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होली; मनुष्य को भीतर से बाहर तक एकरूप कर देने का त्योहार। होली; अलग-अलग रंगों के एकरंग हो जाने का अवसर। होली; शालीनता और नैतिकता के बोझ को किनारे रखकर कुछ क्षण स्वाभाविक हो जाने का पर्व। होली; सभ्यता के आडम्बर से मुक्त होकर सहजता की धारा में डुबकी लगाने का रिवाज़।
होली के दिन आपमें कृष्ण साकार होते हैं। मैं बचपन से कृष्ण के दैहिक वर्ण का विचार करता रहा हूँ। सुविधा के लिए साँवरे के विग्रह को काले या नीले रंग से दिखाने की परम्परा है किन्तु मैंने अपने आसपास इतना काला या ऐसा नीला रंग किसी मनुष्य की काया का देखा नहीं है।फिर एक दिन होली खेलते समय मुझे अनुभूत हुआ कि गुलाबी, बैंगनी, हरा, लाल, पीला, नीला और भगवा रंग जब स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे में समाहित हो जाते हैं तो इस सम्मिलन से जो अनोखा सा रंग चढ़ता है, वही साँवरे का रंग है। जिसके लिए रंग शास्त्रियों ने कोई नाम तय नहीं किया है। यही साँवरा है। यही कन्हैया है। यही ब्रज का रंग है। यही फागुन का रंग है।
नियम और नीतियों ने नाप-तोलकर जिस मनुष्य को सभ्यता के शोकेस में सजा रखा है, उसको कुछ क्षण के लिए मन से जीने का अवसर देता है, होली का त्योहार। विवशता के रिंग मास्टर ने जिस शेर को सर्कस का जोकर बनाकर छोड़ दिया है, उसे एक बार पूरे सिंहत्व के साथ जंगल में दहाड़ने का मौक़ा देता है होली का पर्व।
नीतियों के इशारे पर किसी मशीन की तरह जिये जा रहे इंसान को एक बार उच्छृंखल होने का निमंत्रण देता है होली का दिन। अपने भीतर घुट रहे पागलपन को बाहर निकाल फेंकने का महोत्सव है होली।
हज़ारों वर्ष तक सभ्यता लपेटे घूम रहे व्यवस्थितों को देखकर शनैः-शनैः हमारा पूरा समाज सभ्यता लपेटकर घूमने लगा। जो पदार्थ कम उपलब्ध हो उसकी क़ीमत बढ़ने लगती है। प्राकृतिक रूप से जी रहे मानव ने जब करीने के परिधान से सज्ज मानव देखे होंगे तो उन जैसा बनने की होड़ लग गई होगी। यह होड़ बहुत ख़तरनाक होती है। इसका परिणाम यह हुआ कि पूरा समाज सभ्यता ओढ़कर घूमने लगा।
मानव इस हद्द तक सभ्य हो गया कि सभ्यता से ऊब होने लगी। इसलिए ज्यों ही होली पर कोई शंकर जी का बाराती बना बेलौस दिखाई देता है तो हम तुरंत उसकी देखादेखी अपना सभ्यता का आवरण उतार फेंकते हैं।
सभ्य से सभ्य मनुष्य भी जिस क्षण झिझक का खोल तोड़ता है ठीक उसी क्षण वह पूर्णतया प्राकृतिक हो उठता है। शादी-ब्याह में जब नाचने का अवसर आता है तो सभ्यता की झिझक से बंधे लोग किनारे खड़े तरसते रहते हैं और झिझक छोड़कर सहज हुए मनुष्य बेतरतीब नाचने लगते हैं। इस झिझक ने हमें अनेक आनन्दों से वंचित किया है।
होली इस झिझक के खोल से बाहर निकलने का महोत्सव है। चुटकी, रंगबाज़ी, हुड़दंग, ठिठोली, छेड़छाड़, मज़ाक़, गाली-गलौज… ये सब सभ्यता और नैतिकता के व्यामोह को ग़ायब कर देते हैं। हाइजीन-कॉन्शियस लोग जब रंगे हुए हाथों और पुते हुए दाँतों से गुंजिया खाते हैं तो मैनर्स का भूत किसी फटे हुए गुब्बारे-सा ज़मीन पर लोटता दिखाई देता है।
अनावश्यक संबोधनों पर अपनत्व की गालियाँ हावी होने लगती हैं। कल्फ़ लगे कपड़े पहननकर एटिकेट्स के साथ साइलेंटली चलने-फिरने वाले पुतले यकायक भीगे, फटे और रंगे हुए कपड़ों में नाचते हुए सड़कों पर जीवंत हो उठते हैं।
