Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
ये नीतीशवा करे है कानाफूसी
करावे जासूसी
मोदी जी इनका साथ छोड़ दो
इनके तेवर में भर दो ज़रा भूसी
कि छोड़ो कंजूसी
सत्ता की शह-मात छोड़ दो
आर एस एस पर और विहिप पर नज़रें इनकी पैनी हैं
हम हैं मौन तुम्हारी ख़ातिर उनके हाथों छैनी हैं
हमें बता दो आख़िर कब तक गुंडागर्दी सहनी है
संघ लुटा तो बीजेपी की लाज कहाँ फिर रहनी है
जहाँ होती हो रोज़ बेईमानी
क्या दोस्ती निभानी
मोदी जी ये बिसात छोड़ दो
ये नीतीशवा करे है कानाफूसी
करावे जासूसी
मोदी जी इनका साथ छोड़ दो
इनके तेवर में भर दो ज़रा भूसी
कि छोड़ो कंजूसी
सत्ता की शह-मात छोड़ दो
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हमारा समाज पर्दे का दास हो गया है। मीडिया हमारे दृष्टिकोण तय करता है और हम भेड़ों की तरह स्वयं को बुद्धिमान मानकर उस दृष्टिकोण का अनुसरण करने लगते हैं।
‘दंगल’ फिल्म में गीता-बबीता को ज़बरदस्ती उनकी मर्ज़ी के बिना उनके पिता पहलवानी सिखाते हैं तो हम उनके पिता को महान सिद्ध कर देते हैं। क्योंकि कहानी के अंत में पिता (आमिर ख़ान) सही सिद्ध हो गए। हम मंज़िल देखकर रास्ते की प्रशंसा करने लगते हैं। इसी रास्ते पर जब ‘थ्री इडियट’ का डीन चलना चाहता है तो हम उसके खि़लाफ़ खड़े हो जाते हैं। क्योंकि अबकी बार आमिर ख़ान स्टूडेंट थे।
‘कालिया’ में अमिताभ बच्चन स्मगलर बन जाते हैं तो हम दुआ मांगते हैं कि वे पुलिस के हाथ न आएँ। ‘ज़ंजीर’ में वही अमिताभ इंस्पेक्टर बने, तो हम चाहते हैं कि उनके चंगुल से कोई मुजरिम न बचने पाए। इसका साफ़ मतलब है कि हमारी सोच दरअस्ल हमारी नहीं है। हम वह सोचते हैं जो टीवी चाहता है।
हम उतने भर को सच मान लेते हैं, जो पर्दे पर दिखाया जाता है। हम ठीक उसी एंगल से सोचने लगते हैं जिस एंगल से पर्दा चाहता है। हरियाणा में प्रेम विवाह के खि़लाफ़ खाप पंचायतों का फ़ैसला आता है तो हम प्रेमियों के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। (कृपया ज्ञात हो कि मैं खाप के पक्ष में नहीं हूँ) किन्तु उत्तर प्रदेश में एक लड़की अपनी मर्ज़ी से सारे क़ानूनी दायरों में रहते हुए प्रेमी के साथ भाग जाती है तो उसके बर्बाद हो जाने की दुआ मांगी जाती है। उस पर लानतें भेजी जाती हैं। क्यों, क्योंकि खाप के मुआमलों में मीडिया ने हमें बताया कि परंपराओं के नाम पर यह अत्याचार है, और हम मानने लगे। लेकिन अब मीडिया ने हमें बताया कि एक दलित के साथ भाग कर लड़की ने अपने पिता की राजनैतिक प्रतिष्ठा भंग कर दी, उनके मुँह पर कालिख़ पोत दी …और हम मानने लगे।
मैं दोनों मुआमलों में किसी को ग़लत या सही नहीं ठहरा रहा हूँ। मैं केवल यह जानने का प्रयास कर रहा हूँ कि हमारे समाज की अपनी कोई सोच है भी या नहीं। या फिर हम सदियों से मानसिक मवेशियों की तरह अनुसरण ही करते आ रहे हैं। हम एकतरफ़ा फैसला देने में इतनी जल्दी क्यों करते हैं। हम यह क्यों नहीं जानना चाहते कि घटना जहाँ से हमें दिखाई दे रही हैं, उसमें कोई आयाम अनदेखा भी हो सकता है। जो लड़की आज मीडिया के दरवाज़े पर खड़ी होकर अपने पिता से संवाद कर रही है, उसी लड़की ने यदि केवल पुलिस से आस लगाई होती या वह सीधे अपने पिता के सम्मुख खड़ी हो जाती और इसके बाद कोई अनहोनी हो जाती तो हम इसी सोशल मीडिया पर उसे मूर्ख बताते हुए कहते- ‘पागल थी, जिस प्रदेश में पिता नेता है, उसी प्रदेश की पुलिस से सहायता मांग रही थी, जानती नहीं थी क्या कि पुलिस कितनी भ्रष्ट है। सीधे मीडिया में आ जाना था, फिर किसी की हिम्मत नहीं पड़ती उसका बाल बांका करने की।’
काश हम लोग, अपने विवेक से घटना के सम्यक आकलन का प्रयास भर करना सीखें। काश हम यह समझें कि आँखों को केवल दो आयाम दिखते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
