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अरुण जैमिनी: एक नाम नहीं, एक किरदार

“छोड़ ना यार, क्या फरक पड़ता है।” -यह वाक्य कोरा तकियाक़लाम ही नहीं, अपितु अरुण जी के जीवन का मूल सिद्धान्त भी है। जीवन की बड़ी से बड़ी भँवर से भी वे इसी एक वाक्य की डोर थामकर किनारे आ लगते हैं। पहले मुझे ऐसा लगता था कि वे दूसरों की समस्या को छोटा समझते हैं, इसीलिए सामनेवाले की परिस्थिति और तनाव के पहाड़ को अपने इस एक वाक्य से छोटा साबित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन बाद में मैंने देखा कि वे ख़ुद की समस्याओं को भी अपने इसी एक वाक्य से छोटा साबित कर देते हैं।
उन्हें जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगता है अपना कम्फर्ट ज़ोन। इसीलिए ज्यों ही उनके कम्फर्ट ज़ोन में कोई तनाव प्रवेश करने लगता है तो वे ‘किसी भी कीमत पर’ उससे अपने कम्फर्ट को सुरक्षित निकाल लाते हैं। अपने कम्फर्ट ज़ोन की रक्षा के लिए वे धन, सिद्धान्त, यश, लाभ और एक सीमा के बाद सम्बन्ध तक से मोहभंग कर लेते हैं। कई बार मुझे उनके मापदण्ड बदलने पर बहुत आश्चर्य होता था, लेकिन अब महसूस होता है कि समय की किसी एक इकाई में किसी एक मापदण्ड की अनदेखी कर देने से यदि आप एक लम्बी अवधि के तनाव से मुक्त हो जाते हैं, तो यह सौदा खरा कहा जा सकता है, बशर्त उसका उद्देश्य किसी को धोखा देना न हो।

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अरुण जैमिनी जी से पहली बार मैं उस कवि-सम्मेलन में मिला था, जो एक श्रोता और कवि, दोनों रूपों में मेरा पहला कवि-सम्मेलन था। उसके बाद उनके कवि-सम्मेलनीय कद के कारण आगे से बढ़कर उनसे सम्पर्क बढ़ाने में संकोच होता रहा। लेकिन उनका व्यक्तित्व और उनके चेहरे की कांति मुझे हमेशा आकृष्ट करती थी। कई वर्ष तक मैं उनके अस्तित्व को दूर से ही देखता रहा, फिर न जाने कब वे मित्र हो गए; न जाने कब उन्होंने मेरे संकोच की दीवार गिराकर अपनत्व का सूत्र बांध लिया।
मुझे जहाँ तक याद है, वर्ष 2011 में जब मैंने जम्मू में नौकरी की थी, तब अरुण जी से मेरा रिश्ता सुदृढ़ होने लगा। 2012 में जब नौकरी छोड़कर आया, तो वह स्थिति जन्मी कि हम दिन में कम से कम एक बार बात ज़रूर करते थे। तब से अब तक यह क्रम अनवरत ज़ारी है। जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुःख… सब कुछ हम परस्पर साझा कर लेते हैं।
मेरी सर्जरी के दौरान उन्होंने जिस शिद्दत से मित्रता निर्वहन किया, वह मैं कभी नहीं भूल पाता। मुझे याद है कि जब मेदांता में वे मुझसे मिलने आए तो मैंने कहा कि मेरे कारण सब परेशान हो रहे हैं। इस पर वे भावुक होकर बोले – ‘अर तू जो सबके लिए परेशान होता है हमेशा!’

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अरुण जी के साथ एक बात ख़ास है, वो ये कि वे एक बार में एक ही काम करते हैं। और जो काम करते हैं, उसे पूरी शिद्दत से करते हैं। जैसे उन्हें एक बार यह बात समझ आ गई कि कवि-सम्मेलन समिति के अधिवेशन में सबको गले में आईकार्ड ज़रूर लटकाना है तो इसके बाद वे मुख्य अतिथि को भी बिना कार्ड के अधिवेशन हाॅल में एंट्री नहीं करने देंगे। काम महत्वपूर्ण है या नहीं, ये अलग बात है, लेकिन अगर उसकी ड्यूटी अरुण जैमिनी ने ली है तो वह होगा ज़रूर। अपने हिस्से काम वे उतना ही लेते हैं, जितना वे कर सकें। और अरुण जी कितना काम कर सकते हैं, ये उन्हें जानने वाले अच्छी तरह जानते हैं। लेकिन जितना काम वे करते हैं, उसमें कोई कमी नहीं निकल सकती।
जून 2023 में मेरी और मनीषा की शादी थी। मैंने कहा, चाचा, अबकी बार मुझे अधिवेशन की तैयारी से मुक्त कर दो। अरुण जी का डायरेक्ट जवाब था, शादी में तैने क्या करना है। सब हो जाएगा। मैंने कहा, ‘भाईसाहब सबको निमंत्रण भेजना है, सारी तैयारी करनी है…।’ उन्होंने पूरी ज़िम्मेदारी उठाते हुए कहा- ‘तेरी शादी में कवियों के निमंत्रण की ज़िम्मेदारी मेरी।’ उन्होंने इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी ले ली तो मुझे थोड़ा सहारा मिला। मैंने हर वर्ष की तरह पूरा समय लगाकर जोधपुर अधिवेशन सम्पन्न किया। और कवि-परिवार से इतर सबको निमन्त्रण के लिए व्यवस्थित रूप से सूची बनाकर विवाह का निमन्त्रण भी भेजता रहा। 25 जून को विवाह का रिसेप्शन था। समय से पहले अरुण जी और भाभी आयोजन स्थल पर उपस्थित थे। कवि-परिवार भी प्र्याप्त संख्या में उपस्थित था, लेकिन अनेक महत्वपूर्ण नाम दिखाई नहीं दिये। …मैंने अरुण जी से कुछ लोगों के न आने का कारण पूछा तो पता लगा कि अरुण जी ने कवियों के व्हाट्सएप ग्रुप पर सबको सामूहिक निमंत्रण दे दिया था कि चिराग़ और मनीषा के ब्याह में सभी आमंत्रित हैं, चिराग़ बहुत व्यस्त है, अलग से निमंत्रण का इंतज़ार न करें।’
अब जो-जो उस ग्रुप में था, वो-वो निमंत्रित हो गया और जो जो उस ग्रुप में नहीं था, वो आज तक मुझे ताना देता है। …मुझे अरुण जी की इस हरक़त पर क्रोध नहीं आया क्योंकि मैंने देखा है कि वे अपने घर के ब्याह-टेलों में भी कवि-समाज को निमंत्रित करने का ‘दायित्व’ ऐसे ही निभाते हैं।

