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हास्य और अश्लीलता

पहले लाफ्टर चैम्पियन जैसे कार्यक्रम आए, उनमें कभी-कभी द्विअर्थी बातें सुनाई देती थीं। समाज के एक तबके ने मंच पर द्विअर्थी संवादों का प्रतिकार किया। लेकिन कुछ लोगों ने इस प्रतिकार को पुरातनवादी सोच कहा और द्विअर्थी संवाद समाज में मान्य हो गए।
प्रतिकार करनेवाले स्वरों को मौन कर दिया गया और समाज शालीनता के धरातल से एक सीढ़ी नीचे उतर गया।
मुझे ऐसा लगता है कि जिन शब्दों को ‘गाली’ कहा जाता है, उनका सार्वजानिक प्रयोग भी इसी तरह ‘सामान्य’ की श्रेणी में आया होगा।
अभद्रता हमेशा नैतिकता से नीचे रही है, वह समाज से समन्वय बैठाने के लिए कभी ऊपर नहीं आ सकती। यदि कोई अभद्रता समाज में सामान्य दिखाई दे तो समझ लेना चाहिए कि समाज ही अपने स्तर से नीचे उतर गया होगा।
पहले हम अपरिचितों के सामने गाली देते थे, फिर हम परिचितों के सामने गाली देने में निःसंकोच हुए। फिर हमने काम-धंधे और नौकरी-पेशे में अपने अधीनस्थ को गाली देना सामान्य कर दिया। फिर हम ग्राहकों को गाली देने लगे। फिर गालियां हमारा तकियाकलाम बन गईं। फिर हम गाली को परिवारवालों के सामने उच्चारने लगे। अब स्थिति ऐसी हो गई है कि कोई ‘गाली’ की शिकायत करने जाए तो लोग समझाते हैं, ‘अबे, ये गाली नहीं होती। ये तो आजकल नाॅर्मल है।’
यही कॉमेडी में बढ़ी अश्लीलता के साथ हुआ। पहले द्विअर्थी संवादों को मान्यता मिली। फिर असंसदीय भाषा ‘सामान्य’ समझी जाने लगी। फिर ‘AIB’ जैसे कार्यक्रमों में सितारों ने अभद्रता की तात्कालिक सीमाएं लांघीं। कॉर्पोरेट culture के युवाओं को यह आचरण अच्छा लगा। स्वतंत्रता और निरंकुशता के मध्य का भेद भूल चुकी पीढ़ी इस आचरण का अनुकरण करने लगी।
फिर TV पर Bigboss और stand up comedy के कार्यक्रम रोज़ अश्लीलता की दलदल में एक सीढ़ी उतरने लगे।
पिछले कुछ वर्षों से stand up comedy के live show शुरू हुए। इनमें प्रस्तुति देनेवाले कॉमेडियन Social Hypocrisy के कपड़े उतारने के प्रयास में ख़ुद नंगे होते चले गए।
पाखण्ड के चेहरे बेनक़ाब हुए तो युवा पीढ़ी किसी हल्के लोहे की तरह इन चुम्बकों से जा चिपकी। चूँकि गालियों को समाज पहले ही सामान्य मान चुका था, इसलिए युवाओं को इन comedians के मुँह से दूसरों के लिए गाली निकलना सामान्य लगा।
जब मंच की मर्यादा और भाषाई भद्रता के बंधन से मुक्त होकर किसी के भी विषय में कुछ भी बोलना लोकप्रिय होने लगा तो लाखों रुपये के पैकेज छोड़कर युवाओं ने ख़ुद को stand up comedian बनाना शुरू कर दिया।
जो लोग इस क्षेत्र में सफल हुए उनका बौद्धिक स्तर और observation लाजवाब है, यह मैं स्वीकार करता हूँ। लेकिन ज्यों-ज्यों इस क्षेत्र में competition बढ़ा, त्यों-त्यों इन comedians पर रोज़ कुछ नया, कुछ हटकर करने का दबाव बनने लगा।
इस दबाव के चलते किसी ने अपनी ही audience को गाली देकर लोगों को हँसाया। तो किसी ने बकायदा किसी को point out करके उसकी Hypocrisy का भौंडा मज़ाक किया।
