+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

शब्द शक्ति

मंच पर दो शब्द कहने की विवशता
भौंथरा करती रही है
सैंकड़ों शब्दों की पैनी धार को,
मार डाला है
बनावट से सुसज्जित ग्रीटिंगों ने
मौन अधरों पर थिरकते प्यार को।

बात दिल से झूमकर निकले
तो फिर
बस ‘भाइयो-बहनो’ का सम्बोधन
भरी महफ़िल को दीवाना बना दे,
धमनियों से बह के आए शब्द हों तो
एक ही विन्यास
बर्बर डाकुओं की क्रूरता को
आदमीयत का
(सभी को मान्य)
पैमाना बना दे।

किन्तु अब इस दौर में
भाषाओं के व्यापारियों से
मंच के भाषण लिखाए जा रहे हैं।
स्वार्थ की डाली पे बैठे
काग को कोयल बताकर
अब सियारी गीत गाए जा रहे हैं।

चापलूसी
ज्ञान का मांगा हुआ लहंगा पहनकर
मंच पर मुजरा करे तो
अब उसे मुजरा नहीं कहते।

शब्द के लच्छे बनाकर
वक़्त के महंगे लम्हे
बर्बाद करने की कला
श्रोताओं को पूर्णार्थ की ख़्वाहिश से
कोसों दूर रखती है।

प्रेम, मानवता, दया, करुणा
हमारी संस्कृति
माँ-बाप, हिन्दुस्तान
जनता, लोकसत्ता
न्याय और संघर्ष
अपनी सभ्यता
संवेदना, अध्यात्म
और ऐसे ही ढेरों शब्द
अपने अर्थ का बल क्षीण करके
अधमरे से हो गए हैं।

अब इन्हें सुनकर किसी के
रोंगटे उठते नहीं हैं।

हमने अपने मानसिक रनिवास में बैठी
प्रशंसा की सुरक्षा के लिए
जिन शब्दों का पहरा बिठाया है
उन्हें ख़ुद ही नपुंसक कर दिया है,
शांति के सब वाक्य
इतने खोखले शब्दों के मिलने से बने हैं
समझ लो
हमने अपने हाथ से
माहौल हिंसक कर दिया है।

शब्द ऐसे जी के बोले जाएँ
मदिरा बोल देने मात्र से
पूरी सभा मदहोश हो जाए।

✍️ चिराग़ जैन

संकोच

मुस्कानों ने सूर्य उगाया
संकोचों ने अस्त कर दिया
आशाओं का महल नवेला
आशंका ने ध्वस्त कर दिया

मर्यादा की डोरी थामे
स्वीकृति का इंगित तो आया
किन्तु झुकी पलकों का मतलब
आशंकित मन समझ न पाया
ख़ुद ही मैंने हिम्मत जोड़ी
ख़ुद ही उसको नष्ट कर दिया

हलकी सी मुस्काई भी थीं
तुम दाँतों में होंठ दबाकर
फिर मीठे गुस्से से तुमने
देखा था मुझको झुँझलाकर
बिन बोले ही तुमने मेरी
दुविधा को आश्वस्त कर दिया

साथसदा रहने की ज़िद में
संगत का सौभाग्य गँवाऊं
तुम मिल जाओ इस चाहत में
मिलने तक को तरस न जाऊँ
मैं तो पग-पग पर कतराया
तुमने मार्ग प्रशस्त कर दिया

