Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
वह दिन दूर नहीं जब हर टोल प्लाज़ा पर लिखा होगा कि अगला टोल प्लाज़ा 500 मीटर आगे है।
2017 में भारत सरकार ने सभी वाहनों के लिए टोल टैक्स भुगतान करने के लिए ‘फास्ट टैग’ आवश्यक कर दिया था। इसके समर्थन में यह तर्क दिया गया था कि इससे टोल प्लाज़ा पर लगने वाली लम्बी कतारों से मुक्ति मिलेगी। (यद्यपि तब भी यह नियम था कि यदि टोल प्लाज़ा पर एक निश्चित दूरी से अधिक लम्बी लाइन लग जाए तो सभी वाहनों को बिना टोल वसूले जाने दिया जाएगा।)
यदि किसी ने फास्ट टैग न लगवाया तो टोल प्लाज़ा से गुज़रते समय उससे दोगुने पैसे वसूले जाएंगे। अब जनता विवश होकर निजी कंपनियों के पास फास्ट टैग ख़रीदने पहुँची। कंपनियों ने सिक्योरिटी मनी के रूप में 150-200 रुपये प्रत्येक वाहन धारक से धरवा लिए। रीचार्ज के लिए जमा करवाने वाली रक़म करोड़ों रुपये का आँकड़ा पार कर गयी।
अब हर वाहन पर फास्ट टैग लग गए और वाहन चालक यह समझने लगे कि टोल प्लाज़ा पर जाम लगना बंद हो जाएगा। कुछ जगह हुआ भी लेकिन अधिकतर टोल प्लाज़ा पर फास्ट टैग की मशीनें काम नहीं करतीं। वहाँ खिड़की पर बैठा वसूलीकर्ता आपको गाड़ी आगे-पीछे करवाता रहता है। फिर भी मशीन स्कैन न कर सके तो आपको कह दिया जाता है कि आपके फ़ास्ट टैग में बैलेंस नहीं है। आप आश्चर्यचकित होकर मोबाइल निकालते हैं। फिर उसमें फास्ट टैग की एप्प खोलकर उसे बैलेंस दिखाते हैं। वह अपने भावनाशून्य चेहरे को दूसरी ओर घुमाकर एक अजीब से स्वर में चिल्लाता है। उस स्वर को सुनकर कुछ मिनिट बाद एक प्राणी अपने हाथ में एक छोटा-सा स्कैनर लेकर आता है। आपके फास्ट टैग को स्कैन करता है और तब आप टोल से निकल पाते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में यदि आप थोड़े भी चिड़चिड़ाते हैं तो तुरंत आपकी गाड़ी के चारों ओर छह-सात पहलवान प्रकट हो जाएंगे और आपको प्रकान्तर से समझा देंगे कि हमसे पैसे वसूलने के लिए इन्होंने सरकार को पैसे दिए हैं, इसलिए इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
रोज़-रोज़ की इस ज़्यादती से परेशान होकर आप थाने जाने का विचार करते हैं और एक दिन थाने चले जाते हैं। थानेवाले आपको पहले प्यार से और फिर डाँटकर चलता कर देते हैं। आप थाने के बाहर खड़े होकर समझ जाते हैं कि पुलिसवालों के हाथों बेइज़्ज़त होने की अपेक्षा ठेकेदार के गुंडों के हाथों लुटना बेहतर है।
अब टोल प्लाज़ा पर कितनी भी लाइन लगे, आप चुपचाप खड़े रहते हैं। इस जिल्लत से गुज़रते हुए आपको यह ध्यान ही नहीं रहता कि कब आपके टोल टैक्स में 20-25 प्रतिशत की वृद्धि कर दी गयी है। इस वृद्धि का विरोध नहीं किया जा रहा, इससे ठेकेदार ख़ुश है। ठेकेदार जनता से वसूलकर मोटा पैसा सरकार को दे रहा है, इससे सरकार ख़ुश है। (क्योंकि सरकार का काम बिज़निस करना नहीं है) और जनता… वह यह सोचकर ख़ुश है कि पहले से बनी हुई सड़क पर जो नया टोल प्लाज़ा बन रहा है, उस पर अभी टोल शुरू नहीं हुआ है।