इधर social media पर negative publicity को भी viral होने का tool मान चुकी पीढ़ी, अपने इस व्यक्तिगत अपमान को सौभाग्य मानने लगी।
कुछ नया करने का दबाव बढ़ता जा रहा था और अश्लीलता और बदतमीज़ी की कीचड़ में और गहरे उतरते comedians का हर style एफिल टॉवर की तरह एक ही viral वीडियो की बदौलत, झटपट common होता गया।
उठने की सीमा होती है, पर गिरने की कोई सीमा नहीं होती। इसीलिए ख़ुद को witty कहकर celebrity बने comedians को scripted instant content पर उतरना पड़ा। सामने बैठी ऑडियंस में paid लोग बैठाए गए, जिन्हें बेइज़्ज़ती कराने के पैसे मिलते थे।
यहाँ से होड़ लगी paid audience के पतन की। किसी ने अपने भाई को अपमानित किया तो किसी ने अपने माँ-बाप को। कोई अपनी सोच का मखौल बनवाने को तैयार हो गया तो कोई अपने profession की गरिमा को बेच आया।
जब गर्दन तक कीचड़ में उतर चुके इस profession के पास बेचने को कुछ नहीं बचा तो इन्होंने संबंधों की गोपनीयता बेची। कीचड़ नाक तक आ गई। जब यह भी कॉमन हो गया तो इस समाज ने उस व्यक्ति की लाश भी फूहड़ता की इस भट्ठी में झोंक दी, जिसने अपनी मृत्यु तक समाज को ‘दान’ कर दी थी।
अब ये लोग आमूलचूल कीचड़ में स्नान करके नंगे खड़े हो गए हैं। जिस लोक ने इनके हाथों पर मिट्टी लगी देखकर इन्हें प्रजापति समझ लिया था, उसी लोक की लाज का ऐसा हश्र इनके हाथों किया जाएगा, ऐसा अनुमान समाज को नहीं था।
हास्य पूजन जैसा पवित्र है। हँसी मनुष्य को बेहतर मनुष्य बना सकती है… ये बात समाज को बतानेवाले लोग ‘हँसी’ के साथ ‘मर्यादित’ विशेषण लगाना भूल गए थे।
बंदर उस्तरा लेकर आया और तुम उससे दाढ़ी बनवाने बैठ गए… अब बाल के साथ गाल भी कट रहे हैं। इससे पहले कि टेंटुए से ख़ून बह निकले, इन बन्दरों के हाथ से उस्तरा छीन लो!
✍️ चिराग़ जैन

हम नहीं सुधरेंगे

मुझे कोविड-19 का दौर अच्छी तरह याद है। अपने-अपने घरों में कैद हम लोग, अपनी और अपनों की जान की ख़ैर मना रहे थे। ‘जान है तो जहान है’ -का अर्थ उस दौर में सारी दुनिया को एक साथ समझ आ गया था।
राजनीति के अतिरिक्त सब कुछ पूरी तरह रुक गया था। सब लोग त्याग, समर्पण, मानवता तथा वैराग्य किस्म की बातें करते थे। रिश्ते, प्रकृति, स्वास्थ्य और मनुष्यता का अर्थ सभी को ठीक-ठीक समझ आ गया था। महावीर का अपरिग्रह कुछ अंशों में सबके भीतर घटित होने लगा था। बिना किसी सरकारी ‘अभियान’ या ‘आदेश’ के भी लोग स्वच्छ रहने लगे थे।
मनुष्य के जीवन में आए इस परिवर्तन पर गिलहरी, चिड़िया, टिटहरी बधाई गाती फिर रही थीं। आसमान ने दिल्ली जैसे शहरों की मांग में तारे जड़ दिए थे। कोविड ने कुछ हद तक मनुष्यता के डीएनए को क्लीन कर दिया था।
‘कुछ हद तक’ इसलिए कि संकट की घड़ी में परस्पर सहयोग कर रहे लोगों का क्रेडिट हड़पनेवाले यशापेक्षी दैत्य उस दौर में भी नहीं सुधरे। सियासत उस समय भी ‘आपदा में अवसर’ तलाशती हुई वोट के गणित में व्यस्त थी। मरीज़ को अस्पताल में इलाज मिले, इससे पहले यह सोचा जाता था कि यदि यह मरीज़ ठीक हो गया तो इसका वोट हमारी पार्टी की ओर कैसे डायवर्ट होगा।
