Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
मौन लम्हों को पकड़कर शब्द में साकार करना
भावसागर से अमिय का घट जुटाने-सा कठिन है
कल्पना में कौंधते लाखों विचारों से उलझना
इक उफनती बाढ़ को काबू में लाने-सा कठिन है
राम का दुःख तब कहा जब रह गए तुलसी अकेले
मेघदूतम् के रचयिता ने विरह के कष्ट झेले
कृष्ण की इक बावरी ने विष पिया जीवन गँवाया
सूर के अंधियार में ही रौशनी के खेल खेले
अनुभवों की देह छूकर, शब्द में जीवन पिरोना
साँस से अहसास की क़ीमत चुकाने सा कठिन है
दूसरों को बाँट कर देखो कभी अपना उजाला
क्यों कबीरा ने लुकाठी से घरौंदा फूँक डाला
सीकरी की भेंट ठुकराना निरी दीवानगी है
प्राण से प्यारी सुता खोकर बना कोई निराला
आँसुओं को आँख में ही रोक कर स्याही बनाना
धमनियों में वर्णमाला को बहाने-सा कठिन है
सो गया शहरे-अवध में रोते-रोते मीर कोई
फै़ज़ होने के लिए पहने रहा ज़ंजीर कोई
गै़र मुमकिन है बिना अनुभव के वारिस शाह होना
उस बशर ने खोई होगी ज़िन्दगी में हीर कोई
ज़ख़्म की हर टीस को दिलचस्प-सा क़िस्सा बनाना
चोट खाकर महफ़िलों में खिलखिलाने-सा कठिन है
गीत लिखकर गीत ऋषियों ने असीमित दर्द ढाँपा
शायरों को इल्म है किस शाख़ पर कब फूल काँपा
जेल की दीवार पर अशआर हिम्मत से लिखे पर
पुत्र के सिर का कलेवा कर नहीं पाया बुढ़ापा
भाव, पारे की तरह छूने नहीं देता स्वयं को
काव्य रचना ओसकण से घर बनाने-सा कठिन है
भावनाओं के प्रसव का मिल गया वरदान कवि को
अश्रु पीकर बाँटनी होगी सदा मुस्कान कवि को
मुश्क़िलों की हर परत को खोल कर छूना पड़ेगा
ज़िन्दगी मिलती भला कैसे बहुत आसान कवि को
एक जीवन में सभी की भावना को शब्द देना
हर पहर मरते हुए जीवन बिताने-सा कठिन है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सूर्य चलकर आ गया है देहरी तक
द्वार की साँकल इसी पल फँस गई है
भाग्य सब वैभव लुटाने को खड़ा है
किसलिए मुट्ठी इसी पल कस गई है
रंग-भू पर जब हुआ अपमान, तब ये आस रक्खी
एक दिन रणक्षेत्र में गाण्डीव भी दो टूक होगा
शर बताएंगे कभी जब गोत्र मेरी वीरता का
राजसी वैभव पगा जयघोष उस क्षण मूक होगा
जब समर में सामने है पार्थ मेरे
क्यों उसी पल भूमि ऐसे धँस गई है
क्या करे जीवट अगर हर आस दामन छोड़ जाए
लड़खड़ाती झांझरों का ताल से संबंध क्या है
ताश के घर से कई सपने संजोए पुतलियों में
धैर्य के क्षण का भला भूचाल से संबंध क्या है
ईश जाने कौन-सी दुर्भाग्य रेखा
आज जीवन रेख के संग बस गई है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सघन तलाशी समय करेगा, धीरज के गठरी-झोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
देख रही हैं उनकी आँखें, षड्यंत्रों के दृश्य घिनौने
फिर भी त्याग नहीं पाए वे, अपने संयम के मृगछौने
सूरज पूजा करता होगा, श्वासों में भड़के शोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
सच जबड़े भींचे बैठा है, झूठ निरंतर बोल रहा है
अपराधों के उत्सव में बस, निर्दोषों का मोल रहा है
मासूमों की किलकारी ही, आज चुनौती हथगोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
सहना है तो सह ही लेंगे, कठिन समय की पीर विजेता
कुछ मुठभेड़ों से उकताकर, तनिक न खोते धीर विजेता
प्राण गँवाकर और बढ़ेगी, रंगत बासंती चोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
मंज़िल की धुन में राह के मंज़र निकल गये
ख़ुशियों के गाँव आए तो छूकर निकल गये
कुछ लोग ज़िन्दगी का अर्थ बूझते फिरे
कुछ लोग इसे शान से जीकर निकल गये
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
हम तरसते रहे रेशमी भोर को
रात भर सिलवटें कसमसाती रहीं
इक सुक़ूं के लम्हे की तमन्ना लिए
साँस आती रही साँस जाती रही
आँख में इक समंदर सँजोए हुए
घाट का रोज़ अपमान करती चली
प्यास की कोर पर अश्रु ठहरा रहा
पर नदी सिर्फ़ मद में अकड़ती चली
चाल भारी हुई, देह खारी हुई
डूब कर देर तक थरथराती रही
बालपन कट गया यौवनी आस में
और यौवन बुढ़ापे की चिंताओं में
कर्म निर्भर रहा बाजुओं पर मगर
हाथ उलझे रहे भाग्य रेखाओं में
ज़िन्दगी मौत की राह तकती रही
मौत जीवन से बचती-बचाती रही
✍️ चिराग़ जैन