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बाक़ी सब ठीक है

असम जल रहा है, मुम्बई में हिंसा है, दिल्ली में हा-हाकार है …मध्य प्रदेश में बाढ़ है, राजस्थान में सूखा, सीमापार खड़े कुछ हिंदू हिंदुस्तान आने को तरस रहे हैं, हरियाणा का एक “मंत्री” फ़रार है …संसद में हंगामा हो रहा है। मीडिया भी अब चिल्ला-चिल्ला कर बाज आ चुका है। कुछ दिन राष्ट्रपति की तलाश का ड्रामा चलता है, फिर उसी हंगामे के बीच एक वफ़ादार राष्ट्रपति बनाकर बोलती बंद कर दी जाती है, कुछ लोग जंतर मंतर पर बैठते हैं कि देश बदलेंगे, फिर कुछ दिन बाद ये कहकर उठ जाते हैं कि हम बदल गये हैं। फिर कुछ दिन उपराष्ट्रपति चुनाव का वैसा ही हल्ला मचता है, फिर किसी को उपराष्ट्रपति बनाकर बोलती बंद कर दी जाती है। बहुत दिन बाद आडवाणी जी के बयान से सोनिया जी बौखलाती हुई दिखाई दीं, लेकिन लोकसभा की कार्रवाई से इसको निकाल दिया गया और देश एक महत्वपूर्ण ड्रामा देखने से वंचित रह गया। उत्तर प्रदेश के एक मंत्री जी फ़िल्मी स्टाइल में ख़ुद को निर्दोष साबित करने के लिये इस्तीफ़ा देकर फ़रार हो गये। यू पी में करोड़ों रुपया ख़र्च कर के मायावती सरकार ने कुछ ज़िलों के नाम महापुरुषों के नाम पर रखे, अब अखिलेश सरकार ने मायावती की उस भूल को सुधारने के लिये अरबों ख़र्च करने का मन बनाया है।
किसी की किसी बात को लेकर कोई जवाबदेही नहीं है। सरकार और विपक्ष, जो पहले एक साथ चीखते थे, अब अनुशासित हो गये हैं। अब जब सरकार बोलती है तो विपक्ष सुनता है और जब विपक्ष बोलता है तो सरकार। मीडिया में सबकी फ़ुटेज का पर्सेंटेज फ़िक्स हो गया है। उस स्लैब में जिसकी जो चाहे वो बकवास करे।
टाइम बाउंड आमरण अनशन किया जा रहा है, मतलब अनशन करने वाला आश्वस्त है कि इतने समय में वो मर ही जायेगा। इमोशनल कहानी में कॉमेडी के सीन घुसाये जा रहे हैं।
बाकी सब ठीक है।
पूरा देश शंकर जी की बारात हो गया है। जिसका जो मन कर रहा है वो वैसा कर रहा है। हालाँकि कोई भी कुछ नहीं कर रहा है। कोई किसी से सेम्पल मांगते-मांगते ख़ुद एग्ज़ांपल बन गया, तो किसी का सबूत मंत्रालय में रखी फ़ाइल की तरह जल गया।
ऐसा लग रहा है कि हम सब किसी ख़राब फ़िल्म के मूक दर्शक हैं। डायरेक्टर का जब जैसा मन होता है वैसी कहानी डाल देता है, कहानी कहीं है ही नहीं, सिर्फ़ कथाएँ हैं, जिनको सुनाते वक़्त भविष्य हम सब पर ठहाका मार कर हँसेगा …वैसे इस बात की भी कोई गारंटी नहीं इस कहानी को सुनने के लिये कोई भविष्य में बचेगा भी या नहीं!

✍️ चिराग़ जैन

करीने की बात

मरने की बात हो चुकी जीने की बात कर
गाली-गलौज छोड़, करीने की बात कर
सीने के नाप से ये सियासत न चलेगी
अब आम आदमी के पसीने की बात कर

✍️ चिराग़ जैन

मैं लाचार हूँ

घटक दल बोलता है बस यही हर बार मैं लाचार हूं
मेरी तो बात सुनती ही नहीं सरकार मैं लाचार हूं
मेरी बीवी ने पाले हैं गली में यार, मैं लाचार हूं
मेरी बीवी चलाती है मेरा परिवार मैं लाचार हूं

✍️ चिराग़ जैन

जीना मुहाल है

तुझको सबसे मलाल है, सच्ची
यार तू भी कमाल है, सच्ची

इश्क़ वालों का हाल मत पूछो
बस कि जीना मुहाल है सच्ची

उम्र भर मुंतज़िर रही नज़रें
एक पल का सवाल है सच्ची

जाने कब कैसा रूप धर लेगी
ज़िन्दगानी छिनाल है सच्ची

मुझसे ज़्यादा मुझे तबाह करे
इतनी किसकी मज़ाल है सच्ची

✍️ चिराग़ जैन

सरकारी स्कूलों के बच्चों में संस्कार

श्री श्री रविशंकर ने बयान दिया है कि ”सरकारी स्कूलों के बच्चों में संस्कार नहीं होते।“ सुनकर लगा कि श्री श्री को अपनी खी-खी करवाने का चाव चढ़ा है। उनको कोई समझाये कि सरकारी स्कूलों में तो बच्चे ही नहीं होते। उन टीन वाले कमरों में ‘बाप’ पढ़ते हैं।
अमीरी की चम्मच मुँह में दबाए जन्मने वाले लाटसाहबों को अगर चार दिन इन सीलन भरे कमरों में बैठना पड़ जाये तो वे बिना किसी बाबा की सहायता के ‘सुदर्शन क्रिया’ करने लगेंगे। इसका प्रयोग करने के लिये बाबा स्वयं इन विद्यालयों का दौरा करें, वहाँ पहुँचते ही ‘कोऽहम्- कोऽहम्’ का मंत्र न बोलने लगें तो कहना।
ज़िम्मेदार लोगों को इस प्रकार की ग़ैर-ज़िम्मेदार बातें नहीं कहनी चाहियें। बाकी रही संस्कार की बात तो बाबा किसी दिन छुट्टी के समय कॉन्वेंट स्कूलों के बाहर जाकर देख लेना, संस्कृति और संस्कार किस प्रकार बसों के पीछे खड़े प्रेम और सद्भावना का प्रसार करते हैं, देख कर आपकी देह के विविध प्रदेशों के रोम राष्ट्रगान की मुद्रा में आ जाएंगे।
सरकारी स्कूलों की चुनौतियाँ बेशक़ टॉपर्स की फेहरिस्त तैयार न करने देती हों, लेकिन जीवन जीने का सही ज्ञान इन स्कूलों में आज भी बच्चे टाट्पट्टी पर बैठ कर ग्रहण कर लेते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

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