Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
सबने भर भर के अपनी पिचकारी, विरोधियों पे मारी
होली का चढ़ा रंग भाइयो!
कहीं लाठी बजी है कहीं गारी, कहीं कुर्सी की खुमारी
सभी का न्यारा ढंग भाइयो!
बच्चन जी ने खूब कहा था मेल कराती मधुशाला
पर सत्ता का कैसा-कैसा खेल कराती मधुशाला
शिक्षामंत्री जैसों को भी फेल कराती मधुशाला
अब जाकर ये ज्ञान हुआ है, जेल कराती मधुशाला
सीबीआई ने आरती उतारी, ईमान के पुजारी
हुए हैं कैसे तंग भाइयों
नई ख़बर चल पड़ी देश में, बात पुरानी भूल गए
उनका अन्ना याद रहा अपना अडवानी भूल गए
इनकी करतूतों में अपनी कारस्तानी भूल गए
मधुशाला का शोर मचा तो लोग अडानी भूल गए
उनकी झाड़ू की तीलियां बेचारी, कमल ने बुहारी
दिल्ली में छिड़ी जंग भाइयो!
मोदी पर आरोप लगाए सीधे-सीधे राहुल ने
संसद तक में घोटालों के पढ़े कसीदे राहुल ने
जिसे छुआ उसके ही तीनों लोक पलीदे राहुल ने
कहीं अडानी के शेयर तो नहीं खरीदे राहुल ने
किसने पंजे की ले ली सुपारी, न नकदी, न उधारी
दुबला हुआ ये अंग भाइयो!
ऐसा रंग खिला है सारे बने फिर रहे बंदर हैं
कोई डर कर बाहर भागे, कोई डरकर अंदर है
सबकी चाबी भरकर बैठा देखे खेल कलंदर है
जनता को बस इतना बोला, महँगा हुआ सिलेंडर है
सुन के जनता की छूटी सिसकारी, पर बोली न बेचारी
ठंडी हुई उमंग भाइयो!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Hasya Kavita, Lapete Mein Netaji, Poetry
डेमोक्रेसी को बचा लो तुमको कुर्सी की कसम
इसकी टूटी नाव संभालो तुमको कुर्सी की कसम
जो अपने खेमे में है उसकी फाइल दबवा दो
जो विरोध करता हो उसकी कचहरी लगवा दो
इस आदत पर मिट्टी डालो तुमको कुर्सी की कसम
रामदेव के आंदोलन पर लाठीचार्ज कराया
अब पसली टूटी तो नैतिकता का पाठ पढ़ाया
भैया कुछ तो ठीक लगा लो तुमको कुर्सी की कसम
हरखू की रोटी का मुद्दा फिर फिर टल जाता है
ख़बरों में बाबाजी का बुलडोजर चल जाता है
रोटी के भी प्रश्न उठा लो तुमको कुर्सी की कसम
हम चुनाव पर आँख गड़ाकर बैठे घात लगाए
भूख, ग़रीबी, शिक्षा इनका जो हो वो हो जाए
अब ये साफ़-साफ़ कह डालो तुमको कुर्सी की कसम
नफ़रत, गाली, झूठ, सियासी दांव-पेंच और दंगा
इनका भगवा उनका हरिया, घायल हुआ तिरंगा
इन घावों पर लेप लगा लो तुमको कुर्सी की कसम
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो
ऐसे प्रश्नों की झड़ियां लगा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
है नाक में नकेल भाइयो
समन भेज कर पलट दिया है खेल समूचा ईडी ने
बिन बल्ले के शॉट लगाया कितना ऊँचा ईडी ने
ग्यारह घण्टे तक बैठाकर की है पूजा ईडी ने
जिनको कोई नहीं पूछता उनको पूछा ईडी ने
इनको कुर्सी की ताक़त दिखा दी, ये चकरी सी घुमा दी
बनी हुई है रेल भाइयो
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो
तुम नाराज़ हुए सिस्टम का यूज पर्सनल करने पर
ईडी-सीबीआई सबके अपने पीछे पड़ने पर
उनको ज्ञान सुनाते हो तुम यूँ मनमानी करने पर
तुमने भी तो बैठाए हैं दो-दो सीएम धरने पर
गहलोत जी की ड्यूटी लगा दी, चटाई सी बिछा दी
धरने पर हैं बघेल भाइयो