मोबाइल के स्पीकर को होंठों से चिपकाकर न्यूनतम स्वर में बात करने वाले जेंटलमैन अपने गले को लाउडस्पीकर बनाकर जब हो-हल्ला करते हैं तो आवाज़ अपना वास्तविक अर्थ ग्रहण करती है।
होली का यह अवसर हँसने का अवसर होता है। जो दिखे, उस पर हँसी छूट जाती है। और आनन्द यह कि जब हम उस पर हँसने के लिए दाँत निकालते हैं तो हमारे दाँतों की शेड देखकर वह हम पर हँसने लगता है। उसे स्वयं पर हँसते देखकर हम और हँसते हैं।
अपमान, उपहास, बेइज़्ज़ती, इन्सल्ट और ईगो जैसे शब्द इस समय बेमआनी हो जाते हैं। नियमों की क़ैद से मुक्त होकर पूरा वातावरण ठहाके लगाने लगता है। छद्म शालीनता रंगों की बरसात में धुल जाती है। हवा में उड़ता गुलाल बालों के बीच विराजने लगता है तो सिर पर चढ़ चुका ‘लोग क्या कहेंगे’ का भय भाग जाता है।
कदाचित भारत के अतिरिक्त भी कुछ समाज, मनुष्य के भीतर के पागलपन को बाहर निकालने के लिए कोई आयोजन करते हैं; किन्तु संबंधों के भीतर पनप गयी कुंठाओं को उखाड़ फेंकने के लिए होली से बेहतर कोई अन्य अवसर किसी के पास नहीं है।
अगर आपने अब तक होली से परहेज किया है और आज तक स्वयं को इस उत्सव-धारा से अछूता रखा है तो मुट्ठी में अबीर लेकर अपनी ही उंगलियों से ख़ुद के गालों पर लगा लो… आपको ख़ुद से मुहब्बत हो जाएगी।
✍️ चिराग़ जैन
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शिव… जहाँ पीड़ा और उत्स एकाकार हो जाते हैं।
शिव… जहाँ काव्य के नौ रस बिना किसी भेदभाव के एक साथ रहते हैं।
शिव… जहाँ सृष्टि के समस्त भावों को प्रश्रय मिल जाता है।
शिव… जिसके द्वार किसी के लिए भी बंद नहीं हैं। बल्कि यूँ कहा जाए कि जहाँ द्वार जैसा कुछ है ही नहीं। शिव तो द्वाररहित हैं। शिव तो मार्गरहित हैं। मार्ग, द्वार, यात्रा ये सब तो भौतिक शब्द हैं! शिव इन सबसे परे हैं। शिव कोई संज्ञा नहीं हैं, वे तो एक घटना हैं। वे तो घटित होते हैं।
और घटना का कोई मार्ग अथवा द्वार नहीं हो सकता। वह तो कहीं भी घटित हो जाए। उसके घटित होने का बाद उस स्थल का मार्ग अथवा द्वार अवश्य हो सकता है। किंतु वह उस वैराट्य का स्मारक मात्र होगा। द्वार और मार्ग से जहाँ कोई पहुँचेगा वहाँ उसे उस घटना के चिह्न मिल सकते हैं… घटना तो घटित हुई और विलीन हो गयी।
इसीलिए शिव तक पहुँचने के लिए कहीं जाने की आवश्यकता ही नहीं है। इसीलिए शिव का स्वरूप किसी प्रदेश, लोक जाति, देश, वर्ण, नस्ल, वर्ग, ग्रह, योनि, काल अथवा धर्म तक सीमित नहीं है। शिव असीम हैं। उन्हें जो देखे वो उसे ‘अपने’ लगते हैं।
शिव किसी एक के हो भी कैसे सकते हैं। शिव तो सबके हैं। सबकी पीड़ा का निदान हैं। शिव किसी भी प्रकार के परहेज से परे हैं। भूत, प्रेत, व्यंतर, मनुष्य, नाग, नक्षत्र, पशु, नदी, पर्वत, सुर, असुर और यहाँ तक कि मसान तक को शिव से अपनत्व मिल जाता है।
शिव के अर्द्धांग में प्रतिष्ठित पार्वती प्रेम का अस्तित्व हैं तो शिव के कण्ठ में विद्यमान विष उनके वात्सल्य का द्योतक है। चिताभस्म का लेप वैभत्स्य को जीवंत करता है, त्रिशूल पर ओज विराजित है और जटाओं से प्रस्फुटित गंगा आश्चर्य उत्पन्न करती है। शिव के गणों में हास्य के दर्शन होते हैं और हृदय में करुणा वास करती है। त्रिपुण्ड के मध्य स्थित नेत्र उन्हें रौद्र कर देता है तो निमीलित नयनों से वे अपने निर्वेद होने की सूचना देते हैं।
