Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
गाँव के वटवृक्ष जिसकी झाड़ियाँ छूकर दुखी थे
अब नए बिरवे उसी कीकर को बाबा बोलते हैं
जिस मुहल्ले से निकलकर स्नान करना था ज़रूरी
आजकल अख़बार उन गलियों को क़ाबा बोलते हैं
ये नया अध्याय अब इस नस्ल को किसने पढ़ाया
कौन है जो पोखरों के नाम लिखता है रवानी
धूर्तता से ध्वस्त करके भीष्म का वैभव धनंजय
गुरुकुलों में बाँचता है आत्मश्लाघा की कहानी
कुछ पुराने लोग ये सच जानते भी हैं; मगर अब
हैं बहुत लाचार, अंगारे को लावा बोलते हैं
लिख रहे हैं आज जो इतिहास इक भीषण समर का
वे समर के वक्त डरकर छुप-छुपाते बच रहे थे
जब समय इनसे अपेक्षा कर रहा था वीरता की
ये कहीं बैठे हुए झूठी कहानी रच रहे थे
दो मवाली पीट आए थे कभी इक बेसहारा
पाठ्यक्रम इस बात को ‘दुश्मन पे धावा’ बोलते हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
एक विशेषण की चाहत में, संज्ञा का अपमान किया है
लाए को अनदेखा करके, पाए पर अभिमान किया है
अभिलाषा के रथ पर फहरी स्पर्धा की उत्तुंग ध्वजा है
लोभ बुझे तीरों से भरकर लिप्सा का तूणीर सजा है
अपना ही सुख खेत हुआ है, कैसा शर संधान किया है
जीवन को वरदान मिला है, श्वास किसी की दासी कब है
मीठे जल से ना बुझ पाए, तृष्णा इतनी प्यासी कब है
निश्चित की आश्वस्ति बिसारी, संभव का अनुमान किया है
मानव होना बहुत न जाना, जाने क्या से क्या बन बैठा
चोर, दरोगा, दास, नियामक और कभी धन्ना बन बैठा
ख़ुशियों का अमृत ठुकराकर, कुंठा का विषपान किया है
भोर न जानी, रैन न देखी, दिन भर की है भागा-दौड़ी
सुख के पल खोकर जो जोड़ी, छूट गई हर फूटी कौड़ी
अपने जीवन के राजा ने औरों को श्रम दान किया है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
कुछ सही भी नहीं, कुछ ग़लत भी नहीं
प्रेम फंसता नहीं ज्ञान-अज्ञान में
प्राण तो सृष्टि भर से अधर हो गए
देह उलझी रही मान-अपमान में
प्रेम ने जब हृदय को सहज कर दिया
कोई सीमा बची ही नहीं लाज की
श्याम के बालपन पर सलोनी लगी
नग्नता और निर्लज्जता आज की
लाज दो हालतों में सताती नहीं
एक अपनत्व में एक अज्ञान में
जब कभी भी समर्पण की नौका चढ़ा
प्यार बैकुंठ की देहरी पा गया
फँस गया जब कभी स्वार्थ के जाल में
बस तभी वासना का धुआं छा गया
कुछ समस्याओं में ही फँसे रह गए
कुछ मगन हो रहे हैं समाधान में
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
जब किसी राधिका ने सुरों को छुआ
लोक बस बाँसुरी में मगन हो गया
प्रेम ने फुसफुसा कर कहा जो कभी
अनहदी राग वह इक कथन हो गया
द्वार पर एक जोगी खड़ा भरतरी
एक पल में पराया किया प्रीत को
था कठिन द्वार पर भूल कर प्रेम को
पीठ पर लाद लाना किसी जीत को
पींगला की व्यथा आंख से बह चली
गोरखों को लगा आचमन हो गया
एक अनजान पथ पर बढ़ा जब कदम
दिल धड़कता रहा, पाँव कँपते रहे
अपशगुन इस घड़ी दिख न जाए हमें
आँख मूंदे हुए मन्त्र जपते रहे
प्रीत ने मुस्कुरा कर कहा- ‘बढ़ चलो!’
