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जोकर का तमाशा

लड़ाई क़ायम रहनी चाहिये। जंग चलती रहनी चाहिये। जोकर का तमाशा कभी नहीं रुकता। हिन्दू-मुस्लिम के खेल से ऊब जाओ तो विचारधाराओं का खेल खेलो। उनसे मन भर जाए तो जातियों का पंगा डाल दो। जाति हटे तो भाषा, भाषा हटे तो उत्तर-दक्षिण, ये नहीं तो कुछ और, कुछ और नहीं तो कुछ भी और। लेकिन मनोरंजन होता रहना चाहिये।
कई बार तो फ़ख़्र होता है। कोई ज़र्रा नहीं छोड़ा जहाँ कलेस न हो। जम्मू वालों को घाटी वालों का दुश्मन बना दिया। यदि किसी बेवक़ूफ़ ने जम्मू-कश्मीर के बीच सौहार्द क़ायम करने में सफ़लता पा ली तो जम्मू-कश्मीर को पूरे भारत का दुश्मन बना दिया। पंजाब वाले भाषा पर नहीं लड़ते तो उनको ख़ालिस्तान की सौगात दे दी। राजस्थान वाले भाषा-धर्म पर नहीं लड़ते तो उनको आरक्षण पर लपेटे में ले लिया। गुजराती शांतिप्रिय होने का दावा कर बैठे तो उनको पटेल आरक्षण में बिज़ी कर दिया। हरियाणा को खाप देकर हिल्ले से लगा रखा है तो बिहार को ऊँच-नीच के चक्रव्यूह में गोल-गोल घुमा रखा है। उत्तर प्रदेश इस मामले में काफ़ी समृद्ध है। वहाँ मुज़फ़्फ़रनगर, दादरी, दनकौर वगैरा कई ऐसे उत्पादक प्रदेश हैं जहाँ कुछ न कुछ चलता ही रहता है। ये सब दबेगा तो देवबंद उछल जाएगा। वो दबेगा तो मथुरा या काशी बोल पड़ेगी। और सब कुछ दब गया तो राम जी के भरोसे लड़ाई जारी रहेगी। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश को लेकर कोई चिंता नहीं है। उत्तराखंड पलायन से जूझ रहा है। उधर बंगाल भी जैसे तैसे अपना काम चला ही लेता है। वहाँ भाषा को लेकर इतनी निष्ठा है कि उनको भेदभाव करने के लिये प्रवासी मिल जाते हैं। पूर्वोत्तर के पास लड़ने के लिये अन्तरराष्ट्रीय सपोर्ट है। उड़ीसा ने अमीर ग़रीब वाली पुरातन पद्धति को ज़िंदा रखने का महती कार्य किया है। झारखंड के पास लड़ने के लिये बिहार वाली ऊँच नीच की परंपरा भी है और उड़ीसा वाली आर्थिक असमानता की भी। छत्तीसगढ़ जंगल और शहर की लड़ाई में मशगूल है। मध्य प्रदेश हिन्दू और नॉन-हिन्दू से पेट पाल रहा है। महाराष्ट्र उत्तर भारतीयों और किसानों के दम पर ख़बरों में बना रहता है। तेलांगाना का मुद्दा निपटा तो एक बार लगा था कि आंध्रवासी निठल्ले हो जाएंगे लेकिन भाषा ने उनको भी बेरोज़गारी से बचा लिया। तमिलों को भाषा के रहते कोई दूसरा कुँआ खोदने की ज़रूरत ही क्या है। कर्नाटक में भी कोई न कोई राजनैतिक नाटक चलता ही रहता है। हाँ केरल ने एक अदद शाश्वत कलेस के अभाव में थोड़ा निराश किया है लेकिन वहाँ के लिये भी कोई न कोई कलेसी पैदा हो ही जाएगा। भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं…!
