Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
आप रेडलाइट पर खड़े हैं अचानक आपके पीछे कोई हॉर्न बजाने लगता है। उसको इस बात पर आश्चर्य है कि जब कोई पुलिसवाला नहीं खड़ा तो आप रेडलाइट का सम्मान क्यों कर रहे हो? आप बाजार से गुज़रते हैं। बीच सड़क पर कोई स्कूटर पार्क कर गया है। सारा ट्रैफिक रुक गया है। सबको परेशानी हो रही है। दस-पंद्रह मिनिट बाद स्कूटर का मालिक बेशर्मी से फोन कान पर लगाए आता है और स्कूटर स्टार्ट करके निकल जाता है।
सब लोग “उसके जाने के बाद” कुछ अपशब्द टाइप बड़बड़ाते हुए अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं। नो पार्किंग के बोर्ड के ठीक नीचे पार्किंग करने वाले लोग; नो राइट टर्न से दाएं मुड़ने वाले लोग; यू-टर्न को ब्लॉक करने वाले लोग; पार्क के बेंच पर च्विंगम चिपकाने वाले लोग; बस की सीट फाड़ने वाले लोग; पैट्रोल पम्प पर पेट्रोल चुराने वाले लोग; अपने दूर के रिश्तेदार की पहुँच पर इतराने वाले लोग; चौराहों पर भीख देने वाले लोग; आसाराम की रिहाई के लिए जंतर-मंतर पर धरना देने वाले लोग; रेल लाइनों पर गंदगी फेंकते लोग; बिजली-पानी की चोरी करते लोग; रामपाल के लिए सेना को पथराने वाले लोग; रामवृक्ष के लिए पुलिस को दबोचने वाले लोग; रामरहीम के लिए देश जलाने वाले लोग और माँ की कसम देकर मेसेज फारवर्ड करने वाले लोग ….इन्हीं सब लोगों से मिलकर हमारे देश की जो तस्वीर बनती है उसमें सरकारी योगदान अथवा निकम्मेपन की कोई भूमिका नज़र तो नहीं आती लेकिन फिर भी हम अपने हर सामाजिक व नैतिक अपराध को सरकार तथा सिस्टम की ओट लेकर छुपा देने के अभ्यस्त हो गए हैं।
मैं सरकार और सिस्टम की तरफदारी या विरोध न करके केवल इतना भर सोचना चाहता हूँ कि जो सुई पिछले सात दशक से सिस्टम की ख़राबी पर अटकी है उसे एक बार जनता की अथक ईमानदारी से आगे क्यों नहीं बढ़ाया जा सकता! क्या आवश्यक है कि बर्बरीक बनकर इस देश की महाभारत को एकटक निहारते रहा जाए और हर मृत जयद्रथ तथा अभिमन्यु को वीरता के ख़िताब की डुगडुगी थमाकर उससे निंदा का रस प्राप्त किया जाए?
