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युद्ध के बाद

दो देश आमने-सामने खड़े हैं। सीमा पर तनाव है। नभ, थल और जल में होनेवाली हर आहट किसी अनहोनी की आशंका से मन कँपा रही है। यह कंपन, भय का कंपन कतई नहीं है। देश की रक्षा में तैनात वीर बेटों को मृत्यु से भयभीत होने की फ़ुर्सत होती ही कहाँ है।
मीडिया, युद्ध के उन्माद को भुनाकर टीआरपी बटोर रहा है। अपने आरामदायक बिस्तर पर लेटकर दर्शक किसी एक्शन फिल्म की तरह इन बुलेटिन्स को देखते हुए उन्मादी हो रहे हैं। टीवी की स्क्रीन से नज़र हटाकर मोबाइल की स्क्रीन पर टिकाओ तो सोशल मीडिया पर युद्ध की उतावली दिखाई देने लगती है। पाकिस्तान में पकड़े गए भारतीय पायलट की दुर्दशा का वीडियो क्लिप फॉरवर्ड करके हर कोई अपने मोबाइल में दर्ज संपर्कों पर यह इम्प्रेशन जमा रहे हैं कि मेरे पास सबसे पुख्ता और लेटेस्ट जानकारियाँ हैं।
इससे शायद हमारा कोई सूक्ष्म अहंकार पुष्ट होता होगा लेकिन एक पल के लिए उस परिवार के प्रति करुणा भी जागनी चाहिए जिसका बेटा इस वीडियो में दुश्मनों के बीच घिरा दिखाई दे रहा है। हम शेखचिल्ली की तरह वीरता की बड़बोली बातें करते समय यह कल्पना ही नहीं कर पाते कि इस अपरिचित पायलट की जगह हमारा अपना कोई इस वीडियो में दिखाई दे रहा होता तो शायद उंगलियाँ रूह से पहले काँप जातीं।
दो-दो विश्वयुद्ध लड़ चुकने के बाद यूरोप ने युद्ध से तौबा कर ली है। पूरा यूरोप सीमाविहीन हो चला है। युद्ध, अफ़वाह, शौर्य के खोखले जुमले, बदला, हमला, विध्वंस और खून-ख़राबे में नष्ट होनेवाले संसाधन मानव के जीवन स्तर को सुधारने में व्यय हो रहे हैं। कहते हैं कि कलिंग का रक्तपात देखकर राजहठ का शौर्य भी विरक्त हो गया था। कहते हैं कि मरणासन्न सुयोधन ने श्वास डूबने से पूर्व युधिष्ठिर का पश्चाताप देखा था।
कुछ घंटों, कुछ दिनों, कुछ सप्ताहों का एक युद्ध दो देशों को विकास की दौड़ में दशकों पीछे धकेल देगा। कुछ क्षणों का उन्माद सैंकड़ों चौखटों को हमेशा हमेशा के लिए अंधियारे से भर देगा। कुछ पलों का प्रतिशोध एक पूरी पीढ़ी को अनाथ कर देगा। हमारे पास केवल आँकड़े आएंगे कि भारत के इतने सैनिक ‘शहीद हुए’ और पाकिस्तान के इतने सैनिक ‘मारे गए’। हम मारे गए सैनिकों की संख्या के सम्मुख शहीद हुए सैनिकों की संख्या रखकर कम-ज़्यादा का आकलन करेंगे और क्रिकेट मैच के स्कोरबोर्ड की तरह यह ज्ञात कर पाएंगे कि किसका पलड़ा भारी है। इस प्रक्रिया के संपन्न होने के बाद हम उन आँकड़ों को भुला देंगे और बेचैनी से न्यूज़ बुलेटिन देखने लगेंगे।
एक पल के लिए भी हम उस मारे गए अथवा शहीद हुए किसी सैनिक के परिवार की मनोदशा का अनुमान लगाने की ज़हमत नहीं उठाएंगे। ख़ूब खून-ख़राबा होने के बाद हमारे यहाँ के डिप्लोमेट्स, उस दुश्मन के डिप्लोमेट्स के साथ बातचीत का लिए स्वीकृति दे देंगे और फिर कुछ घंटों की मशक्कत के बाद किसी समझौते पर हस्ताक्षर हो जाएंगे। इस बीच जिन परिवारों के चिराग़ बूझेंगे उनकी सुधि किसी को नहीं आएगी। मीडिया सीमा रेखा को भूलकर शिखर वार्ता की तैयारियों, अतिथि देश के प्रधानमंत्री की पोशाक, खानपान, रुकने के स्थान और पर्यटन की कवरेज में व्यस्त हो जाएगा।
हम अपने सैनिकों के शौर्य को बिसारकर अपने देश की मेहमान नवाज़ी पर रीझने लगेंगे। एक काग़ज़ के टुकड़े पर हस्ताक्षर होंगे। दोनों मुल्कों के राष्ट्राध्यक्ष हाथ मिलाते हुए फ़ोटो खिंचवाएंगे। फिर एक साझा बयान जारी होगा और दस-बारह साल के लिये छुटपुट घटनाओं के भरोसे अपने सैनिकों को छोड़कर अपने-अपने काम में व्यस्त हो जाएंगे।
काश, हम अपने उन्माद के अंधियारे में बेटे खोने का दुःख टटोलने की कोशिश कर पाते। काश हम समझ पाते कि दो मुल्कों के एक सौ चालीस करोड़ लोगों के जीवन और भविष्य की कीमत पर युद्ध की ओर बढ़ना किसी के लिए भी सुखद नहीं होगा। काश हम स्वीकार कर पाते कि बातचीत की टेबल तक कि यात्रा यदि युद्ध के मैदान से होकर न जाए तो कई आंगनों को बिलखने से बचाया जा सकेगा।

