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अपनेपन का स्वांग

यूं तो सारी राहें मैंने सोच समझ कर चुन रखी थीं
चंद मुश्क़िलें अपनेपन का स्वांग रचाकर साथ आ गईं

पथ में कोई वबेला कब था
राही भला अकेला कब था
किसको, कब, क्या कहना होगा
-इन प्रश्नों का रेला कब था
किस बीहड़ में, किस पोखर पर, कितना पानी, कब पीना है
इन सारे प्रश्नों की चिंता आंख बचाकर साथ आ गई

जीवन में संत्रास न होता
पीड़ा का एहसास न होता
राहों से भी बातें करते
मंज़िल का ही पास न होता
इसकी ख़ातिर ये करना है, उसकी ख़ातिर वो करना है
कई योजनाएँ ऐसी ही, नेह बढ़ाकर साथ आ गई

केवल श्वास ज़रूरी रहती
और न कुछ मजबूरी रहती
दुनिया वाले क्या सोचेंगे
-इन प्रश्नों से दूरी रहती
इस दुनिया की जो परिपाटी, हम दुनिया को दे आए थे
वो परिपाटी भी दुनिया से, हाथ छुड़ाकर साथ आ गई

✍️ चिराग़ जैन

भीगा मन

झमाझम बारिश
दिल्ली यूनिवर्सिटी कैम्पस
भीगते हुए लड़के-लड़कियाँ
लटों से फिसल कर टपकती बूंदें
फर्राटे से पानी उछालती गाड़ियाँ
मस्ती में किलकारता यौवन
मोटर-बाइक पर आलिंगनबद्ध प्रेम
ग्वाॅयर हाॅल कैंटीन की मैगी
चाय की चुस्कियाँ
काॅलेज-डेज़ की यादें
किसी पुराने परिचित से मुलाक़ात।

…और भीगे मन की
भीगी-सी आवाज़
…चल, भीगते हैं यार।

✍️ चिराग़ जैन

राॅयल्टी

प्रेम
जीवन का याचक नहीं
ख़ुशियों का सौदागर है।

मुनाफ़ाख़ोर नहीं है प्रेम
एक पल की
ख़ुशी के बदले
एक ही पल लेगा
हमारे जीवन से

फिर हम
जीवन भर
प्रसन्न रहें
उस पल की
स्मृतियों में।

प्रेम
कभी नहीं आएगा
स्मृतियों की
राॅयल्टी मांगने।

✍️ चिराग़ जैन

सिलवटें कसमसाती रहीं

हम तरसते रहे रेशमी भोर को
रात भर सिलवटें कसमसाती रहीं
इक सुक़ूं के लम्हे की तमन्ना लिए
साँस आती रही साँस जाती रही

आँख में इक समंदर सँजोए हुए
घाट का रोज़ अपमान करती चली
प्यास की कोर पर अश्रु ठहरा रहा
पर नदी सिर्फ़ मद में अकड़ती चली
चाल भारी हुई, देह खारी हुई
डूब कर देर तक थरथराती रही

बालपन कट गया यौवनी आस में
और यौवन बुढ़ापे की चिंताओं में
कर्म निर्भर रहा बाजुओं पर मगर
हाथ उलझे रहे भाग्य रेखाओं में
ज़िन्दगी मौत की राह तकती रही
मौत जीवन से बचती-बचाती रही

✍️ चिराग़ जैन

व्यस्तता

तुम आई थीं
सुख की गगरिया लिए
सुख लुटाने।

पर मैं
बैठा ही रह गया
घात लगाए
जीवन के अहाते में
चुराने को
दो पल सुख।

अब सुख तो है
पर चोरी का है
तुम नहीं हो ना!
गगरिया नहीं है
मीठे सुख की।

✍️ चिराग़ जैन

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