्दू थे।
क्योंकि वे हिंसा से दूर थे
और सब जीवों से प्यार करते थे।

महावीर पारसी थे।
क्योंकि उनमें
संसार के पार देखने की क्षमता थी।

महावीर आर्यसमाजी थे।
क्योंकि उनमें सत्य के प्रति ममता थी।

हाँ, महावीर बुद्ध थे।
क्योंकि उनके उसूल दुर्बुद्धि के विरुद्ध थे।

…और हाँ!
महावीर ईसाई भी थे
क्योंकि वे इंसानियत के साईं भी थे।

लेकिन, महावीर जैन नहीं थे।
…क्योंकि उनकी वाणी में
हमारी जिव्हा की तरह कटु बैन नहीं थे;
उनके हृदय में
श्वेताम्बर-दिगम्बर का झगड़ा न था;
उनके अन्तस् में
बीस और तेरह का रगड़ा न था;
वे नियम थोपते नहीं थे;
वे हिंसा रोपते नहीं थे;
वे नित नए धर्म गढ़ते नहीं थे;
वे लकीर के फ़क़ीर बनकर
लड़ते नहीं थे;
वे हमारी तरह ढोंगी नहीं थे;
वे दिन के जोगी
रात के भोगी नहीं थे;
वे तो आडम्बरों के बिन थे
सचमुच……..
मेरे महावीर जैन नहीं थे
….’जिन’ थे।

✍️ चिराग़ जैन

देव-शास्त्र-गुरु

ज्ञानसिंधु वीतरागी हित-उपदेषी हैं जो
ता की करो पूजा नित प्रति अष्ट द्रव्य से
पंच-महाव्रतों का जो बाना पहन के चलें
ऐसे गुरुओं की सेवा करो जीव भव्य रे
जिन की जो वाणी जिनवाणी का मनन करो
संयम का पालन बनाओ बस लक्ष्य रे
व्रत-उपवास करो नितप्रति दान करो
तब ही चिराग कहलाओगे सुसभ्य रे
✍️ चिराग़ जैन

महावीर

क्षमा को भुलाओ नहीं मति भरमाओ नहीं
घाव को कुरेदोगे तो ख़ून बह जाएगा
जो हुआ सो भूल जाओ आज में सुधार लाओ
निज को संवारे वही वीर कहलाएगा
अम्बर को छोड़ के दिगम्बर को ओढ़ ले तो
धन्य तेरी जननी का क्षीर कहलाएगा
समता का भाव धरे काऊ से ना राग करे
तब ही ‘चिराग’ महावीर कहलाएगा
✍️ चिराग़ जैन

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