Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
मिट्टी में
क्षमता होती
बीज की प्रवृत्ति बदलने की
तो
एक ही गुरुकुल में
एक ही गुरु से पढ़कर
सभी शिष्य युधिष्ठिर बन जातेे
कोई दुर्योधन न बना होता
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Seriously Funny
लो जी, बाज़ार में भी स्त्रीलिंग चांदी ने पुल्लिंग सोने की मोनोपॉली पर धावा बोल दिया है। अब खरे सोने की सामने टंच चांदी अकड़ कर चलने लगी है।
मैं तो उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ जब भतीजे के ब्याह से विदा होते समय बुआजी, मुँह बिचकाते हुए कहेंगी- ‘भाभी ने सोने के कंगन में बहका दिया। इकलौती ननद हूँ। एक जोड़ी चांदी की पजेब ही दे देती।’
चांदी की ऐसी चांदी हुई है कि सोने को उबासी आने लगी है। सोना ऐसा उपेक्षित-सा बैठा है जैसे राजेश खन्ना को धक्का देकर भीड़ ओमप्रकाश के ऑटोग्राफ लेने दौड़ पड़ी हो। इसी स्पीड से चांदी की कीमतें बढ़ती रहीं तो वो दिन दूर नहीं, जब लोग सोने के गहनों पर चांदी की पॉलिश करवाने लगेंगे।
सर्राफा बाज़ार चांदी कूट रहा है और चांदी मिल्खा सिंह की स्पीड से भागी चली जा रही है। हमारे बाज़ारों में ज़रा-सी हलचल होते ही भविष्यवाणियों का बाज़ार गरम हो जाता है।
मेरे एक रिश्तेदार ने मुझसे पूछा- ‘कुछ मार्किट-वार्किट में इन्वेस्ट किया है या नहीं?’
मैंने संकोच के साथ डींग हांकते हुए कहा- ‘जी गोल्ड बॉन्ड लिए हैं कुछ।’
उन्होंने हिकारत से मेरी ओर देखकर कहा- ‘कुछ नहीं रखा गोल्ड में, सिल्वर देखो बेटा सिल्वर।’
मैंने गोल्ड के मुँह पर ऐसी लानत पहले कभी नहीं देखी थी।
घर-परिवार का कोई समारोह हो या फिर चाय की दुकान, हर महफ़िल में कोई न कोई कॉन्फिडेंट भविष्यवक्ता अपने अनुभव से बता रहा होगा कि चांदी छह लाख तक जाएगी। शेयर बाज़ार का यह सबसे बड़ा लाभ है, जिनकी जेब में फूटी कौड़ी न हो, वो भी हज़ार-लाख-करोड़ की बातें करने का लुत्फ़ उठा सकते हैं। और जिसने हज़ार-पाँच सौ इन्वेस्ट कर दिये हों, उसे तो टाटा, बिड़ला से लेकर अम्बानी, अडानी तक को धंधा सिखाने का लाइसेंस मिल जाता है।
नुक्कड़ की चर्चाओं में उपस्थित अर्थशास्त्री चांदी की बढ़ती कीमतों का कारण भी बताते रहते हैं। एक विद्वान सोलर एनर्जी में चांदी की खपत का पत्ता फेंकता है तो दूसरा रूस-यूक्रेन यूद्ध से चांदी को जोड़कर उसे लाजवाब कर देता है। कोई इसे डोनाल्ड ट्रंप की शरारत बता रहा है तो कोई एलन मस्क की सीक्रेट बिज़नेस पॉलिसी को सार्वजनिक करके चांदी की कीमतों का भेद खोल देता है।
मैं भी घर से साबुन खरीदने निकला था, लेकिन नुक्कड़ की बातें सुनकर चांदी खरीदने निकल पड़ा। नहाना-धोना तो होता रहेगा, अगर चांदी नहीं खरीदी तो रातोंरात अमीर होने के मौके से हाथ धो बैठूंगा।
जिन फिल्मी गीतों में चांदी शब्द का प्रयोग हुआ है, मैंने उन्हें गुनगुनाना भी बंद कर दिया है। कहीं ऐसा न हो कि चांदी मेरे मुँह से बाहर निकल जाए और मैं रेंकता रह जाऊँ।
इन दिनों चांदी ने जो छलांग लगाई है, उस पर चांदी को ऊँची कूद का गोल्ड मेडल दिया जा सकता है। ओलम्पिक संघ ने इस विषय पर विचार भी किया लेकिन फिर ये सोचकर मन मसोस लिया कि कहीं चांदी राजकुमार के स्टाइल में ये न कह दे- ‘जानी, हम चांदी हैं, गोल्ड-वोल्ड जैसों को हम मुँह नहीं लगाते।’
