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काॅन्ट्रेक्ट बेस जाॅब

सरकारी नौकरी में
मिलने वाले
नियत वेतन की तरह
मिलता है
रिश्तों में दर्द।

और वार्षिक बोनस की तरह
मिल जाती है
ख़ुशी भी
यदा-कदा।

लेकिन
काॅन्ट्रेक्ट बेस जाॅब
होते हैं रिश्ते।

बहुत कुछ
सहन करना पड़ता है
इनमें!

…और
कब तक चलेंगे
कुछ कह नहीं सकते।

✍️ चिराग़ जैन

निस्पृह

तुम
हर बार तलाश लेती हो
कोई नई वजह
नकारने की।

…और मैं
हर बार
बिना वजह
स्वीकार लेता हूँ
मन ही मन।

हर बार बदल जाता है
तुम्हारा बहाना

…और मैं
हर बार
बिना वजह
कर बैठता हूँ
गुज़ारिश।

मैं हर बार रहता हूँ
वैसा का वैसा
क्योंकि मैंने
कभी तलाशी ही नहीं
कोई वजह
तुम्हें चाहने के लिए।

✍️ चिराग़ जैन

बाज़ारीकरण

किस क़दर हावी हुई हैं व्यस्तताएँ देखिए
कसमसा कर रह गईं संवेदनाएँ देखिए
स्वार्थ, बाज़ारीकरण और वासना की धुंध में
खो चुकी हैं प्रेम की संभावनाएँ देखिए
✍️ चिराग़ जैन

सही उत्तर

यूँ ही पूछ बैठी थीं तुम
‘मेरे बिना रह पाओगे?’
सुनकर
मेरे मस्तिष्क में
एकाएक कौंध गया एक और प्रष्न-
‘क्या तुम सही उत्तर सह पाओगी?’

…ख़ुद से उलझते-जूझते
अनायास ही
मेरे मुँह से निकल गया-
‘नहीं!’

…और तुमने
इसे अपने प्रश्न का
उत्तर समझ लिया।

✍️ चिराग़ जैन

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