Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
भारतीय स्वयंवर परंपरा के गौरवशाली इतिहास में जानकी और द्रौपदी के स्वयंवरों की टीआरपी सबसे हाई रही है। इन दिनों राखी सावंत इस इतिहास को डायरेक्ट चुनौती दे रही है। यहाँ यह बताना बेहद ज़रूरी है कि स्वयंवर की ‘ईवेंट मैनेजमेंट’ में राखी को सीता और द्रौपदी से अधिक मेहनत करनी पड़ी। पहले तो उन्हें अपने लिए कुछ ‘भाई’ ढूंढने पड़े। इस चयन प्रक्रिया में न्यूनतम योग्यता यह थी कि आवेदक की मौजूदा स्थिति ‘आउट आॅफ फोकस’ होनी चाहिए ताकि उनको पेयमेंट कम करनी पड़े। पूज्यनीय राम ‘भैया’ इस ‘कसौटी’ पर खरे उतरे और उन्हें अपनी बहन के स्वयंवर की एंकरिंग करने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ। इस बहाने उनको काम मिल गया और उनकी ‘हैल्दी प्रज़ेंस’ के कारण उनके तेरह काल्पनिक बहनोई उनकी बहन की ओर आँख उठा कर नहीं देख सके। ये और बात है कि जब एक उम्मीदवार ने राखी को ‘किस’ कर लिया तो लड़ने के लिए दूसरे बहनोई को उस पर छोड़ दिया गया और ‘भैया जी’ ने उसकी ओर आँख नहीं उठाई।
ख़ैर अब दूसरे भैया की बात करते हैं। आदरणीय रविकिशन जी सेट पर आए तो राखी जी ने उनका आलिंगन कर उनका स्वागत किया। इस स्वागत समारोह के दौरान बहुत से ‘सैंया उम्मीदवार’ भैया जी की क़िस्मत से जल रहे थे। उधर कुछ सालियाँ और सासू माँ भी सेट पर अवतरित हुईं। उनके साथ सभी बहनोइयों की अच्छी पटी। यह शोध का विषय है कि आने वाले एपिसोड्स में राखी का हाथ बँटाने और कौन-कौन कुनबेदार आने वाले हैं। यह शोध का विषय है कि राखी पति खोजने निकली हैं या कुनबा जोड़ने।
जो भी हो, इतना तो मानना ही पड़ेगा कि राखी जी ने स्वयंवर जैसी परंपरा के रीति-रिवाज़ों से कोई छेड़छाड़ नहीं की। ये दीगर बात है कि द्रौपदी और सीता अपने स्वयंवर से पूर्व राजकुमारों के साथ ‘डेट’ पर नहीं गई थीं। इसके दो कारण हैं। पहला कारण तो यह कि वे राखी जी की तरह ‘बोल्ड’ नहीं थीं और दूसरा यह कि उन दिनों ‘कलैण्डर’ नहीं होते थे।
बहरहाल, राखी जी ने स्वयंवर की परंपराओं को हर क़ीमत पर निभाया है। स्वयंवरों का टूट-फूट से गहरा रिश्ता रहा है। कहीं शिव का धनुष तोड़ा गया तो कहीं मछली की आँख फोड़ी गई। इस परंपरा को क़ायम रखते हुए राखी ने स्वयंवर में शर्त रखी है कि जो प्रत्याशी टीआरपी के रिकाॅर्ड तोड़ने में सर्वाधिक मदद करेगा, राखी की माला उसी के गले पड़ेगी।
स्वयंवर के पहले दिन राखी जी से प्रश्न पूछा गया- ‘स्वयंवर करने का निर्णय लेने में आपको क्या कठिनाई हुई?’ यह प्रश्न पूछ कर पत्रकार ने राखी जी की क्षमताओं पर सवालिया निशान खड़ा किया है। लेकिन हमारी उदार राखी जी ने पत्रकार की धृष्टता को अनदेखा करते हुए इस सवाल का बेहद तार्किक और सारगर्भित उत्तर दिया। टाॅपलेस टाॅप पहनकर; अपने एक हाथ में अपना ही दूसरा हाथ थामे हुए, नज़रें नीची कर राखी जी ने कहा- (इनवर्टिड कौमा स्टार्ट) हर लड़की शादी के लिए छह-सात लड़कों से तो मिलती ही है। बस मैंने इन सबको एक साथ बुला लिया (इनवर्टिड कौमा क्लोज़)। कितने महान विचार हैं। काल करै सो आज कर………!