✍️ चिराग़ जैन
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पिछले कुछ वर्ष में भारतीय संस्कृति के विरुद्ध एक ऐसा डिजिटल षड्यंत्र प्रारम्भ हुआ है, जिसके शिकंजे में हमारे हज़ारों युवा फँसते जा रहे हैं। भारतीय संस्कृति अपनी आर्य परम्परा, सहिष्णुता, सौहार्द तथा वात्सल्य के दम पर पूरी दुनिया में शीर्ष पर रही।
इन मूल्यों के कारण ही यूनान, मिस्र, रोमा सब मिट गये जहाँ से लेकिन हमारी संस्कृति का बाल बांका न कर सके। मुग़लों ने भारत पर इतने लंबे समय शासन किया लेकिन सनातन परंपरा की गहरी जड़ों को हिला न सके। अंग्रेजों ने भौतिकवाद के तमाम अस्त्र छोड़े किन्तु विनम्रता और परस्पर उपकार करने की आदत के आगे उनका एक भी शस्त्र सफल न हो सका।
भयावह क्रोध में किसी के प्रति आक्रोश उमड़ता था तो भी घर की दीवार पर लगी मर्यादा पुरुषोत्तम की मुस्कान हमारे द्वेष को विगलित कर देती थी और हम उसकी नकारात्मकता से होड़ करने की बजाय अपनी सकारात्मकता की लकीर को बड़ा करने में जुट जाते थे।
हमने श्रीराम से सीखा है कि रावण से युद्ध जीतने के लिए रावण होना कोई उपाय नहीं है। स्वयं को राम बनाए रखते हुए अपनी सीता वापस लेने का नाम ही विजय है। यदि सामने वाले ने आपको अपने जैसा बनने के लिए विवश कर दिया तो फिर काहे की जीत?
यही आदर्श पूरी दुनिया को हमारे सामने घुटने टेकने पर विवश करता रहा है। इसीलिए मेरा ऐसा मत है कि दुनिया भर में सनातन संस्कृति से ईर्ष्या रखने वालों ने सोशल मीडिया पर ऐसी लाखों प्रोफाइल्स बनाई हैं, जिनके डीपी में या तो हिन्दू ध्वज होता है, या श्रीराम के उग्र स्वरूप का चित्र होता है या फिर ‘मैं कट्टर हिन्दू हूँ’ का उद्घोष होता है। इन प्रोफाइल्स पर आप नीचे तक स्क्रॉल करेंगे तो पाएंगे कि इनमें से अधिकतर में चार-पाँच बार डीपी चेंज करने के अलावा कुछ और नहीं होता। ऐसी कुछ प्रोफाइल्स में कट्टरता की पोस्ट्स भी कभी-कभार शेयर कर ली जाती हैं। कुल मिलाकर आप इन प्रोफाइल्स पर विचरण करेंगे तो आसानी से समझ सकते हैं कि यह किसी की ओरिजनल प्रोफ़ाइल नहीं है, बल्कि एक उद्देश्य विशेष के लिए बनवाई गयी फेक प्रोफाइल्स में से एक है।
ये सभी प्रोफाइल्स भारतीयता की बात करनेवालों को, लोकतंत्र की बात करनेवालों को, सद्भाव की बात करने वालों को और वर्तमान शासन की आलोचना करनेवालों की पोस्ट पर गंदी गालियाँ लिखकर आती हैं। इसमें सरकार की आलोचना करनेवालों को गालियाँ बककर वे यह सिद्ध करते हैं कि ये प्रोफाइल्स भाजपा सरकार ने बनवाई हैं। जबकि वास्तव में उनका उद्देश्य सनातन संस्कृति को बदनाम करना है।
