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ये आग कब बुझेगी

विश्व भर में भावुकता और संवेदना की मिसाल कहा जानेवाला देश आज राजनैतिक वर्चस्व की अंधी होड़ में संवेदना जैसे शब्दों को कितना बेमआनी कर चुका है, इसका आभास होने तक संभवतः हमारे पास पश्चाताप के लिए आंसू तक नहीं बचेंगे।
हमारी संस्कृति ने हमें सिखाया है कि अपनी महत्वाकांक्षाओं की बलिवेदी पर नौनिहालों को बलिदान करनेवाले चरित्र कंस और हिरण्यकश्यप जैसी कुख्याति को प्राप्त करते हैं। लेकिन जिस दौर में निगेटिव पब्लिसिटी को भी सुर्ख़ियों में बने रहने का हथकण्डा समझा जाने लगा हो, वहां बेचारी संस्कृति की पुस्तक पलटने की फ़ुरसत किसके पास बची है!
यह सत्य है कि लखनऊ की आग न तो सत्ता ने लगाई है, न ही विपक्ष ने। लेकिन यह भी सत्य है कि राजनीति ने हमारी संवेदना को इतना भौंथरा तो कर ही दिया है कि हम चौदह-पन्द्रह परिवारों की चौखट पर पसरे अंधेरे पर कोई टिप्पणी करने से पहले यह सोच रहे हैं कि इससे सत्ता को क्या नुकसान होगा और विपक्ष को क्या लाभ होगा। हम मानवता की मर्यादा रेखा से इतनी दूर तो आ ही गए हैं कि बड़े से बड़े दुर्भाग्य की ख़बर सुनकर हमारे समाचार चैनल यह विचार करने लगते हैं कि जिस इमारत में आग लगी है उसे कोचिंग सेंटर की बजाय गेमज़ोन कहने से ख़बर की लपटों को किस दिशा में मोड़ना संभव हो सकेगा।
यह एक सत्य है कि ‘हादसे बोलकर नहीं आते’ लेकिन यह भी सत्य है कि यदि प्रशासन हादसे से उपजे क्रोध को डाइल्यूट करने की बजाय वास्तव में समाधानोन्मुखी कदम उठाती तो आज़ादी के आठवें दशक में भी हम अनाधिकृत निर्माण और विभागीय भ्रष्टाचार के कारण निर्दोष युवक-युवतियों के झुलसे हुए जिस्म देखने पर विवश न हुए होते।
परीक्षाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार और विभागीय लापरवाही से हताश जिन बालकों ने आत्महत्या जैसे कदम उठाए हैं, वे दरअस्ल हमारी व्यवस्था के मुंह पर यह प्रश्नचिन्ह तो छोड़ ही गए हैं कि इस हताशा का असली दोषी कौन है कि एक बालक अपने सिस्टम से सवाल पूछने की बजाय, अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेना ज़्यादा आसान समझ रहा है। हो सकता है कि अत्याचार के आगे अपना मुंह बंद करने से अधिक आसान जान पड़ा हो अपनी आंखें बंद कर लेना।
कल उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री को लखनऊ के घटनास्थल के बाहर मीडिया को बाइट देते देखा। महसूस हुआ कि उनका गला भर्रा गया था। महसूस हुआ कि उनकी आंखों की कोरें भीग गई थीं। बस उसी एक बाइट को देखकर मेरे भीतर के नैराश्य में आशा की किरण जगती है। लेकिन इसके तुरंत बाद ज्यों ही मीडिया कवरेज देखी तो ऐसा लगा जैसे हमने संवेदना की तमाम उम्मीदों को नेस्तोनाबूद करने का प्रण ले लिया है।
प्रश्न यह नहीं है कि सत्तर साल किसका शासन था और बारह साल से कौन गद्दी पर बैठा है। प्रश्न यह है कि दिल्ली में तोड़े जा रहे अनधिकृत निर्माण पर व्यवस्था को कोसनेवाले अराजक नागरिकों को लखनऊ की दुर्घटना पर अनधिकृत निर्माण के लिए सरकार को उत्तरदायी ठहराने का अधिकार कैसे मिल सकता है?
