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हमारी ज़िंदगानी

अंधेरों की कहानी आफ़ताबों में नही मिलती हक़ीक़त की निशानी चंद ख़्वाबों में नहीं मिलती हमारे दर्द को महसूस करने की ज़रूरत है हमारी ज़िंदगानी इन किताबों में नहीं मिलती ✍️ चिराग़...

कुछ देर मिलन के बाद

दो पल को प्यास मिटाकर तुम घंटों तड़पाया करती हो कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो जब जाड़े की सुबह में तन को धूप सुहाने लगती है सबकी आँखों में जब अलसाई मस्ती छाने लगती है जब उस मीठे-मीठे मौसम में नींद-सी आने लगती है बस तभी अचानक हवा रंग में भंग मिलाने लगती...

वक़्त का हिण्डोला

घर के मुख्य द्वार की देहलीज पर बैठकर दफ़्तर से लौटते पापा की राह तकतीं नन्हीं-नन्हीं आँखें रोज़ शाम आशावादी दृष्टिकोण से निहारती थीं सड़क की ओर …कि पापा लेकर आएंगे कुछ न कुछ चिज्जी हमारे लिए। लेकिन लुप्त हो रही है ये स्नेहिल परंपरा पिछले कुछ वर्षों से बच नहीं पाती...

वर्तमान

मुझे बेबस दिलों में पल रहे अरमान लिखने हैं ग़रीबों के घरों के दर्द और तूफ़ान लिखने हैं कभी मौक़ा मिलेगा तो चमन की बात कर लूंगा अभी फुटपाथ के गलते हुए इन्सान लिखने हैं ✍️ चिराग़...

सियासत का ज़हर

सच के मंतर से सियासत का ज़हर काट दिया हाँ, ज़रा रास्ता मुश्क़िल था, मगर काट दिया वक्ते-रुख़सत तिरी ऑंखों की तरफ़ देखा था फिर तो बस तेरे तख़य्युल में सफ़र काट दिया फिर से कल रात मिरी मुफ़लिसी के ख़ंज़र ने मिरे बच्चों की तमन्नाओं का पर काट दिया सिर्फ़ शोपीस से कमरे को सजाने के लिए...
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