महापुरुषों को पहले ही भाजपाई, कांग्रेसी, बसपाई, सपाई कर के निपटाया जा चुका है। इस बीच कुछ नया करने की छटपटाहट होने लगी थी। तभी कुछ लोगों का ध्यान इस बात पर गया कि कई दिनों से ये बुद्धिजीवी नहीं लड़े। इन कलाकारों में कोई कलेस नहीं हुआ। फिर क्या था, एक बार ठान ली तो क्या नहीं हो सकता। साहित्यकार विचारधारा के नाम पर अपने-अपने पुरस्कार लेकर पिल पड़े। कलाकार हिन्दू-मुस्लिम बनकर अपने-अपने अलग राग अलापने लगे।
रसख़ान ने जब “लाम के मानिंद हैं गेसू मेरे घनश्याम के…” कहकर सोच को व्यापक किया था तब उनको नहीं पता था कि आख़िरकार लड़ना पड़ेगा। तब उनका क्या हश्र होगा। उनसे हिन्दू नफ़रत करेंगे क्योंकि उनके नाम में ख़ान है, और मुस्लिम उनको क़ाफ़िर कहकर लानत भेजेंगे क्योंकि उन्होंने बुतपरस्ती का गुनाहे-अज़ीम पेश फ़रमाया। ऐसी ही भूलें अब्दुर्रहीम ख़ाने-ख़ाना और अमीर ख़ुसरो से भी हो गई। क़बीर तो ख़ैर जन्म के कलेसी थे ही। दूरदर्शिता का सर्वथा अभाव था इन सबमें। समझ ही नहीं आ पा रहा कि इनके नाम पर कौन पक्ष में लड़े कौन विपक्ष में। इधर हाल के दशकों में भी कुछ ऐसे हो गए जिनको सौहार्द का शौक़ चर्राया। क्या ज़रूरत थी शक़ील को ये कहने की कि “मन तरपत हरि दर्सन को आज…! तुम तो लिख कर चलते बने। उस पर नौशाद ने इसको सुरों में पिरो दिया। फिर मुहम्मद रफ़ी… तुम तो कम से कम रौ में न बहते। पूरे कुएँ में ही भांग पड़ गई थी क्या। चंद रुपैयों के लिये कितने नीचे गिर गए। क़ाफ़िर हो गए।
ऐसे ही पापी रहे रघुपति सहाय। फ़िराक़ गोरखपुरी बनकर कैसे इतराते फिरे। अरे भई, हिन्दी में रहकर क्या प्रतिष्ठा नहीं मिलती थी। जा पड़े मुसलमानों की भाषा में। शर्म आनी चाहिये। हमें देखो। लिखा चाहे एक अक्षर न हो, लेकिन किसी को इतना मौक़ा न दिया कि हमें हमारे धर्म से अलग कर सके। हमने किसी के आगे सिर नहीं झुकाया। आग लगे ऐसी प्रसिद्धि में। अरे तुमसे बढ़िया तो वो छोकरे हैं जो ज़रा सा इशारा पाते ही दूसरे धर्म वालों के लिये मौत बन जाते हैं। इसे कहते हैं समर्पण। ये नहीं कि सारी ज़िंदगी दूसरे धर्म के लोगों की चमचागिरी में गुज़ार दो।
उधर ये बोलते हैं कि ग़ुलाम अली को सुन लो। क्यों सुन लें भई। हमारे पास जगजीत सिंह नहीं हैं क्या। जो आदमी पाकिस्तानी होगा उसके लिये यहाँ कोई जगह नहीं है। हम हम हैं। अपनी गायकी पाकिस्तानियों को सुनाओ। हम जगजीत सिंह से संतुष्ट हैं। हमारी मजबूरी न होती तो भगत सिंह को भी पाकिस्तान में पैदा होने के जुर्म में देश निकाला दे देते। लेकिन बस हमारी चल नहीं पा रही।
