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रिश्तों को ज़िंदा रखना

कितना आसान है
रिश्तों को फ़ना कर देना

ज़रा-सी बात को दिल से लगा के रख लेना
ग़ैर लोगों को, रक़ीबों को तवज़्ज़ो देना
शक़ की तलवार से विश्वास को कर देना हलाल
अपने लहजे को तल्ख़ियों के हवाले करना
अपने मनसूबों में कर लेना सियासत को शुमार
सामने वाले की हर बात ग़लत ठहराना
उस की हर एक तमन्ना को नाजायज़ कहना
उसको बिन बात हर इक बात पे रुसवा करना
उसकी हर बात में खुदगर्ज़ियों की करना तलाश
उस से रख लेना बिना बोले समझने की उम्मीद
उसके आगे सदा हँसने का दिखावा करना
अपने हर दर्द की वजह उसे समझ लेना
प्यार को अनकही रंजिश की शक़्ल दे देना
अपनी झूठी अना की दे के दुहाई हर दम
अपने अहसास के अमृत को ज़हर कर लेना
या कि इक पल में ही अपनों को ग़ैर कर देना…….

कितना मुश्क़िल है मगर
रिश्तों को ज़िंदा रखना!

✍️ चिराग़ जैन

ख़ुद से मुख़ातिब

कितना आसान है
दुनिया को ग़लत ठहराना

थोड़ा चालाक रवैया
ज़रा-सी अय्यारी
झूठ को सच बना देने का क़रामाती गुर
थोड़ी कज़बहसी
थोड़ी ज़िद्द
ज़रा-सी लफ़्फ़ाज़ी
तेज़ आवाज़ औ’ मुद्दों को घुमाने का हुनर
चन्द सिक्कों से ख़रीदे हुए दो-चार गवाह
और इक इन्तहा बेअदबी की
ढिठाई की….

….कितना मुश्क़िल है मगर
ख़ुद से मुख़ातिब होना!

✍️ चिराग़ जैन

अंतर्मुखी

ख़ुशी की लाश उठती है ख़ुशी की चाह के नीचे
बहुत से ज़ख्म होते हैं ज़रा-सी आह के नीचे
हमारे दिल की बातें दिल में ऐसे दब के रहती हैं
कि जैसे पीर सोता हो कोई दरगाह के नीचे

✍️ चिराग़ जैन

चांदनी से रात बतियाने सहेली आ गयी

चांदनी से रात बतियाने सहेली आ गयी
कुछ मुंडेरों के मुक़द्दर में चमेली आ गयी

पैर भी सुस्ता लिये, आँखों ने भी दम ले लिया
ज़िंदगी की राह में, दिल की हवेली आ गई

झाँकता है हर कोई ऐसे दिल-ए-नाशाद में
जैसे आंगन में कोई दुल्हन नवेली आ गई

बोझ कंधों का उतर कर गिर गया जाने कहाँ
जब मेरे सिर पे बुज़ुर्गों की हथेली आ गई

तीरगी का ख़ौफ़, सन्नाटे की दहशत थी मगर
इक किरण सूरज की धरती पर अकेली आ गयी

✍️ चिराग़ जैन

रोटी

पेट को जब भूख लगती है
तो अक्सर पाँव सबके
घर से बाहर आ निकलते हैं
भूख के कारण सभी
प्राणी, परिन्दे, जानवर
सब कीट और इन्सान तक
संघर्ष करते हैं

तितलियाँ लड़ती हैं अक्सर आंधियों से
चींटियाँ चलतीं कतारों में
निकलकर बांबियों से
साँप, बिल को छोड़कर फुफकारते हैं
शेर, तजकर मांद को
भीषण दहाड़ें मारते हैं

भेड़िये, चीते, बघेरे
मृग, मगर और मीन
सब भोजन कमाने को
घरों का त्याग करते हैं
परिन्दे, दानों की ख़ातिर
खोलते हैं पर
फुदककर नीड़ से बाहर निकलते हैं

और इन सबकी तरह
इंसान भी
दो वक़्त की रोटी कमाना चाहता है

हाँ,
कमाने के तरीक़े भी
सभी के एक से हैं।
छीनना, लड़ना, झपटना, मांगना
या सोखना और चाटना
जूठन उठाना
या किसी की हसरतों का क़त्ल करके
पेट की ज्वाला बुझाना

फ़र्क़ है तो सिर्फ़ इतना
और सब
सुब्ह निकलकर
शाम तक घर लौट आते हैं
फिर से सूनी बांबियों में
घोसलों में
प्यार की दुनिया बसाते हैं

आदमी, पर इक दफ़ा
जब रोटियाँ लाने निकलता है
तो फिर घर लौट कर
वापिस नहीं आता!

✍️ चिराग़ जैन

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