क्या एक सप्ताह मात्र के लिए हम यह प्रयोग नहीं कर सकते कि सरकारी नीतियों के उलाहनों को छोड़कर हम आत्म अनुशासन से इस देश की छोटी छोटी समस्याओं को बढ़ने से रोक पाएं। क्या अपने बच्चों को कल सड़क पर बेहिचक चलने देने के लिए आज हम अपनी गाड़ी थोड़ी दबा कर पार्क नहीं कर सकते? क्या कल अपनी बिटिया के निडर जीने की सुविधा देने के लिए आज अपने बेटों को संस्कार का छोटा-सा पाठ नहीं पढ़ा सकते। क्या कल अपने देश पर फख्र करने के लिए आज अपने आलस्य व प्रमाद का त्याग नहीं कर सकते? क्या हम देश को बदलने की ख़्वाहिश के लिए अपनी आदतों को सुधारने की कोशिश नही कर सकते!!!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Muktak, Poetry
इक कमीशनखोर से उसकी कमीशन छीन ली
उसने मासूमों से सारी ऑक्सीजन छीन ली
हाकिमों ने वहशियों के साथ बस इतना किया
दे के उनको ट्रांसफर उनकी डिवीजन छीन ली
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
गोरखपुर मुआमले जैसे महापाप के सूतक की ज़िम्मेदारी एक बार फिर सरकारी दफ्तरों की कार्यशैली ने ली है। पाकिस्तान में जब स्कूली बच्चों की लाशें बिछीं तो पूरे विश्व ने आतंकवाद से मिलकर लड़ने की शपथ उठाई थी। आज जब हमारे मुल्क में नन्हीं किलकारियों की प्राणवायु तक दफ्तरी छीन ले गए तो इस हिंसक व्यवस्था के साथ एकजुट होकर लड़ने के लिए हम क्यों शपथ नहीं ले सकते।
स्थितियां इतनी विकराल हैं कि “ईमानदारी” के साथ आप ड्राइविंग लाइसेंस तक नहीं बनवा सकते हैं और बेईमान होते ही आप कुछ भी कर सकते हैं। “चप्पल घिसना”; “एड़ियां रगड़ना”; “धक्के खाना”; अड़ंगा लगाना”; “पेंच फँसना”; “जुगाड़ भिड़ाना” और “ले-दे के करवाना” जैसे मुहावरों से सुसज्जित हमारे सरकारी कार्यालय स्वाधीनता दिवस के अवसर पर हर साल रौशनी में नहा जाते हैं लेकिन देश के भीतर का अंधेरा कम होने का नाम नहीं लेता। किसी दफ़्तर में आपका सामान्य-सा काम भी पड़ जाए तो इस हद तक हैरासमेंट होता है कि अराजक हो जाने का मन करने लगता है।
फॉर्म के एक कॉलम में चूक हो जाए तो खिड़की पर बैठा बाबू आपको इस तरह लताड़ता है जैसे किसी बलात्कारी को रंगे हाथ पकड़ लिया हो। किसी काग़ज़ की फोटोकॉपी करवानी पड़ जाए तो दफ्तरी आपको यह भी नहीं बताएगा कि फोटोकॉपी होगी कहाँ से। बाबू से कोई सवाल पूछ लो तो ऐसे हिक़ारत से देखा जाता है मानो उसकी जेब काट ली हो। चपरासी भी प्रतीक्षा करने वालों के साथ ऐसे बर्ताव करता हो जैसे किसी इकलखौन्डी बहू के घर उसकी ननद छह महीने से पड़ी हो।
दो और दो चार जैसे सामान्य सवाल को भी इतना जटिल बना दिया जाता है कि आदमी गिनती भूल जाए। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर और नर्स तो हैं ही; सफाईकर्मी तक किसी भी मरीज़ या उसके परिजन को अकारण धकियाने और लताड़ने के लिए अधिकृत होते हैं। रेलवे में किसी की इतनी औक़ात नहीं है कि पूछताछ खिड़की के उस पार बैठे साहब से रेल के लेट होने का कारण पूछ सके। अदालतों में जज साहब ग़लत समय पर छींकने के जुर्म में भी किसी पर अवमानना का अभियोग चला सकते हैं। और थाने तो दैवीय प्रकोप के महाभवन हैं ही।
पुलिसवाले जनता के बीच जब गाना बजाते हैं “पुलिस- आपके लिए आपके साथ” तो ऐसा सुखद अनुभव होता है मानो फरिश्तों ने खाकी पहन कर क़ौम की खिदमत का बीड़ा उठाया हो। पुलिस के जनहित में जारी विज्ञापन देखो तो ऐसा महसूस होता है मानो पूरी पुलिसफोर्स आपके पैर पकड़ कर गिड़गिड़ा रही हो कि हे जनता जनार्दन! हमारा कर्तव्य है कि आपको कोई कष्ट न हो। हमें हमारा फ़र्ज़ अदा करने का मौका दो माई-बाप! ….लेकिन अगर किसी दिन आपको थाने के दर्शन करने पड़ जाएं तो ये सारे विज्ञापन आपके पीछे तालियाँ पीट-पीट कर नाचते हुए गाना गाने लगते हैं – “अप्रैल फूल मनाया, तो उनको गुस्सा आया…”।
व्यवस्था की यह घिनौनी तस्वीर न तो जनता से छिपी है न ही सरकार से। ऐसे में किसी भी नेता की या समाजसुधारक की इच्छा शक्ति संक्रमित पतीले में दूध की तरह व्यर्थ है। सरकार संसद में बैठ कर योजनाएं बनाती है और बाबू उस योजना का सागर मंथन करके उसमें से लक्ष्मी जी के अवतरण का उपाय खोज लेते हैं। रेड लाइट जम्पिंग रोकने के लिए चालान की राशि बढ़ाकर सौ से पांच सौ की जाती है तो रेडलाइट के पार पेड़ की ओट में अपराध करने का अवसर देने वाले सार्जेंट के ईमान की क़ीमत पचास रुपये से बढ़कर स्वतः ही दो सौ हो जाती है।
भारत में कई नेता ऐसे हुए हैं जो सचमुच इस देश को एक लोककल्याणकारी गणराज्य बनाने का स्वप्न देखते थे। लेकिन उन सब स्वप्नों की फाइलें टूथपिक से कान खुजाते किसी बाबू के बासी चाय के झूठे कप के नीचे दबी धूल खा रही हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Gorakhpur Case, Children dead in hospital due to shortage of Oxygen.
Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose, Story
नोटबंदी की आठवें दिन मैं अपने मकान मालिक को किराया देने पहुँचा तो मकान मालिक अड़ गया, बोला ‘मैं तो कैश ही लूंगा।’ मैंने कहा कि बैंक से पैसे निकल नहीं पा रहे हैं और वैसे भी अब प्रधानमंत्री जी ने नक़द लेनदेन से बचने की अपील की है।
मकान मालिक नहीं माना और बोला ‘मैं तो कैश ही लूंगा, कैश न दे सको तो मकान खाली कर दो।’
मुझे इस ज़िद्दी रवैये पर बहुत क्रोध आया और मैंने पुलिस को फोन मिलाया।
पुलिसवाला आया और दोनों को सामने बैठा कर बोला- “मैं भी कैश ही लूंगा।”
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
श्रद्धेय राजनीतिज्ञो!
स्वाधीनता के सात दशक बीत चले हैं। इतनी लंबी अवधि किसी भी समाज में विसंगतियों और विद्रूपताओं के प्रवाह हेतु पर्याप्त है। सामान्यतया स्वाधीन हो चुके समाजों में अचानक पनपे अधिकार भाव के कारण इस प्रकार की स्थितियां सहज पनप जाती हैं। किन्तु आप दूरदर्शी लोगों ने स्वाधीन हो जाने के बावजूद महान भारतवर्ष को ऐसे पुंछल्लों में उलझाए रखा कि किसी प्रकार के विकार को पनपाने योग्य समय ही उनके पास शेष नहीं रहा।
समाज विकास की अंधी होड़ में पाश्चात्यता का दास न बन जाए; इस हेतु आप उन्नीसवीं शताब्दी में मर चुकी जातिप्रथा की सड़ी हुई लाश को अपने कंधे पर ढो कर लाए और समाज के बीच उसे पटक दिया। आज़ादी की लड़ाई के उन्माद में जो समाज इसे भूल चुका था, वह पुनः इसके गले-सड़े अंगों से खेलने में मशगूल हो गया।
अंत्योदय और पंचशील जैसे ठाली बैठे के कामों में हमारा नौजवान फँस कर न रह जाए इस हेतु आपने बेरोज़गारी के पैरों पर अपनी पगड़ी रख दी कि वह इस मुल्क़ को छोड़ कर न जाए। आपकी इस अनुनय से पिघल कर महान बेरोज़गारी ने अपना बंधा हुआ बोरिया खोला और इस देश के हर मुहल्ले में अपनी पैंठ बनाई।
परदेसियों के अधीन रहे इस समाज में शासन को शत्रु समझने का भाव घर कर गया था, इस समस्या को ध्यान में रखते हुए आपने जनहित में एक ऐसा अलिखित संविधान तैयार कर डाला जिसमें सरकारी करों के भुगतान का मार्ग अवरुद्ध हो ही न सके। लिखित संविधान के अनुसार सरकार जनता से विविध कर वसूल कर अपने कोष में एकत्र करती है और फिर उस कोष से सड़क, बिजली, जल, शिक्षा, सुरक्षा, न्याय आदि की मूलभूत सुविधाएँ जनता के लिए मुहैया कराई जाती हैं। लेकिन आपका अलिखित संविधान कर प्राप्ति और जनहित के इस अनावश्यक रूप से लंबे तरीके पर विश्वास नहीं करता।उसके अनुसार FIR लिखने और झगड़ों का निपटारा करने के एवज में दरोगा जी; सड़क पर चलने वाले करदाता से ट्रैफिक सार्जेंट और इसी प्रकार एन्य जनसेवक अपने-अपने हिस्से का कर बिना किसी रसीद के सीधे वसूल लें। इस महान प्रणाली से रसीदों में नष्ट होने वाली लुगदी की ख़ासी बचत हुई है।