जब कोई डीपी में भगवान राम का चित्र लगाकर माँ-बहन की गालियाँ बकेगा तो उससे साख तो श्रीराम की ही धूमिल होगी। जब कोई ‘मैं कट्टर हिंदू हूँ’ लिखकर अभद्र टिप्पणियाँ करेगा तो इससे बदनामी उसकी नहीं होगी, हिंदू धर्म की होगी।
ऐसे में मोदी सरकार के भोले-भाले समर्थक इनके झाँसे में आकर इनके जैसा आचरण करने को ही राष्ट्रवाद मान बैठे हैं। जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना में मातृभूमि के जिस गुण की सबसे पहले पूजा की गई है वह है ‘वात्सल्य’ (नमस्ते सदा ‘वत्सले’ मातृभूमे)। ऐसी विचारधारा के लोग भला कट्टरता और गाली-गलौज का समर्थन कैसे कर सकते हैं।
श्रीराम को आदर्श माननेवाली परम्परा भला बदले की भावना को कैसे भड़का सकती है? यदि बदला लेना ही उचित होता तो क्या श्रीराम सीता के अपहरण के बदले मंदोदरी का अपहरण न कर लेते! लेकिन श्रीराम ने हमें सिखाया कि उस युद्ध का उद्देश्य केवल अपनी सीता वापस लेना है। इस प्रयास में जो लंका उन्होंने जीती उस पर भी अधिकार नहीं किया।
‘हमने दुश्मन को गले मिल-मिल के शर्मिंदा किया है’ जैसे सूक्ति वाक्यों का अनुगमन करने वाली परम्परा को गाली-गलौज और वैभत्स्य के अखाड़े में खींचने का यह षड्यंत्र श्रद्धेय डॉ हेडगेवार और पूज्य गुरु गोलवलकर जी के सपनों को ध्वस्त करने का एक कुचक्र है।
आप स्वयं देखिए, जबसे ये प्रोफाइल्स बनी हैं तबसे हेडगेवार जी और गुरु गोलवलकर जी का कोई नाम भी उद्धृत नहीं करता। क्योंकि इनके विचारों पर विवाद नहीं किया जा सकता। सब लोग सावरकर के नाम को उछालते हैं, नाथूराम गोडसे का नाम लेते हैं क्योंकि इनके नाम पर विवाद करके हमारी संस्कृति, परम्परा और विचारधारा को विवादित सिद्ध किया जा सकता है।
श्रीराम के मुस्कुराते हुए चित्र, वन को जाते हुए श्रीराम के चित्र, हनुमान को गले लगाते हुए श्रीराम के चित्र, शबरी के बेर खाते हुए श्रीराम के चित्र हमारे जीवन से ग़ायब कर दिए गए हैं। क्योंकि इन सब चित्रों को देखकर श्रीराम उनके लिए भी पूज्यनीय हो जाते हैं, जो जन्मतः वैष्णव नहीं हैं। इसके स्थान पर आपको क्रोधित राम की पेंटिंग दी गयी है डीपी पर लगाने के लिए। ज़रा याद करके देखें कि आपने अपने बचपन में क्रोधित राम का चित्र कहाँ देखा था? आपको समझ आएगा कि ये पेंटिंग्स पिछले कुछ वर्षों में एक षड्यंत्र के तहत बनवाई गई हैं ताकि अपनी मुस्कान से सबका मन मोहनेवाले भगवान राम की उस छवि को बदला जा सके।
अपनी विनम्रता से पूरी दुनिया को दीवाना बना लेने वाले सनातन धर्म को लड़ाकों और कट्टरवादियों का धर्म सिद्ध किया जा सके। काश मेरे इस महान धर्म की युवा पीढ़ी इस षड्यंत्र से बच सके ताकि ‘मधुराधिपतेरखिलं मधुरं’ की इस अद्वितीय संस्कृति को बचाया जा सके।
✍️ चिराग़ जैन
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देश एक बार फिर दोराहे पर खड़ा हैं। एक ओर खुला राजमार्ग है जिसके दोनों ओर रोटी-पानी के स्रोत हैं लेकिन उसके हर मोड़ पर ‘दुर्घटना’ होने की आशंका भी है। दूसरी ओर वह बंद सड़क है, जो दुर्घटनाओं से तो हमें सुरक्षित कर देगी लेकिन रोज़मर्रा की ज़रूरतों का अभाव इस सुरक्षा का न्यूनतम मूल्य है।