हमने बहुत दिन सहिष्णु होने का ढोंग कर लिया। अब हमसे न होगा ये सब। भाग जाओ यहाँ से। कोई गजल-वजल नहीं सुनी जाएगी। हमारे पास यही काम रह गया क्या। बड़े आए गजल सुनाने वाले। हम तुम्हारी गजल सुनेंगे या साहित्यकारों के पुरस्कार लौटाने के मुद्दे पर ध्यान देंगे।
इनको अपनी पड़ी है। क्या आफ़त आ गई। किसने चिकौटी काट ली। नहीं चाहिये पुरस्कार तो मत लो। हम किसी और को दे देंगे। अपनी विचारधारा वाले को दे देंगे। दस-पाँच साल बाद कोई और सरकार आएगी तो हमारे वाले भी लौटा देंगे। फिर तुम ले लेना। अब एक पुरस्कार एक ही जगह धरा-धरा धूल खाए… ये कोई अच्छी बात है क्या।
वामपंथी और राष्ट्रवादी, दोनों की ही एक-दूसरे के बारे में एक जैसी राय है। ‘तुमने लिखा भी क्या है। सब अल्लम-गल्लम। कोई सार नहीं है तुम्हारे साहित्य में। साहित्य तो हमारे वालों ने रचा है।’
एक बताएगा, “गांधी वध और मैं” …अहा! क्या पुस्तक है। बखिया उधेड़ कर रख दी। और साहित्य पढ़ना है तो गीताप्रेस गोरखपुर जाओ। जा में नहीं राम को नाम, वा कविता किस काम की। देश को समझना है तो झण्डेवालान जाओ। सुरुचि प्रकाशन की पुस्तकें पढ़ो। वीर सावरकर की क़ुर्बानी के आगे क्या किसी की क़ुर्बानी टिकेगी। माननीय हेडगेवार जी, गुरुजी, मुखर्जी जी, दीनदयाल उपाध्याय जी… अरे इनकी जीवनीयाँ पढ़ो। तो कुछ संस्कार आवें। इनके सिवाय देश में न तो कोई महापुरुष है न ही कोई साहित्य। कम से कम जब तक हमारी चलेगी तब तक तो नहीं ही होने देंगे। जब तुम्हारी चले तो तुम हमारे वालों को मत मानना।
दूसरा कहेगा, पेरियार! क्या लिखा है, सच की परतें खोल दीं। रशियन लिटरेचर नहीं पढ़ा तो क्या ख़ाक़ पढ़ा! लेनिन, मार्क्स… हीरे हैं साहित्य के। ‘बम का दर्शन’ पढ़ो। जनचेतना प्रकाशन की किताबें ख़रीदो! ग़रीब के दर्द की बात न हुई तो काहे का साहित्य। सत्ता को गाली देने की हिम्मत न हो तो चाट का ठेला लगा लो, ज़रूरी थोड़े ही है साहित्य रचना।
…ये सब देख कर मदारी अट्टहास करते हैं। उन्हें इस बात की संतुष्टि है कि सब जमूरे बढ़िया से काम में लगे हैं। सबने सबको व्यस्त कर रखा है। ये सब इन बातों से ऊपर उठने नहीं चाहियें। क्योंकि अगर इन कलेसों से बाहर आए तो ये सब विकास मांगेंगे। फिर ठहाके लगाने तो दूर साँस लेने की भी फ़ुर्सत नहीं मिलेगी। इसलिये जंग जारी रहनी चाहिये। डुगडुगी बजती रहनी चाहिये। तमाशा होता रहना चाहिये।