शिव के चरण पर्वत पर हैं और शीश पर चंद्रमा विद्यमान है। यह स्वरूप शिव के वैराट्य का प्रमाण है। मृगछाल और गंगोद्गम उनके प्राकृतिक होने का उद्घोष है। शिव समाधान का पर्यायवाची है। वहाँ समस्या कोई है ही नहीं। सभी समस्याओं के समाधिस्थ हो जाने की स्थिति है शिव। इस अद्भुत स्वरूप में किसी परहेज की संभावना ही नहीं है। वहाँ सब स्वीकार्य है। शिव के लिए ‘कुछ’ बनना नहीं पड़ता। शिव को पाने के लिए कुछ ओढ़ना नहीं पड़ता।
वहाँ तो ठीक वैसे ही पहुँचा जा सकता है, जैसे आप हैं। जितने अधिक स्वाभाविक होते जाएंगे, शिव का नैकट्य उतना ही अधिक होता जाएगा। कृत्रिमता हटी और शिव घटित हो गये। बनावट का विलीन हो जाना ही शिव का घटित होना है। विश्व में जो-जो असम्भव है, वह सब भी शिव के यहाँ सम्भव हो जाता है। वहाँ नकार है ही नहीं। वहाँ तो सब कुछ साकार है। वहाँ सब कुछ सम्भव है।
शिव का स्वीकार इतना बड़ा है कि उसके आगे कोई अस्वीकार टिक ही नहीं पाता। वे संसार के समस्त भावों को एक सरीखा स्वीकार कर लेते हैं। अन्यत्र आपको ऐसा कहीं नहीं मिलेगा। अन्यत्र ऐसा कहीं तलाशने भी न लगना। मन के भीतर घट रहे हर ‘अजीब’ को शिव के अतिरिक्त कहीं व्यक्त किया तो पागल कहलाओगे। किन्तु शिव के यहाँ सब स्वीकार्य है। वहाँ मन को खोलकर रख देना। वहाँ हर आवरण हटा देना। वहाँ हर नियम के दायरे से बाहर निकल आना। वहाँ हर नैतिकता के खोल से ऊपर उठ जाना। क्योंकि वहाँ कुछ अनैतिक नहीं। वहाँ कुछ अराजक नहीं। वहाँ कुछ अनावृत नहीं… वहाँ तो सब सहज ही सहज है।
इसलिए शिव को पाने की तपस्या सहज हो जाने की तपस्या है। सहज होने के लिए सर्वाधिक तपस्या करनी पड़ती है। बनावट के लिए तो दुनिया भर के पार्लर खुले हुए हैं। बनावट के लिए तो दुनिया भर के मठ, धर्मस्थल, विद्यालय, संस्थान, इदारे खुले हुए हैं। लेकिन सहज होने के लिए कोई इंस्टीट्यूट नहीं है। इन सब संस्थानों और इदारों से बच निकले तो आप शिव के निकट आ जाएंगे। स्वाभाविक होना सबसे कठिन काम है। क्योंकि इसमें कुछ करना नहीं होता। सायास कुछ न करना सबसे कठिन है। क्योंकि जब-जब कुछ सायास किया जाएगा तो वह आपको कृत्रिमता की ओर ले जाएगा, किन्तु जब आपकी अंतःचेतना आपसे अनायास ही कुछ करा लेगी तो वह प्राकृतिक होगा। उसमें कुछ असत्य नहीं होगा। उसमें कुछ असुन्दर नहीं होगा। वह तो पूर्ण सत्य होगा। वह तो पूर्ण सुन्दर होगा। वह तो शिव होगा।
✍️ चिराग़ जैन
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सीमित संसाधनों में असीमित सुख भोगने का साधन है- प्रेम। भौतिकता और नैतिकता; इन दोनों की कुण्डली से मुक्त होकर निस्पृह विचरण का निमित्त है- प्रेम। क्रोध, मान, माया और लोभ -इन चारों से रहित होकर निश्छल हो जाने की अनुभूति है- प्रेम। अमूर्त को देख लेने की कला है- प्रेम।
प्रेम के पथ पर भाव ही भाव हैं; वहाँ अभाव जैसा कुछ है ही नहीं। यही कारण है कि जिसने प्रेम को जिया वह भावुक हो उठा। जिसने प्रेम को भोगा, वह आनन्दित हो गया। जिसने प्रेम को सुना, वह मौन हो गया। यही मौन प्रेम की गहनतम अनुभूति का पाथेय है।
जिसने सर्वश्रेष्ठ को सुन लिया, उसे उसमें अपनी आवाज़ मिलाने का ध्यान ही नहीं आ सकता। मुँह में गुड़ की डली घुल जावे, फिर कौन मूर्ख उसका स्वाद बताने में रस नष्ट करेगा! हाँ, उसके मुखमण्डल की भंगिमा का आलोक देखकर अन्यान्य लोग उसे अभिव्यक्त करने का अनुमान अवश्य लगाते हैं। लेकिन यह केवल अनुमान भर है।