कुछ समझ आया मूर्ख पत्रकार! मैं समझाता हूँ। इन महान उद्गारों के माध्यम से राखी जी कहना चाहती हैं कि हर प्राणी जीवन में लगभग आधे वक़्त तो सोता ही है, तो क्यों ना बच्चे को पैदा होते ही खूब सारी नींद की गोलियां खिला दी जाएँ ताकि वह सोने का सारा काम एक साथ निपटा ले। या फिर यूँ कहें कि हर व्यक्ति आठ रोटी प्रतिदिन के हिसाब से पूरे वर्ष में लगभग दो हज़ार नौ सौ बीस रोटियाँ खाता है। यदि उसको साठ वर्ष जीना है तो उसे जन्म लेते ही एक लाख पचहत्तर हज़ार दो सौ रोटियाँ खिला देनी चाहिएँ। इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि प्रत्येक व्यक्ति रोज़ाना लगभग पाँच मिनट शौचालय में बिताता है, तो उसे चाहिए कि वह साठ वर्ष की संभावित आयु के मुताबिक़ तीन माह तक लगातार शौचालय में रहे ताकि उसे जीवन में पुनः ऐसी गंदी जगह न जाना पड़े।
मुझे पूरा यक़ीन है कि ‘ज़मीन से जुड़े’ इस अंतिम उदाहरण से आपको राखी जी के कथन का सार समझ आ गया होगा। आइए अब हम ‘ज़मीन से जुड़ी’ राखी जी की बात पर लौटते हैं। उनकी महान प्रतिभा को पहचानने वाले जौहरी का नाम है- लव। उन्होंने राखी जी के बलिदानों और व्यक्तित्व को ध्यान में रखते हुए कहा- ‘जिस तरह हमारे देश में रानी लक्ष्मीबाई थी, जैसे हमारे देश में इंदिरा गांधी थी; वैसे ही अब हमारे देश में राखी जी हैं।’ लव के इस ‘अध्यक्षीय’ वक्तव्य के बाद योजना आयोग कुछ ऐसी योजनाएँ तैयार कर रहा है जिनका नाम पूज्यनीया राखी जी के नाम पर रखा जाएगा, जैसे- राखी सावंत खुला विश्वविद्यालय योजना, राखी सावंत एक्सप्रेस हाई-वे योजना और राखी सावंत संस्कृत विद्यापीठ इत्यादि।
कहने का मतलब ये है कि लब ने सीता मैया, रानी लक्ष्मीबाई और इंदिरा गांधी की तुलना राखी सावंत से कर के देश की संस्कृति और सम्मान को इतना ऊपर उठा दिया है कि अधिक ऊँचाई के कारण उस पर हृदयाघात का ख़तरा मंडराने लगा है।
तो भाई लोग, नित नए ‘करतब’ लिए राखी का स्वयंवर जारी है! राखी सचमुच महान हैं। उनमें कुछ भी कर गुज़रने की क्षमता है। अब देखना यह है कि टीवी पर पब्लिसिटी बटोरने आए नौजवानों में से किसे राखी की मांग भरनी पड़ती है। दुआ कीजिए कि स्वयंवर के पश्चात् इसी सिरीज़ में अगला कार्यक्रम हो – ‘राखी का हनीमून।’
✍️ चिराग़ जैन
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ट्यूशन हमारी सांस्कृतिक तथा पौराणिक परम्पराओं का महत्वपूर्ण अंग है। यदि कुछ क्षण के लिए अपना दृष्टिकोण व्यापक करने के लिए पाश्चात्य विद्वानों की तरह सोचा जाए (क्योंकि हमारे यहां वेद-पुराणों की बातें तब तक समझ नहीं आतीं जब तक पश्चिम उसकी व्याख्या न करे) तो हम देखेंगे कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के युग से ही यह महान परम्परा हमारे समाज का अभिन्न अंग रही है।
संत कवि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में इस परम धर्म की उतनी ही ‘कड़ी अनुमोदना’ की है जितनी कि आज के तथाकथित विद्वान इसकी आलोचना कर रहे हैं। ये और बात है कि अपने पूर्वजों को सम्मान देने के लिए ये आधुनिक विद्वान अपने घरों में इस परम्परा को बन्द करने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं कर पा रहे हैं। ख़ैर छोड़िये इनके घरों को; हम चर्चा कर रहे थे संतकवि तुलसीदास जी की। वे इस महान कर्म से इस हद तक प्रभावित थे, कि इसकी अनुमोदना करते समय वे चैपाई पूरी होने का भी सब्र न रख सके और एक अद्र्धाली मात्र में इस विचार को इन शब्दों में प्रतिपादित कर दिया- ‘गुरु गृह गए पढ़न रघुराई, अल्पकाल विद्या सब आई।’