शायरी में ढूंढ लेना सिसकियों की दास्तां
चश्मे-तर की सुर्ख़ियां अख़बार से मत पूछिए
आदमी होकर सियासत में दख़ल मुम्किन नहीं
आदमीयत का पता सरकार से मत पूछिए
दुश्मनी ही कर रहे हो तो ज़रा तल्ख़ी रखो
सच बता दूँगा मैं सब कुछ, प्यार से मत पूछिए
शुक्र है आवाज़ से महरूम होती है दुआ
किस क़दर ऊबा है घर, बीमार से; मत पूछिए
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हम भारत के लोग बहुत मज़ाकिया हैं, इसलिए हमने भारतीय तंत्र और भारतीय लोकतंत्र दोनों का मज़ाक़ बना दिया है।
हम भारत के लोग संविधान की शपथ लेकर झूठ बोलने में दक्ष हो चुके हैं। हमने इतना विश्वास कमाया है कि जब हम झूठ बोलते हैं तो सब बिना सुने ही समझ जाते हैं कि हम झूठ ही बोल रहे हैं। सब यह भी समझ चुके हैं कि हम किसी भी कीमत पर झूठ बोलना नहीं छोड़ेंगे, इसलिए कोई हमारे झूठ पर ऐतराज भी नहीं करता।
हम भारत के लोग परंपराओं के पोषक हैं। इसलिए हम आज भी जाति, ऊँच-नीच और धर्म के नाम पर बँटे हुए हैं। इस बँटवारे के कारण देश और समाज का बंटाधार होता हो, तो भी हम परंपराओं से मुख मोड़ने वाले नहीं हैं।
हम भारत के लोग परस्पर जुड़े हुए हैं इसलिए अपने दोष देखे बिना दूसरों को दोषी सिद्ध करके प्रसन्न रहते हैं। न्यायालय निर्णय सुनाते हुए प्रशासन को लापरवाह बताकर प्रसन्न है, प्रशासन रिश्वत लेते हुए विधायिका को अपराधी बताकर प्रसन्न है, विधायिका वोट मांगते समय जनता को कामचोर बताकर प्रसन्न है, और जनता कानून तोड़ते समय सबको भ्रष्ट बताकर प्रसन्न है। इस प्रकार हमारा देश एक प्रसन्न राष्ट्र बन चुका है।
हम भारत के लोग कर्मशील हैं, इसलिए हम ऐसी नौकरी की तलाश में रहते हैं जिसमें टेबल के ऊपर और नीचे हर तरफ काम किया जा सके। हम दूसरों को कर्मशील बनाना चाहते हैं अतएव अपनी कर्मण्यता का बखान करने में गर्व की अनुभूति करते हैं।
हम भारत के लोग अपने संविधान तथा तंत्र के प्रति आश्वस्त हैं इसलिए कोई भी अपराध करते हुए निडर रहते हैं। हमारा नेतृत्व तथा मीडिया हमें अपराधी हो जाने के लिए निरंतर प्रेरित करता रहता है। लाखों-करोड़ों रुपयों के घोटाले हमें निरंतर धिक्कारते हैं कि देश के कर्णधार कितना श्रम कर रहे हैं और हम एक अदद कार लोन की भी किश्तें चुकाकर देश के विकास को अवरुद्ध कर रहे हैं।
हम भारत के लोग मंदिर, मस्जिद, गाय, जनेऊ, धर्म, जाति, बुआ, भतीजा, शिवपाल-अखिलेश, उत्तर-दक्षिण, राहुल का धर्म, मोदी की डिग्री और पद्मावती जैसे मुद्दों पर चुनाव करते हैं ताकि विश्व समुदाय को यह संदेश मिले कि हमारे देश में रोटी, कपड़ा, मकान, रोज़गार, सुरक्षा, न्याय, शिक्षा, सड़क, बिजली, पानी जैसी समस्याओं पर पार पा लिया गया है। क्योंकि विश्व समुदाय जानता है कि इन समस्याओं के रहते कोई देश बेमतलब के मुद्दों को तूल नहीं दे सकता। इससे विश्व समुदाय में हमारा सम्मान बढ़ता है।
हम भारत के लोग बेहद भावुक हैं और वर्तमान में जीने में विश्वास रखते हैं। इसलिए किसी भी आतंकवादी घटना के बाद हमें सेना का शौर्य याद आने लगता है। और कुछ ही दिनों में हम चुनाव के खिलवाड़ और नेताओं की गाली-गलौज के चक्कर में व्यस्त होकर सेना को पुनः भुला देते हैं।
हम भारत के लोग देशप्रेमी हैं। इसलिए हर नुक्कड़ पर मोदीभक्त या राहुलभक्त होकर घंटों चर्चा करते हैं। यदि ग़लती से कोई देशभक्त हमारे बीच में बोल पड़े तो उसे कांग्रेस या भाजपा का दलाल सिध्द करने में जुट जाते हैं।
हम भारत के लोग केवल एक प्रश्न स्वयं से कभी नहीं पूछते, कि हमें अपने बच्चों को ईमानदार नागरिक बनने की शिक्षा देनी चाहिए या बेईमान अवसरवादी बनने की?