प्रेम की अनुभूति तो पूर्णता की अनुभूति है। वहाँ कोई उद्देश्य शेष रह ही नहीं जाता। यश-अपयश; स्वीकृति-अस्वीकृति.. ये सब उस अनुभूति से पूर्व के चिंतन मात्र हैं। जिसने पा लिया; वह तो घुल गया उसमें। हम इधर बैठे अनुमान लगाते रह गए। जिन खोजा तिन पाइयां गहरे पानी पैंठ… वह तो गहरे पानी पैंठ गया। और हम बावरे किनारे बैठकर लिखते रह गये कविता। बूझते रह गये पहेलियाँ। गढ़ते रह गये परिभाषा।
मीरा तो विलीन हो गयी। और हम इस पहेली में उलझे रह गये कि उसकी गुनगुनाहट ‘भक्ति’ है या ‘शृंगार’। सूर तो बिना आँखों के उसे देखकर निहाल हो लिये और हम उनकी रचनाओं में उसे ढूंढते रह गये। कबीर ने कुछ लिखा थोड़े ही। वह तो बावरा-सा उससे बतियाते हुए बड़बड़ाता रहा। और हमने उस बड़बड़ाहट को लिखकर दावा कर दिया कि हमने कबीर को सहेज लिया।
यह सब हमारा अंधविश्वास है। प्रेम की अनुभूति हम तक कभी आयी है तो हमने उसे अपनी व्यस्तताओं की चादर से ढँक दिया है। ऐसा नहीं है कि हमने प्रेम को जिया नहीं है। हमारे सम्मुख भी ऐसे अवसर अवश्य आए हैं कि प्रेम का अथाह सागर बाँहें फैलाये हमें समेटने को द्वार तक चलकर आया। लेकिन इस क्षण किसी ने बताया कि तुम पागल हो गये हो, और हमने पैर पीछे हटा लिये। यही तो अवसर था पागल हो जाने का। लेकिन हमें तो किसी ने समझाया और हम समझ गये… हम जैसे समझने को तैयार ही बैठे थे। …उफ़! यही समझना तो ख़तरनाक हो गया। इसी अवसर पर तो बुल्लेशाह हो जाने की ज़रूरत थी। …बुल्ले नू समझावण आइयां, बहना तें परजाइयां।
अच्छा हुआ कि बुल्लेशाह नहीं समझे। समझ जाते तो गये थे काम से। उन्होंने उस क्षण में अपने प्रेम की गोद में बैठकर बेफ़िक्री का उद्घोष कर दिया- ‘बुल्ला की जाणा मैं कौन?’ इस क्षण में समझानेवाले से उसकी पहचान नहीं पूछनी होती। यह क्षण तो ख़ुद को तलाशने का क्षण है। और जब प्रेम हमें चारों ओर से घेर ले तो बेफ़िक्री से गा उठो- ‘रब्ब दीआं बेपरवाहियाँ।’
बुल्लेशाह बहनों और परजाइयों की बात समझना तो चाहता है, लेकिन वो उस बुल्लेशाह को पहचान नहीं पा रहा है जिसे उनकी बात समझ आ सके। यहाँ, जहाँ वह पहुँच गया है, वहाँ बहुत सारे बुल्लेशाह हैं। बल्कि यूँ कहें कि सारे ही बुल्लेशाह हैं। बिल्कुल एक जैसे। यहाँ कोई दूसरा है ही नहीं। इसलिए इनमें से आपकी बात समझनेवाला बुल्लेशाह ढूंढा नहीं जा सकता। क्योंकि वहाँ तो सब एक ही हैं। …प्रेम गली अति साँकरी या में दो न समाय। फिर तो सभी अंतर मिट जाते हैं। स्त्री-पुरुष; जाति-धर्म; देह-विदेह; भक्त-भगवान सब एक हो जाते हैं। फिर कृष्ण, राधा के वस्त्र पहनकर नाच सकते हैं। फिर भगवान भी भक्त के पीछे दौड़ सकते हैं… पीछे-पीछे हरि फिरें।
यह सब शब्दातीत है। यह सब अमूर्त है। यह सब निराकार है। जाति, कुल, गोत्र, लाभ, हानि, नियम, युग, देश, धर्म… सबकी सीमाओं के पार। और इसे पाने के लिये कहीं जाने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। यह तो ठीक वहीं तक चलकर आता है, जहाँ आप उपस्थित हैं। कहीं जाकर या कहीं होकर, इसे पा लेने की बातें कोरी अफ़वाह हैं।
यह इतना सहज है कि इसके अनुमान भर पर जो साहित्य रचा गया, उससे रस के अजस्र स्रोत फूट पड़े। प्रेम की समस्त कविताएँ इस अकथ अनुभूति का अनुमान भर हैं। यूँ समझ लो कि मिर्ज़ा के विश्वास पर चेनाब की धार में उतरने वाली सोहनी पार हो गयी और हम उसके कच्चे घड़े के साथ डूब गये। महसूस करो, कि जब उस डूबने की कथा में हमें इतना रस मिल रहा है तो जो पार हो गयी, उसको क्या मिला होगा!
