Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान से क्यों हैं ….क्योंकि आप दिल्ली में है। जिया जले, जान जले रात भर धुआँ चले …क्योंकि आप दिल्ली में हैं। सागर मंथन से हलाहल उत्सर्जन की घटना प्रोडक्शन एक्सट्रेक्ट के प्रदूषण का सृष्टि का पहला उदाहरण है। यह साफ़ है कि जब भी प्रकृति का दोहन किया जाएगा, तब-तब प्रदूषण चरम पर जाएगा। इससे जीवन जीना कठिन हो रहा है। सतयुग में शिव ने कालकूट पी लिया था। उन्होंने विष को ग्रहण तो किया लेकिन वह विष उनके गले से नीचे नहीं उतरा।
हमारी स्थिति सतयुग से थोड़ी भिन्न है। हमें कालकूट पीना भी है और राजनेताओं की ढोंगी चिंता को गले से नीचे भी उतारना है। राजनीति चिंतित है। यह प्रदूषण पराली के कारण है या दीवाली के कारण; यह भाजपा के कारण है या आम आदमी पार्टी के कारण; यह केंद्र सरकार के कारण है या दिल्ली सरकार के कारण; अगले चुनाव में इसका लाभ अरविंद केजरीवाल को मिलेगा या मनोज तिवारी को -इन महत्वपूर्ण प्रश्नों को सुलझाना सरकार का पहला दायित्व है।
जनता मुँह पर मास्क पहनकर घूम रही है। मास्क बनानेवाली कम्पनियाँ कह सकती हैं कि जिस सागर मंथन से दिल्लीवालों को कालकूट मिला है, उसी सागर मंथन से मास्क मैन्युफैक्चरिंग कम्पनियों को लक्ष्मी मिली है। धन्वंतरि जी भी इन दिनों खूब चांदी काट रहे हैं। दिल्ली सरकार के ऑड-ईवन फॉर्मूले से ओला-ऊबर को कल्पवृक्ष मिल गया है। कामधेनु भाजपा ले उड़ी है। हाथी पर मायावती का पेटेंट है। घोड़े, रंभा, कौस्तुभमणि और वारुणी के लिए राजनैतिक दल चुनाव लड़ रहे हैं। शारंग आउटडेटेड हो गया है क्योंकि हमने विदेशों से शस्त्र ख़रीदने की कला सीख ली है। जो भी पाञ्चजन्य फूंकता है उसे ध्वनि प्रदूषण फैलाने के जुर्म में पुलिस पकड़ रही है। गंधर्वों के गले चोक हो गए हैं। जनता अमृत मिलने के आश्वासन पर ख़ुशी-ख़ुशी विषपान कर रही है।
दिल्लीवाले बड़े सख़्तजान हैं। जिनको राजनैतिक और सामाजिक प्रदूषण प्रभावित न कर पाया, उन्हें ये धुँए की चादर क्या हिला पाएगी। किसी दिन कोई राजनेता ढिठाई से कह देगा कि दिल्ली गैस चेम्बर बन गई है, तो इसमें बुरा क्या है? लोग चिल्लाते रहते हैं कि गैस महंगी हो रही है। हमने दिल्लीवालों को इस महंगाई से मुक्ति दिला दी है। गैस के लिए अपनी गाड़ी कमाई मत ख़र्चाे, हवा में पाइप लगाओ और मस्ती से खाना पकाओ।
मीडिया किसी इवेंट की तरह इस स्थिति की रिपोर्टिंग कर रही है। सिस्टम और राजनेता, मीडिया को उसी स्टाइल में बयान दे रहे हैं जैसे प्याज़ के दाम बढ़ने पर देते हैं। मीडिया, सिस्टम और सरकारें तत्वज्ञान प्राप्त कर चुके हैं कि जो लोग इस धुँए से बच सकते हैं, वे अगला मुद्दा आते ही इस मुद्दे को भूल जाएंगे; और जो इस धुँए से मर जाएंगे, वे सवाल पूछने नहीं आएंगे। कुछ दिनों में यह धुआँ भी धुआँ हो जाएगा। …सब धुआँ हो जाएगा, एक वाक़या रह जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
राह कितनी भी कठिन हो, हौसला मत छोड़ देना
यह नियत है, हर डगर के अंत में मंज़िल मिलेगी
जो सफ़र पूरे हुए हैं, उन सभी का हाल पूछो
हर विजय की राह हर युग में बहुत बोझिल मिलेगी
राम होने के लिए वन-वन भटकना ही पड़ेगा
भाई की हत्या बिना सुग्रीव निष्कासित रहेगा
जो दशानन के सिंहासन पर सुशोभित हो गया है
वह विभीषण वंशहंता हो के अभिशापित रहेगा