इस दोराहे पर नेतृत्व का एक इशारा पूरे देश की नियति बन जाएगा। धर्मसंकट की इस घड़ी में नेतृत्व के कंधों की ज़िम्मेदारी महसूस की जा सकती है। एक ओर ऐसी सुरक्षा है जिसमें सम्पन्नता तो दूर न्यूनतम संसाधनों का भी अभाव हो जाएगा। और दूसरी ओर ऐसा जोखिम है जिसमें न्यूनतम आवश्यकता ही नहीं, वैभव-विलास तक का अभाव नहीं होगा।
सुबह-शाम एक-दूसरे की आँखों में झाँककर ‘लॉकडाउन लगेगा या नहीं’ -का उत्तर खंगालनेवालों को यह जानना होगा कि यह इतना सामान्य प्रश्न नहीं है, जितना हम समझ रहे हैं। सरकार राजमार्ग की ओर देश को ले जाएगी तो दूसरी लहर का हाहाकार स्मृतियों में उभरकर कान के पर्दे फाड़ देगा और बन्द सड़क की ओर देखने का प्रयास करेगी तो भूख और बेरोज़गारी के अजगर साँस लेना दूभर कर देंगे।
सरकार इस स्थिति में क्या निर्णय लेगी, यह उसके विवेक पर छोड़ना चाहिए लेकिन जनता यह अपेक्षा अवश्य करेगी कि जिस भी दिशा में देश को मोड़ा जाए, नेतृत्व उसके साथ उसी दिशा में चलता दिखाई दे। यदि जनता को बन्द गली में क़ैद करके नेतृत्व राजमार्ग के दोनों ओर बनी सुविधाएँ भोगता दिखा तो बन्द गली की घुटन से जनता के भीतर विस्फोट की आशंका उत्पन्न हो जाएगी और यदि जनता को राजमार्ग पर छोड़कर नेतृत्व ने स्वयं को बंद गली में सुरक्षित कर लेना चाहा तो राजमार्ग पर होनेवाली हर दुर्घटना की चीत्कार नेतृत्व के लिए ऐसी चिंघाड़ बन जाएगी, जिसमें जय-जयकार के नारों का शोर कभी सिर नहीं उठा पाएगा।
चुनाव निश्चित रूप से लोकतंत्र के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन इस बार प्रशासन को चुनाव करना है कि राजनीति की दुकान को बचाना है या उन दुकानों के ग्राहकों को…!
✍️ चिराग़ जैन
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एक अभिनेत्री ने कुछ ऐसे बयान दिये हैं, जो तथ्यात्मक रूप से मिथ्या हो सकते हैं, लेकिन इन बयानों का विरोध करनेवालों की भाषा तथा तर्कशक्ति ने अभिनेत्री के मिथ्या भाषण से ध्यान भंग करने में महती भूमिका अदा की है। ‘कम कपड़े पहनकर फिल्मी पर्दे पर आनेवाली नचनिया हमें बताएगी कि आज़ादी क्या होती है!’ -यह वाक्य पढ़कर मुझे लगा कि कुतर्क तथा तर्कहीनता इस देश की किसी भी बहस का अंग बन चुका है। क्यों भाई, यदि किसी अभिनेता/अभिनेत्री ने किसी फिल्म में नकारात्मक भूमिका निर्वाह की है तो क्या इससे उसका चरित्र आंका जाएगा? क्या कम कपड़े पहननेवाले इस देश के नागरिक नहीं हैं?
कोई ‘क्या’ कह रहा है -इस मुद्दे पर बहस को केंद्रित करने की बजाय हम उसके परिधान, उसकी जाति, उसके धर्म, उसके व्यवसाय, उसकी पारिवारिक स्थिति और उसकी निजता को क्यों टटोलने लगते हैं?
