आतंक
मैं
जिससे डरता हूँ
उसे डर बना रहता है हमेशा
कि कहीं
मैं उससे डरना
बंद न कर दूँ।
✍️ चिराग़ जैन
मैं
जिससे डरता हूँ
उसे डर बना रहता है हमेशा
कि कहीं
मैं उससे डरना
बंद न कर दूँ।
✍️ चिराग़ जैन
अमेरिकी उद्योगपतियों के लिए ऑक्सीजन के बिना जीवित रहना संभव है किन्तु राष्ट्रपति जी को प्रसन्न किये बिना अपना अस्तित्व बचा पाना असंभव हो गया है। उनकी हालत देखता हूँ तो शोले फिल्म के गब्बर सिंह का अमर वाक्य याद आता है- ”गब्बर के ख़ौफ़ से तुम्हें केवल एक आदमी बचा सकता है, और वो है ख़ुद गब्बर।“
उद्योगपति सहयोग की उम्मीद से न्यायपालिका की ओर देखते हैं, लेकिन न्यायालय अपने महंगे दुशाले में अपने कटे हुए हाथ छिपाकर चुपचाप खड़ा है। वह जानता है कि अगर थोड़ा भी हिलने-डुलने की कोशिश की तो गब्बर सिंह की हवाएँ उसका दुशाला गिरा देंगी और उसे फ्लैशबैक में जाकर हाथ कटने की पूरी कहानी सबको सुनानी पड़ेगी। इस डिप्रेसिंग सीन से बचने के लिए न्यायालय मुँह फिराकर लिबर्टी की मूर्ति से नैन-मटक्का करने लगता है।
मीडिया के एकाध जय और बीरू, बंदूक लेकर पानी की टंकी पर चढ़ ज़रूर गए हैं, लेकिन उन्हें अच्छी तरह पता है कि उनके चैनल में सांभा और कालिया का पैसा लगा हुआ है। इसलिए माइक को बंदूक की तरह पकड़कर वे दोनों, गब्बर सिंह पर फूल बरसा रहे हैं। कैमरे पर वे बंदूक चलाते हुए दिखते हैं लेकिन मालिक के मालिक पर केवल फूल बरसते हैं।
उधर उद्योगपतियों को अच्छी तरह समझ आ गया है कि गब्बर का मनोरंजन किये बिना काम नहीं चलेगा, इसलिए वे ख़ुद अपनी-अपनी धन्नो को चाबुक मारकर डायलॉग बोल रहे हैं- ”चल धन्नो, तेरी बसंती के धंधे का सवाल है।“ धन्नो पूरी जान लगाकर दौड़ती है, और बसंती को गब्बर के अड्डे पर ले आती है। गब्बर के अड्डे पर पहुँचते ही बसंती मुजरे की महफ़िल जमा लेती है।
गब्बर सिंह को संगीत और कला की भी उतनी ही समझ है, जितनी मनुष्यता की। इसलिए वे ठुमरी को डिस्को कहकर दाद दे रहे हैं। बसंती गब्बर सिंह की मूर्खता को विद्वत्ता सिद्ध करने के लिए ठुमरी की कैसेट चलाकर डिस्को करने की कोशिश करती है। बाहर खड़ी धन्नो, बसंती की इस हरकत पर हँसती है, लेकिन बसंती उसकी हँसी को इग्नोर करके गब्बर स्वामी की मुस्कान पर रीझती रहती है।
जमी हुई महफ़िल में जब थोड़ी देर तक कुछ हैप्पनिंग नहीं होता तो गब्बर सिंह अपने आसन से उठकर एकाध ठुमका लगा देते हैं। गब्बर का ठुमका लगते ही बसंती उनको नृत्यकला का गंधर्व सिद्ध कर देती है। जय और बीरू ड्रोन से पुष्पवृष्टि करने लगते हैं। न्यूयॉर्क हार्बर में लिबर्टी और न्याय की देवी का नैन-मटक्का डांस-शो में बदल जाता है।
गब्बर ठुमका लगाकर ऊंघने लगते हैं और पूरा अमरीका नृत्य करने लगता है। सभी बुद्धिजीवी, सूरमा भोपाली के अंदाज में अपने-अपने मजमे जुटाकर नृत्य की डींगें हाँकते हैं।
जय और बीरू को जिस काम के लिए स्क्रिप्ट में रखा गया था, वह काम उनसे छिन गया है। इसलिए स्क्रिप्ट में बने रहने के लिए बेचारा जय, अपने ही अन्नदाता की विधवा बहू के घर के सामने बैठा माउथ ऑर्गन बजा रहा है। उसके हुनर से इम्प्रैस होकर सूने आंगन में लालटेन जलने लगती हैं।
जो मस्क ख़ुद को घर का मालिक समझकर मसका लगाता फिर रहा है वह दरअस्ल रामलाल है। जिसे बंद कमरे में ठाकुर को चादर ओढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया है।
पूरा अमरीका गब्बर की दहशत से नाच रहा है। सबको पता है कि उसके केस्टो मुखर्जी अमरीका के कोने-कोने में फैले हुए हैं। जो थोड़े बहुत पुराने लोग ज़िन्दा बचे हैं वे इस सबसे उकताकर चर्च की ओर बढ़ते हुए डायलॉग बोलते हैं- “पूछूंगा ऊपरवाले से, इस देश को नचाने के लिए एकाध ट्रम्प और क्यों नहीं दिया?”