मनुष्य जाति पर इतना संकट था कि मरघट तक ने मानव की मिट्टी को शरण देने से कन्नी काट ली थी। स्थिति इतनी भयावह थी कि फोन की घंटी से दहशत होने लगी थी, कि कहीं कोई और ‘अपना’ तो नहीं चला गया। बेटे, अपने बाप की मिट्टी से ख़ौफ़ खा रहे थे।
भय ने मानव मन को इतना पवित्र कर दिया था कि बरसों-बरस से जिन रिश्तेदारों से बोलचाल बंद थी, उनको भी फोन करके हालचाल पूछने की पहल हो रही थी। सबके मन में क्षमा, करुणा, दया, अपनत्व और विरक्ति ने घर कर लिया था।
भय का इतना सकारात्मक परिणाम मैंने पहली बार उसी दौर में अनुभूत किया था। भय मनुष्य को मर्यादित करता है। भय मनुष्य को मनुष्य बनाता है। निर्भय होते ही मनुष्य में दानव जन्म लेने लगता है। निर्भय होते ही मानव मर्यादा लांघने लगता है।
आपको डूबने का भय नहीं रहेगा तो आप किनारे की सीमा लांघकर पानी के सीने पर अतिक्रमण करने लगेंगे। आपको गिरने का भय नहीं रहेगा तो आप पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण को चुनौती देने लगेंगे। आपको मरने का भय नहीं रहेगा तो आप मारने में नहीं हिचकिचाएंगे। आपको अस्वस्थ होने का भय नहीं रहेगा तो आप देह के अनुशासन को भंग करेंगे। आपको भूख का भय नहीं रहेगा तो आप अन्न का अपमान करेंगे।
यह सामान्य मानवीय स्वभाव है। इसीलिए कहा गया है कि ‘भय बिनु प्रीति न होई’। संबंध भी हम तब तक निबाहते हैं, जब तक उस संबंध को खोने का भय न हो। यहां तक कि किसी के साथ मनुष्यता का व्यवहार भी हम तभी तक कर पाते हैं जब तक उस व्यक्ति विशेष से हमें किसी प्रकार की हानि का भय रहता है।
जैसे ही हमें ज्ञात होता है कि अब सामनेवाला हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता, तुरंत हम अमानुष हो जाते हैं।
कोविड के समय हमने प्रकृति के महत्व को जाना था। तब यह अहसास हुआ था कि इस दुनिया को संभालने में प्रकृति, मनुष्य से कहीं अधिक सक्षम है। कई दशकों में मनुष्य ने जिस प्रकृति की सूरत बिगाड़कर रख दी थी, मानवीय हस्तक्षेप कम होते ही प्रकृति ने केवल एक ऋतुचक्र में अपनी खोई आभा पुनः जुटा ली।
लेकिन मनुष्य बहुत निमर्म है। जिन लोगों ने मनुष्य बनकर जीने की कसमें खाई थीं, वे ही लोग संकट के बीतते ही दोबारा वीभत्स हो गए। उस संकटकाल में सीखे गए सबक ताक पर रखकर मनुष्य ने फिर उसी आपाधापी में स्वयं को झोंक दिया। नदी की नीली धार से लेकर वृक्षों के हरे जिस्म तक सबको घायल करने का सिलसिला दोबारा शुरू हो गया। आसमान के चेहरे पर कालिख पोत दी। धरती की देह में सड़ांध बो दी।
सरकारी खजाने के बजट से वन लगाने के बजट पास हुए और भ्रष्टाचारी तंत्र वन लगाने के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये डकार गया। पृथ्वी बेचारी देखती रह गई। उसका जिस्म नंगा रह गया। अधिकारियों को धरती की बेबसी दिखाई नहीं देती। जब कभी पृथ्वी कराह कर उनके पैर पकड़ती है तो वे समझ ही नहीं पाते कि उनके पांव किसने पकड़े हैं। क्योंकि उनकी दृष्टि और उनके पैरों के बीच में उनका पेट लटका रहता है।
जिन रिश्तों के महत्व को समझते हुए हमने उस दौर में आंखें नम की थीं, उन्हीं रिश्तों को हम पुनः आंखें दिखाने लगे। जो पैसा उस दौर में ऑक्सीजन का एक सिलेंडर नहीं खरीद पा रहा था, उसी पैसे के लिए भाग-भागकर हम हांफ रहे हैं।