आज़ादी भीख में मिलनेवाली बात कोई साड़ी-ब्लाउज़ या सूट-शलवार पहनकर कहे तो क्या यह सत्य हो जाएगी? हमें लम्बे समय से मूल मुद्दे को भटकाने के संस्कार दिए गए हैं। टीवी पर होने वाली बहसें यह ट्रेनिंग देने में सफल हुई हैं।
प्रश्न पूर्व का पूछा जाएगा तो उत्तरदाता उसे उठाकर दक्षिण में पटक देगा और फिर दक्षिणवाले उस प्रश्न को अनर्गल साबित कर देंगे। इतना हो हल्ला होगा कि कुछ घड़ी बाद ख़ुद प्रश्न भी यह भूल चुका होगा कि मेरा जन्म क्यों हुआ था।
कोई वर्तमान का प्रश्न करे, तो उसे इतिहास दिखाने लगो। कोई इतिहास पर तुम्हारी ज़ुबान पकड़ ले तो उसे धर्म-जाति के मेले में ग़ुम कर दो। कोई धर्म-जाति पर प्रश्न लेकर खड़ा हो तो उसे आस्था आहत करने के आरोप में राष्ट्रद्रोही और धर्मद्रोही करार दे दो। और यहाँ से भी वह बच जाए तो उसके निजी जीवन, उसके पहनावे, उसके भाषाई उच्चारण दोष, उसके खानपान जैसे विषयों पर बिना बात की बहस छेड़ दो।
नरेंद्र मोदी चलते-चलते संसद की सीढ़ियों पर लड़खड़ा गये और हम इस घटना से उनको नालायक साबित करने लगे। नरेंद्र मोदी बेध्यानी में राष्ट्रगान की धुन पर सावधान न हुए और हम उस क्लिप को लेकर ठट्ठा करने लगे। नरेंद्र मोदी ने बताया कि उनका सीना छप्पन इंच का है और हम इस आधार पर उन्हें महान मानने लगे। चुनाव रैली में राहुल गांधी ने कुर्ते की फटी जेब दिखाई और हम राहुल गांधी को मूर्ख कहने लगे। किसी बयान में योगी आदित्यनाथ के मुँह से लक्ष्मण की जगह भरत निकल गया और हमने हंगामा उठा लिया।
क्यों भाई? हमें राजनेताओं से देश चलवाना है या भागवत सुननी है? किसी की जेब फटी होगी तो उससे उसके राजनैतिक निर्णय पर क्या फर्क पड़ जाएगा? हमें नरेंद्र मोदी से देश चलवाना है या भारोत्तोलन करवाना है? राष्ट्रगान पर सावधान खड़े रहना चाहिए, यह बात तो प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ा दी जाती है। लेकिन अगर कभी किसी से कोई चूक हो जाए तो उसे उसकी राष्ट्रभक्ति से जोड़कर क्यों देखा जाए?
कोई राजनेता अपनी पत्नी से अलग रह रहा है तो यह उसका व्यक्तिगत मुआमला है। इस पर प्रश्न उठाने का अधिकार उसकी पत्नी के अतिरिक्त किसी को भी क्यों हो? कोई राजनेता विवाह नहीं कर रहा तो यह भी उसका निजी निर्णय है? इससे उसके राजनैतिक निर्णयों के आकलन कैसे किया जा सकता है?
कभी विचार करके देखें तो हम पाएंगे कि अपने राजनीतिज्ञों को यह बात हमने ही सिखाई है कि असल राजनीति को छोड़कर इधर-उधर के ड्रामे करते रहो तो जनता ज़्यादा वोट देगी। अन्यथा हर काम वोट के लिए करनेवाले लोग ऐसे कार्यों का प्रोपेगैंडा क्यों करते, जिनका ‘राज्य की नीतियों’ से कोई लेना-देना नहीं हो।
कोई वैष्णोदेवी जाए तो जाने दो। कोई केदारनाथ जाए तो यह उसकी निजी आस्था है। कोई अजमेर में चादर चढ़ाए तो उस उसका पर्सनल मुआमला है। कोई मंदिर में झाड़ू लगाए तो यह उसकी मर्ज़ी है। कोई राममंदिर में दीये जलाए तो यह उसका अपना मत है। हम इन सब कार्यों को उनकी राजनैतिक स्थिति का मापदण्ड क्यों बनाते हैं? हम ऐसा क्यों मान बैठे हैं कि धर्मस्थल पर जानेवाला व्यक्ति भ्रष्टाचारी हो हो नहीं सकता; वह भी तब जब हमारे देश के न्यायालयों में धर्मस्थलों पर हुए कदाचार के सैंकड़ो मुआमले लम्बित हैं।
हम निजी जीवन और सार्वजनिक जीवन को अलग-अलग करके क्यों नहीं देख पाते।
