Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Unpublished
जिन शिखरों को हो पिघलने से ऐतराज़
उन्हें कभी नदी-सा बहाव नहीं मिलता
अनुभूति अनकही रहती हैं जब तक
अक्षरों से उनका स्वभाव नहीं मिलता
जोड़-तोड़ करने से कविता तो बनती है
किन्तु ऐसी कविता में भाव नहीं मिलता
काव्य तो है ऐसी पीड़ाओं की प्रतिध्वनि जहाँ
टीस उठती है पर घाव नहीं मिलता
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Unpublished
परेशानियों में यदि उलझा हो अंतस् तो
कैसा लगता है ये वसंत मत पूछिये
एक-एक दिन एक युग लगता है; और
कैसे होता है युगों का अंत मत पूछिये
प्रेमगीत शोर लगते हैं और लिपियों के
चुभते हैं कितने हलन्त मत पूछिये
जल विच कमल सरीख़ा लगता है मन
काहे बनता है कोई सन्त मत पूछिये
धरती के रोम-रोम से सुगन्ध उठती है
कैसे झूमता है ये वसन्त मत पूछिये
मकरंद ओढ़ कैसे सजता-सँवरता है
जगती का आदि और अंत मत पूछिये
लेखनी में रस घुलता है और घुंघरू से
बजते हैं लिपि के हलन्त मत पूछिये
चंदनी पवित्रता का भोग करते हैं; सारी
दुनिया के सन्त औ महन्त मत पूछिये
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Unpublished
मटक-मटक लट झटक-झटक; हिया-
पट खटपट खटकाती है गुजरिया
ठक-ठक-ठक खटकात नटखट
मोरे हिवड़ा के पट, बतलाती है गुजरिया
लाग न लपट, तज अंगना का वट
झट जमना के तट, चली आती है गुजरिया
लेवे करवट जब मन का कपट
उस पल झटपट नट जाती है गुजरिया
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Unpublished
चुप-चुप देखती थीं राधिका कन्हैया जी को
हौले-हौले उठ रहे शोर से विवश थी
साँवरे के पास खींच लाती थी जो बार-बार
प्रीत की अनोखी उस डोर से विवश थी
इत होरी की उमंग, उत दुनिया से तंग
फागुन में गोरी चहुँ ओर से विवश थी
लोक-लाज तज भगी चली आई गोकुल में
मनवा में उठती हिलोर से विवश थी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Unpublished
काली अमावस का अंधेरा होम करने को,
दीवाली के दीप सामधेनी बन जाएंगे
पीड़ा वाली ज्वालाएँ जहाँ प्रचण्ड होंगी, वहाँ
शांति-धार बरसाने प्रेम-घन जाएंगे
बलिदान हुए यदि कहीं तेरे लाडले तो
अरथी सजाने केसरी-सुमन जाएंगे
पर यदि तलवार चली रणबाँकुरों की,
शत्रुओं के शीश तेरी ही शरण आएंगे
चाहे कितने भी हथियार वे बटोर लाएँ,
लूट नहीं सकते हैं तेरी आन-बान माँ
बार-बार तूने घूँट कड़वे पिए हैं पर
अब नहीं करना पड़ेगा विषपान माँ
ऑंख भी उठाई यदि पापियों ने तेरी ओर,
कम पड़ जाएंगे कफ़न वाले थान माँ
दुष्ट असुरों का सर्वनाश करने के लिए
परमाणु-बमों का करेंगे संधान माँ
लाज तेरे पावन किरीट की बचाने हेतु
कर में किरिच औ त्रिशूल धर लेंगे हम
चामरों की सौम्य पवन का जिन्हें ज्ञान नहीं,
उन्हें समझाने को प्रलय-समर देंगे हम
अब नहीं तृषित रहेगी देवी रणचंडी,
शत्रुओं के श्रोणित से घट भर देंगे हम
सुमनों की क्या बिसात; माता भेंट में तू आज
मांग के तो देख दुश्मनों के सर देंगे हम
✍️ चिराग़ जैन