✍️ चिराग़ जैन


पुराने समय में किसी नगर में एक यशस्वी राजा राज्य करता था। एक बार सभी राजकीय कर्मचारियों ने राजा की महा आरती का आयोजन किया। राजकाज के सभी कर्मचारी अपने-अपने विभाग के बजट के अनुरूप दीप, धूप, लौबाण, गुग्गल और न जाने कितनी ही सामग्री बटोर लाए।
आयोजन बहुत भव्य था। धूप के धुएं ने आकाश तक जाकर राजा की लोकप्रियता के फरमान पर हस्ताक्षर किए। धीरे-धीरे यह धुआं राजा के विरोधियों की आँखों में चुभने लगा। विरोधियों की आँखें लाल हुई तो प्रजा की भी साँस घुटने लगी।
विरोधी, जनता की कराह को चीख बनाने पर तुल गये और मंत्रियों ने कराह की आवाज़ को आरती के मंजीरे की आवाज़ घोषित करके राजा की पूजा जारी रखी।
जब धुएं से ख़ुद राजा की ही साँस उखड़ने लगी तो राजा ने मंत्रियों से पूछा कि इस धुएं का क्या करें?
मंत्रियों ने राजा को सुझाव दिया कि और तो कुछ नहीं हो सकता लेकिन ये धुआं प्रजा की आँखों में झोंकने के काम आ सकता है।
समाधान सुनकर राजा की आँखें चमक उठीं। उसने अपने काबिल मंत्रियों की ओर प्रशंसा भरी नजरों से देखा।
एक मंत्री बोला, ‘हुज़ूर, हम इस धुएं को धोकर राजा की सौगात के रूप में जनता को बांट देंगे।’
‘लेकिन धुएं को धोया कैसे जाएगा?’ एक चिढ़ोकड़ा मंत्री बोला।
”पानी से धुलाई होगी जनाब, और कैसे धोयेंगे?’ पहला मंत्री गुफी पेंटल के अंदाज़ में खिसियानी हँसी हँसते हुए बोला।
राजा को सुझाव पसंद आया, पूरे राज्य में मुनादी हो गयी कि “सब अपने-अपने घर के ऊपर छाये धुएं को धो-पोंछकर साफ़ करेंगे। जिसके घर के ऊपर ज़हरीला धुआं मिला, उसको राजा के आदेश से देशनिकाला दे दिया जाएगा।”
मुनादी काम कर गई, देशनिकाले के डर से जनता ने अपने-अपने ऊपर के आसमान को साफ़-सुथरा कहना शुरू कर दिया। समाजसेवी संगठनों ने जगह-जगह कैंप लगाकर हवा में पानी उछाला और धुएं की धुलाई में उल्लेखनीय योगदान दिया। वैद्य-हकीमों ने धुएं में साँस लेने के चिकित्सीय लाभ बताकर प्रजा को जागरूक किया। हरकारों ने घर-घर संदेश पहुँचाया कि राजा की बेहतरीन शासकीय क्षमता से प्रजा की आँखों से ख़ुशी के जो आँसू बहे, उन्हीं आँसुओं से सारा धुआं धुल गया।
विरोधियों ने जिस आसमान को सिर पर उठा रखा था, उसी आसमान को शीशे की तरह साफ़ बताकर प्रजा ने विरोधियों के सिर पर दे मारा।
इसे कहते हैं मास्टर स्ट्रोक।राजा ने एक मुनादी से प्रदूषण की चौतरफा सफाई कर दी।
पानी बहा, इससे जल प्रदूषण समाप्त हो गया। धुआं धुल गया इससे वायु प्रदूषण ख़त्म हुआ। जिनकी आँखों में राजा की ख्याति खटक रही थी, उनकी आँखों का कचरा साफ़ हो गया।
और विरोधियों की बोलती बंद हुई इससे ध्वनि प्रदूषण पर भी लगाम लग गई।
डिस्क्लेमर: इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं।यदि इसमें दिल्ली के प्रदूषण के दर्शन हों तो यह केवल एक इत्तफाक होगा।
✍️ चिराग़ जैन

सोचा था
मन को
गंगा जैसा पावन करके आएंगे
लेकिन
लौटे हैं
गंगा को
मन जैसा मैला करके!