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उनका किरदार उनकी सादगी से पोषित होता है। पंच और डांस को रोकने में वे हमेशा असमर्थ रहे हैं। मुझे याद है एक बार गौरव शर्मा और मैं काठमांडू के एक कार्यक्रम में थे। अरुण जी को इसी कार्यक्रम में कहीं और से आना था, तो वे दो घण्टे बाद होटल पहुँचे। होटल पहुँचने पर गौरव ने उन्हें बताया कि चाचा, चिराग़ ने रास्ते में मुझे बहुत शानदार गीत सुनाया।
गौरव की बात सुनकर चाचा के चेहरे पर भय मिश्रित आश्चर्य तैर गया। आँखें बड़ी हो गईं, फिर धीमे स्वर में गौरव से पूछा- इतनी देर में इसने गीत भी सुना दिया।
गौरव उनके व्यंग्य को समझकर झट से रुआँसा होकर बोला- ‘हाँ चाचा, एक नहीं तीन-तीन।’
अरुण जी ने चेहरा लाल करके मुझसे कहा- ‘साले, इन्हीं हरकतों से एक दिन तू अपने सारे दोस्त खो देगा।’
ठहाके का ऐसा निर्माण होता मैं पहली बार देख रहा था।

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कुल मिलाकर, तनाव से रहित जीवन जीने का जीवन्त उदाहरण है मेरा चाचा। आज ये सारी बातें इसलिए याद आ रही हैं क्योंकि आज चाचा का जन्मदिन है और चाचा अमरीका में है। अगर भारत में होते तो इतना लम्बा लेख लिखने का समय ही नहीं देते।
हैप्पी बर्थडे चाचा… लव यू।
✍️ चिराग़ जैन

माहेश्वर तिवारी: गीत का उदाहरण

एक सम्पूर्ण गीत को यदि मनुष्य बना दिया जाए तो उसका आचार-व्यवहार लगभग माहेश्वर दा जैसा होगा। संवेदना में डूबकर तरल हो उठी आँखें उनके गीतकार नहीं, ‘गीतमयी’ होने का प्रमाण थीं। आज वे आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।
मृदु वाणी किसे कहते हैं, इसका उदाहरण आज हमसे छिन गया। सौम्य व्यक्तित्व कैसा होता है; इसका सबसे सटीक दर्शन आज लुप्त हो गया। निश्छल मुस्कान का एक बिम्ब आज अलभ हो गया। गीतकार को कैसा होना चाहिए- इसका उत्तर देने के लिए दृष्टि तर्जनी का पीछा करते हुए जिस मनुष्य पर जाकर ठहरती थी वह मनुष्य आज परलोक सिधार गया।
अपनी सृजन प्रतिभा के वैभव को भोगते हुए भी अंतर्मुखी होने से चेहरा कितना सुदर्शन हो उठता है- यह अब केवल तस्वीर में ही देखा जा सकेगा।
आधुनिकता के किसी बिम्ब में करवट लेते गीत को चुनकर शब्दाकार करने का लुत्फ़ किस संतुष्टि को जन्म देता है- इसका अब केवल अनुमान लगाया जा सकेगा।
गीत के नए साधकों के सौभाग्य से आज गीत का एक जीवंत गुरुकुल मिट गया। माहेश्वर जी के देहावसान ने आज मुझे एक बार फिर इस एहसास से भर दिया है कि लौकिक व्यस्तता की टुच्ची आड़ में सृजन के जिन अलौकिक देवदूतों की संगत से स्वयं को वंचित कर रहा हूँ, उनके व्यक्तित्व की सुगंध दोबारा नसीब नहीं होगी।
मुरादाबाद से गुज़रते हुए अब हर बार एक टीस हरी हो जाएगी।
विदा दद्दू!