प्रश्न यह है कि यदि अलीगंज की उस इमारत के लिए अधिकारियों पर सख़्त कार्रवाई की मांग की जा सकती है तो चांदनी चौक और करोलबाग़ की इमारतों का हिसाब-किताब करने पर हंगामा क्यों मचाया जाता है।
दरअस्ल समस्या के समाधान पर किसी का ध्यान है ही नहीं। सत्ता हो या विपक्ष, किसी भी घटना या दुर्घटना पर उनके मन में केवल एक प्रश्न कौंधता है कि इस घटना को भुनाकर पब्लिक सेंटीमेंट्स अपने पक्ष में कैसे किये जाएं। पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में सिर पर लटकते बिजली के तार हटाने तक का साहस जिस व्यवस्था में नहीं है, वह बुलडोजर और त्वरित न्याय की बात करती अच्छी नहीं लगती।
जब कभी यह प्रश्न उठता है, तब बेशक सरकारी विभाग कुछ छज्जे तोड़कर, कुछ इमारतें गिराकर अपनी गंभीरता का विज्ञापन करने लगते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि जिस अधिकारी के कार्यकाल में वह इमारत बनकर तैयार हुई, जिस-जिस अधिकारी के हस्ताक्षर से उसका बिजली-पानी का कनेक्शन पास हुआ। जिस-जिस अधिकारी ने उसकी हाउस-टैक्स की रसीदों पर हस्ताक्षर किए, उन सब पर हत्या के मुकदमे चलाने का प्रवधान नहीं होगा तो यह व्यवस्था कभी नहीं सुधरेगी।
मैं किसी भाजपा या किसी कांग्रेस का समर्थन या विरोध करके अपने आंसुओं का अपमान नहीं करना चाहता। मैं यह भी नहीं चाहता कि अमानवीय भ्रष्ट आचरण को किसी भी तरह की अराजकता के हाथों सौंप दिया जाए। मैं केवल इतना चाहता हूं कि जिन संभावनाओं को कल अलीगंज की इन लपटों ने लील लिया है, उन्हें हम श्रद्धांजलि न दें, बल्कि यह आश्वस्ति दें कि ‘प्यारे बच्चो! जब भी इस देश में व्यवस्था-सुधार के तात्कालिक कारणों पर चर्चा होगी, तब तुम सबके झुलसे हुए चेहरे सूरज की तरह चमक उठेंगे।’

✍️ चिराग़ जैन

विदूषकों से प्रदूषकों तक

हमारा समाज मुद्दतों से गालियों को यत्र-तत्र प्रयोग करके व्यर्थ करता रहा है। पहली बार एक पूरी पीढ़ी ने इन मूल्यवान शब्दों की कीमत समझकर इनका बाकायदा एक प्रोफेशन के रूप में सदुपयोग करना सीखा है। गालियों के बूते बाकायदा एक ऐसी विधा डेवलप हुई है, जिसमें छोटे-बड़े, लड़के-लड़की, अपने-पराये और सभ्य-असभ्य जैसे भेदभाव के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। इसे कहते हैं असली समानता का अधिकार।
इन महान कलाकारों को सरस्वती जी से तो आशीर्वाद मिल नहीं सकता, इसीलिए इन्होंने महाभारत के शिशुपाल को अपना ‘आराध्य’ मान लिया है। उसी के चरित्र का अनुसरण करते हुए ये लोग, न मौका देखते हैं न दस्तूर, बेहिचक जमकर गालियां बकते हैं। माइक हाथ में आते ही इन्हें लगता है कि यदि गालियां न बकी गईं तो शायद इनका आराध्य इनसे नाराज़ हो जाएगा।
पैसे देकर, टिकट ख़रीदकर इनके शो देखनेवाले श्रोतागण भी इनकी गालियां सुनकर खूब ठहाके लगाते हैं। कंटेंट पर तालियां बजें या न बजें लेकिन गालियों पर तो तालियां बजती ही बजती हैं।
