Chirag Jain Writings, Free Verse, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
टूट गया था मैं
ठीक वैसे ही
ज्यों कठोर धरातल पर गिरते ही
टूट जाता है कच्चा बर्तन।
क्वारी-गर्भवती कन्या के
मजबूर बाप की तरह
कसमसा उठी थी मेरी आत्मा।
जून की झुलसती गर्मी में
सड़क-किनारे खड़े
शिकंजीवाले की गीली रेहड़ी पर पड़े
बर्फ़ के छोटे-से टुकड़े की तरह
पिघल गईं थीं मेरी आँखें
और भूख से बिलबिलाते हुए
मासूम बच्चे की
ग़रीब माँ की तरह
फ़फ़क पड़ा था मेरा दिल
क्योंकि भ्रष्टाचार का शिकार हुआ था ‘मैं’।
मेरे जीवन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य
(क्योंकि अपना कार्य सभी को महत्त्वपूर्ण लगता है)
चढ़ा दिया गया था
भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर।
लेकिन आज न टूटन है मुझमें
न आत्मा में सिसक
न आँखों में पानी
और न दिल में कराह।
बस कुछ है तो लालच में लपलपाती जीभ
आँखों में अमानुषी चमक
होंठों पर जीत की कुटिल मुस्कान
आसुरी अट्टहास
और कुम्भकर्ण की तरह सोता हुआ ज़मीर।
क्योंकि भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर बलिदान हुआ कार्य
आज महत्त्वपूर्ण नहीं है
आज मैं भ्रष्टाचारी हूँ।
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Hasya Kavita, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
जंगल के सभागार में
बहुत बड़ा आयोजन हुआ
जिसमें सर्वप्रथम
भारत माँ के चित्र के सम्मुख
दीप-प्रज्वलन
और फिर
मेंढ़क जी का स्वागत भाषण हुआ।
भाषण में
अजीव ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ था
भाषण का सार कुछ यूँ था-
“भैंसा दल के अध्यक्ष
श्री कालूूप्रसाद जी!
टबासीन मछलियो!
रंग-बिरंगी तितलियो!
खूँटों से बंधी गायो!
और अन्य देशभक्त चौपायो!
हम लोग
लम्बे समय से
देश की ख़ातिर
प्राण न्योछावर करते रहे हैं
विदेशियों की थालियों में सजने के लिये
मरते रहे हैं।
जितना अधिक हमारा मांस
विदेशी भट्ठियों में चढ़ता है
उतना ही हमारे वित्तभण्डार में
विदेशी धन बढ़ता है।
इस तरह
हम अपने देश के वित्त का
पोषण कर रहे हैं
देश की प्रगति की राह पर
सूखे पत्तों की तरह
झर रहे हैं।
लेकिन पिछले दिनों
‘बाज तक’ चैनल का
एक संवाददाता बता रहा था
कि देश के वित्तमंत्री ने
संसद में गहरी चिंता जतायी है
क्योंकि विदेशों से आनेवाली
भारतीय पशुओं की मांग में
भारी कमी आयी है।
भाइयो,
इस समस्या को लेकर
सभी देशभक्त पशु चिंतित हैं
आज सदन में
इस समस्या के निदानार्थ
आपके विचार आमंत्रित हैं।”
अब महान वैज्ञानिक
मुर्गा जी ने बताया,
“सभी पशुओं के मांस का
क्वालिटी टेस्ट
हमारी लेबोरेट्री में करवाया गया है
लेकिन हमारी
और हमारे पूर्वजों की गुणवत्ता में
कोई अन्तर नहीं पाया गया है।
महोदय,
मेंढ़कों के पैर के जालों में
फर पशुओं की खालों में
मछलियों के तेल में
मंकियों की टेल में
चिड़िया की जीभवाली ट्रीट में
और हम मुर्गों के मीट में
आज भी वही स्वाद है
श्रीमान्
मुझे तो लगता है
इस सारे षड्यंत्र में
पड़ोसी गधों का हाथ है।”
इतना सुनकर
श्रीमती मछली
टब में से उछली
टेबल पर रखे गिलास में डोली
और अन्दर की बात बोली-
“मान्यवर
हमारी गुप्तचर एजेंसियों ने
इस समस्या का
सही कारण ढूंढ़ निकाला है
दरअस्ल, विदेशियों ने
अपने जीने का ढंग बदल डाला है
ख़बर मिली है
कि कृष्ण की गायों का मांस खानेवाले विदेशी
अब कृष्ण के पुजारी बन गये हैं
और इस प्रकार
सभ्य संस्कारों के सच्चे अधिकारी बन गये हैं।
जब से उन्होंने
सूती धोती
और काठ-खड़ाऊ को अपनाया है
तब से चमड़े और फ़र को
हाथ भी नहीं लगाया है।
अब उन्हें केवल शाकाहारी व्यंजन भाते हैं
और तो और
अब वे पढ़े-लिखे लोग
इलाज भी
भारतीय चिकित्सा पद्धतियों से ही करवाते हैं।
श्रीमान्
आजकल पश्चिम के जंगल में
अजीब-सी ख़ुमारी है
यहाँ तक कि इराक़ का नाश्ता
और अफ़गानी लंच करनेवाले
अमरीकी भेड़िये भी शाकाहारी हैं।”
यह सब सुनकर
गौमाता ने प्रश्न उठाया-
“यदि सभी विदेशी लोग
भारतीय सभ्यता का अनुसरण कर रहे हैं
तो फिर हम पशुगण
थोड़ी संख्या में भी क्यों मर रहे हैं?”