यूँ लगा ज्यों घटित इक शगन हो गया
था अनैतिक किसी ब्याहता के लिए
पर पुरुष से हृदय नेह को जोड़ना
नीतियाँ एक निर्णय पे सहमत हुईं
इस दिवानी को जीवित नहीं छोड़ना
हो गया जिससे मीरा का नैतिक पतन
अनुकरण योग्य वह आचरण हो गया
पीर अपनी सुनें और कविता लिखें
वक़्त इतना किसे मिल सका प्यार में
मन स्वयम् को अभी सुन नहीं पाएगा
व्यस्त है आज प्रियतम के सत्कार में
एक मन की ख़ुशी छंद में बंध गई
गीत में प्रीत अवतरण हो गया
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
भारतीय लोकतंत्र के चार स्तम्भ हैं। इनमें से किसी भी स्तम्भ से चिपक कर खड़े हो जाओ, कोई न कोई दूसरा स्तम्भ उसके साथ मिलकर तुम्हें पीस कर रख देगा।
विधायिका की स्थिति ऐसी है जैसे किसी युवती को झीनी पोशाक में झरने के नीचे बैठा कर निकाला गया हो और बाहर आते ही वह दूसरी युवतियों को ढँक-ओढ़ कर रहना सिखाने लगे। एक दल का नेता हमें बताता है कि उसकी जेब में राजीव गांधी के ख़िलाफ़ सबूत हैं। हम उसकी बात मानकर उसे प्रधानमंत्री बना देते हैं। बाद में वह काग़ज़ देश के भविष्य की तरह कोरा निकलता है। फिर कोई आता है और हमें कहता है कि वह राम मंदिर का निर्माण कराएगा। हम उसको भी प्रधानमंत्री बना देते हैं। बाद में वह बस में बैठकर लाहौर की यात्रा पर निकल जाता है। राम जीऔर देश के रामलाल उसकी लीलाएं देखकर ताली पीटते रह जाते हैं। फिर एक व्यक्ति आता है और हमको कहता है कि देश को आर्थिक सम्पन्नता मिलेगी। देश का ग़रीब से ग़रीब शख्स भरपेट खाना खाएगा। हम उसके कहने पर किसी को भी प्रधानमंत्री बना देते हैं। किसान आत्महत्या को मजबूर हो जाते हैं। कोयले से लेकर तकनीक तक की दलाली में घोटाले होने लगते हैं। रोज़ एक नया घोटाला सामने आता है। ग़रीब के हाथ का आख़िरी निवाला भी भ्रष्टाचारियों के गले से नीचे उतर जाता है। ग़रीब विकास करके भुखमरा बन जाता है। सरकारी ईमानदारी का डंका पीटते हुए कलमाड़ी जेल जाते हैं और सरकारी बेईमानी की सुरंग से चुप्पी साध कर छूट जाते हैं। जनता देखती रह जाती है। फिर कोई आता है और हमें बताता है कि वह काला धन हर भारतीय के खाते में डलवा देगा। वह जमाई बाबू को जेल भिजवा देगा। वह स्विस बैंकों में जमा भारत का पैसा वापस लाएगा। वह अच्छे दिन लाएगा। हम उसको भी प्रधानमंत्री बना देते हैं। वह प्रधानमंत्री बनते ही कुर्सी की जगह हवाई जहाज में बैठता है। स्विस बैंकों का पैसा छोड़ कर छोटे-छोटे बच्चों के पिगी बैंक तुड़वा देता है। जमाई बाबू को गिरफ्तार नहीं कर पाता। जनता उससे पूछती है कि हमारे बैंक खाते में पैसा कब आएगा तो वह कह देता है कि वो तो चुनावी जुमला था। हम ठगे से खड़े रह जाते हैं। वह बोलता हैकि आज से लाइन में खड़े होना है। हम लाइन में खड़े हो जाते हैं। वह कहता है भूखे मरो ताकि विदेशों में देश का नाम हो सके। हम भूखे मरने को तैयार हो जाते हैं।