श्रोतादीर्घा में बैठी पब्लिक अपने उपहास पर, अपने परिवारवालों के उपहास पर और अपने प्रोफेशन के उपहास पर इतने प्रसन्न होते हैं, जैसे किसी ने उन्हें नोबेल पुरस्कार दे दिया हो।
हम vulg पहुंच गए। सेंसरबोर्ड जैसे संस्थान भी इन्हें कुछ नहीं कहते, क्योंकि यदि इनकी स्क्रिप्ट में से उन्होंने कुछ एडिट करने की कोशिश की तो अंत में केवल विराम-चिन्ह ही शेष बचेंगे।
मैं इन आधुनिक स्टैंडअप कॉमेडियन्स को समाज-सुधारक मानता हूं। क्योंकि इन्होंने उन शब्दों का उद्धार किया है, जिन्हें असभ्य कहकर अभी तक समाज में तिरस्कृत समझा जाता था। इन्होंने लाज-शर्म और लिहाज के घूंघट में जी रहे विषयों को सार्वजनिक मंच पर ले आने का साहस किया है। और चूंकि चैरिटी बिगिन्स फ्रॉम होम, इसीलिए इन महान आत्माओं ने अपने माता-पिता, अपने भाई, अपने दोस्तों और अपनी बहन तक के नितांत निजी क्षणों को धड़ल्ले से सबके सामने सुनाया।
मर्यादा की लीक पर चलते हुए अभी तक भारतीय समाज बाप-बेटी और भाई-बहन के संबंधों को जीता रहा था, उन्हें लगभग निर्वस्त्र करते हुए तलियों और ठहाकों का विषय बनाया गया। जिस तरह की बातचीत को ‘शर्मनाक’ कहकर अभी तक समाज लानत भेजता रहा था, उन्हीं को ‘गर्व’ का विषय सिद्ध करनेवाले ये युगदृष्टा एक नये युग का सूत्रपात कर रहे हैं।
कविता से हास्य उत्पन्न करनेवाले हास्य कवि, चुटकुलों से हंसानेवाले हास्य कलाकार, मिमिक्री के बूते हंसी परोसनेवाले मिमिक्री आर्टिस्ट और हावभाव से लोगों का तनाव दूर करनेवाले हास्य अभिनेताओं ने अभी तक समाज को असली हंसी से दूर रखा। इन नए हास्य अवतारों ने हास्य का पूरा परिदृश्य बदलकर रख दिया।
अपने आपको आधुनिक कहनेवाले इन शिशुपाल-पुत्रों को याद रखना चाहिए कि जिस समाज को तुम कायर मान बैठे हो, वह दरअस्ल कृष्ण की तरह मौन रहकर तुम्हारे अपराधों की गिनती कर रहा है।

✍️ चिराग़ जैन

भारतीय संस्कृति में हास्य

हम हास्य को लेकर बेहद संवेदनशील दौर से गुज़र रहे हैं। एक तरफ वे लोग हैं जो स्वस्थ, पारंपरिक, पारिवारिक और सामाजिक ठट्ठे को भी ‘जातीय अपमान’, ‘आस्थाओं पर प्रहार’ तथा ‘राष्ट्र्रद्रोह’ सिद्ध करने पर तुला है। जो परिहास को भी ‘उपहास’ और ‘अपमान’ सिद्ध करने के षड्यंत्र रच रहा है, दूसरी ओर वे लोग हैं जो निरी अश्लीलता और वैभत्स्य को ‘हास्य’ घोषित कर देना चाहता है।
हमारी संस्कृति में उल्लास और उत्सव में देवी-देवताओं और यहां तक कि ईश्वर को भी सहभागी माना जाता है। परिवार के बड़े-बूढ़ों से लेकर बालकों तक सबके लिए परिहास तथा हंसी-ठट्ठा हमारे उत्सव-टेलों में सम्मिलित होता है। शादी-ब्याह में गाई जानेवाली ‘गारी’ और रतजगों में होनेवाला परिहास हमारी लोकसंस्कृति में रचे-बसे हास्यबोध का परिचायक है।