✍️ चिराग़ जैन

मन रह गया अयोध्या में…

जहाज ने दिल्ली का रन-वे छोड़ा और मन राम के आचरण की कथा बाँचने लगा। खिड़की से बाहर झाँका, तो सूरज के तेज प्रकाश से आँखें चुंधिया गईं। भौतिक आँखें बंद हुई तो मन राम के नयनाभिराम चरित्र पर त्राटक करने लगा। अनायास ही राम से कुछ मांगने की उत्कंठा जगी तो याचना राम-आचरण की प्रार्थना के गीत में ढल गई।
अयोध्या विमानतल पर लैंडिंग की उद्घोषणा होने से पहले गीत पूरा हुआ। जहाज धरती पर उतर रहा था और मन सृजन के आनंद में उड़ान भर रहा था। आगमन हॉल में प्रवेश किया तो पुष्पक विमान के माध्यम से राम आगमन की भव्य पेंटिंग आँखों की चुंबक बन गई। जिधर दृष्टि जाती है उधर ही राम विराजमान हैं। एक दीवार पर मधुबनी शैली की पाँच पेंटिंग्स में राम की जीवन झाँकी प्रदर्शित है।
मैंने देखा कि कन्वेयर बेल्ट पर लगेज घूम रहा था और लोग अपने सामान की चिंता छोड़कर आगमन हॉल की चित्रकारी को कैमरे में क़ैद कर रहे थे।
हवाई अड्डे से निकलकर अपने प्रवास की ओर चले तो ऐसा लगा कि पूरा शहर किसी अनन्त उत्सव में संलग्न है। धूप तेज़ थी, लेकिन उत्साह में कोई कमी नहीं। सड़क के दोनों ओर जगह-जगह भित्तिचित्र, सूर्य-स्तम्भ और न जाने कितने नगर सिंगार दृश्यमान हैं। पूरी अयोध्या उस नारी की तरह इतरा रही है, जिसे पूरे जीवन के तिरस्कार के बाद पिया का संसर्ग मिल गया हो।
हमारे ठहरने की व्यवस्था नए बस अड्डे के पास बनी निषादराज गुहा टैंट सिटी में थी। हम अयोध्या को निहारते हुए गंतव्य तक पहुँचे।
टैंट सिटी क्या, एक छोटी-मोटी बस्ती बसी हुई है। प्रवेश करते ही एक बड़े से आँगन में ऊँचे चबूतरे पर खड़ाऊ की भव्य प्रतिकृति बनी है। उसके पीछे धनुर्धर श्रीराम स्वयं एक ऊँचे चबूतरे पर खड़े हैं। उसके पीछे सैंकड़ों टैंट कतारबद्ध तने हुए हैं। हर टैंट सुविधाओं से युक्त। एयर कंडीशनर भी मौजूद है और रूम हीटर भी; टीवी भी है और डबलबेड भी। कुल मिलाकर जब तक कोई याद न दिलाए, तब तक यह किसी शानदार होटल के कमरे से कम नहीं लगता।
भोजन के लिए शबरी रसोई है। पार्श्व में रामधुन का संगीत और थाली में सादा किन्तु स्वादिष्ट भोजन। हम सभी कवियों ने प्रसाद की तरह भोजन ग्रहण किया।
माहौल से मन का वातावरण प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। इसलिए हमारा मन भी आराम का विचार त्यागकर नगर भ्रमण और रामलला के दर्शन को आतुर हो गया। जहाँ हमें गाड़ी ने छोड़ा वहाँ बहुत बड़ा द्वार बना है, जिस पर सात घोड़ों पर सवार दिनकर उकेरे गए थे। इस द्वार से प्रारंभ हुई सड़क, सीधे लता मंगेशकर चौक तक जाती है। इस चौक पर एक बहुत बड़ी वीणा बनाई गई है। जब हम यहाँ पहुँचे तब इस्कॉन की एक मंडली ‘हरे कृष्णा हरे रामा’ गाते हुए नृत्यमग्न थी। उत्साह ने हमारे पैरों को भी सुरों का दास बना दिया। थोड़ी देर नाच-गाकर हम राम की पैड़ी पर जा पहुँचे। दिन, दोपहर की ड्योढी लाँघकर शाम के बगीचे में प्रवेश कर रहा था। सूरज शीतल हुआ जाता था और हवा मीठी। राम की पैड़ी पर सभी कवियों ने मस्तक पर चंदन-रोली से राम नाम लिखवाया। फिर सरयू की मुख्यधारा में नौका विहार किया। यहाँ नदी का जल इतना निर्मल है कि एक-एक लहर में आरपार झाँका जा सकता है। हम सरयू की अगम धार पर नौकायन कर रहे थे और मन के भाव लहरों से भी अधिक लहरा रहे थे।
रामशरणदायीनी सरिता को प्रणाम करके हम हनुमानगढ़ी की ओर बढ़ चले। विनीत चौहान जी कह ही रहे थे कि “इतनी भीड़ में हनुमानगढ़ी के मुख्य महंत राजूदास जी अति व्यस्त होंगे, अन्यथा मैं सब कवियों को उनसे मिलवाता”; इतनी देर में रामायण धर द्विवेदी ने राजूदास जी को फोन मिला दिया। अगले 4 मिनिट में हम महंत जी के सामने थे। विनीत जी के पुराने परिचित महंत राजूदास जी ने सभी कवियों का सम्मान करके सबको रामनामी ओढ़ाई। अयोध्या के राजा के दर्शन से आनंद द्विगुणित हो गया। और हम अंजनिपुत्र को राम-राम बोलकर दशरथ महल आ पहुँचे। फिर कनक भवन में माँ जानकी की आरती की और नवनिर्मित राममंदिर की ओर बढ़ चले।
उत्साह और कदम एक दूसरे से होड़ कर रहे थे। अभय सिंह निर्भीक, बड़े मन से हमें राममंदिर तक लाए। फोन और जूते बाहर जमा करा दिये गए। जूते उतारकर हम ज़मीन से जुड़ गए और फोन छोड़कर हम अनावश्यक व्यस्तता से छूट गए।
ज्यों-ज्यों हम मंदिर के भीतर घुसते जाते थे, राम के विग्रह को देखने की लालसा और घनीभूत हुई जाती थी। मंदिर की नक्काशी में दर्जनों कलाकृतियाँ उपस्थित थीं किन्तु मन को राम से कम कुछ नहीं लुभाता था। आँखों ने देखा कि स्तम्भों पर शिव के विविध स्वरूप उकेरे गए हैं; कहीं यक्ष अंकित हैं तो कहीं हनुमान; कहीं गणपति हैं तो कहीं शक्ति; कहीं किसी दीवार पर पत्थर को छैनी से छूकर कलाकार ने प्राणवान कर दिया है। दरवाज़ों पर कनक मँढ़ाई थी और भीड़ के बावजूद धक्का-मुक्की बिल्कुल नहीं थी। आँखें सब कुछ देख रही थीं, किन्तु मन व्याकुल हुआ जाता था। अभय सिंह निर्भीक आस्था और उत्साह में भरकर राम नाम की जयकार करता था… कहीं कोई टोली कीर्तन करती बढ़ रही थी, तो कहीं किसी कोई राम दर्शन के लिए आँखों को अश्रु स्नान करा रहा था।
उत्सुकता और भक्ति के यह तमाम दृश्य जिस एक सूत्र में पिरोए जा रहे थे, उस सूत्र का नाम है – ‘प्रेम’। मैंने महसूस किया कि मेरे भीतर राम के प्रति जो आस्था थी वह प्रेम में रूपांतरित हो रही थी।