महाकवि ने यह स्पष्ट किया है कि गुरु के घर जाने से रघुराई जी ने अल्पकाल में ही सारी शिक्षा प्राप्त कर ली थी। अब जब रामायण की बात चली है तो महाभारत का ज़िक्र न करने से बात अधूरी ही रह जाएगी। हालांकि इस देश में बहुत सी बातें महाभारत के ज़िक्र के बावजूद अधूरी ही पड़ी हैं। लेकिन फिर भी, इस सत्य को दरकिनार कर, लेखन की परम्पराओं का निर्वाह करते हुए मैं रामायण के पश्चात महाभारत का ज़िक्र अवश्य करूंगा।
महाभारत में केवल अर्जुन ही एकमात्र ऐसे होनहार विद्यार्थी थे, जो अपने होनहार गुरु से ‘अल्पकाल में शिक्षा पाने के लिए’ नाइट ट्यूशन का सहारा लेते थे। इसी कारण केवल वही ऐसे शिष्य रहे जिन्हें चक्रव्यूह भेदना आता था। यूं सीखा तो एकलव्य ने भी था, लेकिन उसने छिपकर सीखा था, और गुरु द्रोण कोई टटपूंजिये तो थे नहीं जो मुफ़्त शिक्षा दे देते। न ही उन्हें सरकार अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई अनुदान दे रही थी, जो वे अपने आश्रम में पिछड़े वर्गोंं के लिए कुछ सीट्स रिज़र्व करते। एकलव्य ने उन्हें धोखा दिया था इसलिए उन्होंने एकलव्य के माध्यम से अपने शिष्यों को ‘जैसे को तैसा’ की अंतिम शिक्षा दे डाली।
गुरुद्रोण के इस ‘अंगूठा काटन कार्यक्रम’ को हम आज भी पूरे ज़ोर-शोर से चला रहे हैं। कुछ इंस्टिट्यूट्स ने तो इस परंपरा का बाक़ायदा विकास भी किया है। ये विकासवादी परंपरा के समर्थक इंस्टिट्यूट्स, शिष्यों का अंगूठा काटने की घटना के बाद हुई गुरु द्रोण की आलोचनाआंे से सबक लेते हुए, इस निश्चय पर पहुंचे हैं कि शिष्यों को सही-सलामत रहने दिया जाए और परम्परा के निर्वाह हेतु उनके अभिभावकों के हाथ-पैर कटवा लिए जाएं। इससे सामाजिक आलोचना भी नहीं होगी और परंपराओं की रक्षा भी हो सकेगी।
हाथ-पैर कटवा चुकने के बाद जब अभिभावकगण अपनी संतानों के शैक्षणिक विकास की भ्रामक आस लिए ट्यूशन वाली या वाले के पास पहुंचते हैं तो ये ट्यूशनधर्मी गुरुजी पहले तो पौराणिक परंपराओं का सम्मान करते हुए शिष्य से उसकी जाति पूछते हैं, फिर बातों-बातों में यह पता लगाते हैं कि इस राधेय/एकलव्य/अर्जुन/दुर्योधन/अश्वत्थामा या कृष्ण के पिता का व्यवसाय तथा सामाजिक कद कैसा है।
यदि शिष्य दुर्योधन, अर्जुन या युधिष्ठिर की तरह राजपरिवार से संबंध रखता हो तो पूरे आश्रम की नीतियां शिष्य की रुचियोें के अनुसार परिवर्तित करना गुरुजी के लिए सहज हो जाता है। आवश्यकता पड़ने पर विदुर या पितामह के हाथों में ही यह निर्णय सौंपा जा सकता है कि आश्रम की आचार-संहिता में क्या-क्या परिवर्तन करने होंगे। हां, ऐसे शिष्यों के प्रवेश के समय गुरुजी इस बात का विशेष ध्यान रखते हंै, कि फीस की चर्चा नहीं करनी। इससे इम्प्रेशन खराब होने का ख़तरा रहता है।
कृष्ण और राम जैसे शिष्य यदि राजपरिवार से संबंध न भी रखते हों तो भी गुरुजी की यह परम इच्छा रहती है कि समाज के ये अनमोल रत्न उन्हीं के इंस्टिट्यूट में अध्ययन करें। इस श्रेणी के शिष्यों की लोकप्रियता गुरुदेव को इस हद तक प्रभावित करती है कि कुछ गुरुश्रेष्ठ तो इनको लेने इनके घर तक जा पहुंचते हैं। इनको पढ़ाने से एक तो गुरुदेव को साख का लाभ मिलता है साथ ही अपना बड़प्पन झाड़ने का सौभाग्य भी प्राप्त होता है। इसलिए पब्लिक पर्सनेलिटी के प्रति गुरुजी का विशेष स्नेह देखने को मिलता है।