यही कारण है कि हमारी संस्कृति दुनिया की उन गिनी-चुनी संस्कृतियों में से एक है जिनके यहां हंसता हुआ ईश्वर उपलब्ध है। हमारे पौराणिक साहित्य में हास्य-विनोद के अनेक प्रसंग इस बात का प्रमाण हैं कि हंसने से ईश्वर अपमान नहीं होता, बल्कि अपनत्व बढ़ता है।
ऐसा नहीं है कि हंसने से अपमान हो नहीं सकता। और ऐसा भी नहीं है कि गंभीर रहनेवाला व्यक्ति जो करता है वह सम्मान ही है। यह सब धारणा पर निर्भर करता है। शिशुपाल गाम्भीर्य ओढ़कर भी नारायण का अपमान करने का प्रयास करता रहा। दुर्योधन हंसते हुए भी पाण्डवों के विरुद्ध लाक्षागृह का षड्यंत्र रच रहा था। कर्ण स्मितहीन जीवन जीकर भी द्रोण से लेकर कुंती तक पर व्यंग्यबाण छोड़ता रहा और राम, मुस्कुराते हुए अनेकानेक कष्टों से होकर गुज़र गए।
हंसना-मुस्कुराना अपराध है यह भी आधी-अधूरी विवेचना है और गाम्भीर्य शालीनता है, यह भी अर्द्धसत्य ही है।
जो मुस्कान सहजता में अभिवादन के काम आती है, विरोध में वही मुस्कान कटाक्ष बन जाती है। ऐसे में मुस्कान से धारणा का निर्णय करना बेहद बचकाना है।
महाभारत में मयसभा में सुयोधन को जो भ्रम हुआ था वह विशुद्ध हास्य का प्रसंग था। पानी और धरती में भेद न कर पाने के कारण सुयोधन जो आचरण कर रहे थे, उसे देखकर वहां उपस्थित सभी लोग हंस रहे थे। इस क्षण पांचाली ने हास्य की मर्यादा लांघकर जो कटाक्ष किया वह हास्य करनेवाले के लिए मर्यादा का श्रेष्ठ उदाहरण है तथा उस समय सुयोधन के मन में प्रतिशोध की जो अग्नि भड़की, वह हास्य-बोध न समझनेवालों के लिए सबक जैसा है।
यही नहीं महाभारत में ही विराटनगर के युवराज ‘उत्तर’ और वृहन्नला के मध्य हुआ संवाद हास्य की छटा प्रस्तुत करता है। नारदमुनि को कामदेवव पर विजय पाने के लिए ‘हरिमुख’ के नाम पर ‘वानरमुख’ देनेवाले नारायण ने परिहास से परहेज नहीं किया। शिवपुराण में भस्मासुर को अपने ही सिर पर हाथ रखने के लिए विवश करनेवाली मोहिनी का प्रकरण हास्यरस का प्रसंग है। हरिवंशपुराण में श्रीकृष्ण की बाललीलाओं में प्रचुर हास्य मिलता है। रामचरितमानस में जिस चातुर्य से हनुमान सुरसा को परास्त करते हैं, अशोक वाटिका में किलोल करते हैं… वह सब हास्य की ही श्रेणी में आता है। पंचवटी में शूर्पणखा का प्रसंग, लंका में कुम्भकर्ण का वर्णन तथा ऐसे ही अनेक प्रसंगों में हास्य की छटा दिखाई देती है। हमारी लोक-कहावतों तथा मुहावरों में भी पौराणिक संदर्भों के पर्याप्त उद्धरण मिलते हैं।
इससे यह तो स्पष्ट हो जाता है कि हमारी संस्कृति में हास्य को अछूत नहीं माना गया है। किंतु यह भी जानना आवश्यक है कि शस्त्र कौन सा चलाया गया से अधिक महत्वपूर्ण है कि शस्त्र किस विचार से चलाया गया।