हम सब कवि सबसे बाईं लाइन में चल रहे थे। मुख्य गर्भगृह में सभी दर्शनार्थी तीन पंक्तियों में बँट गए थे। और ये तीनों पंक्तियाँ राम तक पहुँचती थी। मध्य पंक्ति में लगे लोग सबसे अधिक सौभाग्यशाली रहे। किंतु हमारे और राम जी के बीच एक स्तम्भ आ रहा था। बेचैनी बढ़ती जाती थी। मन करता था कि दृष्टि किसी तरह स्तम्भ के पार हो जाए। मध्य पंक्ति वाले भाव विभोर थे और मैं विकल हुआ जाता था। अचानक मेरे पैरों ने स्तम्भ के प्रभाव क्षेत्र को लांघकर मुझे राम के सम्मुख ला खड़ा किया। एक पल को धड़कन थम सी गई… ऐसा लगा राम के रूप को स्पर्श करके पलकें पत्थर हो गई थीं। क्या मज़ाल जो एक बार भी झपक जाएं! मूर्ति काफ़ी दूरी पर थी लेकिन मन ने दृष्टि के विमान पर बैठकर क्षणांश में यह दूरी तय कर ली। लगभग 4-5 सेकेंड के लिए मैंने बैकुण्ठ का अनुभव किया और फिर आँसुओं से आचमन करके दृष्टि लोक की ओर मुड़ गई। पलटकर देखने का मन हुआ, किन्तु देख न सका। सुनील व्यास फफककर रोते हुए दिखे। विनीत जी निःशब्द थे। पूनम वर्मा जी के पति मुकेश जी के चेहरे पर आनंद घुल गया था। निकुंज अपने मौन के साज पर कुछ गुन रहा था। अभय के चेहरे पर यह संतोष था कि उसने अपने सभी अतिथियों को अच्छे से दर्शन करवा दिए।
मन की तन्द्रा टूटी तो याद आया कि पांव काफी दुखने लगे थे। किंतु धमनियों में भक्ति और प्रेम प्रवाहित था, सो देह का कष्ट चेहरे तक न आ सका।
मन वहीं स्तम्भ की टेक लगाकर खड़ा रह गया और हमारे शरीर टैंट सिटी के बिस्तरों पर आकर पसर गए। सुबह उठे तो मौसम बदला हुआ था। सूरज की तीखी किरणों पर बादलों की चादर बिछ गई थी। हम नहा-धोकर नाश्ते के लिए चले तो आकाश ने बूंदों के हाथों से हमें छू लिया। हम नाश्ता करके गुप्तहार घाट की ओर रवाना हुए। मौसम ने तीर्थयात्रा को पर्यटन बना दिया था। हमारे होस्ट आशुतोष जी भी हमारे साथ थे। गुप्तहार घाट पर हमने ख़ूब फोटोग्राफी की। सरिता शर्मा जी ने बेर के पेड़ से बेर तोड़कर खाया; भुट्टे, चाय… अहा! आनंद ही आनंद हो रहा था। आशुतोष जी ने एक चायवाले की दुकान में घुसकर अपने हाथ से चाय बनाई। भीगा हुआ मौसम, नदी का किनारा और चाय-पकौड़े… स्वर्ग शायद इसी को कहते हैं।
एक बजते-बजते हम अपने ठिकाने पर लौट आए थे। दोपहर तीन बजे से कवि-सम्मेलन था। सुबह की बारिश की फुहार अब तक झमाझम बन चुकी थी। घनघोर बरसात के कारण सुरक्षा की दृष्टि से टैंट सिटी की लाइट काट दी गई थी। बिना रौशनी के जैसे-तैसे सब कवि सम्मेलन के लिए तैयार हुए। छप-छप पानी और कीचड़ से अपने कपड़े बचाते हुए हम कार्यक्रम स्थल तक पहुँचे।
कार्यक्रम स्थल पर मुख्य श्रोता स्वरूप राम दरबार का चित्र था। मंच पर विनीत चौहान, डॉ सरिता शर्मा, संजय झाला, पूनम वर्मा, शंभू शिखर, सुनील व्यास, मनीषा शुक्ला, निकुंज शर्मा, सुशांत शर्मा और मुझे मिलाकर कुल दस कवि थे। ऐसा लगता था मानो स्वयं राम जी को कविता सुनाई जा रही हो। सुबह से बरस रहा आकाश अब थम चुका था… बादलों की दीवार को पार करके सूरज की किरणें धरती को दुलार रही थीं। सभी कवियों ने राम शब्द के इर्द-गिर्द काव्यपाठ किया। सबको मन से सुना गया।
कार्यक्रम के बाद सबने भोजन किया और यह तय हुआ कि जो कवि कल दर्शन में उपस्थित नहीं थे, वे आज दर्शन करने जाएंगे। शंभू शिखर, डॉ सरिता शर्मा, संजय झाला, मनीषा शुक्ला और सुशांत शर्मा का कार्यक्रम बनने लगा। मैं और सुनील व्यास दोबारा दर्शन के लालच में इनके साथ हो लिए।
शंभू ने किसी को फोन करके विशेष व्यवस्था करवा ली। इसके कारण आज हमें बहुत पैदल नहीं चलना पड़ा। हम सीधे मुख्य मंदिर के निकट गाड़ी से उतरे और पीछे के रास्ते से रामलला के सम्मुख उपस्थित हो गए। लगभग दस-पंद्रह मिनिट तक बेरोकटोक राम जी को निहारा। न जाने क्यों, आँखें झरना बन गई थीं। ऐसा लगता था किसी ने दृष्टि को बांध लिया था। देह का रोम-रोम आँख बनकर इस अलौकिक रूप को निहारता था। अनवरत देखने पर ऐसा लगता था ज्यों कोई सलोना बालक खिलखिलाकर हँसता हो। मैंने सपत्नीक दर्शन किए। जी हटता ही नहीं था। श्याम पाहन पर राम के अस्तित्व की भंगिमा से विग्रह पर दमकते आभूषण मात खा रहे थे। तिलक पर सजे रत्नों की किरणें सलोने मुखमण्डल को सूर्य बना रही थीं। राजीव लोचन के नयन इतने जीवंत थे कि दृष्टि स्तंभित हो गई थी। दस-पंद्रह मिनिट तक इस रूप को आद्योपांत निहारता रहा। श्याम विग्रह के ठीक नीचे विराजित रामलला का स्वर्णिम स्वरूप भी पलकों में भरकर हम मंदिर से बाहर आ गए।
मैं चमत्कारों में विश्वास नहीं करता हूँ किन्तु सम्मोहन की अनुभूति मुझे दोनों बार हुई। मैं अंधविश्वासी नहीं हूँ किन्तु ऐसा विश्वास होता है कि उस मूर्ति में कुछ ऐसा है जो अन्यत्र कभी नहीं देखा। देर तक उन्हें निहारने के बाद भी मन मेरे साथ वापस न आ सका।
मंदिर से लौटकर हनुमानगढ़ी की ओर जाने लगे तो सीढ़ियों के बाहर खड़े पुलिसकर्मियों ने शंभू को पहचान लिया। दर्जनों लोग इकट्ठा हो गए। दर्जनों हाथ हवा में लहराकर उत्साह और उत्सव को रिकॉर्ड करने लगे। पुलिसकर्मियों ने भी कविताएं सुनाई। शंभू ने ख़ुद अपने कैमरे से सब रिकार्ड किया। कवियों ने भी चार-चार पंक्तियाँ इस अनियोजित कवि-सम्मेलन में सुनाई। हनुमानजी की सीढ़ियों पर राम जी की कविता हुई।
बरसात रात को फिर सक्रिय हो गई। टैंट पर बूंदों के संगीत के बीच बहुत मीठी नींद ली और सुबह नाश्ता करके हवाई अड्डे की ओर बढ़ आए। देह दिल्ली पहुँच गई है और मन अभी भी साकेत के एक तराशे हुए स्तम्भ से सटकर रामरूप को अपलक निहारे जा रहा है।
✍️ चिराग़ जैन

