Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हमारी कल्पना शक्ति अद्भुत है। भारतीय रिजर्व बैंक ने 2000 रुपये के नोट जारी करने की बात कही और हमने कल्पनाएँ शुरू कर दी। बातें बनाने में हमें बहुत मज़ा आता है। ऐसी ही बातों के दम पर मोदी जी को चमत्कार पुरुष मानने की परम्परा चल निकली है।
आँखें बड़ी करके होंठों को गोल करके किस्से सुनाते-सुनाते हम अपने प्रधानमंत्री को पुरानी हिंदी फ़िल्म के उस नायक की तरह समझ बैठे हैं जो बेसिर-पैर की विलक्षण शक्तियों से युक्त होता था। ऐसा हम कई सामाजिक तथा राजनैतिक व्यक्तित्वों के साथ पहले भी कर चुके हैं लेकिन इस बार विशेष यह है कि स्वयं प्रधानमंत्री जी भी ख़ुद को किसी पुरानी हिंदी फ़िल्म का नायक मान चुके हैं।
सवा सौ करोड़ लोगों के देश को चलाने के लिए वे लगभग उन्हीं रास्तों का प्रयोग कर रहे हैं जैसे कोई घर-घर खेल रहा हो। स्मृति ईरानी को मानव संसाधन मंत्रालय देने से लेकर देश की मुद्रा को “गैरकानूनी” घोषित करने तक का उनका जो अंदाज़ है उससे एक बात स्पष्ट है कि रजनीकांत की फ़िल्में देखते हुए वे निश्चित ही तकिया गोदी में रखकर उसे भींच डालते होंगे।
काला धन बाहर निकलवाने का उनका विचार स्तुत्य है किन्तु इतने बड़े राष्ट्र को अचानक मुद्रा विहीन कर देना समझ से परे है। जिन मूल्यों के करेंसी नोट्स को बंद किया गया उसके बाद पूरा देश “एक दिन के लिये ही सही” अर्थहीन हो गया। इस एक दिन को “सिर्फ एक दिन” कहकर टालने से पूर्व हमें यह जान लेना चाहिए कि इस देश का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो दिन भर मेहनत करके शाम को सिर्फ एक दिन के गुज़ारे भर का अर्थ जुटा पाता है; आज लिक्विड मनी की किल्लत के कारण उसके घर चूल्हा नहीं जल पाया होगा।
केमिस्ट 500 का नोट लेने को तैयार है लेकिन उसके पास बाकी बचे रुपये देने को सौ के नोट नहीं हैं। सब्ज़ी वाला, मदर डेयरी, चाय वाला, परचुनिया, पनवाड़ी, खोमचेवाला और यहाँ तक कि पुलिसवालों के समक्ष भी चालान काटने पर खुले पैसों की चुनौती है।
शादी-विवाह का मौसम है। जिसे आज बेटी विदा करनी है उसे कल रात 8 बजे अचानक प्रधानमंत्री जी ने बताया कि उधार लेकर, बैंक से आहरित कर या अन्य उपायों से उसने विवाह के हेतु जो धन जुटाया था वह सब गैरकानूनी है। यहाँ यह व्यवहारिक तथ्य भी ज्ञात हो, कि इस देश में बहन-बेटी को शगुन दिया जाता है जिसके लिए चेकबुक या NEFT/RTGS कराने की परंपरा नहीं है।
यद्यपि हमारे वित्त मंत्री जी बजट भाषण के दौरान यह स्पष्ट बोल चुके हैं कि “मिडिल क्लास” अपना ध्यान खुद रखे, तथापि इस सरकारसे यह प्रश्न करने का तो मन करता है कि मध्यमवर्गीय जनता के जीवन को सुगम नहीं बना सकते तो उसकी जीवनचर्या को जटिल करने का आपको क्या अधिकार है?