धर्म का अपमान उन्होंने नहीं किया जिन्होंने अपने पूजितों को अपने उत्सवों में सम्मिलित किया। धर्म का अपमान उन्होंने किया है जिन्होंने अपने ईश्वर के नाम पर घृणा और विद्वेष बोने के कुचक्र रचे।
हमारा ईश्वर इतना सक्षम है कि वह जब चाहे अपने सम्मुख खड़े शिशुपाल की गर्दन उतार सकता है। हमारा ईश्वर इतना सक्षम है कि वह घृणित समझे गए गिद्ध के प्रति भी कृतज्ञ होने से नहीं कतराता। हमारा ईश्वर इतना सक्षम है कि वह लंका में रहनेवाले रावण और विभीषण की सोच के अंतर को समझ सकता है।
इसलिए ईश्वर की चिंता के नाम पर समाज में घृणा फैलाना छोड़ो। ईश्वर अपने समाज को हंसता-खेलता देखकर प्रसन्न होता है। लड़ता-भिड़ता देखकर तो उसे भी कष्ट ही होता है। इसलिए धर्म की रक्षा के नाम पर समाज को घृणा की अंधी खोह में धकेलनेवाले भी उतने ही पापी हैं जितने हास्य के नाम पर पैशाचिक वैभत्स्य तक उतरनेवाले लोग पापी हैं।

✍️ चिराग़ जैन

हास्य और अश्लीलता

पहले लाफ्टर चैम्पियन जैसे कार्यक्रम आए, उनमें कभी-कभी द्विअर्थी बातें सुनाई देती थीं। समाज के एक तबके ने मंच पर द्विअर्थी संवादों का प्रतिकार किया। लेकिन कुछ लोगों ने इस प्रतिकार को पुरातनवादी सोच कहा और द्विअर्थी संवाद समाज में मान्य हो गए।
प्रतिकार करनेवाले स्वरों को मौन कर दिया गया और समाज शालीनता के धरातल से एक सीढ़ी नीचे उतर गया।
मुझे ऐसा लगता है कि जिन शब्दों को ‘गाली’ कहा जाता है, उनका सार्वजानिक प्रयोग भी इसी तरह ‘सामान्य’ की श्रेणी में आया होगा।
अभद्रता हमेशा नैतिकता से नीचे रही है, वह समाज से समन्वय बैठाने के लिए कभी ऊपर नहीं आ सकती। यदि कोई अभद्रता समाज में सामान्य दिखाई दे तो समझ लेना चाहिए कि समाज ही अपने स्तर से नीचे उतर गया होगा।
पहले हम अपरिचितों के सामने गाली देते थे, फिर हम परिचितों के सामने गाली देने में निःसंकोच हुए। फिर हमने काम-धंधे और नौकरी-पेशे में अपने अधीनस्थ को गाली देना सामान्य कर दिया। फिर हम ग्राहकों को गाली देने लगे। फिर गालियां हमारा तकियाकलाम बन गईं। फिर हम गाली को परिवारवालों के सामने उच्चारने लगे। अब स्थिति ऐसी हो गई है कि कोई ‘गाली’ की शिकायत करने जाए तो लोग समझाते हैं, ‘अबे, ये गाली नहीं होती। ये तो आजकल नाॅर्मल है।’
यही कॉमेडी में बढ़ी अश्लीलता के साथ हुआ। पहले द्विअर्थी संवादों को मान्यता मिली। फिर असंसदीय भाषा ‘सामान्य’ समझी जाने लगी। फिर ‘AIB’ जैसे कार्यक्रमों में सितारों ने अभद्रता की तात्कालिक सीमाएं लांघीं। कॉर्पोरेट culture के युवाओं को यह आचरण अच्छा लगा। स्वतंत्रता और निरंकुशता के मध्य का भेद भूल चुकी पीढ़ी इस आचरण का अनुकरण करने लगी।
फिर TV पर Bigboss और stand up comedy के कार्यक्रम रोज़ अश्लीलता की दलदल में एक सीढ़ी उतरने लगे।
पिछले कुछ वर्षों से stand up comedy के live show शुरू हुए। इनमें प्रस्तुति देनेवाले कॉमेडियन Social Hypocrisy के कपड़े उतारने के प्रयास में ख़ुद नंगे होते चले गए।