✍️ चिराग़ जैन
देश भर में दीवाली का माहौल है और बिहार में चुनाव का। हालाँकि राजनीति तो बिहार को ही अयोध्या मानकर अपने राजतिलक की प्रतीक्षा कर रही है।
हर दल स्वयं को भरत माने बैठा है कि सत्ता के रामचंद्र जी आकर उसी से गले लगेंगे। सत्ता के गले पड़ने के लिए हर नेता ने ख़ुद के भरत होने की घोषणा कर रखी है, लेकिन बिहार जानता है कि ये सब भरत, विभीषण बन जाने का सही मौक़ा तलाश रहे हैं।
दरअस्ल चुनाव वह पंचवटी है जिसमें हर रावण, साधु बनकर सीताहरण का अवसर तलाशता फिरता है। मारीच मुद्दों को भटकाने के लिए सीता के सामने कंचनमृग बनकर विचरता है और जो लक्ष्मण, सीता की सुरक्षा के लिए उपस्थित होता है उसे सीता खरी-खोटी सुनाकर ख़ुद अपने से दूर कर देती है।
बहरहाल टिकटों की आतिशबाज़ी हो चुकी है, जिनके पटाखे फुस्स हो गए उन्होंने अपने रॉकेट की बोतल का मुँह पार्टी कार्यालय की ओर मोड़ दिया। जिनको टिकट मिल गई उन्होंने अपने भीतर के बारूद को कपूर बताकर पार्टी की आरती उतारनी शुरू कर दी।
जिन्हें टिकट की सूची में जगह नहीं मिली, उन्होंने अपने-अपने लंकेश को भ्रष्टाचारी घोषित कर दिया है। उधर हर लंकेश मन ही मन सेतुनिर्माण की सूचना से भयभीत है, किंतु अपने चेहरे पर अहंकार का मास्क चिपकाकर अपने विरोधियों को भालू-बंदर सिद्ध करने पर तुला है।
नीतीश कुमार जब भी चुनाव प्रचार पर निकलते हैं तो उन्हें यह स्मरण रहता है कि अपनी सोने जैसी इमेज की लंका में उन्होंने ख़ुद अपनी ही पूँछ से आग लगाई है।
अयोध्या में राम के राजतिलक की तैयारियाँ चल रही हैं और लंका भीषण युद्ध में घिरी हुई है। चुनाव के शोर-शराबे से चैन की नींद सो रहे कुम्भकर्ण भी डिस्टर्ब होकर जाग गए हैं।
कोई अपना मेघनाद दांव पर लगा रहा है तो कोई अपने लक्ष्मण के लिए संजीवनी मंगवा रहा है। कोई पराये वानरों को भी अपना बनाने में जुटा है और कोई अपने भाई को भी लतिया रहा है।
हर पटाखे की बत्ती सुरसुरा रही है, लेकिन हर उम्मीदवार इस आशंका से ग्रस्त है कि कहीं ऐसा न हो कि बत्ती उसके पटाखे की जले और धमाका किसी और के पटाखे में हो जाए।
युद्ध के बाद जिसे सीता मिलेगी उसके घर दीवाली मनेगी और बाकी सब अपने कुनबे के साथ बैठकर अमावस्या मनाएंगे। लेकिन एक बात तय है कि फ़िलहाल देश में दीवाली का माहौल है।
✍️ चिराग़ जैन
