Blank Verse, Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
जानते हैं
मोदी जी के स्वच्छता अभियान की गाड़ी
पिक-अप क्यों नहीं ले रही
क्योंकि जिस देश में कभी
दूध की नदियाँ बहती थीं
वहाँ दूध की थैलियाँ
नदियों को बहने नहीं दे रही।
शहरों से गाँवों तक
मस्तक से पाँवों तक
मेलों से ठेलों तक
रेलों से जेलों तक
खेलों से झूलों तक
कॉलेज से स्कूलों तक
फ़िल्मों से चैनल तक
एंकर से पैनल तक
नारों-विचारों तक
ख़त से अख़बारों तक
सब्ज़ी से राशन तक
रैली से भाषण तक
पर्ची से चंदे तक
सेवा से धंधे तक
कूड़ा ही कूड़ा है
जर्जर इक मूढ़ा है
जिस पर हम बैठे हैं
बिन कारण ऐंठे हैं
दर्द की दवाई हो
बात ना हवाई हो
अल्लाह दुहाई हो
अब कुछ सफ़ाई हो
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
बेकार की बात है श्रीमान
मोदी जी को क्या पता
किसे कहते हैं सफ़ाई अभियान
सफ़ाई अभियान के प्रति,
सबसे ज़्यादा गंभीर हैं
हमारे देश के पति।
जिन्हें घर में घुसने से पहले
साफ़ करनी पड़ती है
मोबाइल की कॉल डिटेल,
कम्प्यूटर छोड़ने से पहले
साफ़-सुथरी बनानी पड़ती है
अपनी ई-मेल।
अरे साहब
झाड़ू उठाकर सफ़ाई करने को
हम बड़ा काम कैसे मानें,
पत्नी के प्रश्नव्यूह से
साफ़ निकल कर दिखाओ
तो जानें।
✍️ चिराग़ जैन
Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose, Story
कोसी का बढ़ता पानी तीन दिन मीडिया में बहता रहा। कोसी भी उचक-उचक कर देखती रही कि ख़बर में क्या चल रहा है। एक ही ख़बर को बार-बार देख बेचारी बोर हो गयी। बिहार देखता रह गया और कोसी उतार पे आ गयी।
किसी ने पूछा कि इतना सारा पानी (जो पूरे बिहार पर आफ़त बनकर टूटने वाला था) आख़िर अचानक कहाँ हवा हो गया। मैंने कहा- “पानी था ही नहीं, हवा ही थी। जो थोड़ा-बहुतेरा पानी आया था, सो मीडिया ने पी लिया।”
ठीक इसी तरह की आफ़त महीने भर पहले पॉवर प्लांट्स में कोयले की कमी को लेकर मची थी। पूरा देश अँधेरे में डूबने वाला था। खबर करंट की तरह दौड़ी। हा-हाकार मच गया। एनटीपीसी और अन्य पॉवर कम्पनियां अपना-अपना कोयला टटोलने लगीं। कोयला, जो पहले भी मीडिया का एक्सपीरियंस होल्डर रहा है, चुपचाप सारा तमाशा देखता रहा। दो दिन हल्ला मचा। ख़बर भी चलती रही और बिजली भी।
2012 में दुनिया ख़त्म होनी थी, नहीं हुई। मीडिया ने बचा लिया। फिर कानपुर में सोना निकलना था, नहीं निकला।शायद मीडिया से घबराकर किसी बिल में जा छुपा। साईं-शंकराचार्य विवाद पर हिन्दू-हिन्दू दंगे होने थे, नहीं हुए। ईश्वर ने स्वयं आकर मिडिया के पैर जो पकड़ लिए।
मैंने एक वरिष्ठ पत्रकार से पूछा- “उत्तरदायित्व का मतलब समझते हैं आप?”
वो बोले – “आधे घंटे बाद समझूंगा यार, अभी बुलेटिन जाना है।”
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
अश्लीलता समाज के लिए हानिकारक है और समाज अश्लीलता के लिए। पार्क में पेड़ के पीछे बैठी लड़की तभी अश्लील कही जा सकती है जब वो मेंरे साथ न बैठी हो। यदि उसको मेरे साथ बैठने में ऐतराज़ न हो तो मुझे नाक-भौं चढाने वालों को अनपढ़ और मैनर्सलैस कहने में क्या एतराज़ हो सकता है।
पड़ोसी की बीवी को कपड़े सुखाते देखकर आहें भरनेवाले जब उसको दूधवाले से हंसकर बात करते देखकर बातें बनाते हैं तो ऐसा लगता है जैसे योगाचार्य उबकाई को चिगलते हुए हाज़मा दुरुस्त करने की कसरत करा रहा हो। लेकिन योगाचार्य कसरत कराता है साहब। उबकाई आती रहती है। कसरत करने वाले हाथ हिलाते रहते हैं। कसरत करने वालियां सांस लेती रहती हैं। कसरत कराने वाला भी सांस लेता रहता है।
खैर छोड़िये हम अश्लीलता पर थे।
योगा में अश्लीलता कहाँ। अश्लीलता अंग्रेजी में अश्लीलता नहीं रहती। उन गलियारों में वो मॉडर्न होती है। अश्लील लोग लड़कियों को पीठ पीछे माल, बम, पटाखा, आइटम जैसे भद्दे शब्दों से बुलाते हैं लेकिन सभ्य लोग उनको मुँह पर बेहिचक हॉट और सैक्सी कहते हैं । वो एडवांस जो हैं।
अश्लीलता का दायरा लिंगभेद भी जानता है। फिल्म के पोस्टर पर सनी लियोने का भीगे कपडे से ढंका चित्र अश्लील है लेकिन पीके के पोस्टर पर आमिर खान का रेडियो की ओट में समाया बदन आर्टिस्टिक है। रेडियो और कपडे का क्या मुकाबला साहब। रेडियो आमिर खान को पसंद है। इसलिए वो ग्रेट है। सनी की चद्दर में कहाँ कुछ छिपता है यार। इसलिए विरोध हुआ। हमें अंडर एस्टीमेट कर डाला। हमने साड़ी वाली माधुरी को भी उसी सौन्दर्यपरक नज़र से देखा था, ये भीगी चद्दर वाली…..हुँह।
सड़क पर खड़ी लडकियों को जब कोई गुंडा छेड़ता है तो अक्षय कुमार उसकी धुलाई कर डालते हैं। क्योंकि वो हीरो हैं। फिर अक्षय कुमार खुद उनको छेड़ते हैं। लेकिन वो अश्लील थोड़े ही हैं, वो तो हीरो हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
कौन कहता है नदी सागर को प्यारी हो गयी
ठौर ना पाया मिठासों में तो खारी हो गयी
टूटकर बिखरी कहीं जब भी, तभी झरना बना
पत्थरों ने गोद में लेकर कहा- ‘मरना मना’
सिर झुकाकर बढ़ चली पर चाल भारी हो गयी
ठौर ना पाया मिठासों में तो खारी हो गयी
घाट तक पहुँची, उलझकर रह गयी संसार में
गाँव-गलियों, मरघटों, नहरों, नलों, घर-बार में
उफ़, बिना मतलब ही खेतों की उधारी हो गयी
ठौर ना पाया मिठासों में तो खारी हो गयी
बांध ने बंदी बनाया, शहर ने शोषण किया
कर्मकाण्डों ने लहू लेकर भरण-पोषण किया
कारख़ानों ने छुआ, घातक बिमारी हो गयी
ठौर ना पाया मिठासों में तो खारी हो गयी
✍️ चिराग़ जैन