पाखण्ड के चेहरे बेनक़ाब हुए तो युवा पीढ़ी किसी हल्के लोहे की तरह इन चुम्बकों से जा चिपकी। चूँकि गालियों को समाज पहले ही सामान्य मान चुका था, इसलिए युवाओं को इन comedians के मुँह से दूसरों के लिए गाली निकलना सामान्य लगा।
जब मंच की मर्यादा और भाषाई भद्रता के बंधन से मुक्त होकर किसी के भी विषय में कुछ भी बोलना लोकप्रिय होने लगा तो लाखों रुपये के पैकेज छोड़कर युवाओं ने ख़ुद को stand up comedian बनाना शुरू कर दिया।
जो लोग इस क्षेत्र में सफल हुए उनका बौद्धिक स्तर और observation लाजवाब है, यह मैं स्वीकार करता हूँ। लेकिन ज्यों-ज्यों इस क्षेत्र में competition बढ़ा, त्यों-त्यों इन comedians पर रोज़ कुछ नया, कुछ हटकर करने का दबाव बनने लगा।
इस दबाव के चलते किसी ने अपनी ही audience को गाली देकर लोगों को हँसाया। तो किसी ने बकायदा किसी को point out करके उसकी Hypocrisy का भौंडा मज़ाक किया।
इधर social media पर negative publicity को भी viral होने का tool मान चुकी पीढ़ी, अपने इस व्यक्तिगत अपमान को सौभाग्य मानने लगी।
कुछ नया करने का दबाव बढ़ता जा रहा था और अश्लीलता और बदतमीज़ी की कीचड़ में और गहरे उतरते comedians का हर style एफिल टॉवर की तरह एक ही viral वीडियो की बदौलत, झटपट common होता गया।
उठने की सीमा होती है, पर गिरने की कोई सीमा नहीं होती। इसीलिए ख़ुद को witty कहकर celebrity बने comedians को scripted instant content पर उतरना पड़ा। सामने बैठी ऑडियंस में paid लोग बैठाए गए, जिन्हें बेइज़्ज़ती कराने के पैसे मिलते थे।
यहाँ से होड़ लगी paid audience के पतन की। किसी ने अपने भाई को अपमानित किया तो किसी ने अपने माँ-बाप को। कोई अपनी सोच का मखौल बनवाने को तैयार हो गया तो कोई अपने profession की गरिमा को बेच आया।
जब गर्दन तक कीचड़ में उतर चुके इस profession के पास बेचने को कुछ नहीं बचा तो इन्होंने संबंधों की गोपनीयता बेची। कीचड़ नाक तक आ गई। जब यह भी कॉमन हो गया तो इस समाज ने उस व्यक्ति की लाश भी फूहड़ता की इस भट्ठी में झोंक दी, जिसने अपनी मृत्यु तक समाज को ‘दान’ कर दी थी।
अब ये लोग आमूलचूल कीचड़ में स्नान करके नंगे खड़े हो गए हैं। जिस लोक ने इनके हाथों पर मिट्टी लगी देखकर इन्हें प्रजापति समझ लिया था, उसी लोक की लाज का ऐसा हश्र इनके हाथों किया जाएगा, ऐसा अनुमान समाज को नहीं था।
हास्य पूजन जैसा पवित्र है। हँसी मनुष्य को बेहतर मनुष्य बना सकती है… ये बात समाज को बतानेवाले लोग ‘हँसी’ के साथ ‘मर्यादित’ विशेषण लगाना भूल गए थे।
बंदर उस्तरा लेकर आया और तुम उससे दाढ़ी बनवाने बैठ गए… अब बाल के साथ गाल भी कट रहे हैं। इससे पहले कि टेंटुए से ख़ून बह निकले, इन बन्दरों के हाथ से उस्तरा छीन लो!