अब भैंसादल के अध्यक्ष
कालूप्रसाद जी ने शंका-निवारण किया
और गाय के प्रश्न का
बेहद तर्कपूर्ण उत्तर दिया-
“ईका कारण
हमका एही समझ में आया है
कि भारतवासियों ने
पाश्चात्यता के संदर्भ में
अपना
अतिथिसत्कार-धर्म निभाया है
ए ही कारण
घर से बेघर हुई
पाश्चात्यता को
अपने घर में ला बसाया है
जब से ई संस्कृतिवा का
आयात-निर्यात हुआ है
तब से ही
ई देसवा की धरती पर
जुरदार कुठाराघात हुआ है
जब भारत की सड़कों पर
नंगेपन और हिंसा से भरी
पाश्चात्यता का
भद्दा रंग दिखने लगा है
और चाहिए तो
हमरे साथी दल से पूछ न लीजियेगा
कि ई विदेसवा का
रिजेक्टेड माल
भारत में धड़ल्ले से बिकने लगा है।”
यह सब सुनकर
पीछे रखी
भारत माँ की तस्वीर से
ख़ून के आँसू बहने लगे
और दबी आवाज़ में
चीख-चीखकर कहने लगे-
“ऐ भारत के लोगो,
मेरी संस्कृति का ऐसा विस्तार न करो
ग़ैरों को शरण देने के लिये
अपनों का तिरस्कार न करो।
यदि तुम अपनी सभ्यता से बिछड़ जाओगे
तो ध्यान रखना विकास की होड़ में
बुरी तरह पिछड़ जाओगे।
यदि अमर होना चाहते हो
सफलता की सेज पर सोना चाहते हो
तो अपनी ओर लौट आओ
क्योंकि सभी जानते हैं
कि संस्कृति का मानस
अपमान का तमाचा नहीं सह सकता है
ठीक ही तो है
जो बाप को बाप न कहे
वो पड़ोसी को चाचा कैसे कह सकता है।“
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
तेरे बँटते हुए आँचल में कौन सोएगा
बम्बई ने जो धमाकों के ज़ख़्म खाए हैं
भूखे बच्चे जो गोधरा में बिलबिलाए हैं
मंदिरों में भी धमाकों की गूंज उठती हैं
आज हिन्दोस्तां में अरथियाँ भी लुटती हैं
किसी मासूम की जब आह सुनी जाती है
तो ख़यालों में यही बात सरसराती है
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
जब दरिंदों ने अयोध्या में ज़ुल्म ढाया था
जहाँ लाशों का समन्दर-सा लहलहाया था
काश इन्सान को इन्सान दिखाई देते
न तो हिन्दू न मुसलमान दिखाई देते
काश हिन्दोस्तां एक प्यार का क़स्बा होता
सबकी आँखों में एतबार का जज़्बा होता
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
जिसने इस देश की ख़ातिर लहू बहाया था
जिसकी ललकार से अंग्रेज कँपकँपाया था
जिनको दुश्मन ने कोल्हुओं के साथ पेला था
जिनकी पीठों ने चाबुकों का दर्द झेला था
उन शहीदों के भी अरमान पूछते होंगे
आज अल्लाह और राम पूछते होंगे
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
आज मरहम की ज़रूरत है तो मरहम बाँटें
क्या ज़रूरी है कि ख़ुशियों की जगह ग़म बाँटें
आओ हम इतने क़रीब आएँ कि दूरी न रहे
आओ ऐसे जिएँ कि मरना ज़रूरी न रहे
आओ इतने दिए जलाएँ कि ना रात आएँ
किसी के जे़ह्न में फिर ये न ख़यालात आएँ
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
तेरे बँटते हुए आँचल में कौन सोएगा
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
अमावस के आकाश में रौशनी का खेल
माटी के दीपकों में फुँकता हुआ तेल
चौराहों पर बिखरी बंगाली मिठाई
और आग में जलती देश की कमाई
मेरे मन में कुछ प्रश्न भर जाती है
और मुझे सोचने पर विवश कर जाती है
क्या ग़रीब के घर से ज़्यादा अंधकारमय है आकाश?
क्या निर्धनकाया से ज़्यादा रूखापन है दीपकों के पास?
क्या सड़क को भूखों से ज़्यादा भूख लगती है?
क्या मेरे देश में फूँकने के लिये भी कमाई बचती है?
काश,
ये सारे प्रश्न
हमारी राहों से सदा-सदा के लिये मिट जायें
इसी कामना के साथ संभव हैं
दीपावली की शुभकामनाएँ।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
ऐसा मत सोचो कि जब सब सोचेंगे तब सोचेंगे
पहले हम सोचेंगे तब ही तो इक दिन सब सोचेंगे
आख़िर बंदूकों से ही जब सारे काम निकलने हैं
आयत रटने से क्या हासिल अहले-मक़तब सोचेंगे
दो और दो को पाँच बनाने की तरक़ीबें क्या होंगीं
इस उलझन का हल कुर्सी पर बैठे साहब सोचेंगे
आज जिन्हें मीठी लगती हैं, मेरी कड़वी बातें भी
कल वो मीठी बातों के भी कड़वे मतलब सोचेंगे
कल की चिन्ताओं पर अपना आज निछावर क्या करना
कल की छोड़ो, कल का क्या है, आएगा तब सोचेंगे
✍️ चिराग़ जैन