Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
इस कदर नफ़रत बढ़ी है, हो गये त्योहार घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल
ईद को डर है, वजू की हौद में तेज़ाब ना हो
शाम की मजलिस कहीं बस दो घड़ी का ख़्वाब ना हो
रह नहीं जाएँ नयी नस्लें मिठासों से नदीदी
दे न दे कोई क़फ़न की शक्ल में इस बार ईदी
मस्जिदों की सीढ़ियाँ ज़ख़्मी हैं, कुल बाज़ा घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल
सावनी उत्सव सभी दहशत के रंगों में रंगे हैं
जिस जगह झूला पड़ा था, अब वहाँ मातम टंगे हैं
तीज पर बाबुल के घर का रास्ता मुश्किल कटा है
जिस डगर आएगी लाडो, उस डगर कल बम फटा है
भाई-बहनों का कलाई पर सँवरता प्यार घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल
आयतों की आड़ में गोली चली रमज़ान रोया
स्वर्ण मंदिर में बहा खूँ, शौर्य का बलिदान रोया
मौत का तांडव मिला है, धर्मगुरुओं के दरों पर
सब पे शासन की तमन्ना छा गई गिरजाघरों पर
शस्त्र से सब शास्त्र आहत, स्वार्थ से अवतार घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल
आपसी सद्भाव इतना हो कि नफ़रत टिक न पाये
फूल का बाज़ार यूँ पनपे कि असला बिक न पाये
ज़ख़्म को मरहम मिला तो दम घुँटेगा दहशतों का
आदमीयत ही पढ़ेगी फ़ातिहा इन नफ़रतों का
काश मानवता दरिंदों को करे इक बार घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल
✍️ चिराग़ जैन
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जेहादियों ने कहा-
“अल्लाह हमारे साथ है”
बच्चों ने कहा-
“अल्लाह हमारे साथ है”
फिर ज़ेहादियों की बंदूकों ने
सैंकड़ों मासूम
मौत के घाट उतार दिए
फिर ज़ेहादी ख़ुद को शहीद मानकर
अल्लाह के पास गए
वहाँ अल्लाह नहीं मिला
उसका लहूलुहान जिस्म मिला
उसके जिस्म में गोलियाँ लगी थीं
…जेहादियों की।
✍️ चिराग़ जैन
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बरवाला में आज हमला दिवस था। आश्रम पर हमला हुआ। बचाने आए भक्तों पर हमला हुआ। पकड़ने आए पुलिसवाले पिटे। देखने गए गांववाले पिटे। दिखाने गए मीडियावाले पिटे। घुटने टूटे, कैमरे टूटे और टीआरपी के रिकॉर्ड भी। अदालत नाराज़ है कि अदालत की तौहीन हुई। पुलिस नाराज़ है कि पुलिस की तौहीन हुई। मीडिया नाराज़है कि मीडिया की तौहीन हुई। भक्त नाराज़ हैं कि संत की तौहीन हुई।
पुलिस आई, पैरामिलिट्री आई, प्राइवेट मिलिट्री आई। सारा दिन बरवाला में बम, लाठी, गोली चली, चैनल्स पर लाइव टेलीकास्ट चला, शाम को सभी चैनल्स पर शब्दों का युद्ध हुआ।
किसी ने बताया कि बाबा कबीरपंथी है। ऐसा लगा कि दिन भर लोकतंत्र घायल होता रहा। दिन भर धर्म घायल होता रहा। लेकिन शाम को मीडिया की बहस में जब बाबा को कबीरपंथी बताया गया तो ऐसा लगा कि एक ही पल में कबीर लहूलुहान हो गए।आश्रम के भीतर से जितने पत्थर फेंके गए उनसे कबीर का अंग-अंग ज़ख़्मी हो गया।बरवाला की दिशा में कान लगाकर सुना तो लगा कोई कराह रहा है। उस कराह में एक टीस है, कोई बुदबुदाता जाता है-
कबिरा पिटा हिसार में, पूछ रहा है रोय
दो पार्टिन के बीच में, खींच लिया क्यों मोय
✍️ चिराग़ जैन
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कहीं भी तो अंतर नहीं है यार! चांद को नहीं पता कि उसे देखकर कोई रोज़ा, ईद की ख़ुशी में तब्दील होगा या कोई उपवास, महाशिवरात्रि के उल्लास का रूप धरेगा। गाय को भी नहीं पता कि उसके थनों में जो धार उतरी है, वो सेवइयों की मिठास में घुलेगी या शिवलिंग पर ढलक कर पावन होवेगी। यहाँ तक कि सड़क किनारे पट्टा बिछाकर बैठे मेहंदीवाले को भी नहीं पता कि वह अपने सामने पसरा जो हाथ, मेहंदी के बूटों से सिंगार रहा है, वो किसी दुआ को महकायेगा या किसी अर्पण को।
देहरी ने कब पूछा किसी पायल से कि वो अपनी रुनझुन ईद के मेले में बाँटने जायेगी या हरियाली तीज के झूलों में! फिर हमें किसने बता दिया ये सब? उत्सवों की चौपाल में नफ़रतों की सुगबुगाहट फैलानेवाली हवा कौन दिसा से आई रे बटोही। सेवइयाँ खाओ बाबू, अम्मी ने भेजी हैं। और ये भी कहा है, बेर लेता अइयो लौटती बेर, पण्डित जी से।
✍️ चिराग़ जैन
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लाउड स्पीकर ने धर्मगुरु से पूछा- मैं तो साईं भी नहीं हूँ फिर मुझ पर विवाद क्यों?
धर्मगुरु बोले – क्योंकि तूने हमसे ऊंची आवाज़ में बात की।
लाउड स्पीकर झुक कर बोला – लेकिन मैंने तो आपकी ही आवाज़ बुलंद की हुजूर।
धर्मगुरु मुस्कुराए – ये समझ ले अब तू बेकार हो गया था। मीडिया की आवाज़ तुझसे ज़्यादा बुलंद है और मीडिया की मुंडेर तक पहुँचने के लिए तुझ पर खडा होना ज़रूरी था।
✍️ चिराग़ जैन