✍️ चिराग़ जैन

हम नहीं सुधरेंगे

मुझे कोविड-19 का दौर अच्छी तरह याद है। अपने-अपने घरों में कैद हम लोग, अपनी और अपनों की जान की ख़ैर मना रहे थे। ‘जान है तो जहान है’ -का अर्थ उस दौर में सारी दुनिया को एक साथ समझ आ गया था।
राजनीति के अतिरिक्त सब कुछ पूरी तरह रुक गया था। सब लोग त्याग, समर्पण, मानवता तथा वैराग्य किस्म की बातें करते थे। रिश्ते, प्रकृति, स्वास्थ्य और मनुष्यता का अर्थ सभी को ठीक-ठीक समझ आ गया था। महावीर का अपरिग्रह कुछ अंशों में सबके भीतर घटित होने लगा था। बिना किसी सरकारी ‘अभियान’ या ‘आदेश’ के भी लोग स्वच्छ रहने लगे थे।
मनुष्य के जीवन में आए इस परिवर्तन पर गिलहरी, चिड़िया, टिटहरी बधाई गाती फिर रही थीं। आसमान ने दिल्ली जैसे शहरों की मांग में तारे जड़ दिए थे। कोविड ने कुछ हद तक मनुष्यता के डीएनए को क्लीन कर दिया था।
‘कुछ हद तक’ इसलिए कि संकट की घड़ी में परस्पर सहयोग कर रहे लोगों का क्रेडिट हड़पनेवाले यशापेक्षी दैत्य उस दौर में भी नहीं सुधरे। सियासत उस समय भी ‘आपदा में अवसर’ तलाशती हुई वोट के गणित में व्यस्त थी। मरीज़ को अस्पताल में इलाज मिले, इससे पहले यह सोचा जाता था कि यदि यह मरीज़ ठीक हो गया तो इसका वोट हमारी पार्टी की ओर कैसे डायवर्ट होगा।
मनुष्य जाति पर इतना संकट था कि मरघट तक ने मानव की मिट्टी को शरण देने से कन्नी काट ली थी। स्थिति इतनी भयावह थी कि फोन की घंटी से दहशत होने लगी थी, कि कहीं कोई और ‘अपना’ तो नहीं चला गया। बेटे, अपने बाप की मिट्टी से ख़ौफ़ खा रहे थे।
भय ने मानव मन को इतना पवित्र कर दिया था कि बरसों-बरस से जिन रिश्तेदारों से बोलचाल बंद थी, उनको भी फोन करके हालचाल पूछने की पहल हो रही थी। सबके मन में क्षमा, करुणा, दया, अपनत्व और विरक्ति ने घर कर लिया था।
भय का इतना सकारात्मक परिणाम मैंने पहली बार उसी दौर में अनुभूत किया था। भय मनुष्य को मर्यादित करता है। भय मनुष्य को मनुष्य बनाता है। निर्भय होते ही मनुष्य में दानव जन्म लेने लगता है। निर्भय होते ही मानव मर्यादा लांघने लगता है।
आपको डूबने का भय नहीं रहेगा तो आप किनारे की सीमा लांघकर पानी के सीने पर अतिक्रमण करने लगेंगे। आपको गिरने का भय नहीं रहेगा तो आप पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण को चुनौती देने लगेंगे। आपको मरने का भय नहीं रहेगा तो आप मारने में नहीं हिचकिचाएंगे। आपको अस्वस्थ होने का भय नहीं रहेगा तो आप देह के अनुशासन को भंग करेंगे। आपको भूख का भय नहीं रहेगा तो आप अन्न का अपमान करेंगे।