✍️ चिराग़ जैन

ढाक के तीन पात

आवेग बीत चुका है। भारतीय मानस में सुलग रहे शोलों पर रोज़मर्रा की ज़रूरतों के छींटें पड़ चुके हैं। मीडिया अगली बड़ी ख़बर आने तक पुलवामा को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाए रखने के लिए विवश है। इसी कारण भारतीय गाली-गलौज से निचुड़ने वाली सारी टीआरपी बटोरने के बाद अब हमें पाकिस्तानी गालियाँ सुनवाई जा रही हैं। इमरान खान के बयान पर हर चैनल चर्चा कर रहा है। और हर चर्चा के अंत में एंकर भारतीय शौर्य की कोटिंग करके इमरान का प्रचार करने के पाप से मुक्ति पा रहा है। राजनैतिक पार्टियां अपने स्वभाव के अनुसार पुनः आरोप-प्रत्यारोप, छीछालेदर, गठबंधन, चरित्र हत्या, जोड़-तोड़, दल-बदल, रैली, भाषण और वोट-मैनेजमेंट जैसे महत्वपूर्ण कार्यों की ओर उन्मुख हो चुकी हैं। इन सबसे फ़ुर्सत पाकर बीच-बीच में “बदला लिया जाएगा” जैसे जुमले बोलकर यह भी जताया जा रहा है कि “न भूलेंगे न मुआफ़ करेंगे” हमें याद है। इससे भावुक देशभक्तों की वोट पक्की होती है। अनिल अंबानी से सुप्रीम कोर्ट ने कुछ करने को कहा है। और बात न मानने पर कारावास की चेतावनी भी दी है। किंतु हमारी मीडिया इतनी संवेदनशील है कि इस ख़बर को कुछ सेकेण्ड के लिए ही चलाया गया। क्योंकि मीडिया जानती है कि किसी मुआमले में फैसला आने से पहले आरोपी को अपराधी नहीं माना जा सकता। मीडिया यह भी जानती है कि न्यायालय अम्बानी जी को सज़ा बाद में देगा लेकिन अम्बानी सर की नेगेटिव न्यूज़ चलाने की सज़ा मीडिया को ज़रूर मिल जाएगी। सरकारी दफ्तर, बसें, नुक्कड़ और चौपालें अभी भी दो गुटों में बँटे हुए विश्वयुद्ध लड़ रहे हैं। एक गुट का मानना है कि मोदी जी कोई भगवान टाइप की आइटम हैं जो नोटबंदी की तरह एक दिन अचानक टीवी पर आकर बताएंगे कि हमारा पड़ोसी पाकिस्तान अब हमारे बीच नहीं रहा। दूसरे गुट की विचारधारा अधिक ड्यूरेबल है। उनकी हमेशा यही मान्यता रही है कि सब साले चोर हैं, सबको अपनी कुर्सी की चिंता है, देश की किसी को कोई फिक्र नहीं है। एक तीसरा पक्ष भी है, जिसे हम निर्गुट मानते हैं। उसका मानना है कि भैया हमें तो हड्डे कटाकर पेट भरना है, न कांग्रेस कुछ देगी न भाजपा। स्कूलों में लड़के रात के बुलेटिन और व्हाट्सएप्प से प्राप्त ज्ञान को इस आत्मविश्वास के साथ बाकी जमघट को सुनाते हैं जैसे रात भर मोदी जी के साथ भारतीय सेना के शस्त्रागार का मुआयना करके लौटे हों। राजनैतिक दलों की “वानर सेनाएँ” किसी कश्मीरी को पीट कर, किसी जगह पुतले जलाकर, किसी जगह देशभक्ति का अभिनय करके अपने ऊपर होने वाले ख़र्चे को जस्टिफाई कर रही हैं। सोशल मीडिया पर अफवाहें अभी भी फैलाई जा रही हैं। फोटोशॉप सेना अभी भी सक्रिय है। पुलवामा के सैनिकों की चिताओं से फूल चुने जा चुके हैं, अब राजनीति उस राख में से वोट चुनने का प्रयास कर रही है। जिन परिवारों के बेटे वीरगति को प्राप्त हो गए अब राजनैतिक अनदेखी के कारण वे परिवार भी दुर्गति को प्राप्त होने जा रहे हैं। भारत सरकार ने “सदा-ए-सरहद” (दिल्ली-लाहौर बस सेवा) को बंद कर दिया है ताकि सरहद के जवानों की चीख़-पुकार देश को विह्वल न करे। लेकिन “समझौता एक्सप्रेस” (अटारी-लाहौर रेल सेवा) को जारी रखा है ताकि आवश्यक कामकाज होता रहे। 1947 से अब तक ऐसे तनावग्रस्त अवसर कई बार आए हैं जब दोनों ही मुल्कों की आम जनता का खून खौला है। यही सब गाली-गलौज, प्रतिबंध, आक्रोश, बयानबाज़ी हर बार होती है और फिर कुछ दिन बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। दोनों ही देशों की जनता को यह नहीं मालूम कि जब भी तनाव बढ़ता है तब सिर्फ क्रिकेट का खेल बन्द किया जाता है, सियासत का नहीं।

