Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
जीत ने मात से रिश्वत ली है
दिल ने जज़्बात से रिश्वत ली है
चांदनी कम है अंधेरा ज़्यादा
चांद ने रात से रिश्वत ली है
फिर से बारिश में चुएगा छप्पर
इसने बरसात से रिश्वत ली है
सब समय की दुहाई देते हैं
सबने हालात से रिश्वत ली है
मुझको लगता है मिरी नींदों नें
कुछ ख़यालात से रिश्वत ली है
कैसे सच्चा जवाब दे कोई
जब सवालात से रिश्वत ली है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
बड़ी अधूरी थी ये ज़िन्दगी जो अब न रही
तुम्हारा प्यार जो पाया तो कुछ तलब न रही
ग़ज़ल मैं तेरे अदब की मिसाल देता हूँ
तवायफ़ों के लबों पर भी बेअदब न रही
तुम्हारी ओर से भी नज़्ा्रे-इनायत तो हुई
मगर जब हमको ज़रूरत थी महज तब न रही
कोई उस जीत को पाकर भला करे भी क्या
जो जीत एक भी मुस्कान का सबब न रही
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
बिना मांगे मुझे सब कुछ मिरा दातार देता है
वो दरिया है जो पत्थर को नया आकार देता है
सरे-महफ़िल मुझे जो बेवज़ह दुत्कार देता है
अकेले में वो मिलता है तो मुझको प्यार देता है
बताओ कौन है मुज़रिम, ग़रीबी या कि वो बापू
जो बच्चों की तमन्नाओं को हर दिन मार देता है
मिरे भीतर के शाइर को कोई व्यापार सिखलाए
ज़माना दर्द देता है तो ये अशआर देता है
फ़साना एक ही होता है शाइर और वीणा का
जो छेड़ो तो तड़पकर इक नई झनकार देता है
कोई कितना भी दुनिया में भटक ले, पर यही सच है
हमेशा आसरा अपना ही घर-परिवार देता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
जहाँ तुमको बस एक पत्थर मिला है
वहाँ हमको जन्नत का मंज़र मिला है
उसे भी ग़ज़ब का मुक़द्दर मिला है
मुक़द्दर में जिसको तिरा दर मिला है
कहाँ कोई ऐसा क़लन्दर मिला है
जिसे मन मुताबिक़ मुक़द्दर मिला है
हुआ एक अरसे के बाद आज तनहा
लगा, जैसे कोई बिछड़कर मिला है
भले चोट की जिस्म पर दोस्तों ने
मगर ज़ख़्म उसका ज़ेह्न पर मिला है
कोई तेरी रहमत को माने न माने
तिरा नाम सबकी ज़ुबां पर मिला है
ज़माना भले उसको समझे न समझे
मगर इक इशारा बराबर मिला है
जिसे जो मिला है वो उसका मुक़द्दर
मुझे जो मिला है वो बेहतर मिला है
कोई उनसे पूछे मुक़द्दर के मानी
जिन्हें तिश्नगी में समन्दर मिला है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Muktak, Poetry
प्यार कब बेज़ुबान होता है
लफ्ज़ बिन दास्तान होता है
आँख तक बोलने लगें इसमें
इक मुक़म्मल बयान होता है
✍️ चिराग़ जैन