हम तब से अब तक कहते फिर रहे हैं कि सोहनी कच्चे घड़े के भरोसे चेनाब में उतर गयी और डूब गयी। यह हमारी आँखों के द्वारा बोला गया झूठ है। भला घड़े के भरोसे कोई चढ़ती नदी की धार में उतरता है। ये नदी की धार, ये कच्चा घड़ा और ये डूबती हुई सोहनी… ये सब हमारी आँखों द्वारा फैलाई गई अफ़वाह हैं। नदी कहीं बाहर थी ही नहीं। नदी तो सोहनी के भीतर थी। उत्ताल तरंगों के ज्वार का वेग। प्रेम का अथाह सागर सोहनी के मन में लहरा उठा होगा। …इस सागर से पार उतरने के लिए कच्चे घड़े की नहीं, पक्के विश्वास की आवश्यकता होती है। उस दिन उस पार मौजूद मिर्ज़ा की आँखों में वह विश्वास दिखा होगा सोहनी को, और एक बार यह विश्वास दिख जावे, फिर घड़ा फूट सकता है, लेकिन विश्वास नहीं टूट सकता। प्रेम का विश्वास अनब्रेकेबल होता है। पूरा ब्रह्मांड थर्रा उठे तो भी प्रेम के विश्वास का पाँव नहीं हिल सकता।
इसीलिए सोहनी को डूबते देखकर जो साहित्य रचा गया उसे पढ़ने कभी न तो सोहनी आई, न महिवाल। वो तो उतर गये पार। और हम टूटे घड़े के टुकड़े उठाकर साहित्य रचते रह गये। ‘बाणोच्छिष्टम् जगत्सर्वम्’ -संस्कृत की इस उक्ति को जब मैंने पढ़ा तब समझ न सका था। लेकिन जब मैंने बाणभट्ट का साहित्य पढ़ा तो इसका अर्थ ज्ञात हुआ। आज यही उक्ति मैं प्रेम के संदर्भ में कहता हूँ- ‘प्रेमोच्छिष्टम् सरस सर्वम्!’ जो भी कुछ सरस है, वह प्रेम की जूठन है। मूल स्रोत तो कहीं पुण्डरीक की प्रतीक्षा में बसा हुआ है। वह तो कादम्बरी के सौंदर्य में बिंधा धरा है। और हम पत्रलेखा-सी परिचारिका की भाँति प्रयासरत हैं।
लेकिन यह प्रयास भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। प्रेम की ये कविताएँ भी किसी-किसी क्षण आपके भीतर स्थित अनुभूति की इस कुंडलिनी को जागृत कर सकती हैं। इन्हीं प्रयासों में कभी कोई देवल आशीष लिख बैठता है कि ‘मैंने धरती को दुलराया, तुमने अम्बर चूम लिया।’ यह साधारण पंक्ति नहीं है। यह लहरों में समाती किसी सोहनी के उस पार उतर जाने की गवाही का प्रयास है। इन्हीं प्रयासों में कभी कोई महादेवी वर्मा कह लेती हैं कि ‘जो तुम आ जाते एक बार, कितनी करुणा, कितने संदेश, पथ में बिछ जाते बन पराग’ -यह पंक्ति भी साधारण नहीं है। यह शबरी की प्रतीक्षा में व्याप्त राम के विश्वास की मुहर है। यह उस एक क्षण की यूएसपी है, जिसके लिए कोई जीवन भर बेर चुन-चुनकर प्रतीक्षा कर लेता है।
इन्हीं प्रयासों में माया गोविंद लिख पाती हैं कि ‘आशाएँ अलख जगाती हैं, बीमार कल्पना के द्वारे।’ -यह पंक्ति प्रेम की अनुभूति का कुछ अधिक स्पष्ट झरोखा है। कल्पना की बीमारी को भाँपकर आशाओं की अलख देखने में कवयित्री सफल हुई हैं। प्रेम के महीन परत को उघाड़कर देख लेने में कवयित्री सफल हुई हैं।
यह परत शृंगार की रचनाओं में ही उघड़ पाए… ऐसा कतई आवश्यक नहीं है। यह कहीं भी सामने आ जाती है। क्षण मात्र के लिए जब ‘वह तोड़ती पत्थर’ में भी यह परत उघड़ती दिखाई देती है तो इसको जीनेवाले निराला की आँखें यकायक लाल होते हुए भीग जाती हैं। लेकिन ‘सरोज-स्मृति’ के निराला की आँखें यकायक लाल नहीं होतीं, उनके अश्रुओं का रंग धीरे-धीरे गुलाबी होता है और फिर उनका मन नीला पड़ जाता है।
