पहचान
जो लोग पहचान से काम पाना चाहते हैं, उन्हें काम से पहचान नहीं मिलती।
✍️ चिराग़ जैन
जो लोग पहचान से काम पाना चाहते हैं, उन्हें काम से पहचान नहीं मिलती।
✍️ चिराग़ जैन
वो दौर गये जब लोग वसीयतों में ज़मीन-जायदाद छोड़कर जाते थे, आजकल तो चार सोशल मीडिया अकाउंट्स, कुछ हज़ार फॉलोवर्स और दस-पाँच ब्लॉक्ड प्रोफाइल्स से ज़्यादा किसी के पास कुछ नहीं है छोड़ने को…
सफेद बाल और अरथी देखकर वैराग्य घटित होनेवाली कहानियां सुनकर बड़े हुए थे, पर अब पता चला कि व्हाट्सएप-इंस्टाग्राम थोड़ी देर को बन्द हो जाए तो जीवन निरर्थक लगने लगता है।
✍️ चिराग़ जैन
बाहर से जीते-जीते हैं, भीतर से हारे-हारे हैं
पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं
अपने सिर पर ओट रखी है, सारी दुनिया की सिरदर्दी
इनकी दिनचर्या लगती है, घर भर को आवारागर्दी
सामाजिक जीवन जीने की चाहत ने सब कुछ छीना है
जो सबको जीवित रख पाये, वो जीवन इनको जीना है
ये बेचारे, केवल अपनी नींदों के ही हत्यारे हैं
पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं
लगने को लगता है, लेकिन इनका दिल भी सख्त नहीं है
आँसू इनको भी आते हैं, पर रोने का वक़्त नहीं है
सबका सुख-दुःख ढोते फिरते, सबकी नाराज़ी सहते हैं
सबके साथ खड़े होते पर, जीवन भर तन्हा रहते हैं
इनकी तन्हाई से पूछो, इनके भी आँसू खारे हैं
पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं
सीधा-सादा जीवन जीकर, ये भी उम्र बिता सकते थे
मुट्ठी भर आमदनी करके, रूखी-सूखी खा सकते थे
लेकिन इन लोगों ने अपने सपनों का सम्मान किया है
अपना जीवन मुश्किल करके, दुनिया का आसान किया है
थोड़े इनमें अवगुण हैं पर, गुण भी तो कितने सारे हैं
पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं
हर एक मुहूरत का जग में सत्कार मुझी से सम्भव है
बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है
बर्तन की खनखन चौके में
पायल की रुनझुन आंगन में
मेरे होंठो पर सजती है
गीतों की गुनगुन सावन में
जीवन के सोलह सपनों का सिंगार मुझी से सम्भव है
बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है
हर रोज़ सुबह की रंगोली
होली, दीवाली मुझसे है
रिश्तों की शोभा मुझसे है
घर की ख़ुशहाली मुझसे है
जीवन की पहली कोशिश का सत्कार मुझी से सम्भव है
बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है
बचपन में माँ का नाम हूँ मैं
यौवन की मीठी शाम हूँ मैं
अस्वस्थ बुढापे की ख़ातिर
हर इक पीड़ा पर बाम हूँ मैं
जीवन की हर इक दुविधा का उपचार मुझी से सम्भव है
बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है
✍️ चिराग़ जैन
इस दुनिया में प्यार रहे तो
भावों का सत्कार रहे तो
कितना प्यारा होगा ये संसार समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है
किस्सा सुनकर मन सबका कहता है इसमें भूल हुई है
बिन मतलब की दुनियादारी पाँखुरियों में शूल हुई है
जो रांझे के साथ हुई थी हम वो भूल सुधारेंगे कब
अपने मन से बिन मतलब की दुनियादारी मारेंगे कब
इनको सुख से जीने दें इस बार; समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है
नज़रें टकराने पर जो आवाज़ हुई, वो शोर नहीं है
मन ही मन सब कह लेता है, पर फिर भी मुँहजोर नहीं है
अपनी इच्छाएं बिसरा कर उसकी मुस्कानें बोते हैं
इक-दूजे की ख़्वाहिश पूरी करके दुगने ख़ुश होते हैं
शुद्ध मुनाफे का ऐसा व्यापार समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है
दुनिया को मन में फूले सब फूल दिखाई दे जाते हैं
आँखों-आँखों चलने वाले शब्द सुनाई दे जाते हैं
चेहरे का कब, क्यों, कैसा था रंग समझ में आ जाता है
पलकों के झुकने का हर इक ढंग समझ में आ जाता है
तो फिर इस दुनिया की ख़ातिर प्यार समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है
✍️ चिराग़ जैन
रोज़ उजड़े, रोज़ सँवरे, इस शहर का दिल अलग है
मत मिसालें दो हमारी, अपना मुस्तकबिल अलग है
कुछ अलग है नूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
खण्डहरों के साथ कितने युग खड़े हैं मुँह उठाए
ख़ून में भीगी रही है साज़िशों के ज़ख़्म खाए
पर इन्हीं सब साज़िशों ने रच दिया इतिहास जग में
इसके दीवानों का किस्सा हो गया है ख़ास जग में