✍️ चिराग़ जैन

हिन्दुस्तान हमारा है

दुर्घटना घटे सड़क पर तो हम रुकने को तैयार नहीं
आँखों के आगे जुल्म बढ़े तो हम करते प्रतिकार नहीं
अब हमको फर्क नहीं पड़ता चालीस मरे या चार मरे
पानी बन गया लहू वह जो बढ़कर भीषण हुंकार भरे
जब भूखी उम्मीदें टूटीं खलिहान जले हम मौन रहे
जब धनिया की अस्मत लूटी पत्थर पिघले हम मौन रहे
लालच ने जब नैतिकता का दर्पण तोड़ा हम मौन रहे
लाचारी को ताक़त ने जब बेघर छोड़ा हम मौन रहे
निर्बल की आह-कराह सुनी, दिल दहल गया, हम मौन रहे
टीवी पर चर्चाएँ सुन ली, मन बहल गया, हम मौन रहे
अपराध घटित होता है तो देखा करते हैं मौन खड़े
फिर ये कहकर बढ़ जाते हैं, छोड़ो पचड़े में कौन पड़े
शोषित पर अत्याचार हुआ, शोषक ने अट्टाहास किया
नुक्कड़ पर खड़े बतोलों ने, उपहास किया, परिहास किया
अख़बारों को हेडलाइन मिली, टीवी ने ख़ूब विलास किया
हम भी संवेदनहीन हुए, हमने भी टाइमपास किया
उम्मीद कभी चलकर अपने द्वारे तक आई तो होगी
रातों में किसी बिचारी ने साँकल खटकाई तो होगी
हमने ख़ुद बंद किया बढ़कर सब खिड़की रौशनदानों को
गुलदस्ते लेकर पहुँच गए जब बेल मिली सलमानों को
छोड़ो ये चर्चा कब कितना नुकसान हुआ घोटालों से
पहले ये सोचो औलादें क्यों सस्ती हुई निवालों से
छोड़ो इन बातों की चर्चा सरकार हमें क्या दे पाई
पहले ख़ुद से ये तो पूछो क्यों भूखा मरा सगा भाई
कुछ रंग-बिरंगे चोलों ने भड़काया तो हम भड़क गए
पत्थर की गिरी इमारत तो हम सबके बाजू फड़क गए
लेकिन तब ख़ून नहीं उबला, ना गुस्से को सुर-साज मिला
जब पन्द्रह दिन की बच्ची को दिल्ली में नहीं इलाज मिला
हमने कब किसकी रक्षा की, अपराधों से, आघातों से
निष्क्रियता पर पर्दे डाले कुछ रटी रटाई बातों से
शासन पर प्रश्न उठाएंगे, सत्ता को जी भर कोसेंगे
सिस्टम से आस लगाएंगे, अपने आलस को पोसेंगे
क्या ये सचमुच आवश्यक है हम सच से पीठ किए बैठें
क्या से सचमुच आवश्यक है अवसर पर होंठ सिए बैठें
ये क्या हो गया हमें आख़िर, धमनी में ख़ून नहीं है क्या
निष्क्रियता को बंदी कर ले, ऐसा क़ानून नहीं है क्या
खादी, खाकी, व्हाइट कालर, ये सब हममें से ही तो हैं
इक्के, बेग़म, राजा, जोकर, ये सब हममें से ही तो हैं
केवल इतना भर अंतर है, केवल इसके ही हैं झगड़े
कुछ खिड़की के इस पार खड़े, कुछ खिड़की के उस पार खड़े
यूँ तो हममें से हर कोई बढ़-चढ़कर बात बनाता है
जिसका जिस पर वश चलता है, वो उससे स्वार्थ सधाता है
हम किस दिन ये सच समझेंगे सारा नुक्सान हमारा है
जिसको दिन-रात कोसते हैं, वो हिन्दुस्तान हमारा है

✍️ चिराग़ जैन

मीडिया की महानता

जंतर मंतर पर गजेन्द्र सिंह फांसी झूल गया। मीडिया की मौज हो गई। गजेन्द्र सिंह पर हर चैनल ने पीएचडी कर मारी। वहां वसुंधरा क्यों नहीं गई। वहां अरविन्द केजरीवाल क्यों चुप रहा। किसने उसकी चिता जलाई। कौन उसकी बेटी है। किसको उसने फोन किया। सारी पड़ताल दो दिन में हो गई।