मूल प्रवृत्ति

सामान्यतया राम की मूर्ति धनुष से पहचानी जाती है, और राम का चरित्र मृदुता से! इसके ठीक विपरीत कृष्ण की मूर्ति बाँसुरी से पहचानी जाती है किन्तु कृष्ण का चरित्र एक योद्धा का चरित्र है। राम कंधे पर धनुष रखकर विनम्र जीवन जीते हैं और कृष्ण अधरों पर बाँसुरी रखकर राजनैतिक जीवन जीते हैं। दोनों के चित्र देखकर उनके चरित्र का आकलन नहीं किया जा सकता। दोनों को जानने के लिए उनके आचरण का अनुसरण करना होगा।
राम के व्यवहार में बाँसुरी की मोहिनी है और कृष्ण के आचरण में धनुष का सा निस्पृह कर्म। शिशुपाल वध की घटना में कृष्ण ठीक धनुष का आचरण करते प्रतीत होते हैं। वे प्रत्यंचा के टूटने की सीमा तक अपने क्रोध के बाण को पीछे खींचते हैं और फिर एक क्षण में वही बाण शिशुपाल की जीवन रेखा को दो टूक करता हुआ निकल जाता है। उधर कैकेयी और मंथरा के प्रति राम का व्यवहार बाँसुरी की मिठास से परिपूर्ण है। वे अपनी दसों उंगलियों से परिस्थिति को साधने का यत्न करते हैं और अंततः सम्बन्ध को सुरम्य बना लेते हैं।
राम और कृष्ण के मध्य का यह विलोम अन्य भी अनेक विषयों में उजागर होता है। रामकथा आस्था के पोषण पर केंद्रित है। रामकथा में प्रतीक्षा के समापन स्वरूप रामकृपा प्राप्त होती है। अहल्या की प्रतीक्षा का समापन राम के स्पर्श से हुआ। शबरी की प्रतीक्षा का समापन राम के दर्श से हुआ। सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत पर मूक होकर प्रतीक्षा करते रहे और राम ने बाली का वध करके सुग्रीव की प्रतीक्षा का सुखद अंत कर दिया। रामकथा की सीता भी अशोक वाटिका में राम के प्रति आस्था के बल पर प्रतीक्षारत रही। और रामकथा के भरत भी चौदह वर्ष तक राम के लौटने की प्रतीक्षा करते रहे। प्रतीक्षा के लिए आस्था आवश्यक है। और आस्था भी पूरी तरह निशंक होनी चाहिए। जहाँ आस्था को संशय ने छुआ वहीं धैर्य डोल जाएगा। फिर एक क्षण भी प्रतीक्षा करना सम्भव नहीं होगा। संशय की एक बूंद आस्था के महासागर को सुखा देती है। इसलिए रामकथा की प्रत्येक प्रतीक्षा अद्वितीय है।
लेकिन कृष्ण की कथा कर्म की महत्ता बताती है। इसलिए कृष्ण की कथा के जिस भी पात्र ने कृष्ण को पाया, उसे आस्था रखते हुए कर्मशील भी होना पड़ा। कृष्ण गोपियों तक चलकर नहीं जाते, वे तो वृंदावन में चैन की बंसी बजाते बैठते हैं; उनकी बंसी की तान पर गोपियों को वृंदावन तक जाना पड़ता है, तब रास घटित होता है। सुदामा की प्रतीक्षा, किसी साधना से कम नहीं थी। किन्तु कृष्ण को पाने के लिए उन्हें द्वारका के राजमहल तक जाने का उद्यम करना पड़ा।
कृष्ण चाहते तो अर्जुन की ओर से लड़ सकते थे किंतु वे युद्धक्षेत्र में होते हुए भी शस्त्र नहीं, लगाम थामते हैं। उनका सखा अर्जुन, कृष्ण के साथ होते हुए भी अपनी लड़ाई स्वयं लड़ता है। अपना कर्म स्वयं करता है। यह घटना इस बात की ओर इंगित है कि आस्था को कर्म का संबल मिले तो कृष्ण को पाया जा सकता है।
ये दोनों सनातन चरित्र पहले हमें आस्थावान बनना सिखाते हैं। और जब आस्था पुष्ट हो जाए तब कर्मशील होने का प्रावधान है। आस्था के अभाव में किया गया कर्म ईश्वर का साहचर्य नहीं दिला सकता।
रामकथा और कृष्णकथा में ऐसे बहुत विलोम दिखाई देते हैं। राम मित्रता के निर्वहन हेतु वनवासी सुग्रीव को उसकी किष्किंधा जीतकर देते हैं। राम लंका जीतकर शरणागत विभीषण को सौंप देते हैं। किंतु कृष्ण, पाण्डवों को वनवासी होने से रोकने का कोई यत्न नहीं करते। वे उनके इंद्रप्रस्थ के लिए कोई कूटनीति नहीं रचते। अपितु एक ऐसे युद्ध की सर्जना करते हैं कि इंद्रप्रस्थ पर दृष्टि गड़ानेवाले दुर्योधन से उसका हस्तिनापुर भी छीन लिया जाए। और यह कार्य कृष्ण करते नहीं, करवाते हैं।
इतनी विविधता के बाद भी एक बात दोनों ही चरित्रों से सीखने को मिलती है, और वो बात यह है कि यदि केवल चित्र देखकर किसी का आकलन किया जाए तो आप उसकी मूल प्रवृत्ति को नहीं समझ पाएंगे।