है यही दस्तूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
ये शहर बनकर रहा है पांडवों की राजधानी
इसने बाँची तोमरों की और पिथौरा की कहानी
लाट दिल्ली में गुलामो की गड़ी है शान बनकर
और रज़िया बैठ पाई तख़्त पर सुल्तान बनकर
मन हुआ मग़रूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
इस शहर ने खिलजियों के वहशती अरमान देखे
इस शहर ने तुगलकों के तुगलकी फरमान देखे
सैयदों का तौर देखा, लोदियों का ढंग देखा
शेरशाह सूरी सरीख़े शासकों का रंग देखा
कौन है मंसूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
शाहजहानाबाद बनकर ख़ूब इठलाती थी दिल्ली
चांदनी की रौनकों में रोज़ इतराती थी दिल्ली
लाल पत्थर के किले को चूमकर जमुना चली थी
सात दरवाज़ों के भीतर झूमकर दिल्ली पली थी
ताज था मखमूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
इस शहर ने ख़ूब देखा ताज मिट्टी में मिले थे
आज जो भी खण्डहर हैं, कल वहाँ रौशन क़िले थे
तख़्त रंगीला हुआ तो, छिन गयी सब शान इसकी
महल की अय्याशियों ने छीन ली पहचान इसकी
खोया कोहेनूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
मुल्क़ की ताक़त बनी जब एक बूढ़ी बादशाहत
तब नयी करवट बदलने लग गयी पूरी सियासत
इक शहंशाह को नहीं दो ग़ज़ ज़मीं तक दे सकी ये
फिर नये ही रूप में ढलने लगी हारी-थकी ये
हाल था मजबूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
और फिर रहने लगी बेचैन आठों याम दिल्ली
नौ दशक तक लड़ रही थी इक अलग संग्राम दिल्ली
उस समर में शांति भी थी, उस समर में जोश भी था
उस समर में इक तरफ़ दिल्ली चलो का घोष भी था
रास्ता था दूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
रायसीना को बड़ी मुश्किल से जब खादी मिली थी
सैंकड़ों बलिदान देकर हमको आज़ादी मिली थी
देश बँटने का स्वयं पर बदनुमा इल्ज़ाम सहकर
इस धरा पर ही गिरा था जब कोई ‘हे राम’ कहकर
पुँछ गया सिंदूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
इस शहर में दर्ज है बलिदान की अद्भुत कहानी
सीस कटवाए मगर अन्याय से कब हार मानी
तख़्त के ज़ुल्मो-सितम से जूझने की जिद्द बड़ी थी
तेग़ के आगे बहादुर की फ़क़त हिम्मत लड़ी थी
है अमर वो शूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
इस शहर को औलियाओं की ज़मीरी का गुमां है
सूफियों की मस्तमौला सी फ़क़ीरी का गुमां है
राम और रहमान बढ़कर साथ चलते हैं अभी भी
इस शहर में फूलवाले सैर करते हैं अभी भी
यूँ मिटा नासूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
आओ ना साहब यहाँ का चावड़ी बज़ार देखो
नाक सी सीधी गली में इत्र का व्यापार देखो
नफ़रतों को किस अदा से मिल रही है मात देखो
एक पंक्ति में खड़े हैं धर्म सब इक साथ देखो
इश्क़ कर मंजूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
चाट की लज़्ज़त उठाओ और परांठों का मज़ा लो
चावड़ी बाज़ार में हलवा-नगौरी ख़ूब खा लो
लुत्फ़ बालूशाही का लेना हो, यमुना पार कर लो
पान या कुल्फी खिलाकर जीभ का सत्कार कर लो
स्वाद है अमचूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
इस शहर को जान पाने का कोई ज़रिया नहीं है
नाम दरियागंज है, लेकिन वहाँ दरिया नहीं है
इस शहर में आदमीयत के अभी हिस्से मिलेंगे
तंग गलियों में बड़े दिल के कई किस्से मिलेंगे
प्यार है भरपूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
गुलमोहर के लाल फूलों के लिबासों का शहर है
टेसुओं का, नीम का और अमलतासों का शहर है
गुनगुनी-सी धूप में कचनार खिलता है यहाँ पर
हर गली में एक हरसिंगार मिलता है यहाँ पर
रंग कब बेनूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
जब ग़ज़ल छेड़ी तो छेड़ी ज़ौक़ का अंदाज़ लेकर
शायरी ग़ालिब ने की तो, इश्क़ को आवाज़ देकर
आज भी इक छाप ख़ुसरो की यहाँ आली मिलेगी
आज तक भी उर्स में मक़बूल क़व्वाली मिलेगी
मन रहा संतूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
चाह कर देखो नहीं है, कौन सा पकवान इसमें
इल्म उर्दू का बहुत है, और हिन्दी ज्ञान इसमें
जनवरी शिमला सरीखी,जून राजस्थान इसमें
ध्यान से देखो मिलेगा एक हिंदुस्तान इसमें
प्यार है दस्तूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
✍️ चिराग़ जैन