Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
तेरा पब्जी करके बैन,
तोय ऐसो मज़ा चखाय देंगे
तेरा छिन जाएगा चैन,
तोय नानी याद दिलाय देंगे
जिन वीरों का सबरा जीवन टीकटोक ने खाया
एप्लिकेशन बैन करा के हिल्ला याद दिलाया
मेहनत करके दिन-रैन,
तेरा धंधा तले लगाय देंगे
तेरा छिन जाएगा चैन
तोय नानी याद दिलाय देंगे
अपना माल वहीं पर रख ले, हम ख़ुद बनवा लेंगे
तेरे घर कम पड़ता हो तो, तुझको भिजवा देंगे
तेरे छोटे-छोटे नैन
प्रोडक्शन से फटवाय देंगे
तेरा छिन जाएगा चैन,
तोय नानी याद दिलाय देंगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Lapete Mein Netaji, Poetry
इस हाथ बातचीत, उस हाथ घुसपैठ
गोल-गोल न घुमाओ सीधे-सादे सीन को
हाथ मिल जाने से न कमज़ोर मान लेना
जड़ से उखाड़ सकते हैं आस्तीन को
बड़े-बड़े कोबराओं को नचाना जानते हैं
फिर न उठाना पड़े हमें उस बीन को
भारत के वर्तमान पीएम को जान लेना
चाय में मिला के कहीं बेच न दे चीन को
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
‘जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो’ -ये भारतीय पत्रकारिता के प्रारंभिक तेवर थे। संपादन और क्रांति एक-दूसरे के पूरक थे। संपादकों को भाषा का ज्ञान इतना था कि अख़बार में छपे शब्द वर्तनी का प्रमाण होते थे। अख़बार का काग़ज़ खोटा होता था, पर ख़बरें खरी होती थीं। काली स्याही से जो अख़बार में छप गया, वह इतिहास में दर्ज हो गया।
संपादकीय टिप्पणी के एक-एक वाक्य में सत्ता की चूल हिलाने का सामर्थ्य होता था। 15 अगस्त 1947 को आज़ादी की जो फ़सल हमने काटी उसके खेत की सिंचाई में पत्रकारों का क़ाफ़ी ख़ून-पसीना शामिल था।
आज़ादी के पाँच दशक बाद पत्रकारिता में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव हुए। एक तो अब तक टेलिविज़न भारत में दुर्लभ नहीं रह गया था, दूसरे उद्योग जगत् को अख़बार की आड़ में अपने राजनैतिक हित साधने और औद्योगिक घपले छिपाने का फार्मूला मिल गया। अब तक अख़बार के मुताबिक़ जनता चलती थी अब जनता के मुताबिक़ अख़बार चलने लगे। उधर टेलिविज़न पर श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने न्यूज़ रीडिंग को न्यूज़ एंकरिंग में तब्दील करने का पहला प्रयोग ‘आज तक’ नामक समाचार बुलेटिन में किया। लगभग इसी दौरान सुश्री नलिनी सिंह ने ‘आँखों देखी’ के माध्यम से प्रोग्रामिंग और न्यूज़ बुलेटिन के सम्मिश्रण का सफल प्रयोग किया।
इधर ये दोनों कार्यक्रम सफलता के चरम पर थे, उधर चौबीस घण्टे के समाचार चैनल्स की अवधारणा भारत में शुरू हो गई। श्री एस पी सिंह ने जो न्यूज़ एंकरिंग शुरू की थी वह सबसे पहले, सबसे तेज़, सबसे आगे, नम्बर वन और सनसनीखेज़ समाचारों के जंगल में ऐसी फँसी कि उसमें से न्यूज़ ग़ायब हो गई और केवल एंकरिंग शेष रह गई।