✍️ चिराग़ जैन

राम: भारतीय संस्कृति की आत्मा का एक नाम

राम… एक ऐसा नाम, जिसका उच्चारण जितने गहरे स्वर में किया जाए, मन उतना ही आराम पाने लगता है। राम… एक ऐसा नाम, जिसको पुकारने के लिए किसी विशेष मनोदशा की आवश्यकता नहीं पड़ती। जो हर परिस्थिति के अनुरूप लय धारण करने में सक्षम है। जिसका उच्चारण यकायक किसी साकार की छवि निर्मित न भी करे, तो भी किसी निराकार शक्ति से अनायास ही एकाकार कर देता है।
सम्बोधन से लेकर अभिवादन तक; चिंता से लेकर चिंतन तक; भेंट से लेकर विदा तक; जन्म से लेकर मृत्यु तक… हर गाम पर राम का नाम अपने पूरे अस्तित्व के साथ उपस्थित रहता है।
राम… एक शब्द के मन्त्र हो जाने का उदाहरण हैं। राम… एक मनुष्य के ईश्वर हो जाने की कथा है। राम… एक पुरुष के पुरुषोत्तम हो जाने का प्रमाण हैं। राम का चरित्र मर्यादा का एक ऐसा कथानक है, जिसकी किसी भी परिस्थिति में कल्पना करके उस परिस्थिति का सर्वाधिक मर्यादित समाधान खोजा जा सकता है। राम का चरित्र जय और पराजय से पूर्व मर्यादा की तुला से निर्मित होता है। यही कारण है कि मंथरा द्वारा बुने गए छल को राम अपनी मर्यादा के बल से ध्वस्त कर देते हैं।
लोभ और लोक की सामान्य दृष्टि से देखा जाए तो राम का आचरण अनापेक्षित है। संबंधों में संशय की सर्जना करनेवाली मंथरा यह कल्पना भी नहीं कर सकती कि कैकेयी द्वारा वरदान मांगे जाने पर राम इतनी सहजता से वनवासी हो जाएंगे। किन्तु वरबंधक दशरथ के सम्मुख खड़े राम ने उस समय जो आचरण किया, उससे एक ही क्षण में कैकेयी की जय, पराजित हो गई। यह मर्यादित आचरण का ही परिणाम था कि जिस पुत्र के मोह में माता कैकेयी ने साकेत का सुख भस्म कर दिया था; वही पुत्र, राम के मोह में माता कैकेयी और उनके उपलब्ध वरदानों को ठुकराकर राम को लौटा लाने चल दिये।
यह राम के आचरण की विजय थी। यह राम की मर्यादा की विजय थी। यदि राम दशरथ से अपने अधिकार के लिए लड़े होते, तो कदाचित ननिहाल से लौटे भरत का व्यवहार बदल सकता था। वे मंथरा के सुझावों तथा माता कैकेयी की हठधर्मिता को तर्कसंगत मान सकते थे। किंतु राम की मर्यादा ने इसकी संभावना ही समाप्त कर दी।
संशय की जड़ें काटने का कौशल हैं, राम। मर्यादा की सीमा में रहकर कल्पनातीत आचरण से राम हर अंसभव को संभव बना देते हैं। वे कहीं भी रूढ़ियों के दास नहीं बनते। उनकी नैतिकता, उनके आत्मविवेक द्वारा सर्जित नैतिकता है। वे कहीं भी रटी-रटाई नैतिकता का अनुसरण करते ¬प्रतीत नहीं होते। वे अपनी राह स्वयं बनाते हैं। वे अपनी नैतिकता स्वयं गढ़ते हैं। और उनकी रची नैतिकता इतनी सहज है कि वह हर काल में, हर युग में, हर वर्ग में स्वीकार्य हो जाती है। राम की नैतिकता युगातीत है।
यदि लोकप्रचलित परंपराओं के द्वार पर राम का विवेक घुटने टेक देता तो लोक के अनुसार पत्थर हो चुकी अहल्या, जीवित न हुई होती। यदि लोकप्रचलित परंपराओं के हाथों राम का आत्मविश्वास बिंध गया होता तो मिथिला के स्वयंवर-सदन में देवाधिदेव महादेव के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने का साहस राम कैसे जुटा पाते? वह भी तब जबकि तमाम महाबली इस प्रयास में विफल होकर लज्जा की टोकरी में मुँह छिपाए पड़े थे।
शिवधनुष की साधना, राम के निःशंक आत्मबल की धमक से संभव हो सकी। वे शिव के धनुष को तुच्छ समझकर उसे साधने का उपक्रम नहीं करते, अपितु पूर्ण विनय के साथ, शिवधनुष को प्रणाम करके उसे स्पर्श करते हैं। ऐसी विनम्रता के आगे भला कौन-सा शस्त्र नत न हो जाएगा!
यदि आवेश में उठाने गए होते, तो ऊर्जा का समस्त कोष तो आवेश प्रकट करने में ही नष्ट हो गया होता। फिर केवल बाहुबल से शिवचाप को हिलाना संभव न हुआ होता। राम आवेशातीत हैं। राम उद्वेग से अछूते हैं।
वे माँ जानकी का हरण करनेवाले रावण पर भी आवेश में आक्रमण नहीं कर देते। उन्माद जैसा तत्व तो राम के चरित्र के साथ मेल ही नहीं खाता। इसीलिए एकांत में किसी स्त्री का हरण करनेवाले पापी से भी राम यकायक युद्ध नहीं करते, अपितु बिना युद्ध के उसे यह अवसर प्रदान करते हैं कि अपने ‘पाप’ को ‘अपराध’ मात्र मानते हुए वह प्रायश्चित कर सके। रावण, जिसने राम की अर्द्धांगिनी का छल-बल से हरण कर लिया, उसके लिए भी मृत्यु के अतिरिक्त एक विकल्प उपस्थित करने वाले उदात्त नायक हैं राम।
राम इसलिए आदर्श नहीं हैं कि वे अवध छोड़कर वनवास जाते समय व्याकुल नहीं हुए। राम इसलिए भी आदर्श नहीं हैं कि सीताहरण के बाद उनमें रावण के ¬प्रति क्रोध नहीं, बल्कि जानकी के प्रति करुणा पनपी। राम इसलिए भी आदर्श नहीं हैं कि लक्ष्मण के मूर्च्छित हो जाने पर वे प्रतिशोध की अग्नि में जलने के स्थान पर धीरतापूर्वक लक्ष्मण के उपचार का उपाय खोजते हैं। वे तो इसलिए आदर्श हैं कि इन्द्रजीत की मृत्यु के उपरांत वे उसके अंतिम संस्कार तक युद्धविराम की घोषणा करते हैं। राम इसलिए आदर्श हैं कि रावण विजय के पश्चात भी वे माल्यवान और मंदोदरी का अपमान नहीं होने देते। राम इसलिए आदर्श हैं कि युद्ध में विजित होकर भी वे झपटकर माँ सीता से मिलने नहीं चल पड़ते।
राम इसलिए महान नहीं हैं कि उन्हें अपनी पराजय के समय धैर्य धरना आता है, अपितु वे इसलिए महान हैं कि वे अपनी विजय के समय भी धीरज धरना जानते हैं। वे युद्ध करते अवश्य हैं, किन्तु युद्ध से एकाकार नहीं होते। वे रावण सरीखे वीर योद्धा का वध करने के उपरांत भी उतने ही शांत रहते हैं, जितने अवध से प्रस्थान के समय थे। वे युद्धोन्मत्त उद्वेगी के समान रावण के शव के चारों ओर पाशविक नृत्य नहीं करते, बल्कि वे तो उस पराजित की विद्वत्ता का सम्मान करके उसका विधिपूर्वक अंतिम संस्कार कराने की व्यवस्था करते हैं।
