Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
अजीब सी
पशोपेश में रहता हूँ आजकल
तुम
और कविता
दोनों ही मांगती हैं वक़्त!
मैं घण्टों बतियाता हूँ
तुमसे
और भीतर ही भीतर
घुटती रहती है कविता।
आज अचानक
पूछ लिया तुमने-
“क्या बात है
बहुत दिनों से
कोई
नई कविता नहीं सुनाई?”
मैंने कहा-
“कल सुनाऊंगा।
आज ही किसी ने
दिल दुखाया है।”
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
मंच की आलोचना का बोझ भी ढोता रहा
और उसका मंच पर उपयोग भी होता रहा
हास्य कविता की शक़ल में चुटकुला जब भी ढला
तालियाँ तो पिट गईं पर चुटकुला रोता रहा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
अपनों से मिलने वाला दर्द
जन्म देता है
अच्छी कविता को।
शायद इसी कारण
मैं नहीं लिखना चाहता
कोई अच्छी कविता
तुम्हें ले कर।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
दिल्ली में
हर साल आती है बाढ़
हर साल
सिर के ऊपर से
गुज़रने लगता है पानी।
और
हर साल
ढिठाई के साथ
बयानबाज़ी करते हैं
सरकारी गलियारे।
…कमाल है
जहाँ देखो
पानी ही पानी है
सिवाय
सरकारी आँखों के।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Lapete Mein Netaji, Poetry
आज मैंने
एक ग़ज़ब का नज़ारा देखा
मैंने देखा
एक होड़ सी लगी थी
बारिश के जज़्बे से
लोगों के जज़्बे की।
झमाझम बरसात में
दिल्ली की सड़कें
उफ़न आईं थीं लोगों के हुज़ूम से।
किसी को कोई डर ही नहीं था
बीमार पड़ने का
क्योकि
वे सब आए थे
देश की महामारी का
इलाज़ करने।
जहाँ तक निगाह जाती थी
सिर ही सिर नज़र आते थे।
…आज मैंने महसूस किया
कि किसी गांधी की एक आवाज़ पर
कैसे उठ खड़ा होता था
पूरा भारत!
✍️ चिराग़ जैन