पर ये सभी रंग जिस इंद्रधनुष से फूट रहे हैं, वह सतरंगा इन्द्रधनु प्रेम के क्षितिज पर ही उभरता है। जिस रचनाकार ने एक बार इस क्षितिज पर टकटकी लगा दी, उसके लिये फिर रस की कोई कमी न रही। कल्पना के पंख लगाकर स्वयं को विहग कर लेना जिसने सीख लिया, उसी को प्रेम का विहंगम दृश्य देखना नसीब हो सका। फिर मेघदूत का यक्ष अपने चारों ओर विस्तृत प्रकृति में प्रिया के दर्शन कर पाता है। फिर मेघ के हाथों संदेशा भेजा जा सकता है। फिर वाल्मीकि आश्रम में बैठकर यह अनुमान किया जा सकता है कि द्रोणाचल से फूटते झरनों का दृश्य कैसा रहा होगा। फिर कलयुग में बैठकर यह भाँपा जा सकता है कि वाटिका में राम से नयन मिलने पर सीता कैसे लजा गयी होंगी। फिर बेर की कँटीली झाड़ियों से जूठी मिठास सहेजकर प्रेम के अपूर्व बिम्ब रचे जा सकते हैं। फिर विदुरानी खाद्य और अखाद्य का भेद भूल सकती हैं।
फिर हवा के स्पर्श से कँपकँपाती पाँखुरी की आवाज़ स्पष्ट सुनाई देने लगती है। फिर किसी मीठी याद में गड़ा तिनका बरसों बाद भी कविता की याद में चुभ सकता है। फिर देवता के गुनाह में भी पारलौकिक प्रेम के दर्शन किये जा सकते हैं। फिर सब कुछ देखा जा सकता है। फिर सब कुछ जाना जा सकता है।
हज़ार कवि प्रेम के इस मार्ग पर चलते हैं तो उनमें से कोई एकाध ही देह के पार पहुँचकर प्रेम-वैभव तक पहुँचने वाली राह को स्पर्श कर पाते हैं। और इस राह को स्पर्श करने वाले हज़ारों कवियों में कोई एकाध ही विदेह के भी पार पहुँचकर प्रेम को स्पर्श करने में सफल होता है। और ये एकाध ही कबीर, मीरा, सूर, बुल्लेशाह होकर अपनी अनुभूतियों की गूंज से युग-युग तक प्रेम का स्मरण कराते रहते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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कबिरा खड़ा बजार में, मांगे सबकी ख़ैर… अहा! इस पंक्ति को समझने का प्रयास व्यक्ति को कबीर होने का अर्थ बताता है। कबीर इस दोहे में बाज़ार में ही क्यों खड़े हैं? वे मंदिर-मस्जिद; घाट, चौपाल कहीं भी खड़े होकर सबकी ख़ैर मांग सकते थे। बल्कि मंदिर-मस्जिद में मांगना ज़्यादा सम्मानजनक प्रतीत होता। अक्सर बड़े-बड़े सम्मानितों को मंदिर-मस्जिद में मांगते देखा गया है। इसलिए कबीर को भी कुछ मांगना था, तो मंदिर-मस्जिद अधिक उपयुक्त स्थान रहता।
मंदिर-मस्जिद में मांगने का एक लाभ यह भी है कि वहाँ जिससे मांगने जाते हैं; वह किसी को यह नहीं बताने जाता कि अमुक मुझसे फलां चीज़ मांगने आया था। बाक़ी कहीं भी कुछ मांग के देख लेना। तुम्हें वह चीज़ मिले या न मिले, लेकिन तुम्हारी मंगताई का प्रचार ज़रूर हो जाएगा। ईश्वर-अल्लाह के पास इतनी फ़ुरसत ही नहीं है कि वे प्रचार में संलग्न हो सकें। वे तो भाँति-भाँति के मंगतों की दरख़्वास्त और शिक़ायतें निपटाने में ऐसे घिरे हैं कि शायद युगों-युगों से नज़रें उठाकर देख भी न सके हों, कि हमने उनकी दुनिया की सूरत क्या बना दी है।
लेकिन कबीर ने कुछ मांगने के लिए बाज़ार चुना। बाज़ार में मांगने का प्रावधान ही नहीं है। वहाँ तो छीना जा सकता है, ठगा जा सकता है, हड़पा जा सकता है… मांगने की परम्परा बाज़ार की पर्सनेलिटी को सूट नहीं करती। लेकिन कबीर ने उसी बाज़ार को मांगने के लिए चुना। और मांगा भी तो क्या… ‘सबकी ख़ैर!’ यह भी कोई मांगने की चीज़ है भला? लेकिन कबीर मांगते हैं। सर-ए-आम मांगते हैं।
यही कबीर होने का पहला सोपान है। यही कबीर होने की पहली शर्त है। कुछ ऐसा कर गुज़रना, जो परिपाटी ही नहीं है; कुछ ऐसा कर गुज़रना जिसका चलन ही नहीं है। परंपराओं को धता बताकर चलने का जीवट ही कबीर को कबीर बनाता है।
इसीलिए कबीर पहले ही कह देते हैं कि कबिरा खड़ा बजार में…! अब ‘कबीर’ महत्त्वपूर्ण हैं। कबीर बाज़ार को चेतावनी दे रहे हैं कि जो बाज़ार में खड़ा है वह ‘कबीर’ है। यदि इस पंक्ति में ‘बाज़ार’ को प्रमुख समझ लिया जावे तो कबीर को गौण होना पड़ेगा। इसलिए कबीर स्पष्ट कहते हैं कि अब बाज़ार में ‘कबीर’ खड़ा है। इसलिए बाज़ार को गौण होना होगा। अब बाज़ार में ‘सबकी’ ख़ैर मांगी जाएगी।
‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ -इस व्यक्तित्व के साथ ही कोई कबीर हो सकता है। और अपने भीतर के इसी कबीर को जीवित रखने में सफल होना किसी मनुष्य के मनुष्यत्व का द्विगुणित हो जाना सुनिश्चित कर देता है।
बाज़ार में प्रविष्ट होते ही ‘अर्थ’ मुखर हो जाता है। वहाँ पहुँचकर बड़े से बड़े फ़क़ीर भी व्यापारी होते देखे गए हैं। इसीलिए कबीर के पहले और कबीर के बाद किसी साधु-महात्मा-फ़क़ीर ने यह घोषणा नहीं की कि वह बाज़ार में खड़ा है। यह जोख़िम कबीर ही उठा सके। और कबीर भी यह जोख़िम इसीलिए उठा सके कि उन्होंने कभी स्वयं के फ़क़ीर होने की भी कोई घोषणा नहीं की।
यदि कबीर ने अपने आईकार्ड में ओक्यूपेशन ‘फ़क़ीर’ या ‘संत’ लिखवा लिया होता… तो वे भी अपने बाज़ार में खड़े होने का ऐसा ढिंढोरा न पीट पाते।
लेकिन कबीर तो कबीर थे। वे वैरागी होकर बाज़ार में खड़े नहीं हुए, बल्कि बाज़ार में खड़े होकर वैरागी हो गये। …ना काहू से दोस्ती। कितने अनुभवी थे कबीर। बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में बताया कि उनकी किसी से दोस्ती भी नहीं है और वैर भी नहीं है। यदि वे आधी पंक्ति लिखकर छोड़ देते तो उसका इंटरप्रिटेशन ‘यूँ’ किया जा सकता था कि किसी से दोस्ती न होने का अर्थ है कि सबसे दुश्मनी है। जैसे हमसे कोई कहे कि वह झूठ नहीं बोलता… तो हम यह स्वयं अर्थ निकाल लेंगे कि वह सच बोलता है। लेकिन कबीर स्पष्ट करते हैं कि झूठ न बोलने का अर्थ सच बोलना नहीं है। किसी से दोस्ती न होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी से वैर है या सबसे वैर है। दो विलोमार्थी शब्दों के मध्य भी एक भाव होता है। श्वास और उच्छ्वास के मध्य भी एक निर्वात होता है।
इस निर्वात पर खड़े होकर आप चाहे बाज़ार में जाएँ, मंदिर में जाएँ, मस्जिद में जाएँ, मसान में जाएँ, चाहे वेश्यालय में ही क्यों न जाएँ… यहाँ खड़े व्यक्ति से उसका व्यक्तित्व कोई नहीं छीन सकता। यहाँ खड़ा व्यक्ति अपने वातावरण को प्रभावित कर तो सकता है, किन्तु अपने वातावरण से प्रभावित हो नहीं सकता। यहीं खड़ा व्यक्ति सबकी ख़ैर मांग सकता है, बिना यह ध्यान किये कि उसके इस साहस से बाज़ार की परंपरा ध्वस्त हो रही है और बाज़ार पर शासन करने वाला ‘अर्थ’ कबिरा के शब्दों का ‘अर्थ’ बूझते हुए मुँह बाये खड़ा रह जाता है।
✍️ चिराग़ जैन
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धर्म आत्मबल में वृद्धि करने का साधन है। साधना संहनन को सुदृढ़ करने का अभ्यास है। विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को संयत रखने का उपाय ही व्रत है।
जैन आगम का प्रथमानुयोग, जीव के इसी नैतिक विकास का आधार तैयार करता है। प्रथमानुयोग हमें संकट के समय संयत रहने के अवलम्बन प्रदान करता है। जब हम विपत्ति से घिरे हों तब उस विपत्ति का कोई एक उदाहरण मस्तिष्क में कौंध जाए तो विपत्ति छोटी लगने लगती है। यही प्रेरणा मनुष्य के जीवन में कथाओं को उपयोगी बनाती है। यह प्रेरणा न हो तो तमाम कथाएँ राजा-रानी की कहानी की तरह बालक का मन बहलाने का उपकरण मात्र सिद्ध होंगी।
यदि थोड़ा सा विवेक जागृत कर लिया जावे तो शास्त्रों में पढ़ी गईं अनेक कहानियां हमें हमारे परिवेश में साकार होती दिखाई देंगी। जैन आगम की इन कथाओं को जब कभी अपने या अपनों के जीवन में घटित होते देखता हूँ तब-तब मुझे लगता है कि महावीर की प्रासंगिकता सिद्ध हो गयी।