राम और रावण में इसी उदात्तता का अंतर है। विपरीत परिस्थितियों में संयत रहनेवाला राम हो गया और अपेक्षा की उपेक्षा होने पर आपा खो देने वाला रावण बन गया। यही कारण है कि राम की हमारे अंतःकरण में जो छवि है, वह उदात्त नायक की छवि है। क्रोध कभी घटित भी हुआ तो इतना प्रक्षालित होकर घटित हुआ कि जिस पर राम क्रुद्ध हुए, वह स्वयं विनत हो गया। सागर का अहंकार राम की विनम्रता के आगे पानी-पानी हो गया। राम इतने विनम्र हैं कि जिस रावण से युद्ध करने जा रहे हैं, उसके दरबार में बैठे दरबारी ही राम की भलमनसाहत के हवाले से रावण को आत्मसमर्पण की सलाह देते हैं।
यह चमत्कार नैतिकता के आत्मबल के सिवाय अन्य किसी माध्यम से संभव नहीं है। राम की कीर्तिध्वजा उनकी नैतिकता के ध्वजदण्ड पर फहराती है। इसीलिए राम का भक्त भी विवेक और विनम्रता की इस मर्यादा का उल्लंघन नहीं कर पाता। पूँछ जलाने जैसे अपमान के बावजूद हनुमान इतने सविवेकी थे, कि उनके द्वारा भड़काई गई लपटों ने अशोक वाटिका की ओर प्रस्थान नहीं किया। आसन न दिये जाने के बावजूद अंगद ने रावण के दरबार में अपने दूतकार्य की सिद्धि के उपरांत कोई पराक्रम दिखाना आवश्यक न समझा।
इसीलिए रामभक्ति की प्रथम वरीयता है, विनम्रता। राम साधना का प्रथम सोपान है शांति। राम सिद्धि का प्रथम प्रमाण है उदात्तता। इसीलिए राम युद्ध का घोष नहीं, बल्कि अध्यात्म की लय बन जाते हैं। इसीलिए राम बोलने के बाद अधर बंद हो जाते हैं, मानो कह रहे हों कि अब कुछ और बोलना आवश्यक नहीं है।
‘पुनि-पुनि कहहिं-सुनहिं सब सन्ता’ -यह अर्द्धाली रामकथा के अजस्र सौन्दर्य का वर्णन करती है। रामकथा का यही वह गुण है, जिस पर कवि रीझते रहे हैं। कई बार लिखी जा चुकने के बावजूद इस कथा में हर बार कोई न कोई ऐसा नया आयाम मिल ही जाता है, जिसे लिखकर कवियों को सृजन-संतोष प्राप्त होता है।
यही कारण है कि रामायण की प्रवाहमयी कथा के बीच भी कवियों ने अनेक बिन्दु ऐसे ढूंढ ही लिये जिन पर मूलकथा को अक्षुण्ण रखते हुए नये सिरे से लिखा जा सकता था। ऐसे ही सार्थक प्रयासों ने विश्व को ‘राम की शक्तिपूजा’ तथा ‘साकेत’ जैसी अद्वितीय रचनाएँ प्रदान कीं। रामकथा की एक-एक घटना पर अलग-अलग दृष्टिकोण से गीत, मुक्तक, दोहे तथा छन्दमुक्त कविताएँ अनवरत लिखी जाती रही हैं।
हाँ, पिछले कुछ दशकों में राजनैतिक लहर के कारण राम के चरित्र तथा राम की कथा से विलग होकर राम को एक नारे के रूप में प्रयोग करके भी कुछ साहित्य रचा गया है। यह भी सत्य है कि राम की कविता के नाम पर जब उन नारों को परोसा जाता है तो वे एक बार रामकथाधारित काव्य होने का भ्रम भी उत्पन्न कर देते हैं, किन्तु न तो उन रचनाओं की आयु रामकथा की भाँति अनन्त होती है, न ही उनकी उपादेयता सार्वभौमिक होती है। वे किसी राजनैतिक आन्दोलन की भाँति उगती हैं और राजनैतिक परिवेश बदलते ही विस्मृत हो जाती हैं।
इसी स्थिति के स्पष्टीकरणार्थ कविग्राम ने यह अंक उन रचनाओं को समर्पित किया है, जिनमें रामकथा के किसी पात्र, किसी बिम्ब अथवा किसी घटनाक्रम को आधार बनाया गया है।
राम के अप्रतिम व्यक्तित्व पर लिखी गयी कविताएँ बाबा तुलसी की साधना का ही विस्तार मात्र है। राम भारतीय संस्कृति के वह केन्द्र है, जिस पर प्रकार की नोक टिकाकर जो भी वृत्त बनाया जाएगा, वह भारतीयता के परिधिमण्डल से कदापि बाहर नहीं जा सकेगा। इस वृत्त का क्षेत्रफल ज्यों-ज्यों बढ़ता जाएगा, त्यों-त्यों कथा के क्षुद्र पात्रों का आकार भी बढ़ता जाएगा।
मंथरा, सुलोचना, शबरी और केवट ही क्या सुषेण और आर्यसुमंत सरीखे पात्र भी विस्तार के साथ-साथ अधिक महत्त्वपूर्ण होते जाते हैं। जिन शत्रुघ्न को रामकथा में अधिक संवाद नहीं मिल सके हैं, उन शत्रुघ्न को भी यदि नये सिरे से किसी खण्डकाव्य, महाकाव्य अथवा गीत का नायक बनाकर सोचा जाए तो यह मौन पात्र भी अनवरत बोल सकता है। और जब कोई पात्र बोलता है तो वह कुछ भी बोल सकता है। वह मूलकथा के महानायक की भक्ति भी कर सकता है और उससे प्रश्न भी कर सकता है। नायक बनने के लिए किसी भी पात्र को दोनों ही तरफ़ अपना विस्तार करना होगा। यदि वह केवल भक्ति में संलग्न हो जाएगा तो भी उसका नायकत्व अधूरा रहेगा और यदि वह केवल आलोचना में रत हो जाएगा तो भी उसका व्यक्तित्व नायक बनने से चूक जाएगा।
साकेत की उर्मिला केवल करुणा की पात्र भर न होकर, स्त्री के धैर्य तथा सहिष्णुता की जीवन्त मूर्ति भी है। और उर्मिला की सहिष्णुता को शब्दों में अवतरित करने के लिए आवश्यक है कि मूलकथा के उन अंशों को रेखांकित किया जाए, जिसमें कुछ ‘सहन करने जैसा’ स्पष्ट हो सके। और जिसे सहन करना पड़े वह स्थिति कम से कम सुखद तो नहीं कही जा सकती। अब यदि कोई यह आरोप लेकर बैठ जावे कि साकेत में रघुकुल में घटित घटनाक्रम की आलोचना की गयी है… तो यह कवि के साथ बेईमानी होगी। यह सृजन की संभावनाओं पर कुठाराघात होगा।
जिसने रामकथा को अपनी लेखनी का आधार बनाया है, उसकी राम में आस्था कम से कम उनसे तो अधिक होगी, जो राम का उपयोग केवल किसी लौकिक प्रयोजन हेतु करने में रत हैं।
✍️ चिराग़ जैन