सीता का परित्याग करने वाले राम आदर्श राजा हैं। राधा को बिरह देने वाले कृष्ण सर्वश्रेष्ठ राजनीतिज्ञ हैं। यशोधरा और राहुल को सोता छोड़कर जानेवाले तथागत सर्वाेत्कृष्ट ज्ञानी हैं। क्या इन कथाओं से भी हम यह नहीं सीख सकते कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक प्रश्नों के सटीक उत्तर दे रहा हो तो उस समय उसे निजता के कठघरे में घसीटकर प्रश्नावली नहीं बदलनी चाहिए।
✍️ चिराग़ जैन
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‘नो एफआईआर, नो इन्वेस्टिगेशन, नो चार्जशीट, फैसला ऑन द स्पॉट…’ -ऐसे संवाद फिल्मों में तो बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन असल ज़िन्दगी में इस डायलॉग पर काम करनेवाले कार्यपालक निरंकुश हो जाते हैं।
यह सत्य है कि भारतीय न्याय प्रक्रिया की धीमी गति और लचर व्यवस्था का ही दुष्प्रभाव है कि ‘फ़ैसला ऑन द स्पॉट’ जैसे अराजक संवाद इस देश में ‘लोकप्रिय’ हो जाते हैं। पुलिस की वर्दी पहनकर भी क़ानून को ताक पर रखनेवाले पुलिसवालों को हमने ‘दबंग’; ‘सिंघम’; ‘सिमबा’ और ‘पुलिसगिरी’ जैसी फिल्मों में अराजक होते देखा तो हमने यह कहकर स्वयं को संतुष्ट कर लिया कि इस देश में अपराधियों का यही इलाज है।
यदि डॉक्टर अयोग्य होगा तो कंपाउंडर के हाथ में सर्जिकल नाइफ़ सौंप देंगे क्या? डॉक्टर को कर्मठ और सक्षम बनाने की बजाय हम कंपाउंडर के ऑपरेशन करने को तो जस्टिफाई नहीं किया जा सकता ना! निरंतर डॉक्टरों के साथ रहने का कारण, ऑपरेशन थियेटर में आने-जाने के कारण वार्ड बॉय भी शल्य चिकित्सा की शब्दावली सीख जाता है, लेकिन उसे किसी की सर्जरी करने को तो नहीं कहा जा सकता ना!
न्यायालय किसी लोकतंत्र के शल्य चिकित्सक हैं और पुलिसकर्मी इस अस्पताल का नॉन मेडिकल और पैरा मेडिकल स्टाफ। अस्पताल की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए यह स्टाफ बहुत आवश्यक है, किन्तु सामान्य बुखार में भी कोई टेबलेट लिखने की छूट इस स्टाफ को नहीं दी जा सकती।
हैदराबाद में जब पुलिस ने बलात्कार के आरोपियों का एनकाउंटर किया था तो लोगों को तालियाँ पीटते देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ था। मैं यह नहीं जानता कि वह एनकाउंटर झूठा था या बनावटी। लेकिन उस घटना पर पुलिस की पीठ थपथपाने वाले यह ज़रूर मानते थे कि पुलिस ने एनकाउंटर का नाटक करके आरोपियों की हत्या की है। यदि वह एनकाउंटर सत्य भी रहा हो तो भी इलाज के लिए वार्ड से ऑपरेशन थियेटर में ले जाते समय यदि किसी मरीज़ की मौत हो जाए तो उसका श्रेय अथवा दोष वार्ड बॉय को कैसे दिया जा सकता है?
उस दिन हैदराबाद की घटना पर जो सोशल मीडिया ट्रोलिंग हुई थी वह इस देश की संवैधानिक तथा न्यायिक व्यवस्था पर सबसे बड़ा कुठाराघात था। उसके बाद विकास दुबे प्रकरण, फिर मृतका के घरवालों को घर में बंद करके आधी रात को पेट्रोल डालकर शवदाह करने की घटना या कोई भी अन्य नागरिक… ये सब घटनाएँ उस अराजकता का एक झरोखा है, जो हमारे समाज में मूर्खतापूर्ण महत्वाकांक्षाओं के हाथों बोई जा रही है।
मरनेवाले को हिन्दू अथवा मुस्लिम के स्थान पर इस देश के एक नागरिक के रूप में देखेंगे तो आप स्वीकार कर सकेंगे कि उसे अदालत में अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए था। जिन फिल्मों में हमने पुलिसिया गुंडागर्दी पर तालियाँ बजाई हैं, उन्हीं फिल्मों से यह भी सीखा जा सकता है कि कई बार परिस्थितियाँ और इत्तेफ़ाक किसी निर्दाेष को संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर देते हैं। अदालतें इसी संदेह की पड़ताल करने का माध्यम हैं।