उसको न्याय मिलने ही वाला था कि नेपाल की धरती हिल गई। नेपाल में तबाही मच गई और मीडिया में हाहाकार।गजेन्द्र के परिवार की गुहार इस हाहाकार में दब गई। उन अनाथ बच्चों को स्टूडियो से बाहर फ़ेंक कर मीडिया नेपाली हो गया। कौन सी बिल्डिंग गिरी। जब बिल्डिंग गिरी तो लोग कैसे भागे। किस मंदिर में चमत्कार हुआ। किस मलबे में कितने लोग फंसे हैं। सारी रिसर्च ही गई। अभी मलबा पूरी तरह हटा भी नहीं था कि रामदेव की पुत्रजीवक वटी का मुद्दा मीडिया की मशीन में पेल दिया गया। सुबह से शाम तक हर चैनल पर रामदेव और त्यागी जी। उस दवाई के नाम में क्या गुनाह था ये स्पष्ट होता इससे पहले मीडिया को कुमार विश्वास मिल गया। मिडिया ने त्यागी जी को त्याग कर कुमार विश्वास और लड़की का दामन थाम लिया। दोनों पक्ष ये कहते रहे कि हमारे बीच कोई सम्बन्ध नहीं हुए।लेकिन मीडिया ने दो दिन तक कुमार विश्वास का चीरहरण किया। कुमार की इज़्ज़त पूरी तरह लुटती इससे पहले सल्लू मियां पर फैसला आ गया। बेचारे सलमान को जिसने केवल एक फुटपथिये को कुचला था। उसको इतनी भारी सज़ा हो गई। अदालत की इस बर्बरता पर मीडिया ने सवाल उठाए। पूरे देश में दुःख की लहर दौड़ गई। अब देखना ये है कि अगला नंबर किसका है।

हमारा देश इतने जागरूक मीडिया से धन्य है। वो और देश होंगे जिनकी मिडिया को मुद्दों की तलाश होती है। हमारे न्यूज़ चैनल तो जिस पर बात करने लगें, वही मुद्दा हो जाता है। कभी-कभी तो लगता है कि मुद्दे खुद न्यूज़ चैनल के बाहर लाइन बनाकर खड़े हैं। हालात ये है कि किसी भी मुद्दे को दो दिन से ज़्यादा का स्लॉट नहीं मिल पा रहा। इतनी व्यस्तता के बीच भी संसद की चर्चा, भूखे को रोटी, सरकारी भ्रष्टाचार, गर्मी से झुलसते लोग, हवा में बढ़ता प्रदूषण और जीवन स्तर की बेहतरी को दरकिनार कर हमारा मीडिया ऐसे बिना बात के मुद्दों पर पूरी ऊर्जा से चीखता चिल्लाता है; इससे ज़्यादा महानता और क्या होगी।

✍️ चिराग़ जैन

बदचलन लड़की बनाम मीडिया

किसी शहर में एक लड़की रहती थी। बहुत खुले विचारों की थी। उसको मुहल्ले का कोई भी लड़का फ़िल्म दिखाने, कॉफ़ी पिलाने, पार्क घुमाने, बाइक पर घुमाने, डिस्को ले जाने या डेट पर चलने का ऑफ़र देता, तो बिना किसी नखरे के मान जाती थी। धीरे-धीरे उसकी यह सहृदयता पूरे शहर में फ़ेमस हो गई। कभी-कभी बाहर के शहर के छोरे भी उसे आइसक्रीम खिलाने अपने साथ ले जाने लगे। अब उसका कोई भी दिन अकेले नहीं बीतता।

लेकिन आजकल उसकी हालत बहुत दयनीय हो गई है। स्थिति यह है कि पूरे शहर में जिस लड़के के साथ वो होती है, उसके अतिरिक्त बाक़ी पूरा शहर उसको बदचलन, आवारा, चरित्रहीन और कुल्टा कहता है। हाँ, जिस लड़के पर जिस समय कृपा बरस रही होती है, उसको वह बहुत मैच्योर, सिन्सियर और ओपेन माइंडिड लगती है। वो लड़का बाक़ी शहर भर के छोरों को मैनर्सलैस और इल्लिट्रेट मानता है। ये और बात है, बाद में यह छोरा भी मैनर्सलैस छोरों के साथ मिलकर उसे किसी और के साथ घूमते देख आवारा कहने से नहीं चूकता।