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो
कांग्रेस को खूब पता है कैसे क्या क्या होता है
किस दफ्तर से हुआ इशारा, किस दफ्तर का न्योता है
कौन भला किसके कहने पर किसके कपड़े धोता है
इनसे ज़्यादा किसे खबर है कौन कहाँ का तोता है
बीजेपी ने तुम्हारी मुनादी, तुम्हीं को सुना दी
पहचानो ये गुलेल भाइयो
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो
जिसके हाथ रहेगी सत्ता वो ही रंग दिखाएगा
जो विपक्ष में है वो नैतिकता की बात बनाएगा
ऑर्डिनेंस फाड़ा था तुमने तुमको याद न आएगा
कोई लाठी, कोई अपना बुलडोजर ले आएगा
सबने सिस्टम की धज्जी उड़ा दी, इमारत गिरा दी
ये ही है रेलम पेल भाइयो
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
धुन: डोली में बिठाइके कहार…
अभी तो लगाई फटकार
जल्दी ही लेना पुचकार
जड़ दिया मुँह पर प्रवक्ता के ताला
नूपुर हुए हैं ख़ामोश
जो हमसे अब अपना दामन बचाय रहे
उनने ही भरा था ये जोश
लुट गया अचानक
लुट गया न जाने कैसे
लुट गया साहिब का प्यार
अभी तो लगाई फटकार
जो भी विरोधी मिला
उसको ही हमने जी भर के कर दिया ट्रोल
कल तक तो साहब को
खूब सुहाते थे अपने ये नफरत के बोल
अब काहे हो रामा
अब काहे ओ स्वामी मोहे
अब काहे रहे दुत्कार
अभी तो लगाई फटकार
फुनवा मिलाय दिया कोई बिदेसिया
मालिक के भर दीन्हे कान
हमको किनारे करके साहिब बचाय लीन्हा
अपनी छबि का नुक़सान
मुख मोड़ा, क्यों ऐसे
मुख मोड़ा क्यों ऐसे भला
मुख मोड़ा परवरदिगार
अभी तो लगाई फटकार
ट्विटर पे ऐसी-ऐसी गरिया सुनाई
किया नहीं किसी का लिहाज
अपनी प्रोफाइल पर लिख नहीं पा रहे
हम एक अक्षर भी आज
छिन गया हमारा
छिन गया सारा रोज़गार
अभी तो लगाई फटकार
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Lapete Mein Netaji, Poetry
कुर्सी का घमासान इधर भी है, उधर भी
दो लोगों का गुणगान इधर भी है, उधर भी
जो डेडिकेट है वो सिर्फ झंडे उठाए
दल बदलुओं का मान, इधर भी है उधर भी
जो हाँ में हाँ मिलाए, वही पद पे रहेगा
सच कहने में नुक़सान इधर भी है, उधर भी
किस्मत न बदल पाओ तो क्यों दल बदल रहे
सिद्धू तो परेशान इधर भी है उधर भी
मुफ्ती, पंवार, ठाकरे, अखिलेश या जयंत
पंजे के संग कमान इधर भी है, उधर भी
शाहों की ख्वाहिशों पे ही प्यादे निसार हों
ये खेल का विधान, इधर भी है उधर भी
जिसकी भी घुड़चढ़ी हो वहीं नाच रहे हैं
दो-चार पासवान इधर भी हैं, उधर भी
मैं जिनके साथ हूँ वही ईमानदार हैं
सिब्बल का ये बयान इधर भी है, उधर भी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji
चाहे झूठ बोल के, चाहे भेद खोल के
लेते आना, टिकट लेते आना
तुम साइकिल पर पर चढ़ जाना
इक टोपी लाल लगाना
थोड़ा डण्ड पेल के
थोड़ा दण्ड़ झेल के
लेते आना
टिकट लेते आना
तुम कमल का फूल खिलाना
पूरे भगवा रंग जाना
जय श्री राम बोल के
जट श्री श्याम बोल के
लेते आना
टिकट लेते आना
तुम बिन मतलब ही लड़ना
पंजे की उंगली पकड़ना
बिंदी साथ लेके
चूड़ी हाथ ले के
लेते आना
टिकट लेते आना
जनता की बात न करना
असली मुद्दों से बचना
कभी जेब फाड़ के
कभी झोला झाड़ के
लेते आना
टिकट लेते आना
✍️ चिराग़ जैन