सवा सौ करोड़ लोगों के देश में तीन-चार प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो करोड़ों के टर्न-ओवर की हैसियत रखते हैं। शेष जनता जीवन की मूलभूत चुनौतियों से जूझने में इतनी व्यस्त है कि लाखों-करोड़ों का हेर-फेर करने की फुरसत उसे मिल नहीं पाती। चार लोगों की खामियाँ टटोलने के लिए छियानवे लोगों को साँसत में ले आना यदि शासक को सफलता का पैमाना जान पड़ता है तो यह आश्चर्यजनक है।
स्विस बैंकों में जिन मोटी मछलियों ने डेरा डाल रखा है उनके नाम उजागर करके उस धन को जनसम्पत्ति घोषित करके देश की आर्थिक स्थिति सुधारने की बजाय देश को मुद्राविहीन कर देना क्या वास्तव में राजनैतिक पौरुष का परिचायक है?
मैं कड़े निर्णयों का विरोधी नहीं हूँ। न ही दो नंबर के पैसे का हितैषी हूँ। प्रधानमंत्री जी की नेकनीयती पर भी मुझे तनिक संदेह नहीं है लेकिन एक विचारशील नागरिक होने के नाते मैं यह अपेक्षा अवश्य करता हूँ कि माननीय नरेंद्र मोदी जी से जिन आँखों ने उम्मीदें जोड़ी हैं उनमें आख़िरी पायदान पर खड़ा वह व्यक्ति भी है जिसकी आवाज़ में विवशताओं की आह से अधिक ध्वन्योर्जा नहीं है।
डिस्क्लेमर : जल्दबाज़ी में ऊल-जलूल टिप्पणी करने वाले जान लें कि यह लेख मोदी जी के विरोध में नहीं अपितु लोकतंत्र के समर्थन में है। इसलिए तर्कहीन चलताऊ किस्म की श्रद्धापूरित बातें लिखकर अपने चश्मे के शीशे का रंग न बताएं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
प्रेस लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। इस पर प्रतिबन्ध भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को जड़ करने जैसा है। लोकतंत्र जब तानाशाही में तब्दील होने लगता है तब मीडिया को चाटुकार बनाने की अपेक्षा रख बैठता है। -ऐसे अनेक सुगढ़ वाक्य मीडिया के समर्थन में सरकार को लानत भेज रहे हैं।
मैं सरकारी कार्रवाई के पक्ष में नहीं हूँ। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह लग गया तो लोकतंत्र में श्वास लेना दूभर हो जाएगा। किन्तु एक बार हमें इस बात पर भी पुनर्विचार करना चाहिए कि क्या मीडिया वास्तव में जनहित और लोकतान्त्रिक मूल्यों को सर्वोपरि रखकर कार्य कर रहा है। कई बार तो ऐसा लगता है कि जिन सिद्धांतों को सर्वोपरि रखना था उन्हें ताक पर रख दिया गया है। टीआरपी और सबसे तेज़ की होड़ ने तथ्यों के गाम्भीर्य और पुष्टि की अवधारणा को तार-तार कर दिया है।
उत्तरदायित्व और नैतिकता को व्यावसायिक स्वार्थों ने लील लिया है। आयकर में 30 प्रतिशत की कर सीमा में भी जो पत्रकार शामिल नहीं हैं उनकी कोठियाँ कैसे बन गईं, जो स्ट्रिंगर चैनल की आईडी लेकर रियल एस्टेट में घुसता है वो ऐसा क्या कमाल करता है कि उसे फ़्लैट की चाबी अलॉट हो जाती है, ऐसा क्यों होता है कि अचानक एयर इण्डिया के खिलाफ रोज़ ख़बरें प्रकाशित होने लगती हैं (फ्लाइट डिले की नार्मल घटना को भी बुलेट मिलता है) और फिर अचानक एक दिन एयर इंडिया की ख़बरें छपनी बंद हो जाती हैं; पॉवर हाउस में कोयला