उस लड़की का नाम मीडिया है। इसके लिये हर छोरा एक दिन का दाना-पानी है। और छोरे अपनी-अपनी बारी के चक्कर में सब ज़रूरी काम छोड़ कर इसके चाल-चलन और रंग-ढंग से बिना बात प्रभावित हुए रहते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

चरित्र-हत्या का परमानेन्ट फण्डा

मेरे इस लेख को वे लोग न पढ़ें जो स्वयँ को महिला आयोग का अघोषित अध्यक्ष समझते हुए किसी भी मुद्दे में महिला का नाम आते ही महिला को पीड़ित और बेचारी समझकर बुद्धि के कपाट बंद कर देते हैं। वे लोग भी इस पोस्ट से दूर रहें जो स्वयं को मन ही मन, भाजपा, आप, कांग्रेस या अन्य किसी दल का प्रवक्ता मान बैठे हैं और अपने-अपने दल का नाम आते ही सोचने-समझने की शक्ति को पैरों के नीचे रखकर उस पर खड़े होकर हो-हल्ला मचाने लगते हैं।

यह केवल उन लोगों के लिये है जो एक ही समय में एक ही व्यक्ति के जीवन की हर घटना को अलग-अलग करके उस पर सोच सकते हैं और किसी भी प्रकार के आग्रह से मुक्त होकर एक ऐसे चिंतन की आधारशिला पर खड़े हो सकते हैं जो समाज के उन्नयन के लिये अपरिहार्य हो चुका है। क्योंकि इस पोस्ट के प्रश्न जटिल न भी हों तो कड़वे ज़रूर हैं।

क्योंकि प्रश्न यह है कि हाथ हिला-हिलाकर किसी भी व्यक्ति के चरित्र, निर्णय, चाल-चलन और यहाँ तक कि संवेदना तक को सवालों के कठघरे में ला खड़ा करने वाले मीडिया एंकर क्या वास्तव में देश और समाज के लिये चिंतित हैं। प्रश्न यह है कि यदि कोई सवाल किसी की ज़िंदगी से भी बड़ा है, और उस सवाल ने पूरे मीडिया हाउस को झखखोर डाला है तो फिर उस सवाल की गंभीर और गर्मागर्म चर्चा के बीच ब्रेक लेने के निर्णय को टाला क्यों नहीं जा सकता। प्रश्न यह भी है कि स्वयं को निर्णायक मानकर किसी भी शख़्स से बैसिर-पैर के सवाल पूछनेवाले पत्रकार उसको जवाब देने तक का अवसर नहीं देते तो क्या जनता इस तानाशाही को समझ पाती है? सवाल यह है कि जंतर-मंतर पर फाँसी झूल जानेवाले गजेन्द्र की किशोर बेटी से जब यह पूछा जा रहा था कि आपके पिता आपसे क्या बातें करते थे तो क्या दर्शकों के भीतर इस संवेदनहीन मीडिया के प्रति कोई घृणा उत्पन्न हुई थी?

अभी एक टीवी चैनल पर वो मोहतरमा बैठी हैं जिन्होंने सोशल मीडिया पर वायरल हुई कुछ तस्वीरों को लेकर पहले उन पर क्षोभ जताया जिनकी वॉल पर ये तस्वीरें पोस्ट की गईं थीं। फिर उन्होंने यह कहा कि इस मामले से हुई बदनामी के कारण मेरे पति ने मुझे घर से निकाल दिया है।

उनके पति की मांग़ यह है कि कुमार विश्वास अगर इन आरोपों का खंड्न कर दें तो उनको संतोष हो जायेगा। सवाल यह है कि जिस लड़की के चरित्र पर लांछन लगा है क्या उसको स्टूडियो में बैठाकर उससे बार-बार चटखारे लेकर सारी रामकहानी पूछना क्या किसी बलात्कार से कम है? सवाल यह है कि महिला आयोग उस राम से प्रश्न क्यों नहीं पूछता जिसने सोशल मीडिया की एक अप्रमाणिक तस्वीर को आधार मानकर अपनी ब्याहता को घर से निकाल दिया, और अब उसे उस रावण की गवाही चाहिये जिसके साथ उसकी सीता का नाम जोड़ा गया है?