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का आम चुनाव सामने है। यह संभवतः पहला ऐसा आम चुनाव है जिसमें मीडिया से अधिक प्रभाव सोशल मीडिया का है। अब से पहले राजनीति में एक जुमला चलता था कि जनता की याद्दाश्त बहुत कमज़ोर है। लेकिन अब राजनीति यह समझ गई है कि मोबाइल की याद्दाश्त कमज़ोर नहीं होती। इसी कारण राजनीति ने न केवल ढिठाई की कोटिंग मज़बूत करवा ली है, बल्कि भाषा का स्तर भी इतना गिरा लिया है कि जनता उनकी बातों के तथ्यों तक पहुंचने की बजाय, बातों के तरीकों में उलझ कर रह जाए। हमें फ़ख़्र है कि हमें जिन लोगों को क़ानून बनाने के लिए नियुक्त करने जा रहे हैं वे आधिकारिक बैठक में जूते से अपने सहकर्मी की पिटाई करते हैं। हमें गुमान है कि जिन लोगों के हाथ में सभ्यता की बागडोर थमानी है वे सार्वजनिक रूप से माँ-बहन की गाली बकते देखे जाते हैं। हम जिनसे देश को समृद्ध बनाने की उम्मीद कर रहे हैं वे अपने कुर्ते की जेब फाड़ कर जनता के सम्मुख वोट की भीख मांगते देखे गए हैं। ज़िनको वचन निभाने की मिसाल क़ायम करनी थी, वे ओछे स्वार्थों के लिए बेशर्मी से दल बदलते फिर रहे हैं। राष्ट्रसेवा की आड़ में राजनीति का धंधा करने वाले सियारों का असली रंग तब सामने आता है जब उन्हें उनकी पार्टी चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं देती। जनता के सम्मुख चुनावी रैलियों में प्रतिद्वंदियों की चरित्र हत्या की जाती है और फिर सरकार बनाने के जोड़-तोड़ में उन्हीं चरित्रहीन लोगों से गलबहियां डाली जाती हैं। बेशर्मी के साथ चुने हुए प्रतिनिधि ख़रीदे जाते हैं और हम लोकतंत्र की अरथी पर सजी हुई मूल्यों की लाशों को सरकार मानने लगते हैं। हमारी जनता पन्द्रह लाख, बहत्तर हज़ार और मुफ्त राशन की मरीचिका में अपना वोट वायदों के रेगिस्तान में फेंक आती है और राजनीति के गिद्ध वोटों के चीथड़ों को नोच नोच कर अपना पेट भरते रहते हैं। हमारे चुनावों में या तो अंतरिक्ष की उपलब्धियां गिनाई जाती हैं या फिर हवाई जुमले उछाले जाते हैं। यह हमारे नेताओं की ईमानदारी है कि चुनाव ख़त्म होते ही वे जनता को बता देते हैं कि उनके सारे वायदे केवल चुनावी जुमले थे। इस बार भी यही जुमले उछलेंगे और हम टेलिविज़न की बहस देखकर अपने राहुल या अपने मोदी के दांव देखकर ख़ुश होते रहेंगे। हम मोदी, राहुल, माया, अखिलेश, ममता, ओवैसी, उद्धव, नीतीश, शिवपाल, पासवान, अब्दुल्ला, महबूबा, नायडू, केजरीवाल या चौटाला की अंधभक्ति में देशभक्ति बिसरा चुके हैं। हमें किसी अभिनेता या अभिनेत्री की शक्ल दिखाकर प्रभावित किया जाएगा और हम हो जाएंगे। एक पार्टी दिल्ली के पुरबियों को साधने के लिए भोजपुरी के एक गायक को प्रदेश अध्यक्ष बनाती है और पुरबियों की वोट साध लेती है। दूसरी पार्टी पंजाबी वोटर को ख़ुश करने के लिए गणित भिड़ाती है और पंजाबी वोट साध लिया जाता है। जिस देश में जातीय आधार पर राजनैतिक दल बनाना अपराध है, उस देश में टीवी चैनल सरेआम जातीय गणित और चुनाव के जातीय समीकरणों पर घंटों चर्चा करते हैं और हमारे न्यायालय आँख पर पट्टी बांधे बैठे रहते हैं। हमारे लोकतंत्र में सबके गिरेबान चाक हैं। जनता को अपने टुच्चे लालच की साध में राजनेताओं के शिकंजे में स्वयं फंसने में कोई आपत्ति नहीं है तो राजनीति के इस नंगे नाच पर आक्षेप करना जनता को भी कतई शोभा नहीं देता।
✍️ चिराग़ जैन