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Poetry, Purushottam
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विश्व राजनीति को कॉमेडी शो बनाने की सुपारी लेने वाले पहले नेता हैं डोनाल्ड ट्रंप। उन्हें अपने आप पर विश्वास है कि एक दिन वे नासा के वैज्ञानिकों की फौज भेजकर सूरज को भी उठवा लेंगे। वाशिंग्टन के किसी डुप्लेक्स में उसे नज़रबंद करेंगे। फिर मुँहमांगी क़ीमत पर दुनिया भर में धूप का धंधा करेंगे।
शीशियों में धूप भर-भरकर एक ठेला व्हाइट हाउस से निकलेगा और फेरीवाले की तरह ट्रंप गली-गली में धूप बेचेंगे। ठेले पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होगा कि “हमारी रूस या चीन में कोई ब्रांच नहीं है।”
अगर सूरज-चांद को किडनैप करने में नासा के वैज्ञानिक सफल नहीं हुए तो ट्रंप के क्रोध की अग्नि से नासा का नाश हो जाएगा।
मुझे विश्वास है कि सुबह आँख खुलते ही ट्रंप अपने आईने के सामने खड़े होकर आस्था और विश्वास से मंत्रोच्चार करते हैं कि ‘ट्रंप इज़ द बेस्ट प्रेसिडेंट एवर’।
इस मंत्र के प्रभाव से अचानक उनके आसपास रौशनी फैल जाती है। उनके दिमाग़ की बत्ती जल जाती है। वे तुरंत किसी की जड़ें खोदने लगते हैं और किसी की दीवार बनाने लगते हैं। जिस देश में दीवार बनानी हो, उसके प्रधानमंत्री को फोन करके भारतीय शराबियों के स्टाइल में बोलते हैं- ‘आज दीवार तेरा भाई बनाएगा।”
वे जानते हैं कि इस सृष्टि में वही ‘उचित’ है जो माननीय ट्रंप सर करते हैं। यदि कोई तुच्छ प्राणी उनके किसी कार्य की आलोचना करता है तो उसकी आलोचना ‘फेक न्यूज़’ से अधिक कुछ नहीं है।
विश्व राजनीति ने ऐसे लोग भी देखे हैं, जिन्होंने प्रश्नों के अनुसार ख़ुद को बदल लिया। विश्व राजनीति में ऐसे लोग भी हुए हैं, जिन्होंने अपने अनुसार सवाल बदल दिए। लेकिन ट्रंप पहले ऐसे लीडर हैं, जो सवाल पूछनेवाले को ही बदल देते हैं।
रोज़ सुबह आँख खुलते ही ट्रंप अपना ट्विटर खोलकर दुनिया को कोई नयी टेंशन देना नहीं भूलते। उनकी एक गुड मॉर्निंग पूरी दुनिया की नींद उड़ा देती है। इसी को ट्रंप विश्व जागरण कहते हैं।
ट्रंप के आत्मविश्वास के आगे फैक्ट्स शर्म से सिर झुका लेते हैं। सूरज उनके ट्वीट पढ़कर यह जानने की कोशिश करता है कि आज निकलना है या नहीं। चीन की दीवार और मिस्र के पिरामिड रोज़ उनके दरबार में हाजिरी लगाकर यह पूछते हैं कि बॉस अभी हम ‘ग्रेट’ हैं या फिर आपकी किसी हरकत ने हमें टुच्चा सिद्ध कर दिया है?
मैं गूगल पर अमरीका का नक्शा देखता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे कोई चपटे से मुँह का आदमी अपने होंठों को पूरा खींचकर मुस्कुरा रहा हो। इस मुस्कान से उसकी दोनों आँखें बंद हो गई हैं। जिनसे वह देख नहीं पा रहा है कि पूरी दुनिया उस पर हँस रही है।
चूँकि वे स्वयं को महान मान चुके हैं इसलिए अपनी हरकतों को ‘लीला’ कहने में उन्हें संकोच नहीं होता। ट्रंप की महानता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि जबसे ये साहब अपनी पर उतरे हैं तब से दुनिया ने हिटलर, गद्दाफी, सद्दाम और किम जोंग को लानत भेजना बंद कर दिया है।
मुझे जब कभी हँसने का मन करता है तो मैं डोनाल्ड ट्रंप के भाषण सुनने लगता हूँ, क्योंकि बाकी सब कॉमेडियन तो हँसाने के पैसे लेते हैं…!