प्रश्न यह है कि यदि उन तस्वीरों के पीछे की कहानी में कोई सत्य होगा भी तो क्या कुमार विश्वास उसको सार्वजनिक रूप से स्वीकार करेंगे? यदि कुमार विश्वास के कथन की नैतिकता पर इतना ही विश्वास है तो फिर उनके चरित्र पर विश्वास करने में संकोच क्यों? प्रश्न यह है कि जब कुमार विश्वास ने मीडिया के सामने यह कह दिया कि इन ख़बरों में कोई सत्य नहीं है तो फिर पीड़िता की मांग पूरी क्यों नहीं हो गई? उसके पति के संदेह की खाई कैसे पोली रह गई?
प्रश्न यह है कि इस प्रकार के घटनाक्रम यदि इसी प्रकार सेंसेशनल बनाये जाते रहे तो क्या कोई स्त्री समाज और देश के हित कभी किसी भी मुहिम में आगे बढ़ पाएगी? क्या किसी व्यक्ति का सम्मान और पारिवारिक संबंधों की नींव किसी ऐरे ग़ैरे नत्थूख़ैरे के कह देने भर से तय होती रहेगी।

प्रश्न यह है कि हम पीड़ा में से ख़बर तलाशने से कब बाज़ आएंगे? प्रश्न यह है कि 8 मिनिट के विज्ञापनों से पैसा जुगाड़ने की हवस में बाक़ी के 22 मिनिट तक हम पत्रकारिता के मूल्यों को कितने गहरे कुँए में फेंकेंगे?

एक लड़की चिल्ला-चिल्ला कर अपने हाव-भाव और बातों से कुमार विश्वास को “बदमाश” सिद्ध करने पर उतारू है। अचानक वो भावुक हो गई क्योंकि महिला जो है, पीड़ित महिला जो है, लगातार जो है, उसके आँसू जो हैं, वो बह रहे हैं। इतनी देर में कैमरा लड़की की काजल घली आँखों में उतरे आँसुओं को एक्स्ट्रीम क्लोज़ अप से दिखाता है। तभी एंकर के कान में एवीयू से कुछ कहा जाता है, झटाक से कैमरा ज़ूम आउट करता है, एंकर हाँफ़ते हुए बताती है कि इस बीच हमसे किरण बेदी जुड़ चुकी हैं, किरण जी, हमारे साथ स्टुडियों में पीड़ित महिला बैठी है, जो सुबक सुबक कर रो रही है, उसके पति ने उनको घर से निकाल दिया है। आप उनसे कुछ कहना चाहेंगीं?

किरण जी कुछ क़ायदे की बात कहने का प्रयास करती हैं, लेकिन एंकर उनकी बात को सुने बिना फिर उछल-उछल कर चिल्लाने लगती हैं कि आप ये बताओ कि ये कहाँ जाएँ, ……कि इनकी हालत जो है, आप देखिये… कि महिलाओं की रक्षा का मुद्दा… कि फ़लाना… कि ढिमका… कि ये …कि वो… कि अभी वक़्त हो चला है एक ब्रेक का… आप हमारे साथ बने रहिये… टैंनेंटैणं… मेकअप दादा, टचअप… पानी……… (एवीयू से कान मेंफ़ुसफ़ुसाहट होती है) …क्या बात है, हिला कर रख दिया! (एंकर मुस्कुराते हुएखखारती है) रैडी… रोलिंग्…

…प्रश्न ये है कि इन सबके बीच समस्याओं और मुद्दों को गंभीरता से कब सोचा जाएगा?

✍️ चिराग़ जैन

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