ठीक इसी समय प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से प्रतिद्वंद्विता और औद्योगिक घरानों की लाभप्रधान नीतियों के रोग से ग्रस्त होकर ऐसा रंगीन हुआ कि उसमें कुछ भी ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ नहीं बचा। संपादकीय पृष्ठों पर लगने वाली ऊर्जा ‘पेज थ्री’ को ग्लैमरस बनाने में नष्ट होने लगी। सेलिब्रिटी मैनेजर्स को संपादकों से अधिक महत्वपूर्ण समझा जाने लगा। फिल्मी कलियाँ, स्टारडस्ट और मनोहर कहानियाँ जैसी मसालेदार सामग्री से अख़बार की बिक्री बढ़ाने की होड़ शुरू हो गई।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया; भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, खाना-पकाना और सास-बहू के सीरियल्स को ख़बर बनाकर; चौबीस घण्टे न्यूज़ चैनल चलाने का ढोंग करता रहा और प्रिंट मीडिया क्लासीफाइड, मेट्रीमोनियल, बॉलीवुड, क्रिकेट, ग्लैमर वगैरा से अपने-अपने पन्नों के ढेर को नम्बर वन अख़बार बताने पर तुले रहे।
बाज़ार में खड़ी पत्रकारिता के बीच ‘जनसत्ता’ बेचारा काफ़ी दिन तक उसी चौड़े आकार और काली स्याही पर अड़ा रहा; लेकिन चटपटे काग़ज़ को अख़बार समझकर ख़रीदनेवाले ग्राहकों ने जनसत्ता की दशा इतनी दयनीय कर दी कि वह बन्द होने के कगार पर आ गया। हारकर इस एकमात्र मंदिर को भी अपने चौक में दुकानें और सर्कस लगवाने पड़े ताकि पर्यटकों की चप्पलें गिनवाकर श्रद्धालुओं की संख्या में इजाफ़ा किया जा सके।
जिस पत्रकारिता में येलो जर्नलिज्म और गटर जर्नलिज्म को हेय समझा जाता था, वहाँ ‘बटर जर्नलिज्म’ तक के दर्शन होने लगे। जिस देश में, राजनीति अख़बार देखकर जनता का मूड भाँपती थी; वहाँ राजनीति का मूड देखकर, अख़बार जनमत बनाने लगे।
जनता की अनदेखी ने दूरदर्शन के सीधे-सादे समाचार बुलेटिनों और जनसत्ता जैसे साफ़-सुथरे समाचार-पत्रों को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए बाज़ारू होने पर विवश कर दिया।
जिन न्यूज़ चैनल्स को टीआरपी दे-देकर हमने सींचा है, आज वे ही किसी राजनैतिक पार्टी, किसी धन्ना सेठ और किसी मल्टीनेशनल कम्पनी के मन मुताबिक़ हमारी आँखों में धूल झोंक रहे हैं। मीडिया के इस वीभत्स रूप को धिक्कारने वाले एक बार अपने गिरेबान में झाँक कर देखें कि इस मीडिया को इतना उच्छृंखल बनाया किसने है।
जब किसी चैनल की डिबेट में पैनलिस्टों को मुर्गे की तरह लड़ाया जाता है; जब किसी स्टूडियो में बैठे एंकर शालीनता, सभ्यता और शिष्टता की समस्त मर्यादाएँ लांघते हैं; जब पीत पत्रकारिता के दम पर चार-चार दिन लोगों को मूर्ख बनाया जाता है तब भी हम पलटकर दूरदर्शन के समाचार बुलेटिन पर नहीं लौटते। जब हम अख़बार के चालीस पन्नों में से तीस में विज्ञापन और बाकी दस में ग्लैमर और हिंसा देखते हैं, तब हम उस पत्र के दफ्तर में एक चिट्ठी नहीं लिखते कि जिन पन्नों पर ख़बर, समसामयिक लेख, साहित्य, विचार प्रधान संपादकीय छपते थे; जिनमें छपा ‘बच्चों का कोना’ पढ़कर हमारा बचपन अख़बार पढ़ना सीखा है; उन पर ये क्या छाप कर हमारी बालकनी को गंदा कर रहे हो?