ऐसा अनेक बार होता है कि जब हमारा कोई अपना लोभवश हमसे छल करके हमारा आर्थिक अहित कर रहा होता है। ऐसी स्थिति को जानने के बाद यदि हम उस सम्पत्ति से निर्मोह होकर चल देते हैं तो उस क्षण हम भरत को राज्य सौंप कर वन को जाते हुए बाहुबली सदृश हो जाते हैं।
ऐसा अनेक बार हुआ है कि यदि हमें ज्ञात हो जावे कि हमारी उपस्थिति से किसी महफ़िल का माहौल असहज हो जाएगा तो हम उस अवांछित परिस्थिति को टालने के लिए स्वयं को उस उत्सव से विलग कर लेते हैं। जब हम ऐसा करते हैं तब हम अपने अवचेतन में विद्यमान नेमिनाथ से प्रेरणा प्राप्त कर रहे होते हैं जिन्होंने स्वयं को हिंसा का कारण बनते देख उस उत्सव का ही परित्याग कर दिया जो उनके लिए संयोजित किया गया था।
कोई हमें परेशान किये जा रहा है और हम उसके उपद्रव पर ध्यान न देकर अपने कार्य में एकाग्रचित्त रह पाएं तो उस समय हमारा व्यक्तित्व कमठ का उपसर्ग झेलते पार्श्वनाथ से प्रेरणा पा रहा होता है। हमें मिली ख़राब चीज़ को भी यदि हम सँवार कर उपयोगी बना लेने का हौसला रखते हैं तो हम मैनासुन्दरी के किरदार को जीवंत कर देते हैं।
सेठ सुदर्शन, मुनि मानतुंग, मुनि सुखमाल, अंजनबाला, राजुल, अकलंक, निकलंक, सुकौशल मुनि, सनतकुमार मुनि, अकम्पनाचार्य और श्रीपाल जैसे दर्जनों चरित्र हमारे अवचेतन में विद्यमान हैं। जिन परिस्थितियों में ये सब उल्लेखनीय बन गए, उन्हीं परिस्थितियों में ये सब सामान्य भी सिद्ध हो सकते थे। ये सब कथाएँ हमें यह प्रेरणा प्रदान करती हैं कि अनुकूल परिस्थितियों में धर्म पालन करने से कोई विशेष नहीं होता। आपका उल्लेख तब किया जाता है जब आप प्रतिकूल परिस्थितियों में धर्म का पालन कर सकें।
हाल ही में मुझे शल्य चिकित्सा की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा। जब मुझे ऑपरेशन थियेटर में ले जाया जा रहा था उस समय मुझे यह विचार आया कि घर पर हर रोज़ समाधि मरण और बारह भावना की ऑडियो सीडी बजती है। यदि इस क्षण मैंने इन दोनों काव्यकृतियों में वर्णित उदाहरणों का चिंतन नहीं किया, यदि इस क्षण में मैं विकल हो गया तो बरसों से सुनी जा रही इन महनीय रचनाओं की महत्ता खण्डित होगी। फिर इनका श्रवण मधुर संगीत से अधिक उपयोगी सिद्ध न हो सकेगा। …जब तक एनेस्थीसिया ने मुझे पूर्णतया अवचेत न कर दिया तब तक मैं अनेक उदाहरण देते हुए लगातार स्वयं से यह प्रश्न पूछ रहा था कि – “तुमरे जिये कौन दुःख है?”
इस एक प्रश्न ने मेरे मन को उस भय से बचाए रखा, जो ऑपरेशन से पूर्व किसी को हो सकता है। यूँ भी देह और विदेह के पृथकत्व के लिए वह क्षण सर्वाधिक उपयुक्त है, जब आप स्वयं उस बिंदु पर खड़े हों। अन्यथा धर्म चर्चा परानुभूति के प्रवचन से अधिक कुछ नहीं है।
मैं पग-पग पर इन चरित्रों से प्रेरणा प्राप्त करता हूँ। सर्दी लगी तो दिगम्बरत्व का ध्यान कर लिया। गर्मी लगी तो सिर पर जलती सिगड़ी को भूलकर साधनारत रहे मुनि का स्मरण हो आया। परिवेश के व्यवधान किसी कार्य में विघ्न बनने लगे तो ध्यानमग्न बाहुबली के हाथ-पैरों पर लिपटी लताएँ ध्यान आ गयीं। अपने भाग्य पर क्रोध आया तो बेड़ियों में बंधी चंदनबाला ने हौसला दिया।
कुल मिलाकर जीवन की स्लेट पर अनुभव ने जो इबारत लिखी है उसमें उन सब कथाओं का उजाला है, जो बचपन से लेकर अब तक आगम के प्रथम सोपान पर पढ़ी-सुनी हैं। कुल मिलाकर हम सबके जीवन में धर्म बार-बार अवसर लेकर आता है कि हमें उल्लेखनीय बनाया जा सके। कुल मिलाकर आत्मबल और विवेक के अभाव में हम उल्लेखनीय हो जाने के प्रत्येक अवसर पर सामान्य हो जाना सरल समझते हैं। कुल मिलाकर परिस्थितियों से जूझने में आगम को स्मरण रखने वाले लोग, आगम को नियमित रूपेण पूजने वाले लोगों से अधिक सम्यकदृष्टि हैं।
✍️ चिराग़ जैन