कुछ लोग पिस-पिस कर मीडिया के पास त्राहिमाम करते हुए जाते हैं। मीडिया उनकी मार्केट वैल्यू के अनुसार उनकी बात सुनता है। फिर अचानक चीखने लगता है। हम खुश हो जाते हैं। मीडिया हमें बोलता है कि सुभाष चंद्र बोस की फ़ाइल मांगो, उससे खुशहाली आएगी। हम फ़ाइल का हल्ला मचा देते हैं। फ़ाइल खुल जाती है। न किसी को जेल होती न खुशहाली आती। हम फिर पूछते हैं, अब क्या करें। मीडिया बोलता है कि राम वाले बयान पर माफ़ी मांगने को बोलो। हम धरने पर बैठ जाते हैं। कुछ दिन तक बैठे रहने के बाद मीडिया हमसे बोर हो जाता है। वह प्रधानमंत्री जी के साथ बेल्जियम जाकर आइसक्रीम खाने लगता है और हम वहीं बैठे रह जाते हैं।
फिर हम सिविल सोसाइटी के पास जाते हैं। एक बूढ़ा बाबा जंतर-मंतर पर बैठ जाता है। हम “जनलोकपाल” के गीत गाने लगते हैं। बूढ़ा फेमस हो जाता है। उसके गुर्गे उसके कन्धों पर खड़े होकर वोट मांगते हैं। वे हमें बताते हैं कि जनलोकपाल बिल पास कराने के लिए चुनाव लड़ना ज़रूरी है। वे कहते हैं कि वे VIP संस्कृति ख़त्म करेंगे। वे सरकारी कोठी नहीं लेंगे। वे सबकी पोल खोलेंगे। वे फ्री वाई फाई देंगे। वे आम आदमी की गुहार सुनेंगे। हम उन्हें मुख्यमंत्री बना देते हैं। अगले ही दिन वे सायरन बजाती गाड़ियों के काफिले में बैठ नई कोठी से निकलकर विधानसभा जाते हैं और जनलोकपाल के साथ अन्ना बाबा को विदाई देते हैं। हम उसकी खाँसी पर चुटकुले सुन-सुनाकर सन्तोष कर लेते हैं।
कई साल तक सुनवाई के बाद निचली अदालत एक सेलिब्रिटी को अपराधी कहती है। उसके दो घंटे के भीतर ऊँची अदालत केस फ़ाइल करने से लेकर जाँच करने तक और गवाहों की गवाही से लेकर सबूतों की प्रमाणिकता तक सब संपन्न करके उसे रिहा कर देती है। हम बिंधे हुए हिरन से चकित रह जाते हैं।
हम धृतराष्ट्र की तरह संजय रूपी मीडिया कीआँखों से देश का कुरुक्षेत्र देख रहे हैं। संजय बोलता है कोसी में बाढ़ आ रही है। हम भागने लगते हैं। संजय बोलता है नदियां सूख रही हैं, हम प्यासे मरने लगते हैं। संजय बोलता है पॉवर हाउस में कोयला ख़त्म हो रहा है। हम इन्वर्टर चार्जिंग करने लगते हैं। संजय बोलता है राहुल गांधी पप्पू है, हम उस पर लतीफ़े गढ़ने लगते हैं। संजय बोलता है मोदी जी घुमंतू हो रहे हैं, हम उनकी खिल्ली उड़ाने लगते हैं। संजय बोलता है मोदी जी शेर हैं, हम उनसे डरने लगते हैं।
सवा सौ करोड़ लोगों की जनता नेतृत्व और सुदृढ़ व्यवस्था के अभाव में अपनी सूझ-बूझ को भौंथरा कर बैठी है। ख़बर तो दूर की बात है, हम सोशल मिडिया की अफवाहों को प्रमाणिक मानने से पूर्व बुद्धि का प्रयोग करना भूल चुके हैं। ऐसे में कतारों में खड़ा वर्तमान अपने भविष्य की आशंकाओं के लिए राजसत्ता या मीडिया की ओर निहारते समय यह क्यों भूल जाता है कि राजनीति की शतरंज पर कोई प्यादा यदि अनवरत विकास करते हुए विपक्षी हाथी के घर तक पहुँच जाता है तो वह स्वयं भी हाथी बन जाता है और फिर वह प्यादे की सीमाएं भूलकर हाथी जैसा आचरण करने लगता है।
✍️ चिराग़ जैन