✍️ चिराग़ जैन

द ग्रेट तीतरबाज़ डेमोक्रेसी

काफी समय पहले तीतरों के समाज में एक नालायक तीतर ने लड़ाई-भिड़ाई से समय निकाल कर कुछ पढ़ने-लिखने की ठानी। युवा तीतर की इस इच्छा से तीतर समाज बहुत दुखी हुआ। कई बुज़ुर्ग तीतरों ने उसे समझाया कि बेटा, इस पढाई-लिखाई में कुछ नहीं रखा है। लड़ाई-झगड़ा करोगे तो कुछ बन जाओगे। आज का फसाद कल तुम्हें मुहल्ले में सम्मान दिलाएगा। पढ़-लिख गए तो कोई तुम्हारे साथ नहीं बैठेगा। सारे में थू-थू होगी। तुम्हारी भलाई इसी में है कि झगड़ा-झमेला करो और अपना आराम से रहो।
इतना समझाने पर भी जब वह तीतर ज़िद्द छोड़ने को तैयार न हुआ तो पूरे तीतर समाज ने यह निर्णय लिया कि यह युवा तीतर जो लड़ना नहीं चाहता इसकी इस हरक़त से बाक़ी तीतरों के बच्चों पर भी बुरा असर पड़ेगा। इसलिए समाज के हित में और अपनी परम्पराओं की रक्षा हेतु इस उद्दण्ड युवा को यह दण्ड दिया जाता है कि तीतर समाज के किसी झगड़े में इस अधम को नहीं बुलवाया जाएगा और पूरे गाँव में इसका लड़ाई-झगड़ा बंद करके इसे बिरादरी से बाहर निकाला जाता है।
मौक़ा अच्छा था, युवा तीतर ने बिरादरी छोड़ कर इतनी पढाई की कि धीरे-धीरे वह समाज सुधारक बन गया। उसने सब तीतरों को यह ज्ञान दिया कि तीतर लड़ाने वाले ये उस्ताद लोग बड़े उस्ताद होते हैं। चार-चार आने में हम तीतरों की जान आफत में डाल कर मज़े लेते हैं। जिसे तुम जीवन-मृत्यु का प्रश्न बना लेते हो, वह इनके लिए सिर्फ एक खेल है। इन लोगों की आपस में कोई शत्रुता नहीं होती, ये सिर्फ हमें उकसाने के लिए झगड़ने का अभिनय करते हैं।
समाज सुधारक की ये बातें सुनकर बड़े-बूढ़े तीतरों को चिंता हुई कि यह कुलक्षण ऐसी बातों से हमारी परम्पराओं को आघात पहुँचा सकता है। चिंता के कारण सभी बूढ़े तीतर चिंतित रहने लगे। वे युवा तीतरों को तीतरबाज़ी की महान परम्परा क़ायम रखने का मार्गदर्शन देते और चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाते हुए अपनी जवानी की लड़ाइयाँ याद कर-करके शेख़ी बघारते। उधर कुछ युवा तीतरों को समाज सुधारक की बातें अच्छी लगने लगीं। वे छुप-छुप कर समाज सुधारक से मिलने लगे। और निरंतर चिंतन के बाद उन्होंने यह निर्णय लिया कि अब वे उस्तादों के साथ वही व्यवहार करेंगे, जो उस्तादों ने उनके पुरखों के साथ किया है।
अब युवा तीतर उस्तादों से मोलभाव करने लगे। एक तीतर ने उस्तादों के बीच जुमला उछाला कि जो मुझ पर दांव लगाएगा उसे एक साल का वाई-फाई मुफ़्त मिलेगा। सारे उस्ताद तीतरबाज़ी छोड़ कर वाई-फाई के ख्यालों में डूब गए। तभी दूसरा तीतर बोला कि जो मुझ पर दांव लगाएगा उसे मुफ़्त लेपटॉप मिलेगा। उस्तादों में हड़कंप मच गया। वे एक-दूसरे की लुंगियां फाड़ने लगे। उस्तादों में लट्ठ बजने लगे। कोई उस्ताद फटे हुए सर को पकड़े वाईफाई वाले तीतर के गुण गया रहा था तो कोई पैर पर प्लास्टर बांधे लेपटॉप वाले तीतर के दांव-पेंच बखान रहा था। जैसे ही हंगामा थमता दिखाई देता, कोई न कोई तीतर प्रेशर कुकर, सिलाई मशीन या बिजली बिल माफ़ जैसी घोषणा करके आराम से बैठ जाता और उस्तादों को लड़ते देख कर मज़ा लेता।
आजकल तीतरों की नई पीढ़ी और भी स्मार्ट हो गई है। घोषणाओं के ओल्ड फैशन्ड तरीके छोड़कर वे उस्तादों को इमोशनल ब्लैकमेल करने लगे हैं। पिछले दिनों एक ओवरस्मार्ट तीतर ने उस्तादों को बताया कि उसके कुनबे के बुज़ुर्ग खुल कर लड़ने नहीं दे रहे हैं। यह बात सुनकर उस्ताद लोग भावुक हो गए। उन्होंने बुज़ुर्ग तीतरों को कोसना शुरू कर दिया। उस्तादों के मन में उत्पन्न घृणा का लाभ उठाकर ओवरस्मार्ट तीतर ने सारे बुज़ुर्ग तीतरों के पर काट दिए और पूरे तीतर समाज का सरपंच बन बैठा। फॉर्मूले की सफलता देख कर आजकल कोई उस ओवरस्मार्ट तीतर की शिकायत उस्तादों से करके सिम्पेथी बटोरता है तो कोई अपनी दादी और पापा की क़ुर्बानी पर टसवे बहा कर उस्तादों को भावुक कर देता है।
हाल ही में एक चतुर तीतर ने अपने चाचा और अंकलों के अत्याचारों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर उस्तादों की लड़ाई का माहौल ही बदल डाला। उस्ताद आपस में लड़ रहे हैं, तीतर अपने अपने दड़बों में भीतर ही भीतर जश्न मना रहे हैं। समाज सुधारक तीतर उन्हें आश्वस्त कर रहा है कि अब तुम आराम से दाना-पानी खाते रहो और मौज उड़ाते रहो। क्योंकि अब कभी यह निश्चय नहीं हो सकेगा कि किस तीतर पर दांव लगाना उचित है। सो, न लगेगा दांव, न होगी तीतरबाज़ी।