विश्वास कीजिये, बीहड़ बन चुके इस मीडिया में अभी भी उस पत्रकारिता के कुछ बीज ‘दबे हुए हैं’ जिन्हें हमारी दृष्टि का थोड़ा-सा पानी और समर्थन की थोड़ी-सी धूप मिल गई, तो ये वीराना फिर से लहलहा उठेगा।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
भारत का भविष्य न तो उन अराजकों से प्रश्न पूछेगा, जो बंदूकें लहराते हुए ‘हीरो’ बनने का सपना पाल रहे हैं; न ही उन छुटभैये लीडरों से सवाल करने जाएगा, जो दंगे भड़काकर राष्ट्रीय टेलिविज़न की सुखिऱ्यों में दर्ज होने का ख़्वाब देख रहे हैं। आनेवाली पीढ़ियों के सामने यदि सामाजिक विद्वेष की कहानी का कोई भी पन्ना फड़फड़ाया तो वह काग़ज़ का एक टुकड़ा उस महान संस्कृति के लिए कठघरा बन जाएगा, जो स्वयं के विश्वगुरु होने का दम भरती है।
जो लोग इन दंगों में मारे गए हैं, उनके वंशजों को जब भारतीय संस्कृति की महानता की कहानी पढ़ाई जाएगी तब उनकी आँखों में घृणा मिश्रित आश्चर्य दहक उठेगा। फिर उसी घृणा को आधार बनाकर तब के राजनैतिक मनसूबे साधे जाएंगे। जब कोई हमें वर्तमान की स्थितियों पर उकसाने में सफल नहीं हो पाता तब वह इतिहास का ही कोई पन्ना फाड़कर हवाओं में उस पर दर्ज नफ़रतों का धुआँ घोलने लगता है।
जातीय विद्वेष की वर्तमान स्थिति इस अभ्यास का प्रमाण है। पीढ़ियों पहले किसी वर्ग विशेष द्वारा किसी व्यक्ति विशेष पर किया गया अन्याय आज जातीय घृणा की प्राणवायु बन गया है। शम्बूक के वंशजों को यह बताया जाता है कि देखो तुम्हारे पुरखे के साथ कितना अन्याय किया गया। और राम के वंशजों को यह बताया जाता है कि तुम्हारे पुरखों ने शबरी और निषाद को गले लगाया फिर भी इन लोगों को संतोष नहीं मिलता। ये पन्ने लहरानेवाले उनसे ज़्यादा ख़तरनाक़ हैं, जो सड़क पर बंदूक लहरा रहे हैं।
इसीलिए भविष्य बंदूकों से नहीं, पन्नों से पृष्ठ पूछेगा। जिन्होंने बंदूक उठा ली, जिन्होंने पत्थर फेंके, जिन्होंने आग लगाई और जिन्होंने लूटपाट की वे सब आज नहीं तो कल पकड़े जाएंगे, आज नहीं तो कल मर जाएंगे। उनके प्रति किसी के मन में कोई दया भी नहीं होगी। उनके पक्ष में भी कोई खड़ा न होगा। लेकिन जिन्होंने बंदूक उठवाई, जिन्होंने घृणा से भरे लेख लिखे, जिन्होंने आग में घी डाला, जिन्होंने नफ़रत के पन्ने लहराए उन सबकी बातें कभी नहीं मरेंगी। उन सबके शब्द हमेशा वातावरण में मंडराते रहेंगे।
भूखे से रोटी छीनना तो अपराध है लेकिन भूखे के सामने रोटी का गुणगान करना पाप है। क़ानून केवल अपराध का दंड देता है लेकिन पाप का दंड पीढ़ियों को भुगतना पड़ता है। जब समुंदर उफ़ान पर हो तब उसमें और पानी डालनेवालों को भी उतना ही ख़तरा होता है, जितना उसमें से पानी निकालने वालों को। जब कोई मुद्दा गर्म हो तब उसके पक्ष में बोलना भी उतना ही नुकसानदायी है जितना उसके विरोध में बोलना। कई बार मौन से स्थितियाँ आसान हो जाती हैं। अराजकता का उद्देश्य होता है कि वह ध्यान आकर्षण करे। यदि उस पर ध्यान दिया जाए या उस पर चर्चा की जाए तो वह प्रोत्साहित होती है।