वीर लक्ष्मण की कथाएँ जब खंगालेगा कोई तो
राजमहलों के सुखों में घुट रही उर्मिल मिलेगी
जंगलों को छाँट कर चाहे नगर निर्माण कर लें
रण बिना पूरा हुआ क्या, पांडवों की जीत का पथ
द्यूत, लाक्षागृह, कठिन वनवास और फिर दास जीवन
हर क़दम जर्जर हुआ है न्याय की उम्मीद का रथ
मौन रहकर भी समय को काटना चाहा कभी तो
कीचकों के रूप में निश्चित कोई मुश्किल मिलेगी
भोर की पहली किरण का मार्ग अंधियारा रहेगा
रात के अंतिम पहर को दीप की झिलमिल मिलेगी
प्रेम को सारे ज़माने की घृणा सहनी पड़ेगी
नफ़रतों को हर क़दम पर प्यार की महफ़िल मिलेगी
जिंदगानी के सफ़र में मौत का साया रहेगा
मौत को मंज़िल कहा तो, मौत भी तिल-तिल मिलेगी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
सत्ता चाहे जिसकी भी हो, अहम् नहीं स्वीकार प्रजा को
कर्मकांड से कर्मयोग ने पल में लिया उबार प्रजा को
गोकुलवालो छोड़ो छलिया इंद्रदेव का पूजन करना
पर्वत ढोकर ही मिलता है, जीने का अधिकार प्रजा को
सत्ता की मनमानी का करना होगा प्रतिकार प्रजा को
चुप रहने से निर्भरता का होता व्याधि-विकार प्रजा को
श्रमजीवी भी दान-दया का पात्र बने तो युग कोसेगा
कर्म छोड़ कर कृपा निहारे तो सौ-सौ धिक्कार प्रजा को
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
पृथ्वी पर बड़ी-बड़ी ज़मीनें हैं। जिन पर इंसानों की बड़ी-बड़ी बस्तियाँ हैं। इन बस्तियों को वे गाँव, क़स्बा, शहर, देश और दुनिया कहते हैं, जहाँ दो पैरों से चलनेवाले विचित्र प्राणियों के झुंड रहते हैं। झुंड का प्रत्येक सदस्य एक ऐसे झुंड में रहना चाहता है, जिसमें केवल उसकी बात मानी जाए और केवल उसकी सुविधाओं का ध्यान रखा जाए।
पृथ्वीवासी युगों-युगों से इन झुंडों में एक अदद इंसान तलाश रहे हैं। लेकिन आज तक किसी को कहीं कोई इंसान मिला ही नहीं, क्योंकि जब कोई पृथ्वीवासी ‘इंसान’ तलाशने निकलता है, तब केवल उतनी ही देर के लिए वह ख़ुद भी इंसान बन जाता है, और उस वक़्त के गुज़रते ही वह वापस अपने वर्चस्व वाला झुंड बनाने के लिए किसी झुंड में खो जाता है।
पृथ्वी के दो छोर हैं- उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव। इन दोनों ध्रुवों पर प्रकृति ने जीवन जीने योग्य स्थितियाँ नहीं बनाईं, और बाक़ी पृथ्वी को इंसानों ने जीवन जीने लायक नहीं छोड़ा। प्रकृति ने नदियाँ बनाई थीं, लेकिन मनुष्य ने नदियों से जीवन लेते-लेते, नदियों का जीवन ले लिया। पर्यावरण की चिंता और ईश्वर का भय; ये दोनों ही प्रत्येक मनुष्य ने अपने अतिरिक्त सबके लिए आवश्यक बना रखे हैं। चूँकि मनुष्य की आँखें अपने गिरेबान में नहीं झाँक सकतीं, इसलिए एयरकंडीशन कमरे में बैठकर ग्लोबल वार्मिंग पर बात करने में कोई नैतिक संकट उत्पन्न नहीं होता।
हर झुंड के अपने कुछ नियम हैं, इन नियमों को बनाने का काम ‘सरकार’ का होता है। सरकार उन लोगों का समूह है जो अपनी बातों से ज़मीन पर रेंगते लोगों को आसमान के ख़्वाब दिखा सकें। सपने इतने सच्चे लगने चाहियें कि रेंगनेवालों को अपने कुचले जाने का पता न चल सके। सरकार बनाने के लिए हर झुंड में एक प्रतियोगिता होती है, जिसे ‘चुनाव’ कहते हैं। इस प्रतियोगिता में जो सबसे ज़्यादा झूठा, ढीठ, ढोंगी और बेशर्म साबित होता है उसे विजेता मान लिया जाता है। अपने कार्यकाल में जब ये विजेता लोग जनता को