ख़त्म हो जाता है, सभी चैनल्स कोयले की कमी का हंगामा बरपा देते हैं और फिर अचानक बिना लाइट गुल हुए खबर ग़ायब हो जाती है; गौहत्या और गौरक्षक जैसे मुद्दे मीडिया पर रम्भाने लगते हैं फिर बिहार चुनाव संपन्न होते ही सभी गायों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है; मोदी जी की नेपाल यात्रा से पहले कोसी में बाढ़ का हड़कंप मचता है फिर मोदी जी नेपाल जाकर लिटमस कागज़ की भूमिका निभा आते हैं; अंतरिक्ष से कोई उल्कापिंड गिरता है तो हंगामा खड़ा होता है फिर मीडिया उसे कैच करके धरती को तबाही से बचा लेता है। -इन सब प्रश्नों पर कोई सवाल उठाने वाला नहीं है।
जो चैनल सरकार के चाटुकार हैं उनको कहीं भी कुछ भी शूट करने की इजाज़त है लेकिन जिनमे सरकारी आलोचना की प्रवृत्ति है उनको प्रसारण की भी आज्ञा नहीं है। हम किस व्यवस्था में जी रहे हैं भाई? जज फैसलों की दिशा मोड़ने केलिए रिश्वत लेते पकडे जा रहे हैं, राजनीति ढिठाई और सत्तासुख की अंधी होड़ में किसी भी सीमा तक जाने को तैयार है, पुलिस चौराहों पर सर-ए-आम जनता की जेब में हाथ डाल कर वसूली कर रही है, मीडिया ख़बरों की दलाली कर रहा है। इस नपुंसक व्यवस्था में राष्ट्रप्रेम और राष्ट्र के शक्तिबोध जैसी बातें करनेवाले भौंडे लगते हैं।
एक NDTV को प्रतिबंधित करना सरकारी तानाशाही का प्रमाणपत्र है। नैतिकता का मापदंड हो तो भूत-प्रेत, अन्धविश्वास, अराजकता, असत्य और गैर-ज़िम्मेदाराना ख़बरें चलाने के ज़ुर्म में लगभग सभी चैनल सीखचों के पीछे हो जाएं।
न्यायालय में विचाराधीन किसी मुआमले पर चर्चा करने का अधिकार मीडिया को किसने दिया? अधकचरे ज्ञानी एंकर बनकर देश की संज़ीदा विषयों पर फैसला सुनाने लग गए हैं। जनता को चैनल पर खुली धमकी दी जाती है कि अगर हमारे पत्रकार को कुछ कहा तो हम तुम्हारी ज़रूरत के मुद्दे दबा देंगे। किस व्यवस्था की बात की जाय साहब।
पूरे कुँए में भांग पड़ी है। माखनलाल चतुर्वेदी, जुगल किशोर, गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रभाष जोशी और सुरेन्द्र प्रताप सिंह अपने सींचे पौधों पर दलाली के फल लगते देखकर दुआ मांगते होंगे कि हे ईश्वर इन मीडिया संस्थानों को बंद करवा दो।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हमें पुलिसवाला न दिखे तो हम रेडलाइट जम्प करते हुए नहीं हिचकते। रॉंग साइड ड्राइव करते हुए हमें शर्म नहीं आती। सड़क किनारे गाड़ी लगाते हुए हम दूसरों की परेशानी की चिंता नहीं करते। हमें लालबत्ती पर दाएँ मुड़ना होगा तो भी हम सबसे बाईं लेन में सबका रास्ता रोककर खड़े होंगे। हम मोबाइल पर बात करते हुए सड़क पार करते हैं। बिना हेलमेट लगाए कान और कंधे के बीच मोबाइल फँसाए टेढ़ी गर्दन किये टेढ़ी-टेढ़ी बाइक चलाते हैं। कार ड्राइविंग के दौरान तो मोबाइल पर बात करना हमारा धर्म बन चुका है। हम ऑटो चलाते हैं, तो सारे नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हैं। हम बस चलाते हैं तो ब्रेक और इंडिकेटर को अछूत समझने लगते हैं। नो एंट्री और टो-अवे जैसे शब्द तो हमने पढ़े ही नहीं हैं। हम रेडलाइट पर खड़ी गाड़ी को भी हॉर्न दे देते हैं। हम स्पीड लिमिट की परवाह नहीं करते।