चुनाव के समय पूरा विश्व हमारे देश की ख़बरों पर निगाह गड़ाए रहता है। ऐसे में भुखमरी, ग़रीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की विफलता, अस्वच्छता, गुंडागर्दी, पुलिसिया भ्रष्टाचार और सामाजिक न्याय जैसे टुच्चे और पुरापाषाणयुगीन मुद्दों पर चुनाव हों तो इससे वैश्विक समाज में हमारी छवि का ह्रास होगा।इस समस्या के समाधान हेतु आप लोगों ने सारी बुराई अपने कन्धों पर उठाते हुए गाली-गलौज, बेतुके बयान, सूट के रेट, घोड़े की टांग, बर्थडे केक के साइज़, गौरक्षा और राममंदिर जैसे मुद्दों को आपने न केवल पैदा किया अपितु अपनी-अपनी पार्टी के कोष की गाढ़ी कमाई व्यय करके इन्हें मीडिया और प्रोपगंडा के माध्यम से हवा भी दी। कई बार तो दंगों में हज़ारों देशभक्तोंकी आहुति देकर भी अपने मूलभूत मुद्दों को सिर उठाने से रोका है।
व्यवस्था को यद्यपि जनता के हित हेतु निर्मित किया जाता है किन्तु आपने ऐसा जादू घुमा रखा है कि आरामकुर्सी पर पसरी व्यवस्था और शासन सुख भोग रहे व्यवस्थापकों के सुख में खलल डालने के उद्देश्य से चलने वाला हर फरियादी दफ्तरों, थानों, अदालतों और खिड़कियों के चक्कर काट-काट कर चप्पलों के साथ-साथ ख़ुद भी घिस गया लेकिन किसी अफ़सर या कुर्सी के कान पर जूं तक न रेंगा सका।
गली के बच्चे-बच्चे को पता होता है कि फलां घर में सेक्स रेकेट चलता है। पच्चीस रुपल्ली ख़र्च करने की औक़ात रखने वाले हर शराबी को पता होता है कि नक़ली शराब कहाँ मिलती है। चरस, गांजा, अफ़ीम, सुल्फा और ड्रग्स का किस नुक्कड़ पर खोखा है। कौन अपने यहाँ जुआ खिलवाता है, कौन क्रिकेट पे सट्टा लगवाता है, किसके यहाँ आधी रात को भी शराब मिल जाएगी -ये बातें हर ऐरे-गैरे-नत्थूखैरे को पता होती है लेकिन आपने अपने कानून के लंबे हाथों को सिस्टम की आँखों के ऊपर से लपेटते हुए अपने कानों तक इस तरह से बाँध दिया है कि इन काली गलियों की अंधियारी से इस महान राष्ट्र की व्यवस्था काली न पड़ जाए।
इस देश को इस दशा तक लाने में आपने जैसा दिन-रात परिश्रम किया है वैसा तो कोई अपनों के लिए भी नहीं करता। आपकी इन सेवाओं के प्रतिफल में अब काश श्रीकृष्ण आपको इस संसार के कष्टों से मुक्त कर अपने जन्मस्थान पर विश्राम करने के लिए उचित व्यवस्था करें।
✍️ चिराग़ जैन