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अन्तर

अन्तस् की पावन भोगभूमि
और मानस की पवित्र भावभूमि पर बसी
अधरों की सौम्यता।
लोचनयुगल में अनवरत प्रवाहमान
विश्वास की पारदर्शी भागीरथी
अनायास ही छलक पड़ती है
सागरमुक्ता-सी
दन्तपंक्ति के पार्श्व से प्रस्फुटित
निश्छल खिलखिलाहट के साथ।

और इस पल को
शब्दों में बांधने के
निरर्थक प्रयास करके
कसमसाकर रह जाता है शब्दकोश।

अप्रासंगिक लगने लगती हैं
सृष्टि की समस्त लौकिक-पारलौकिक उपमाएँ
क्योंकि
बहुत अन्तर होता है
उपमान और उपमेय में!

✍️ चिराग़ जैन

अहसास

मेरे गीतों में मेरे प्रेम का विश्वास बिखरा है
कहीं पतझर ख़नकता है कहीं मधुमास बिखरा है
मेरी बातें दिलों को इसलिए छूकर गुज़रती हैं
कि इन बातों में कोई अनछुआ अहसास बिखरा है

✍️ चिराग़ जैन

मन में श्रद्धा हो तो

प्रेमी को प्रेमी का होना भर ही काफ़ी होता है
मन में श्रद्धा हो तो इक पत्थर ही काफ़ी होता है
ग़ैरों के संग रहना महलों में भी रास न आएगा
अपनापन मिल जाए तो कच्चा घर ही काफ़ी होता है

✍️ चिराग़ जैन

मुझे अहसास है

किसी पत्थर से जब तूने ये हाले-दिल कहा होगा
तेरी आँखों से बरबस दर्द का सागर बहा होगा
मेरे दिल ने भी पीड़ा को हज़ारों बार झेला है
मुझे अहसास है तूने वो ग़म कैसे सहा होगा

✍️ चिराग़ जैन

कैसे लिखूँ

मस्त था मैं, भ्रमर-सा दीवाना था मैं, लेखनी प्रेयसी बन गई थी मेरी
ऑंसुओं की अमानत संजोई बहुत, जुल्म से जंग-सी ठन गई थी मेरी
एक दिन प्रेयसी मुझसे कहने लगी- “मेरे प्रीतम ये क्या कर दिया आपने
मेरे बचपन को क्यों रक्त-रंजित किया, मांग में रक्त क्यों भर दिया आपने
क्यों शवों के नगर में मुझे लाए हो, मेरी मासूमियत तुमने देखी नहीं
घात-आघात की बात करते सदा, तुमने यौवन की लाली समेटी नहीं
शोक विधवा का, पीड़ा जगत् की दिखी; मेरे दिल के ज़ख़म ना दिखे आपको
सारी दुनिया के ऑंसू समन्दर लगे, मेरे ऑंसू सनम ना दिखे आपको
मेरे भीतर ज़रा झाँक कर देख लो, प्यार के गीत बनते चले जाएंगे
मेरे ऑंचल से ऑंसू अगर पोंछ लो, सब समन्दर सिमटते चले जाएंगे”

मैं रहा मौन, मन ने मगर ये कहा- “तेरे बचपन को मैंने क़तल कर दिया
तुझको खूँ से रंगा हर पहर, हर घड़ी, तुझको यौवन से भी बेदख़ल कर दिया
जब कभी तेरे यौवन पे लाली चढ़ी, मुझको बेवाओं की मांग दिखने लगीं
जब कभी तेरे ऑंचल में मोती जड़े, दिल में भूखी निगाहें सिसकने लगीं
तेरी मासूमियत कैसे देख्रू भला, भूखे बच्चे बिलखते नज़र आ रहे
ऐसे मौसम में क्या प्यार को शब्द दूं, जब ग़रीबों के बच्चे ज़हर खा रहे
क़ातिलों के शहर में खड़ा है कवि, हर तरफ़ मौत का घर नज़र आएगा
प्यार का गीत कैसे लिखेगा कोई, प्यार भी मौत की भेंट चढ़ जाएगा!”

✍️ चिराग़ जैन

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