हमें सोशल मीडिया और न्यूज़ मीडिया को सकारात्मकता की ख़बरों से पाटने की ज़रूरत है। हमें अपनी हर पोस्ट से यह संदेश देना होगा कि चर्चाओं में रहना है तो बुराई का रास्ता छोड़ना होगा। मांग कोई भी हो, अगर उसको कहने का सलीका विधि-सम्मत नहीं होगा तो उसे अखबारों में नहीं छापा जाएगा। उपद्रव के समाधान हेतु सरकारी तंत्र तो सक्रिय होगा लेकिन मीडिया उसके समाचारों की पल-पल रिपोर्टिंग करके उसे प्रोत्साहित नहीं करेगा। हमारे व्हाट्सएप्प से कोई भी ऐसा समाचार प्रसारित नहीं होगा जो किसी उपद्रव का प्रचार करता हो। ‘बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा’ – यह डायलॉग उनकी सोच को संचालित करता है, तो हम उनका ज़िक्र करना छोड़ दें। जिसकी चर्चा करना छोड़ दो वह हमारे मस्तिष्क से बाहर हो जाता है।
हमें इन नकारात्मकताओं को इतिहास से बाहर करना है तो इसके लिए पहला क़दम यही होगा कि इन्हें चर्चाओं से बाहर किया जाए। यदि इनकी चर्चा बन्द हो गई तो वे मनसूबे भी मर जाएंगे जो इन लपटों पर अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकना चाहते हैं, और वे कुंठाएँ भी मर जाएंगी जो पीढ़ियों पहले हुई किसी घटना की टीस से वर्तमान को सड़कों पर नंगा करने में जुटी हैं। फिर भविष्य के पास इतिहास को कोई सफ़हा उड़ता हुआ पहुँचेगा तो उससे सद्भाव की ख़ुशबू आएगी, पथराव की दुर्गंध नहीं।
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Delhi Riots
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
राजधानी दिल्ली का एक क्षेत्र विशेष दंगों की चपेट में है और मीडिया ट्रम्प की यात्रा का इंच-इंच कवर कर रहा है। सरकार मेहमाननवाज़ी में व्यस्त है और घर में भाण्डे बज रहे हैं। सीएए का विरोध या समर्थन दो दिन बाद भी किया जा सकता है यार! हद्द हो गई। क्या हम इतने भी सभ्य नहीं रह गए हैं कि किसी मेहमान के सामने ‘झूठा ही सही’ लेकिन सद्भाव का परिचय दे सकें।
कभी-कभी आश्चर्य होता है। आखि़र किस समाज के लिए यह राजनेता अपना जीवन न्यौछावर करने पर अड़े हैं! हम सुरक्षा में लगे पुलिसवालों को गोली मारेंगे, फिर यह भी चाहेंगे कि कोई हमें नक्सली न कहे। हम धर्म की टोपी पहनकर पत्थरबाज़ी करेंगे और फिर यह चाहेंगे कि हमारे धर्म को आतंकवादी न कहा जाए। शर्म आनी चाहिए। जहालत की भी कोई सीमा होती है।
मोदी जी को यह चिंता है कि दिल्ली के स्कूलों की प्रदर्शनी हो तो दिल्ली के मुख्यमंत्री वहाँ न हों। दिल्ली के मुख्यमंत्री इस बात से ख़ुश हैं कि अमरीकी दूतावास ने यह घोषणा कर दी है कि मुख्यमंत्री की उपस्थिति पर अमरीकी प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं थी, यह आपकी आंतरिक राजनीति के कारण हुआ है। क्या कर रहे हो भाई! हम हर पल गिरते जा रहे हैं। मोदी विरोधी इस बात पर चुटकुले बना रहे हैं कि हमारे प्रधानमंत्री के मुँह से डोनाल्ड की जगह ‘दोलाण्ड’ निकल गया। भाजपाई यह बता रहे हैं कि ट्रम्प भारत इसलिए आए हैं क्योंकि मोदी की तूती बोल रही है। कोई इस बात पर जुमलेबाज़ी कर रहा है कि ट्रम्प ने पाकिस्तान को दोस्त बताकर भारत की डिप्लोमेसी के मुँह पर तमाचा मार दिया। कोई यह सिद्ध करने पर उतारू है कि ट्रम्प ने आतंकवाद ख़त्म करने की बात करके पाकिस्तान की इज़्ज़त उतार दी। …क्या है यह सब।