उस समय पैसा पड़ा था और संबंध काम आ रहे थे। आज संबंधों को लतियाकर पैसा कमाया जा रहा है। इन सब परिवर्तनों से समझ आ रहा है कि पर्यावरण केवल धरती का ही नहीं, बल्कि मनुष्य की मानसिकता का भी प्रदूषित है। प्रकृति तो अपने रंग-रूप को कुछ ही दिन में सुधार लेती है लेकिन मनुष्य न कभी सुधरा है, न कभी सुधरेगा। वह तो संकट के काल में सुधरने का अभिनय मात्र करता है।
✍️ चिराग़ जैन

क्रिकेट से अधिक मनोरंजक होते हैं लोकल रवि शास्त्री

आपको अगर क्रिकेट का पूरा मज़ा लेना है तो स्टेडियम में जाने की बजाय किसी लोकल टाइप की क्रिकेट अकादमी में जाकर टीवी पर क्रिकेट का मैच देखिए। इसमें भी सावधानी यह कि आपको मैच नहीं देखना है, आपको तो मैच देख रहे लड़कों और उन लड़कों के गुरुजी को देखना है।
इस सिचुएशन में एक खेल तो स्टेडियम में चल रहा होता है, जिसका प्रसारण टीवी पर किया जाता है। और एक खेल लोकल क्रिकेट अकादमी के लोकल गुरुजी के मन में चल रहा होता है, जिसका प्रसारण उनकी भाव भंगिमाओं और हरकतों में हो रहा होता है। मुहल्ले के लड़कों को इकट्ठा करके ख़ुद को रवि शास्त्री समझनेवाले गुरुजी को क्रिकेट मैच देखते हुए देखना, मैच से अधिक मनोरंजक होता है।
वे टीवी के सामने ठीक इस मुद्रा में बैठते हैं जैसे भारत की टीम इलेवन का कोच पवेलियन में बैठकर अपने लड़कों की परफॉर्मेंस देख रहा हो। जब तक मैंच चलता है ये श्रीमान क्रिकेटगुरु टीवी स्क्रीन से साढ़े तीन फीट दूर अपनी कुर्सी पर स्थापित हो जाते हैं। इनकी तशरीफ़ सीडान कार की डिक्की की तरह थोड़ी पीछे की ओर निकल आती है। पीठ, टांगों से लगभग पचहत्तर डिग्री का एंगल बनाते हुए आगे को झुकती है लेकिन रीढ़ की हड्डी बिल्कुल सीधी रहती है। पीठ के ऊपरी छोर के बाद गर्दन कुछ ऐसे आगे को निकल आती है जैसे कोई राहु अपने केतु से अलग होकर हवा में लटक रहा हो। होंठ गोलाकार होकर कुछ चूसने की मुद्रा में यथासंभव आगे बढ़ जाते हैं और आंखें चुम्बक की तरह टीवी स्क्रीन पर चिपक जाती हैं। दोनों कुहनियां उनके भारी कंधों का बोझ उठाए हुए घुटनों पर दबाव बनाती हैं और उंगलियां पूरी टीम की चिंता में आपस में उलझती रहती हैं।
किसी भारतीय खिलाड़ी से कैच छूट जाए तो इस लोकल रवि शस्त्री की नाक सिकुडती है और सहसा उसके मुंह से ‘आइला’ या ‘शिट’ टाइप का कोई शब्द निकल पड़ता है। फिर वह अपने छोकरों की ओर देखकर सांत्वना देते हुए ‘कोई बात नहीं, कोई बात नहीं’ की ध्वनि के साथ अपने मैच्योर होने का प्रदर्शन करता है।
अच्छा शॉट लगने पर जब वह गर्वानुभूति के साथ आंखें मिचमिचा कर प्रसन्न होता हुआ ‘वेलडन वीरू वेलडन’ बोलता है, तो ऐसा लगता है कि किसी पट्ठे का दांव देखकर उस्ताद पहलवान की आत्मा मडोना बन गई हो।
भारतीय बल्लेबाज किसी बॉल पर बीट हो जाए तो लोकल रवि शास्त्री के चेहरे पर गहरी चिंता और भय का मिश्रित प्रभाव प्रकट होता है और वह जैसे-तैसे अपने होश संभालकर बोल पाता है, ‘क्या कर रहा है सचिन यार, थोड़ा संभलकर!’
