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अहंकार का अंत

बल के घमण्ड में नियम किये खण्ड-खण्ड
यही बल यश की कुदाल सिद्ध हो गया
जिसको समझकर तुच्छ पूँछ फूँक दी थी
वह भी भयानक कराल सिद्ध हो गया
जिसने भी टोका उसे घर से निकाल दिया
यही आचरण विकराल सिद्ध हो गया
जिसको दशानन समझता था शक्तिहीन
रक्षकुल के लिए वो काल सिद्ध हो गया

✍️ चिराग़ जैन

रावण

यदि अब राम की शरण में चला गया; तो
मुझे मेरे भीतर का पाप मार डालेगा
एकमात्र सधवा बचेगी मेरी पत्नी तो
शेष विधवाओं का विलाप मार डालेगा
जिनसे सुशोभित थी रावण की राजसभा
उन रिक्त आसनों का शाप मार डालेगा
मृत्यु जो करेगी वह जग को दिखायी देगा
जीवन तो मुझे चुपचाप मार डालेगा

जिस अपराध से न मुक्त हो सकूंगा कभी
उसको मैं बीच मँझधार कैसे छोड़ दूँ
अब मेरा पाप मेरे साथ जग से विदा हो
पाप पर जीवन उधार कैसे छोड़ दूँ
वीर हूँ तो जीतकर जीतत्याग कर दूंगा
अन्यथा मैं भाग्य लिखी हार कैसे छोड़ दूँ
विजयी हुआ तो सिया, राम को ही सौंप दूँगा
युद्ध करने का मैं विचार कैसे छोड़ दूँ’

हारने को कुछ भी बचा नहीं है शेष अब
प्राणप्रिय पुत्र मेघनाद भी चला गया
नयनों से अधरों तलक हुआ भावहीन
हर्ष भी चला गया, विषाद भी चला गया
जीत भी गया तो किसको दिखायेगा विजय
हारने का हर अवसाद भी चला गया
रण में मरण का वरण करना ही होगा
रावण ये जानने के बाद भी चला गया

तन अट्टहास करता था निज मूढ़ता पे
मन रो रहा था अपनों के तर्पण को
जिसपे गिरा था उसके कुटुम्ब का रुधिर
चूमने चला था उस भू के कण-कण को
अपनी ही हठ से प्रचण्ड क्रुद्ध हो गया था
राम से नहीं था कोई क्षोभ दशानन को
जिससे हुई थी बन्धु-बान्धवों की देह जीर्ण
भोगने गया था उस बाण की चुभन को

उचक-उचक नभ में कुटुम्ब ढूँढ़ता था
सबको लगा जो अभिमान से भरा हुआ
दस-दस शीश धरती में गड़े जा रहे थे
अपने ही मन से स्वयम् उतरा हुआ
अपने ही हाथों अपना ही यश नष्ट कर
अपने ही आप को बहुत अखरा हुआ
रामजी ने हार-जीत की प्रथा निभायी बस
रावण तो रण में गया ही था मरा हुआ

✍️ चिराग़ जैन

हौसला मत छोड़ देना

राह कितनी भी कठिन हो, हौसला मत छोड़ देना
यह नियत है, हर डगर के अंत में मंज़िल मिलेगी
जो सफ़र पूरे हुए हैं, उन सभी का हाल पूछो
हर विजय की राह हर युग में बहुत बोझिल मिलेगी

राम होने के लिए वन-वन भटकना ही पड़ेगा
भाई की हत्या बिना सुग्रीव निष्कासित रहेगा
जो दशानन के सिंहासन पर सुशोभित हो गया है
वह विभीषण वंशहंता हो के अभिशापित रहेगा
वीर लक्ष्मण की कथाएँ जब खंगालेगा कोई तो
राजमहलों के सुखों में घुट रही उर्मिल मिलेगी

जंगलों को छाँट कर चाहे नगर निर्माण कर लें
रण बिना पूरा हुआ क्या, पांडवों की जीत का पथ
द्यूत, लाक्षागृह, कठिन वनवास और फिर दास जीवन
हर क़दम जर्जर हुआ है न्याय की उम्मीद का रथ
मौन रहकर भी समय को काटना चाहा कभी तो
कीचकों के रूप में निश्चित कोई मुश्किल मिलेगी

भोर की पहली किरण का मार्ग अंधियारा रहेगा
रात के अंतिम पहर को दीप की झिलमिल मिलेगी
प्रेम को सारे ज़माने की घृणा सहनी पड़ेगी
नफ़रतों को हर क़दम पर प्यार की महफ़िल मिलेगी
जिंदगानी के सफ़र में मौत का साया रहेगा
मौत को मंज़िल कहा तो, मौत भी तिल-तिल मिलेगी

✍️ चिराग़ जैन

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