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
भारतीय राजनीति में दो पक्ष होते हैं। दोनों ही पक्ष एक-दूसरे की दृष्टि में विपक्ष होते हैं। भारत की राजनीति एक सधे हुए नाटक की तरह है जिसकी बाकायदा एक पटकथा है। इस पटकथा में हर पक्ष के अलग-अलग संवाद हैं।
पाँच साल में एक बार मतदान की पर्चियों से यह तय किया जाता है कि कौन-सा पक्ष कौन से संवाद बोलकर नाटक में शामिल होगा।
जिस पक्ष को अधिक सीटें मिलती हैं उसे जनता सरकार कहने लगती है। जिस पक्ष के पास सीटों की संख्या कुछ कम रह जाती है वह किसी भी तरह सरकार में आने की कोशिश करने लगता है।
दुनिया दिखावे के लिए इस व्यवस्था को लोकतंत्र कह दिया जाता है। हालाँकि इस तंत्र में लोक जमूरे की तरह नाचता है और तंत्र दर्शकदीर्घा में बैठा हुआ आनंद लेता है।
जिस पक्ष को सरकार कहलाने का सौभाग्य नहीं मिल पाता उसे जनता के वे दुःख-दर्द भी दिखाई देते हैं, जो ख़ुद जनता को भी नहीं दिखते। इसलिए वह लगातार सरकार को निर्मम, भ्रष्टाचारी और अलोकतांत्रिक सिद्ध करने में लगा रहता है।
जिस पक्ष को जमूरों ने सरकार सिद्ध किया होता है, उसे जमूरों के आचरण की सारी खामियां दिखने लगती हैं। हर सरकार जनता की दुर्दशा के लिए पिछली सरकारों को दोषी ठहराने में व्यस्त रहती है।
जनता इस नाटक से कभी बोर नहीं होती। लेकिन दर्शक दीर्घा में बैठे सरकारी पक्ष को कभी-कभी गुस्सा आ जाता है।
वह उठकर घोषणा कर देता है कि अब जिसे भी नाचना है वो केवल हमारी डुगडुगी पर नाचेगा। विपक्ष की डुगडुगी पर नाचने वालों के हाथ-पैर बांध दिए जाएंगे।
सम्वेदनशीलता का अभिनय करता हुआ विपक्ष डुगडुगी छोड़कर दर्द की शहनाई बजाने लगता है। वह दबी हुई आवाज़ में चीखता है कि यह लोकतन्त्र की हत्या है। लेकिन जिसकी डुगडुगी नहीं सुनी गई उसकी शहनाई कौन सुनेगा?
शहनाई बजाते-बजाते विपक्ष की साँस फूलने लगती है।
सरकार को थका-हारा विपक्ष देखकर अच्छा लगता है। हाथ-पैर बंधे हुए बन्दरों की बेचैनी सरकार के लुत्फ़ को बढ़ा देती है। बंधे हुए बंदर शहनाई पर नाचने की कोशिश करते हैं, लेकिन ज़रा-सा हिलने की कोशिश से भारी-भरकम बेड़ियाँ उन्हें धराशायी कर देती हैं। बेचारे बंधक आँखों की पुतलियाँ हिलाने से भी घबराने लगते हैं।
सरकार को जंजीर-डांस देखने की लत लग जाती है। धीरे-धीरे वह अपनी डुगडुगी पर नाचनेवालों के भी हाथ-पैर बांध देती है।
जनता बेचारी परेशान होकर सरकार अलट-पलट कर देती है तो दोनों पक्ष आपस में संवाद बदल लेते हैं। पटकथा ज्यों की त्यों रहती है। सम्वाद जस के तस रहते हैं। बस, बोलनेवाले बदल जाते हैं।
नाटक चलता रहता है और जमूरे आपस में लड़ने लगते हैं। ताज़ा समाचार मिलने तक इस व्यवस्था को लोकतन्त्र ही कहा जाता है।
✍️ चिराग़ जैन