पूरे खेल के दौरान इन गुरुजी का ब्लड प्रेशर ‘रनिंग बिटीवन द विकेट्स’ करता ही रहता है। ‘यॉर्कर डाल यार’, ‘स्ट्राइक दे’, ‘प्रेशर मत ले’, ‘आराम से’ और ‘गुड शॉट’ कहते हुए गुरुजी लगातार मैच में बने रहते हैं।
शुक्र है विज्ञान का, कि टीवी के सामने बैठकर बोलनेवालों की आवाज़ स्टेडियम में खेल रहे खिलाड़ियों के कानों तक नहीं पहुंच पाती। वरना वैभव सूर्यवंशी तय नहीं कर पाते कि उन्हें पहले बॉल को पीटना है या क्रिकेटप्रेमियों को।
एक कमेंट्री टीवी पर चल रही होती है और एक-एक कमेंट्री हर लोकल रवि शास्त्री कर रहा होता है।
पूरी दुनिया में किसी भी खेल के प्रशंसक होते हैं लेकिन हमारे देश में क्रिकेट के दीवाने होते हैं। हमारे यहां क्रिकेटर्स को खिलाड़ी नहीं, डायरेक्ट भगवान मानने की परंपरा है। ये और बात है कि जब वही क्रिकेटिया भगवान आउट ऑफ फॉर्म हो जाता है, तो हम उस भगवान के घर-वर तोड़ने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते। हमारे यहां क्रिकेटरों के लिए यह कहावत बहुत सूट करती है कि ‘एक गेंद पर निखरे इज्जत, एक गेंद पर होवे हुज्जत।’
इन दिनों वैभव सूर्यवंशी का प्रदर्शन देखकर सोशल मीडिया पर किसी ने उसे भविष्य का विश्वविजेता बताया तो किसी ने उसे अगला प्रधानमंत्री तक घोषित कर दिया। एक ज्योतिषी बता रहे थे कि इसकी राशि पर आज बृहस्पति गोचर कर रहे हैं, इसे अच्छा खेलना ही था। मैंने माथा पीट लिया, पूरा देश वैभव को बधाई दे रहा है, जबकि असली मेहनत पृथ्वी से करोड़ों किलोमीटर दूर बैठा बृहस्पति कर रहा था।
हम भारतीय भावनाओं में जीते हैं। खेल का मैदान हो या असल जीवन, जब तक तथ्य और सत्य बेचारे पैदल चलते-चलते हांफते हुए सबके सामने पहुंचते हैं, उससे काफी पहले भावनाएं दौड़कर मंच पर पहुंच जाती हैं और तांडव मचा चुकी होती हैं।

✍️ चिराग़ जैन

समय बहुत नाज़ुक है

एक पत्रकार ने अध्यापकों की कौड़ी गिन दी और पूरा समाज उस पत्रकार के विरोध में खड़ा हो गया। एक प्रशासनिक अधिकारी ने ‘कॉकरोच’ शब्द का प्रयोग किया और युवाशक्ति ने रातोंरात एक डिजिटल क्रांति खड़ी कर दी।
शिक्षा के दोनों छोर एक साथ छेड़े गए और एक पूरे समाज के सिले हुए होंठ खुल गए। इस क्रांति का भविष्य क्या होगा यह तो कहना कठिन है, किन्तु इन दोनों प्रकरणों ने यह अवश्य सिद्ध कर दिया कि संभावनाएं और आशंकाएं क्षीण हो सकती हैं किन्तु समाप्त कभी नहीं होती।
सोशल मीडिया पर विचरण करते हुए पाता हूं कि देश में किसी क्रांति जैसा माहौल है। रवीश कुमार से लेकर खान सर तक कोई भी ऐसी बात नहीं कह रहा है, जो समाज जानता न हो, लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण यह है कि बातें कही जाने लगी हैं। कब तक कह पाएंगे और कहां तक सुनी जाएंगी… यह कहना जल्दबाज़ी होगी।
इस दौर में अट्टालिकाओं के अहंकार से त्रस्त समाज से मैं यह अपेक्षा अवश्य करूंगा कि इस बार अपने विवेक से समझौता मत करना। सिस्टम का विरोध ही सही, लेकिन किसी के भी पीछे चलने से पहले यह समझ लेना कि कहीं हमारा नेतृत्व करनेवाला भी अपने किसी हितसाधन के लिए हमें भीड़ की तरह ‘इस्तेमाल’ तो नहीं कर रहा है।
