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होली : एक अवसर

होली; मनुष्य को भीतर से बाहर तक एकरूप कर देने का त्योहार। होली; अलग-अलग रंगों के एकरंग हो जाने का अवसर। होली; शालीनता और नैतिकता के बोझ को किनारे रखकर कुछ क्षण स्वाभाविक हो जाने का पर्व। होली; सभ्यता के आडम्बर से मुक्त होकर सहजता की धारा में डुबकी लगाने का रिवाज़। होली...

शिव : साधना सहजता की

शिव… जहाँ पीड़ा और उत्स एकाकार हो जाते हैं। शिव… जहाँ काव्य के नौ रस बिना किसी भेदभाव के एक साथ रहते हैं। शिव… जहाँ सृष्टि के समस्त भावों को प्रश्रय मिल जाता है। शिव… जिसके द्वार किसी के लिए भी बंद नहीं हैं। बल्कि यूँ कहा जाए कि जहाँ द्वार जैसा...

या में दो न समाय

सीमित संसाधनों में असीमित सुख भोगने का साधन है- प्रेम। भौतिकता और नैतिकता; इन दोनों की कुण्डली से मुक्त होकर निस्पृह विचरण का निमित्त है- प्रेम। क्रोध, मान, माया और लोभ -इन चारों से रहित होकर निश्छल हो जाने की अनुभूति है- प्रेम। अमूर्त को देख लेने की कला है- प्रेम।...

कबिरा खड़ा बजार में…

कबिरा खड़ा बजार में, मांगे सबकी ख़ैर… अहा! इस पंक्ति को समझने का प्रयास व्यक्ति को कबीर होने का अर्थ बताता है। कबीर इस दोहे में बाज़ार में ही क्यों खड़े हैं? वे मंदिर-मस्जिद; घाट, चौपाल कहीं भी खड़े होकर सबकी ख़ैर मांग सकते थे। बल्कि मंदिर-मस्जिद में मांगना ज़्यादा...

जैन आगम की प्रासंगिकता

धर्म आत्मबल में वृद्धि करने का साधन है। साधना संहनन को सुदृढ़ करने का अभ्यास है। विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को संयत रखने का उपाय ही व्रत है। जैन आगम का प्रथमानुयोग, जीव के इसी नैतिक विकास का आधार तैयार करता है। प्रथमानुयोग हमें संकट के समय संयत रहने के अवलम्बन...
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