सृजन की एक समर्थ साधिका: डॉ. कीर्ति काले

कवि होने की न्यूनतम अर्हताओं में एक अदद मन की आवश्यकता होती है। और मन भी साधारण नहीं; बल्कि ऐसा मन, जिसका करुणा-कोष अक्षय हो। जिसकी कल्पना का आकाश दिखाई तो सबको दे, लेकिन उस तक पहुँचना सहज संभव न हो। जिसकी दृष्टि विहंगम हो। जिसकी आकांक्षाओं में समस्त सृष्टि के लिए शुभ की कामना हो। जिसकी उत्कंठाओं में हर किसी के लिए स्वप्नपूर्ति का अवकाश हो। जो सपनीला हो… जो संगीतमयी हो…!
वैभव की तेज़ रौशनी कब किसी अश्रु में से गुज़रकर इंद्रधनुषी हो उठी है, यह जिसकी आँखों को अनायास दिखाई दे जाए, वह कवि है। कविता के किसी भी रस को साध लेने के लिए इन गुणों की साधना आवश्यक है। डॉ. कीर्ति काले की रचनाओं का मुख्य रस शृंगार है, इसलिए उनका रचनाकार, संवेदना के इस महीन अस्तित्व के प्रति अधिक उत्तरदायी है। वियोग शृंगार के लिए तो फिर भी करुणा की वीथियाँ उपलब्ध हो जाती हैं, किंतु सयोग शृंगार के लिए तो प्रेम के उद्वेग में अनदेखे रह जानेवाले पलों को लपकने का कौशल अपेक्षित है।
इसके लिए प्रेम को भरपूर जीना होता है। इसके लिए प्राप्ति के आनन्द को परत-दर-परत निहारना होता है। इसके लिए फूल की एक-एक पाँखुरी का, एक-एक पर्ण का निकट से अन्वेषण करना होता है। प्रेम की कविताएँ लिखने के लिए कवि को प्रेमियों का मनोविज्ञान भोगना होता है। और रचनाकार एक बार इस मनोविज्ञान को छू ले, तो फिर उसकी रचनाओं में उत्सव की जो खनक उतरती है, वह श्रोता के मन को सम्मोहित करने में सक्षम हो पाती है।
डॉ. कीर्ति काले के काव्यपाठ में मैंने दर्जनों बार यह खनक सुनी है। उनके बिम्ब और प्रतीक इस बात की गवाही देते हैं कि उनकी रचनाएँ पुरानी परंपरागत रचनाओं के प्रभाव से उत्पन्न प्रतिबिम्ब मात्र न होकर, बाक़ायदा सर्वहितकारी साहित्य में गणित होने योग्य हैं। मुझे आज भी याद है, वर्ष 2002 में दिल्ली के एक कवि-सम्मेलन में जब पहली बार डॉ. कीर्ति काले को सुना था, तो उनका पहला ही कवित्त ‘नीम की निंबोरी’ से प्रारंभ हुआ। इस बिम्ब से किसी अल्हड़ किशोरी की मनोदशा का चित्रण हो सकता है, यह मेरे लिए सुखद आश्चर्य का विषय था। निंबोरी जैसा सामान्य फल, जो धरती पर पददलित होकर उपेक्षित रहने को अभिशप्त था, उसे कविता में सजाकर सौंदर्य का उपमान बना देना कवयित्री का ऐसा कौशल था, जिसने मुझे उन्हें ध्यान से सुनने के लिए प्रेरित किया।
इसके बाद जब-जब भी इस सृजनात्मक हृदय की कविताओं का उपभोग किया तब-तब आश्वस्त हुआ कि मैंने इन्हें पढ़ने-सुनने के लिए समय की जो कीमत चुकाई है, वह कम ही है। मेरे भीतर के रचनाकार को डॉ. कीर्ति काले की लेखनी से सात्विक ऊर्जा प्राप्त हुई है। उनके कितने ही गीत ऐसे हैं, जिन्होंने मेरे एकाकी मौन के वातायन में गुनगुनाहट भरी है।
‘याद फिर बुनने लगी है मखमली स्वेटर’ -इस गीत ने रह-रहकर मेरे मन की रोमावली पर गुनगुनी धूप का लेप किया है। कविता जितनी बारीक़ होगी, उतना ही अधिक रस उलीचेगी। इस गीत में न केवल स्वेटर बुनने की याद बुनी गई है, बल्कि एक-एक फंदे और एक-एक सिलाई की बुनावट में उंडला प्रेम भी शब्दाकार हो गया है। ‘धीरे-धीरे घट रहे हैं रात के फन्दे, पोरुओं ने छू लिए दिनमान के कंधे…’ अहा! कविता का कल्पनालोक चाहे, तो स्वेटर के फंदों से पूरी प्रकृति का आलिंगन कर सकता है। यही तो कवि की शक्ति है। इसीलिए तो कवि को ब्रह्मा कहा गया है।
ज्यों-ज्यों आप कीर्ति जी को और पढ़ोगे, त्यों-त्यों आपको इस बात पर और विश्वास होता जाएगा कि वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान। ‘दूर तक दृष्टि जाकर सिहर-सी गई, देखते-देखते दृश्य ओझल हुआ’ -गीत की यह पंक्ति रचनाकार के भीतर के उस दृष्टा का अवधान प्रदर्शित करती है, जो अपनी ही दृष्टि को देखने के लिए भी अपने साक्षीभाव को सचेत रखता है। शोक के जिस पल में आँखों की पुतलियाँ अश्रु अतिरेक के कारण कुछ नहीं देख पातीं, ऐसे में उन अश्रुओं के उस पार दूर तक दृष्टि ले जाना बड़ा जीवट का काम है और उससे भी कठिन है इस पार आँसुओं से जूझती पुतलियों के संघर्ष की गवाही देना। किसी नाटक के बीच ही जब यवनिका पतन हो जाए, तो ऐसे में उस दुर्घटना से भी नाटक का एक दृश्य बुन लेना किसी विलक्षण प्रतिभा के बूते ही संभव हो सकता है। कीर्ति जी ने इस गीत में ऐसे ही असंभव को संभव कर दिखाया है।
उनका एक गीत और है- ‘जब भी मन की माला फेरी, मर्यादा ने आँख तरेरी’। इस गीत की इन दो पंक्तियों में एक पूरे उपन्यास का कथानक समाहित हो गया है। सृजन के लिए मन और मर्यादा के मध्य जो संघर्ष होता है, वह पूरा संघर्ष अनायास ही इन दो पंक्तियों में उतर आया है। ऐसी पंक्तियाँ रचने के लिए किसी कवि को ज्ञान की नहीं अपितु किसी अदृश्य शक्ति के आशीर्वाद की आवश्यकता होती है। मर्यादा की सीमा से बाहर जाकर जिन्होंने मन की माला फेरी है, उन सब पुरखों का वर्णन कीर्ति जी ने इस गीत में पूरे दम-ख़म के साथ किया है। इस गीत में एक जगह कीर्ति जी लिखती हैं- ‘ईश्वर की आँखों से छलके होंगे सूरज-चंदा-तारे।’ यह पंक्ति विज्ञान की तमाम पोथियों को चुनौती देती है। लेकिन यह चुनौती इतनी ख़ूबसूरत है कि एक बार तो स्वयं विज्ञान भी ठिठककर इस पंक्ति को सच मान बैठता है। यह कविता का सम्मोहन है।
डॉ. कीर्ति काले के सृजनलोक में ऐसे सम्मोहन की अनेक वेदियाँ विद्यमान हैं। उनकी लेखनी से निःसृत सहज रचनाओं में एक ऐसा चुम्बकीय गुण है जो रसिकों को सहज ही अपने पाश में जकड़ लेता है।
हिन्दी कवि-सम्मेलन जगत् में तीन दशक से अधिक लम्बी यात्रा के बाद भी कीर्ति जी के स्वर की खनक और गीतों का प्रभाव कम नहीं हुआ है। इसका कारण यही है कि कवि-सम्मेलन के भीड़ भरे मेले में विचरते हुए भी वे अक्सर अपने रचनाकार का आश्रम सजाने के लिए मन का एकान्त खोजने में समर्थ हैं। सृजन के पारलौकिक शक्तिसूत्रों से यही अपेक्षा है कि वह डॉ कीर्ति काले जैसे रचनाकारों को उनके हिस्से का इतना एकन्त सदैव उपलब्ध कराएँ कि वे सरस्वती के इस असीम आकाश में अनवरत कुछ सितारे टाँकती रह सकें।

✍️ चिराग़ जैन

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