कहीं श्वेत परिधानी बाबा का रिमोट किसी चालाक प्रशासनिक के हाथ में तो नहीं है। किसी के सुर में सुर मिलाने से पहले यह अच्छी तरह पड़ताल कर लेना कि कहीं इस सुरीले क्रांतिकारी के सुरों का कोई सप्तक किसी दूसरे आततायी के चरणों में जाकर विलीन तो नहीं हो रहा है।
‘जन’ एक महत्वपूर्ण शब्द है। दुनियाभर में अब राजनीति को इस ‘जन’ की आवश्यकता नहीं रह गई है। इस जन को एकत्रित करके शातिर लोगों ने जैसे-जैसे धोखे किए हैं, उनसे सबक लेकर इस बार कदम मिलाकर भी चलना आवश्यक है और कदम संभालकर भी…।
मुझे याद है कांग्रेस सरकार के समय राहुल गांधी ने एक बयान दिया था कि मध्यम वर्ग कैटल क्लास की तरह सफ़र करता है। इस बयान पर खूब हंगामा हुआ था। राहुल गांधी के विरुद्ध लोगों का गुस्सा फूटा था। उस समय कांग्रेस के सत्ताजनित अहंकार के परिणामस्वरूप प्रत्येक ख़बर लोगों की भावनाओं को आहत करती थी।
अब भी लगभग वही माहौल है। बस तब जनता बोलती थी, आज बोलने पर अनकही-सी मनाही है। पानी को अगर सही तरीके से निकलने का रास्ता न मिले तो वह पाइप फोड़कर निकलता है। हालांकि मैं फिर भी इस बात पर अडिग हूं कि किसी भी तरह की अराजकता अंततः हानिकारक ही सिद्ध होती है। यह बात सिस्टम को भी समझनी होगी और जनता को भी। सिस्टम को इस सोच से बाहर निकलना होगा कि अपेक्षा, बात और शिकायत दरअस्ल सिस्टम का विरोध ही हैं। ठीक इसी तरह जनता को भी यह समझना होगा कि प्रशासन चलाते समय कहा गया हर शब्द अभिधा नहीं होता।
एक और महत्वपूर्ण बात। यदि केवल अध्यापकों को राष्ट्रप्रेमी, ईश्वर के अवतार और ऐसे ही हाइपोथेटिकल विशेषणों से नवाज़ने का सिलसिला ज़ोर पकड़ गया तो मूल विषय धूमिल हो जाएगा। जैसे किसान आंदोलन के समय हुआ। जैसे डॉक्टरों की हड़ताल के समय हुआ। जैसे खिलाड़ियों के समय हुआ।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर मनुष्य में कुछ खामी हो सकती है। जिस देश में डॉ. सर्वपल्लि राधाकृष्णन और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे अध्यापक हुए हैं उस देश में कोई अध्यापक भ्रष्ट हो ही नहीं सकता, इस सामान्यीकृत धारणा से अपने समाज को बचाना आवश्यक है। और जिस देश में एक पत्रकार दारू पीकर लड़खड़ाती हुई एंकरिंग करता हुआ रिकॉर्ड हुआ है, उस देश में सभी पत्रकार दारुड़िये हैं, यह धारणा भी अपरिपक्व है। मेरा तो मानना है कि जो पत्रकार दारू पीकर न्यूज़ पढ़ता हुआ मिला है, वही पत्रकार कभी सत्ता की आंखों में आंखें डालकर प्रश्न करता हुआ मिल जाए तो उसका उस विशेष साहस के लिए सम्मान किया जाना चाहिए। और फिर वही पत्रकार किसी दिन पीत पत्रकारिता करता पाया जाए तो उसी पत्रकार की आलोचना होनी चाहिए।
पत्रकारों को यह बात समझनी पड़ेगी कि जनता का जो गुस्सा इस समय पत्रकारिता के विरुद्ध आंधी की तरह फूट रहा है, वह किसी एक पत्रकार की एक स्टेटमंेट का परिणाम नहीं है। पत्रकारों को यह याद करना होगा कि इस देश ने सुरेन्द्र प्रताप सिंह और प्रभाष जोशी सरीखे पत्रकारों को देखा है। इस देश की पत्रकारिता ने साहस और नैतिकता के इतने बड़े प्रतिमान खड़े किए हैं कि व्यावसायिकता और सत्ता के दबाव से उत्पन्न आपकी कोई भी विवशता यह देश नहीं समझ सकेगा। इसलिए अपनी रिपोर्टिंग में दबाव का अनुपात आटे में नमक जितना ही रखें। इससे अधिक दबाव दिखा तो खानेवाला आपकी रसोई के कौर को थूक देगा।