भारतीय समाज भयंकर संकटों से जूझ रहा है। एक वर्ग विशेष सरकारी राजहठ से लोहा लिए बैठा है। राजा बालहठ को झुकाने पर अड़ा हुआ है। जनता में साम्प्रदायिक विद्वेष बढ़ता जा रहा है। राजनैतिक चर्चाएँ दुश्मनी का सबब बनती जा रही हैं।
समाज भक्तों और चमचों में बँटा जा रहा है। ‘भारत माता की जय’ का सर्वग्राह्य उद्घोष एक राजनैतिक दल की बपौती हो चला है। समाज का सौहार्द बिगाड़ने के लिए धर्म, सम्प्रदाय और जातियाँ पहले से ही विद्यमान थीं; अब पार्टी भी आग में घी का काम कर रही है। कांग्रेसी लोग, मोदी समर्थकों को मूढ़ मान चुके हैं और मोदी समर्थकों ने मोदी विरोधियों को ग़द्दार मान लिया है।
कोई शाहीन बाग़ जाकर ख़ुद को रामभक्त बताता है और बिना लाइसेंस की बंदूक से गोली दाग देता है। कोई महिला कॉलेज में घुसकर हस्तमैथुन करता मिलता है। कोई पत्थरबाज़ी के बीच पुलिस पर गोली चला देता है। आखि़र कर क्या रहे हैं हम? यह भयावह वर्तमान भविष्य के प्रति प्रश्नचिन्ह खड़े करने लगा है।
एक सरकार कार्यविहीन योजना में समय नष्ट करती रही, दूसरी सरकार योजनविहीन कार्यों में पूंजी लुटा रही है। मीडिया अमरीका के चिड़ियाघर में जन्मे भालू के बच्चे दिखाकर टीआरपी बटोर रहा है और न्यायपालिका तारीखें बढ़ाकर अपनी नौकरी बचाए रखने में दक्ष हो गई है। कार्यपालिका कभी पैसा खाने में व्यस्त है तो कभी गोली खाने को मजबूर।
समान नागरिक आचार संहिता की बात करो तो उनको आपत्ति है जो धर्म की आड़ में संविधान के नियमों का मज़ाक़ बनाए जा रहे हैं। समान नागरिक आचार संहिता की बात न करो तो वे बौखलाते हैं जो संविधान की आड़ में एक धर्म विशेष को अपना वोटर बनाए रखना चाहते हैं।
सरकार और तंत्र को गाली देनेवाले लोग ट्रैफिक नियमों को भी मानने को तैयार नहीं हैं। सब, ख़ुद को छोड़कर बाक़ी सबको अपराधी सिद्ध करने पर तुले हैं। हर दुर्भाग्यपूर्ण घटना में कवि अपने लिए तालियाँ बटोर रहा है, पत्रकार अपने लिए टीआरपी तलाश रहा है, राजनीति वोट तलाश रही है और कार्यपालिका अवसर!
कुछ लोग अराजकता के समर्थन में केवल इसलिए हैं क्योंकि वह अराजकता मोदी के खि़लाफ़ बढ़ रही है। कुछ लोग अराजकता के विरोध में केवल इसीलिए हैं कि इससे मोदी जी को चुनाव में फ़ायदा मिलेगा और हमें मोदीवादी होने का अवसर। संविधान, जनहित, नैतिकता, मनुष्यता और सभ्यता जैसे शब्द बेमआनी हो गए हैं और हम रवीश बनाम सुधीर चौधरी में बँटते-बँटते असभ्यता के शिखर की ओर अग्रसर हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Donald Trump’s India visit and Delhi Riots