गिड़गिड़ाने और गाली देने तक विवश कर देते हैं तब अगली प्रतियोगिता में अन्य प्रतियोगियों के जीतने की संभावना बनती है। इससे प्रतियोगिता में रोचकता बनी रहती है। प्रतियोगिता के विजेता अन्य झुंडों के विजेताओं से मिलने-जुलने और लड़ने-भिड़ने में समय व्यतीत करते हैं। इन खर्चों को पूरा करने के लिए झुंड के बाक़ी लोग दिन-रात कठोर परिश्रम करके धन की व्यवस्था करते हैं। हर सरकार अपने झुंड के लोगों को बताती है कि उनके झुंड की दूसरे झुंडों के बीच इज़्ज़त बढ़ रही है। ऐसा सुनकर झुंड के लोग नाचने लगते हैं और सरकार के ख़र्चे उठाने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो जाते हैं।
पृथ्वी का मनुष्य भोजन-पानी के बिना जीवित रह सकता है, किन्तु दूसरों के जीवन में ताका-झाँकी किये बिना नहीं जी सकता। किसके जीवन में क्या चल रहा है, किसकी किससे दोस्ती है, किसकी किससे दुश्मनी है, कौन क्या खाकर सोया है, कौन भूखा सोया है… इस प्रकार के लाखों प्रश्न जीवनयापन का कच्चा माल हैं। मनुष्य बड़ी लगन से इन प्रश्नों को जन्म देता है, फिर दिन-रात श्रम करके इनके उत्तर या तो खोज लेता है, या फिर गढ़ लेता है। उत्तर मिलते ही उन्हें लेकर वह दूसरे मनुष्य को पहले मनुष्य की समस्या और अपनी ज्ञानवत्ता से अवगत कराता है। इस प्रक्रिया में जो चर्चा होती है, वही चर्चा मानव जीवन का परम सुख है। सुख के उन्माद में यह चर्चा धीरे-धीरे झूठ और चरित्र-हत्या के हथियारों का पुलिंदा बनकर उस मनुष्य तक पहुँच जाती है जिसके विषय में चर्चा की जा रही थी। अब वह मनुष्य सक्रिय होता है और चर्चा का पीछा करते हुए चर्चा के जनक को तलाशने लगता हैं। चर्चा आगे बढ़ती जाती है और उसका नायक उसके सूत्रों में उलझकर पीछे होने लगता है। अंततः एक दिन वह जनक को तलाश लेता है और फिर कहासुनी, तू-तू-मैं-मैं, गाली-गलौज, झगड़ा, हाथापाई, मारपीट, भिड़ंत, मुठभेड़ और युद्ध तक कुछ भी हो सकता है। इस घटना के अंत में भी विजेता को धर्मात्मा और पराजित को अधर्मी मान लिया जाता है। फिर इस घटना की चर्चा चलती है। फिर युद्ध, फिर चर्चा, फिर युद्ध…. बस इसी तरह यह संसार-चक्र चलता रहता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सत्य, जिसकी हम अभागे खोज करते फिर रहे हैं
वो युगों से वैभवों का दास बनकर जी रहा है
न्याय, जिसकी चाह में जीवन समर्पित कर चुके हैं
वो किसी दरबार में उपहास बनकर जी रहा है
पीर की सिसकी सुनी तो आँख का पानी पिलाया
दर्द बेघर था, उसे अपने बड़े दिल में बसाया
आह बेसुध थी, उसे सम्बल दिया अपनी भुजा का
हिचकियाँ बेचैन फिरती थीं, गले उनको लगाया
कष्ट की आँखें सजल पाकर उसे अपना कहा था
रंगमंचों पर वही, उल्लास बनकर जी रहा है
आपसी विश्वास, छल की छूट का पर्याय भर है
हर शपथ, मन में बसे इक झूठ का पर्याय भर है
धैर्य कड़वा घूँट है, कायर जनों का ढोंग कोरा
दान क्या है, आत्मा की लूट का पर्याय भर है
भाग्य जब हमसे मिला तो, ठूठ-सा था रूप उसका
आजकल वह बाग़ में मधुमास बनकर जी रहा है
ज्ञान, अपनी धूर्तता को, नीति कहने की कला है
धर्म, नियमों को नियति की रीति कहने की कला है
अर्थ है वह उपकरण जो पाप को भी पुण्य कर दे
प्रेम, कोरी वासना को प्रीति कहने की कला है
जो कथानक वास्तविकता के धरातल पर नहीं था
आजकल वह विश्व का इतिहास बनकर जी रहा है
✍️ चिराग़ जैन