अश्वत्थामा श्रेणी के शिष्यों के लिए आश्रम में स्टाॅफ कोटे की सीटें हमेशा रिजर्व होती हैं। इन शिष्यों से गुरुजी और आश्रम दोनों को ही कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष लाभ नहीं होता, लेकिन इन्हें पढ़ाना गुरुजी के लिए सामाजिक मर्यादा का प्रश्न होता है।
यदि शिष्य राधेय श्रेणी से संबद्ध हो तो गुरुदेव समझ जाते हैं कि इससे उन्हें कोई ख़ास लाभ होने वाला नहीं है। यदि इससे फीस ली जाती है तो निर्धन से धन लेने के आरोप में गुरुजी की बदनामी होगी; और फ्री में विद्यादान दिया गया तो अपनी दृष्टि में ही गुरुजी को मूर्ख बनना पड़ेगा। इसलिए गुरुजी ऐसी स्थिति में अपने आश्रम की आचार संहिता में तुरन्त परिवर्तन कर डालते हैं। इस परिवर्तन के वक़्त केवल इतना ध्यान रखा जाता है कि आश्रम में प्रवेश लेने के इच्छुक विद्यार्थियों की न्यूनतम योग्यता में कोई ऐसी मांग जोड़ दी जाए जिसे पूरा करना राधेय के लिए मुमकिन न हो। यही कारण है कि प्रवेश के नियम स्पष्ट करने से पूर्व प्रवेशार्थी का आर्थिक, बौद्धिक, सामाजिक तथा मानसिक स्तर अच्छी तरह देख लिया जाता है।
ऐसे शिष्यों को अपने आश्रम से रिक्त लौटा देना गुरुजी की सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए घातक हो सकता है, इसलिए चलते समय गुरुजी इन शिष्यों के एकाध गुणों की तारीफ़ करते हुए उसका नाम परिवर्तन अवश्य कर देते हैं। इससे एक तो गुरुदेव समाज की दृष्टि में महान बनते हैं साथ ही यह ख़तरा भी ख़त्म हो जाता है कि राधेय या इसका बाप बाहर जाकर आश्रम की बदनामी करे।
अंत में नम्बर आता है एकलव्य श्रेणी के शिष्यों का। इन शिष्यों के बाप से गुरुजी खाल या गर्दन उतरवाकर रख लेते हैं। यूं वे हाथ, पैर या अंगूठा आदि भी कटवा सकते थे लेकिन यह सब कुछ तो पहले ही इंस्टिट्यूट वाले कटवा लेते हैं इसलिए सत्यवादी हरिश्चंद्र के देश में पैदा होने के कारण मजबूरी में ट्यूशन वाले गुरुजी को अपना कर्तव्य पालन करते हुए ऐसा घिनौना कार्य करना पड़ता है।
✍️ चिराग़ जैन
Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Mann To Gomukh Hai
बिल्कुल ख़ाली कर दिया है मैंने
दिल का भरा-पूरा मकान
आँखों की बाल्टी में
आँसुओं का पानी भरकर
धो डाला है
मकान का एक-एक कोना
…काफ़ी दिन हुए।
लेकिन अब भी गूंजते हैं
यादों के क़हक़हे
टकराकर
ख़ाली मकान की ख़ामोश दीवारों से।
और मैं
फिर से धोने लगता हूँ
दिल के मकान की
उदास दीवारें!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Hasya Kavita, Poetry
मुम्बई में जुहू-चौपाटी पे शाम सात बजे
बाद; परिवार संग नहीं जाना चाहिए
आगरे में बालकों को ताज और प्रेमिका को
पालिवाल गार्डन में घुमाना चाहिए
बैंगलोर वाले लाल बाग़ जैसा कोई एक
प्रेमियों को देश भर में ठिकाना चाहिए
जहाँ पहले हैं, वहाँ और सुविधाएँ मिलें
जहाँ पे नहीं हैं वहाँ बन जाना चाहिए
आशिक़ों को आशिक़ी में डूबने के लिए
जोधपुर वाला एक लेक कायलाना चाहिए
सांझ वाला सत्संग करने के लिए
हर शहर में एक तीरथ बनाना चाहिए
ऐसे लोकप्रिय तीरथों के निर्माण हेतु
सरकार को भी अब आगे आना चाहिए
मानव प्रजाति वाले तोते-तोतियों के लिए
भी तो कोई बर्ड सेंचुरी बनाना चाहिए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
एक पल सूरज छिपा और फिर उजाला हो गया
लेकिन इसमें चांद का किरदार काला हो गया
साज़िशें सूरज निगलने की रची थीं चांद ने
पर वो अपनी साज़िशों का ख़ुद निवाला हो गया
✍️ चिराग़ जैन