✍️ चिराग़ जैन

सरकार बड़ी दयालु है

सालों तक हम किसानों के लिए ‘अन्नदाता’, ‘धरती का भगवान’ और न जाने क्या-क्या विशेषण प्रयोग करते रहे। फिर एक दिन किसानों का राजनीति से पंगा हो गया। पंगा होते ही हम किसानों को ‘आतंकवादी’, ‘राष्ट्रद्रोही’, ‘दंगाई’, ‘अराजक’ और न जाने क्या-क्या कहने लगे। किसानों ने आंदोलन किया तो हमने ‘जय जवान, जय किसान’ के नारे को बांट दिया और अपने जवानों को आदेश दिया कि किसानों पर हमला करो।
इसी तरह हम डॉक्टरों को भगवान का प्रतिनिधि कहते रहे। फिर एक बार डॉक्टरों को सरकार के सामने अपनी कुछ मांगें रखनी पड़ी। चूंकि इतने सालों में डॉक्टर भी खुद को भगवान समझने लगे थे इसलिए उन्होंने सरकार को डांटने का दुस्साहस किया। सरकार ने दो मिनिट में डॉक्टरों को बता दिया कि बेटा, तुम्हें भगवान बनाना हमारी लीला है। भगवान दरअस्ल हम ही हैं।
यही हाल खिलाड़ियों का भी रहा। जिसका सरकार से पंगा हुआ, उसी को उसकी औक़ात बता दी गई। पत्रकारों ने समय पर ही सरकार की कुर्सी पर बैठे भगवान को पहचान लिया था। इसलिए उन्होंने समय से पहले ही सरकार की आरती गानी शुरू कर दी थी। सरकार ने शरणागतवत्सल की तरह पत्रकारों को अभयदान दिया।
ज्यों-ज्यों अलग-अलग वर्गों ने सरकार द्वारा दिए गए सम्मान को सरकार के विरुद्ध प्रयोग करना चाहा, तुरंत सरकार ने उन पर से दयादृष्टि हटाकर तीसरी आंख खोल दी। और एक बार जिस पर उस तीसरी आंख की ज्वाला पड़ी, उसकी प्रतिष्ठा जलकर भस्म हो गई।
जिन विद्यार्थियों को हम अब तक देश का भविष्य समझते रहे, वे सरकार के सिस्टम में खामी निकालते ही कॉकरोच बन गए। विद्यार्थियों ने कहा कि हम सरकार का विरोध नहीं कर रहे हैं, हम तो केवल चोट के दर्द से कराह रहे हैं। पत्रकारों ने बताया कि तुम्हारी कराह से सरकार की आरती का माहौल खराब होता है। यह भी राष्ट्रद्रोह ही है।
शिक्षकों ने सोचा, हमें तो गुरुपूर्णिमा, शिक्षक दिवस और ऐसे ही तमाम सम्मान प्राप्त हैं। हमें तो हर वर्ग ने हमेशा सम्मान की दृष्टि से ही देखा है। यहां तक कि हिन्दी फिल्मों में भी हम हमेशा सम्मानित ही रहे हैं। और फिर हमने जनगणना से लेकर सरकार के अन्यान्य कार्यों में भी कभी आनाकानी नहीं की। झोला लेकर गली-गली बंद और खुली नालियां गिनते फिरे हैं। पोलियो की दवाइयां पिलाई हैं। इसलिए सरकार हमारी बात अवश्य सुनेगी।
ऐसा विचार करके मास्टर जी पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने विद्यार्थियों को हुए कष्ट की दुहाई देते हुए रण में कूद पड़े। अबकी बार सरकार ने कुछ नहीं कहा। लेकिन पत्रकारों ने मास्टर जी की कौड़ी उठा दी। मास्टर बेचारा अपनी अदना सी पे-स्लिप को देखकर अपमानित होकर पानी-पानी हो गया। किसी ने मास्टर को ट्यूशनिया कहा तो किसी ने माफ़िया।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सरकार कभी ग़लत नहीं होती। जिसे सरकार में कोई ख़ामी दिखती है, वह या तो अहसानफ़रामोश है या फिर राष्ट्रद्रोही है। सरकार तो कृपानिधान है। वह तुम्हें समाज से इज़्ज़त दिलवाती है और तुम चले हो उसी पर उंगली उठाने…! हम्मम… बड़े आए!
✍️ चिराग़ जैन

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