हम पैदल चलते हैं, तो गाड़ीवालों को दुश्मन समझते हैं। हम गाड़ी चलाते हैं तो पैदलों को मूर्ख समझते हैं। हम फुटओवर ब्रिज के नीचे भी भागकर सड़क पार करते हैं। हम ज़ेबरा क्रॉसिंग को सडकों के सौंदर्य का प्रसाधन मात्र समझते हैं। हम स्टॉप लाइन को सड़कों के अंग्रेजीकरण का कारण मानकर उसे रौंद डालते हैं।
हमारे पुलिसवाले चालान काटने को ही धर्म समझते हैं। हमारे पुलिसवाले ऑफिस टाइम पर भारी ट्रैफिक के बीच बेरियर लगाकर चाय पीने चले जाते हैं। हमारे पुलिसवाले खुद रेड लाइट जम्प करते हैं। हमारे पुलिसवाले रॉंग साइड, रॉंग लेन, बिना हेलमेट, ओवरटेकिंग, रैश ड्राइव को ड्यूटी समझकर निभाते हैं।
मिलिट्री के ट्रक, शहरों के ट्रैफिक को कीड़े, और शहरों की जनता को चींटी समझकर चलते हैं। सेना या पुलिस की वर्दी पहननेवाला शख़्स कहीं भी, कैसे भी गाडी घुसेड़ सकता है। गाड़ी पर लॉयर लिखा हो, तो उसे क़ानून से खेलने का अधिकार मिल जाता है। गाड़ी पर प्रेस लिखा हो तो उसे पुलिस को छेड़ने का अधिकार मिल जाता है। गाडी पर विधायक या सांसद प्रतिनिधि लिखा हो तो उसे जनता से खेलने का अधिकार मिल जाता है।
अतिक्रमण के कैंसर से बची खुची सड़कें बरसात की फुंसियों से त्रस्त हैं। पैदल चलने के लिए बने फुटपाथ झुग्गियों, रेहड़ियों, खोखों, स्मैकियों और मूत्रदान के लिए समर्पित हो चुके हैं। पार्किंगवाला भैया आधी सड़क घेरकर बदमाशी के स्तर तक उतरकर वसूली करता है। रिक्शावाला भैया अकेले ही पूरे ट्रैफिक का बंटाधार करने में समर्थ है। फुटपाथ का कोई पत्थर अगर सड़क पर गिर जाए तो उसे हटाने की ज़रूरत कोई नहीं समझता। डिवाइडर की रेलिंग घातक होकर सड़क तक मुड़ जाए तो उसे ठीक करने का जिम्मा किसी विभाग का नहीं है।
…हम विकास के पथ पर अग्रसर हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
हर बार इन्हें मुफ्त के सपने न दिखा तू
इक बाद बदल डाल ये किस्मत का लिखा तू
ये मुफ्तख़ोरी देश को बर्बाद न कर दे
ऐ राजनीति इनको कमाना भी सिखा तू
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
प्यार ने लांघ दीं वक़्त की सरहदें
और सारे नियम देखते रह गए
इश्क़ हम पर ठहाके लगाता रहा
हम मुहब्बत के ग़म देखते रह गए
लोक-परलोक की धारणा से परे
शबरियों की प्रतीक्षा अटल ही रही
लोग कहते हैं राधा वियोगिन बनी
कृष्ण से पूछिये वो सफल ही रही
प्रेम से मृत्यु का भय पराजित हुआ
स्तब्ध से मौन यम देखते रह गए
एक कच्चे घड़े पर भरोसा किए
सोहनी तेज़ धारा में ग़ुम हो गई
कैस दर-दर भटकता रहा उम्र भर
और लैला सहारा में ग़ुम हो गई
रूह का आसमां में मिलन हो गया
जिस्म धरती पे हम देखते रह गए
कोई तो इस ज़माने को समझाइये
क़ायदे बावरों को सिखाता रहा
जो दीवाने हुए प्रेम के पान से
उनको विष के पियाले पिलाता रहा
प्रेम विषपान करके अमर हो गया
सारे ज़ुल्मो-सितम देखते रह गए
✍️ चिराग़ जैन