इत्र
इत्र है हँसी
महक उठता है वो
जिस पर छिड़का जाए
लेकिन
जो छिड़कता है
वो तो
चमक ही उठता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
इत्र है हँसी
महक उठता है वो
जिस पर छिड़का जाए
लेकिन
जो छिड़कता है
वो तो
चमक ही उठता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
सरकारी नौकरी में
मिलने वाले
नियत वेतन की तरह
मिलता है
रिश्तों में दर्द।
और वार्षिक बोनस की तरह
मिल जाती है
ख़ुशी भी
यदा-कदा।
लेकिन
काॅन्ट्रेक्ट बेस जाॅब
होते हैं रिश्ते।
बहुत कुछ
सहन करना पड़ता है
इनमें!
…और
कब तक चलेंगे
कुछ कह नहीं सकते।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
उफ़
ये मुई
सपनों की रोशनी
पलकें बंद हैं
पर
चमक उठा है
चेहरा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
तुम
हर बार तलाश लेती हो
कोई नई वजह
नकारने की।
…और मैं
हर बार
बिना वजह
स्वीकार लेता हूँ
मन ही मन।
हर बार बदल जाता है
तुम्हारा बहाना
…और मैं
हर बार
बिना वजह
कर बैठता हूँ
गुज़ारिश।
मैं हर बार रहता हूँ
वैसा का वैसा
क्योंकि मैंने
कभी तलाशी ही नहीं
कोई वजह
तुम्हें चाहने के लिए।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
वक़्त बीमार है
Short term memory loss का पुराना मरीज़।
कुछ याद ही नहीं रह पाता इसको
लिख-लिख कर
मुश्क़िल से याद रख पाता है
बड़ी से बड़ी बात
मैंने अक्सर देखा है वक़्त को
अपनी ही लिखी पर्चियों के बीच
उलझे हुए
इतिहास की किताबों में
किसी क़िरदार की
सबसे सही पहचान तलाशते हुए
सुना है
वक़्त को धोखा देने के लिये
किसी ने जला डाली थीं
कुछ पर्चियाँ
…तब से
बौराया-सा फिर रहा है बेचारा!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
मैंने देखा-
मूसलाधार बारिश में
भीग रही थी
ईश्वर की मूर्ति
मैंने सोचा-
थपेड़े भी सहती होगी
गर्म लू के
इसी तरह।
मैंने महसूस किया-
सर्दी-गर्मी-बरसात
नंगे बदन
कैसे खड़ा रहता है परमात्मा।
…और तब मैंने चाहा-
काश, कोई इसकी भी सुध ले!
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