मैं फिर दोहरा रहा हूँ कि न्याय व्यवस्था को आत्मावलोकन करके अपनी गति तथा कार्यप्रणाली को सुधारने की सख़्त ज़रूरत है। लेकिन जब तक यह काम न हो तब तक भी न्यायालय का विकल्प थाना नहीं हो सकता।
भारतीय लोकतंत्र की एक इकाई होने के नाते प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वह व्यवस्था का सम्मान करे। अराजकता किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। व्यवस्था में कोई ख़ामी आई तो उसे सुधारा जा सकता है किंतु अराजकता का चेहरा समाजसेवा, राष्ट्रहित और समाजहित से हू-ब-हू भी मिलता हो तो भी उसके निरंकुश होने की शत-प्रतिशत गारंटी होती है।
आशा है कि भविष्य में किसी कम्पाउंडर को सर्जरी करते देखेंगे तो कम से कम हम तालियाँ तो नहीं पीटेंगे; क्योंकि अगली बार ऑपरेशन टेबल पर हम भी हो सकते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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जिन्होंने यह कहना शुरू किया कि इस्लाम ख़तरे में है, उन्हीं के नुमाइंदों ने अफगानिस्तान पर जबरन कब्ज़ा कर लिया। यूएनओ में स्थायी सदस्यता की डींगें हाँकनेवाले देशों के लिए यह शर्मिंदगी भरी लानत है। सबसे उम्दा हथियार बनानेवाले देशों के लिए यह डूब मरने की बात है। मानवाधिकार के नाम पर अन्य देशों की निजता में हस्तक्षेप करनेवाले चौधरियों के लिए यह निर्वस्त्र होने जैसा अनुभव है।
धार्मिक कट्टरता की ओट में सत्ता की गलियाँ तलाश रही बर्बरता का घिनौना चेहरा तालिबान की हरक़तों में साफ दिखाई दे रहा है। कट्टरता के खोल में छिपे ये लिजलिजे कीड़े अपने खोल की मज़बूती को लेकर इतने आश्वस्त हैं कि अब ये पूरी मनुष्यता को चाटने की तैयारी में जुट गए हैं।
चूँकि वैचारिक स्तर पर विकसित होती मानवता इनके खोल के लिए सर्वाधिक हानिकारक है, इसलिए ज्यों ही कोई व्यक्ति इन्हें सोच के स्तर पर विकास करता दीख पड़ता है, ये तुरन्त बर्बर हो जाते हैं। मुस्कुराहट और ठहाके इनके आतंक पर सबसे बड़ा आघात हैं, इसलिए हँसानेवाले लोगों के विरुद्ध ये धर्म और संस्कृति के अपमान की निराधार दलीलें परोसने लगते हैं। उत्सव मनाते हुए लोग इन्हें अपने दहशती सम्मोहन से छूटते हुए प्रतीत होते हैं इसलिए उत्सवों की हत्या के लिए ये बम फोड़ने लगते हैं। ज्यों ही मनुष्यता को यह एहसास होने लगता है कि वह इक्कीसवीं सदी में खड़ी है, ये तुरन्त उसे घसीटकर सोलहवीं शताब्दी में ले जाने की ज़िद्द करने लगते हैं। मनुष्यता मिल-जुलकर रहना चाहती है और बर्बरता उसे अलग-थलग कबीलों में बाँटने के लिए जी-जान लगाए बैठी है। लकड़ियों के गट्ठड़ को विभाजित करके उसे आसानी से तोड़ सकने की कला में बर्बरता माहिर है।
हमने इतिहास से सबक नहीं लिया तो आज वर्तमान हमें सिखा रहा है कि धार्मिक कट्टरता की ओट में पनपा एक तालिबान पूरी दुनिया के बड़े-बड़े धुरंधरों की नपुंसकता पर से पर्दा हटा चुका है। यदि पूरी दुनिया के सारे देश मिलकर इस एक कबीले की जकड़ से अफगानिस्तान को मुक्त नहीं करा सकते तो कम से कम इतना तो अवश्य करें कि अपने समाज को कट्टरता के दंश से मुक्त कराने के प्रयास तुरन्त प्रारम्भ कर दें ताकि इस तालिबानी फफूंद को अपने पैर पसारने का वातावरण न मिल सके।
और हाँ, गहरी श्वास लेकर सोचोगे तो समझ आएगा कि किसी भी धर्म को सबसे ज़्यादा नुक़सान उन्हीं लोगों से होता है जो उस धर्म के अनुयाइयों में यह बात प्रचारित करते हैं कि तुम्हारा धर्म ख़तरे में है।
✍️ चिराग़ जैन