✍️ चिराग़ जैन

मरासिम

यार दहशत से समर्पन नहीं जीता जाता
रूप मिल सकता है, यौवन नहीं जीता जाता

क्या मरासिम की रवायत में कोई ख़ामी है
तन लिवा लाते हैं पर मन नहीं जीता जाता

एक झोंके की छुअन से ही बरस जाता है
आंधियो! शोर से सावन नहीं जीता जाता

सामने वाले के एहसास पे हारो ख़ुद को
प्यार का खेल है, जबरन नहीं जीता जाता

हौसला बनके सदा साथ में चलना मेरे
रंग और रूप से साजन नहीं जीता जाता

मार डाला था उसे ख़ुद के अकेलेपन ने
तीर-तलवार से रावन नहीं जीता जाता

✍️ चिराग़ जैन

रुक जाने का मन होता है

आपाधापी की राहों पर सुस्ताने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है

शिक़वे और शिक़ायत कर ली
हिम्मत और हिमाक़त कर ली
यश-अपयश का दौर हुआ है
ज़हर सरीखा कौर हुआ है
नफ़रत का हर पाठ पढ़ा है
बदले का हर ज्वार चढ़ा है
मस्तक पर अवसाद रखा है
अपशब्दों का स्वाद चखा है
छल-बल की हर रीत दिखी है
देहरी चढ़ती जीत दिखी है
अब दुश्मन के आगे जाकर, झुक जाने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है

उत्सव देखे, वैभव देखा
यौवन देखा, शैशव देखा
जयकारों का रोर सुना है
तारीफ़ों का शोर सुना है
स्वागत देखे, वंदन देखे
कितने ही अभिनन्दन देखे
फूलों संवरीं राहें देखीं
स्वागत करतीं बांहें देखीं
यश की हर इक सहेली देखी
पसरी रिक्त हथेली देखीं
हर आपाधापी को तजकर, चुक जाने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है

इच्छाओं को शिष्ट कर लिया
पूरा जीवन क्लिष्ट कर लिया
तन जागा तो स्वप्न नरारद
हल निकले तो प्रश्न नदारद
झुकना चाहा अहम अड़ गए
रुकना चाहा क़दम बढ़ गए
ढेरों नियम, अगिन सीमाएँ
खंडहर थोथी परिभाषाएँ
कारण मिला अधर फैलाये
कारण मिला नयन भर आए
कभी-कभी बिन कारण भी तो मुस्काने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है

✍️ चिराग़ जैन

त्रिशंकु

एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ
सरगम गाने वाली वीणा
किसको अपनी पीर सुनाएँ

ऊपर अनगिन फूल खिले हैं
जिनकी देह सुगंध बिखेरे
भीतर जड़ में गंधियाते हैं
पत्तों की लाशों के डेरे
जितनी बढ़ती उमस जड़ों की
उतने फूल महकते जाएँ
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ

कलकल करती जिस धारा की
घाटों पर पूजा होती है
वो निश्छल नदिया बेचारी
उद्गम पर रिस-रिस रोती है
अंत, गरजता खारापन है
आदि, गलन से ग्रसित शिलाएँ
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ

असुरों के संहारक राजा
कोपभवन से हार गए हैं
दुनिया का मन जीत लिया पर
अंतर्मन से हार गए हैं
घर की चैखट पर टूटी हैं
कितनी अपराजेय ध्वजाएँ
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ

✍️ चिराग़ जैन

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