✍️ चिराग़ जैन

व्यंग्यकार और व्यंग्य

व्यंग्यकारों के लिए ये जानना बेहद आवश्यक है कि व्यंग्य में बात टेढ़ी होनी जरूरी है, मुँह नहीं। व्यंग्यकार की बात श्रोता को थोड़ी देर से समझ आए तो यह व्यंग्य की गुणवत्ता है लेकिन व्यंग्यकार अपनी बात खुद भी बमुश्किल समझ पा रहा हो तो यह व्यंग्यकार की आत्ममुग्धता है।
किसी चर्चा में से व्यंग्य निकालने के लिए आवश्यक है कि मौन रहकर चर्चाकारों के शब्द और उससे भी अधिक उनके मनोभाव को सुना जाए। कई बार व्यंग्यकार चर्चा में इतना वाचाल हो उठता है कि चर्चाकार बोल भी नहीं पाते। ऐसे में व्यंग्य निकालने के प्रयास व्यंग्यकार को निकालने की स्थिति के रूप में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
मैंने अनेक वरिष्ठ व्यंग्यकारों को सीधे-सादे विषय के भीतर से इस प्रकार व्यंग्योक्ति निकालने का प्रयास करते देखा है जैसे कोई प्यासा कौआ पुरानी कहानी से प्रेरित होकर घड़े में कंकर डाल डाल कर प्यास बुझाने की तपस्या कर रहा हो। लेकिन इस प्रयास में काक यह भूल जाता है कि जिस घड़े में कंकर डाले जाएं उसकी तली में इतना जल होना आवश्यक है जो कंकरों का बदन तर करने के बाद चोंच के भीतर आ सकने को पूरा पड़े।
जबरन व्यंग्यकार बनने की चेष्टा में अक्सर कुछ लोग भरी महफिल में कोई जुमला उछालते हैं। जुमला उछालने की प्रक्रिया पूर्ण होते ही वे सदन को मुस्कुरा कर यह भी बताते हैं कि मेरे इस जुमले पर आप सबको इस प्रकार मुस्कुराना चाहिए था। इस सोपान के उपरान्त वे एक एक सदस्य की आँखों में इस भाव से देखते हैं कि इतने सारे मूढ़ों में एक आप तो मुस्कुरा कर मेरी श्रेष्ठ व्यंग्योक्ति समझने की क्षमता सिद्ध करें। अंतिम सदस्य तक पहुँचते-पहुँचते उनकी दृष्टि रिरियाने लगती है। लेकिन इस अपमान से वे हतोत्साहित नहीं होते। बल्कि अपने मुखमंडल पर अजीब सी इतराहत लाकर यह बताते हैं कि अगर तुम अल्पज्ञों में एक भी समझदार मेरे व्यंग्य को समझ लेता तो अब मैं इस प्रकार इतरा रहा होता।
व्यंग्य समाज को आइना दिखा सकता है लेकिन कई व्यंग्यकार उस आईने में चोंच मार मर कर उसे मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ते।
एक समय के बाद वे ये अपेक्षा रखने लगते हैं कि उनके बोलने, हंसने, मुस्कुराने, देखने और यहां तक कि उठने-बैठने तक को व्यंग्य समझ कर लोग खींस निपोरते रहें। यदि उनकी एकाध उक्ति प्रचलित हो जाए तो वे आदमी को आदमी क्या शब्द को शब्द नहीं समझते। उनकी सहजता में बैठा व्यंग्यकार उनकी चेष्टाओं में फूलते बदजुबान के आगे धराशायी हो जाता है। इस स्थिति में व्यंग्यकार आनंद कम और कष्ट अधिक देता है। पत्थर को तराश कर मूर्ति बनाने वाली छैनी भौंथरी होकर कला, कृति और कलाकार तीनों को नष्ट कर डालती है।
✍️ चिराग़ जैन

केदारनाथ धाम का उलाहना

देखकर तुमको
पुलककर खोल दूंगा द्वार
इस भ्रम में नहीं रहना!

याद रखना, सर्द बर्फीली हवा से भागकर
तुम मधुर मनुहार के हर इक नियम को त्यागकर
छोड़ जाते हो कड़कती ठण्ड से बन स्वार्थी
बर्फ़ के वीरान जंगल में अकेला, बेसहारा
ये सभी कुछ भूलकर तुमसे मिलूंगा; मैं निरा ईश्वर नहीं हूँ।
फिर मिलेगा भक्ति का अधिकार
इस भ्रम में नहीं रहना!

जिन धमनियों और शिराओं की उफनती वीथियों में
तुम रवां करते रहे हो, रोज़ मंत्रोच्चार के संग
प्रेम के, अपनत्व के औ आस्था के दीप अनगिन
वे नसें जमने लगी हैं, बर्फ के नीचे सिमटकर
इस दफ़ा उनका पिघलना भी असंभव जान पड़ता है।
फिर उठेगा इन रगों में ज्वार
इस भ्रम में नहीं रहना!

सच कहो, यह प्रेम क्या बस स्वार्थ का दर्पण नहीं है
क्या तुम्हारा प्राथमिक उद्देश्य पर्यटन नहीं है
रोज़ इन दुर्गम पहाड़ों में
हवा जब इस घिनौने प्रेम का आकाश तक उपहास करती है
मैं अकेला सिर झुकाए, ढोंग के संबंध का बोझा उठाता हूँ
फिर छलोगे तुम मुझे इस बार
इस भ्रम में नहीं रहना!

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!