यह सामान्य मानवीय स्वभाव है। इसीलिए कहा गया है कि ‘भय बिनु प्रीति न होई’। संबंध भी हम तब तक निबाहते हैं, जब तक उस संबंध को खोने का भय न हो। यहां तक कि किसी के साथ मनुष्यता का व्यवहार भी हम तभी तक कर पाते हैं जब तक उस व्यक्ति विशेष से हमें किसी प्रकार की हानि का भय रहता है।
जैसे ही हमें ज्ञात होता है कि अब सामनेवाला हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता, तुरंत हम अमानुष हो जाते हैं।
कोविड के समय हमने प्रकृति के महत्व को जाना था। तब यह अहसास हुआ था कि इस दुनिया को संभालने में प्रकृति, मनुष्य से कहीं अधिक सक्षम है। कई दशकों में मनुष्य ने जिस प्रकृति की सूरत बिगाड़कर रख दी थी, मानवीय हस्तक्षेप कम होते ही प्रकृति ने केवल एक ऋतुचक्र में अपनी खोई आभा पुनः जुटा ली।
लेकिन मनुष्य बहुत निमर्म है। जिन लोगों ने मनुष्य बनकर जीने की कसमें खाई थीं, वे ही लोग संकट के बीतते ही दोबारा वीभत्स हो गए। उस संकटकाल में सीखे गए सबक ताक पर रखकर मनुष्य ने फिर उसी आपाधापी में स्वयं को झोंक दिया। नदी की नीली धार से लेकर वृक्षों के हरे जिस्म तक सबको घायल करने का सिलसिला दोबारा शुरू हो गया। आसमान के चेहरे पर कालिख पोत दी। धरती की देह में सड़ांध बो दी।
सरकारी खजाने के बजट से वन लगाने के बजट पास हुए और भ्रष्टाचारी तंत्र वन लगाने के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये डकार गया। पृथ्वी बेचारी देखती रह गई। उसका जिस्म नंगा रह गया। अधिकारियों को धरती की बेबसी दिखाई नहीं देती। जब कभी पृथ्वी कराह कर उनके पैर पकड़ती है तो वे समझ ही नहीं पाते कि उनके पांव किसने पकड़े हैं। क्योंकि उनकी दृष्टि और उनके पैरों के बीच में उनका पेट लटका रहता है।
जिन रिश्तों के महत्व को समझते हुए हमने उस दौर में आंखें नम की थीं, उन्हीं रिश्तों को हम पुनः आंखें दिखाने लगे। जो पैसा उस दौर में ऑक्सीजन का एक सिलेंडर नहीं खरीद पा रहा था, उसी पैसे के लिए भाग-भागकर हम हांफ रहे हैं।
उस समय पैसा पड़ा था और संबंध काम आ रहे थे। आज संबंधों को लतियाकर पैसा कमाया जा रहा है। इन सब परिवर्तनों से समझ आ रहा है कि पर्यावरण केवल धरती का ही नहीं, बल्कि मनुष्य की मानसिकता का भी प्रदूषित है। प्रकृति तो अपने रंग-रूप को कुछ ही दिन में सुधार लेती है लेकिन मनुष्य न कभी सुधरा है, न कभी सुधरेगा। वह तो संकट के काल में सुधरने का अभिनय मात्र करता है।
✍️ चिराग़ जैन

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