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सावन

घन, पंछी, बरखा करें, गर्जन, कलरव, सोर
हृदय मयूरा झूमिहै, ज्यों सावन में मोर

जब मेघन का नेह जल, बरसत है चहुँ ओर
इस प्रेमी मन भीगता, उत बिरहन की कोर

✍️ चिराग़ जैन

लव इन दिल्ली-यूनिवर्सिटी

मौरिस नगर के नुक्कड़ों को
आज भी याद हैं
हज़ारों निशब्द प्रेम कहानियाँ
जिनका पूरा सफ़र
तय होकर रह गया
आँखों-आँखों में ही।

लेकिन अब
ये प्रेम कहानियाँ
ऐसी ख़ामोशी से नहीं बनतीं।
अब
दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ लिखकर
अपने अधिकार जान गया है प्रेम।

अब लोक-लाज
और पिछड़े हुए समाज से
आगे निकलकर
‘निरुलाज़’ और ‘मॅक-डीज़’ में
बर्गर खाते हुए
घंटों बतिया सकता है प्रेम
…सेफ्ली।

या फिर आट्र्स फैकल्टी के बाहर
भेल-पुड़ी खाते हुए
आलिंगनबद्ध हो सकता है
सारे ज़माने के सामने।

अब फैशनेबल मोटर बाइक पर
बेहिचक-बेझिझक
बिना किसी से डरे
फर्राटे से दौड़ सकता है प्रेम।

पहले की तरह नहीं
कि नाम पूछने में ही
महीनों लग जाएँ।
अब तो झट से पूछ सकता है
कोई भी
कुछ भी
किसी से भी।

✍️ चिराग़ जैन

ऐब्स्ट्रेक्ट

किसी की याद के
कुछ रंग
यक-ब-यक
बिखर जाते हैं
ज़ेहन के कॅनवास पर।

और
मैं ठहर कर
निहारने लगता हूँ
उस कलाकृति की
ख़ूबसूरती को।
बूझने लगता हूँ
अतीत के स्ट्रोक्स की
जटिल पहेलियाँ।

आज तक
समझ नहीं पाया हूँ
कि ये ऐब्स्ट्रेक्ट
बना
तो बना कैसे?
✍️ चिराग़ जैन

सच के नाम पे

दुनिया की बदसलूक़ी का तोहफ़ा लिये जिया
फिर भी मैं अपने सच का असासा लिये जिया

कोई महज ईमान का जज्बा लिये जिया
कोई फ़रेब-ओ-झूठ का मलबा लिये जिया

टूटन, घुटन, ग़ुबार, अदावत, सफ़ाइयाँ
इक शख़्स सच के नाम पे क्या-क्या लिये जिया

जब तक मुझे ग़ुनाह का मौक़ा न था नसीब
तब तक मैं बेग़ुनाही का दावा लिये जिया

हर एक शख़्स अपनी नज़र में था बेलिबास
दुनिया के दिखावे को लबादा लिये जिया

रोशन रहे चराग़ उसी की मज़ार पर
ताज़िन्दगी जो दिल में उजाला लिये जिया

इक वो है जिसे दौलतो-शोहरत मिली सदा
इक मैं हूँ ज़मीरी का असासा लिये जिया

तुम पास थे या दूर थे, इसका मलाल क्या
मैं तो लबों पे नाम तुम्हारा लिये जिया

✍️ चिराग़ जैन

सपना

मुझपे अब मेहरबान हो कोई
मेरे सपनों की जान हो कोई
मेरे मन में उतर-उतर जाए
जैसे बन्सी की तान हो कोई

✍️ चिराग़ जैन

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