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भीगा मन

झमाझम बारिश
दिल्ली यूनिवर्सिटी कैम्पस
भीगते हुए लड़के-लड़कियाँ
लटों से फिसल कर टपकती बूंदें
फर्राटे से पानी उछालती गाड़ियाँ
मस्ती में किलकारता यौवन
मोटर-बाइक पर आलिंगनबद्ध प्रेम
ग्वाॅयर हाॅल कैंटीन की मैगी
चाय की चुस्कियाँ
काॅलेज-डेज़ की यादें
किसी पुराने परिचित से मुलाक़ात।

…और भीगे मन की
भीगी-सी आवाज़
…चल, भीगते हैं यार।

✍️ चिराग़ जैन

हमारा बचपन

माँ के आँचल में था महफ़ूज़ हमारा बचपन
आ के दुनिया में कहीं खो गया प्यारा बचपन

इस ज़माने की हर इक चाल से हारा बचपन
कैसे जी पाएगा ऐसे में बेचारा बचपन

देखकर डर गया दुनिया का नज़ारा बचपन
फिर कभी लौट के आया न दुबारा बचपन

जिस घड़ी हो गए हालात ज़ेह्न पर क़ाबिज़
उस घड़ी आँसुओं में बह गया सारा बचपन

‘हम भी जल्दी से बड़े हों तो मज़ा आ जाए’
-ऐसे मासूम ख़यालात ने मारा बचपन

✍️ चिराग़ जैन

बचपन नहीं जाता

अगर कुछ शोख़ियों की ओर उसका मन नहीं जाता
तो फिर इंसान के मन से कभी बचपन नहीं जाता

कोई कितना भी ख़ुद को सख्त दिल कहता रहे लेकिन
कभी यादों से पहले प्यार का सावन नहीं जाता

भले ही मिट गया दीवार का नामो-निशां भी अब
मगर मेरे ज़ेह्न से वो बँटा आंगन नहीं जाता

चुभन ही क्यों बहुत लम्बे समय तक याद रहती है
मिरे मन से वो इक पल का परायापन नहीं जाता

किसी के रूठ जाने पर जो पीछे छूट जाते हैं
बहुत दिन तक उन अपनों का अकेलापन नहीं जाता
✍️ चिराग़ जैन

लव इन दिल्ली-यूनिवर्सिटी

मौरिस नगर के नुक्कड़ों को
आज भी याद हैं
हज़ारों निशब्द प्रेम कहानियाँ
जिनका पूरा सफ़र
तय होकर रह गया
आँखों-आँखों में ही।

लेकिन अब
ये प्रेम कहानियाँ
ऐसी ख़ामोशी से नहीं बनतीं।
अब
दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ लिखकर
अपने अधिकार जान गया है प्रेम।

अब लोक-लाज
और पिछड़े हुए समाज से
आगे निकलकर
‘निरुलाज़’ और ‘मॅक-डीज़’ में
बर्गर खाते हुए
घंटों बतिया सकता है प्रेम
…सेफ्ली।

या फिर आट्र्स फैकल्टी के बाहर
भेल-पुड़ी खाते हुए
आलिंगनबद्ध हो सकता है
सारे ज़माने के सामने।

अब फैशनेबल मोटर बाइक पर
बेहिचक-बेझिझक
बिना किसी से डरे
फर्राटे से दौड़ सकता है प्रेम।

पहले की तरह नहीं
कि नाम पूछने में ही
महीनों लग जाएँ।
अब तो झट से पूछ सकता है
कोई भी
कुछ भी
किसी से भी।

✍️ चिराग़ जैन

दिल्ली

वे भी दिन थे
जब पुरानी दिल्ली की
तंग गलियाँ
अकारण ही मुस्कुरा देती थीं
नज़र मिलने पर
अजनबियों से भी।

दरियागंज की हवेलियाँ
अक्सर देखा करती थीं
एक कटोरी को
देहरी लांघकर
इतराते हुए
दूसरी देहरी तक जाते
कुछ दशक पहले तक।

शाहदरा के बेतरबीब मकान
चिलचिलाती धूप में अक्सर
दरवाज़ा खोलकर
बिना झल्लाए
तर कर देते थे
अजनबियों का गला
ठण्डे-ठण्डे पानी से।

करोल बाग़ की सड़कें
अनायास ही जुट जाती थीं
मुसीबत में खड़े
मुसाफ़िरों की मदद के लिए!

लेकिन अब दिल्ली
दो पल ठहर कर
किसी को रास्ता नहीं बताती है।
अब एक्सीडेंट देखकर भी
गाड़ियों की कतारें
(न जाने
कहाँ पहुँचने की जल्दी में)
फर्राटे से निकल जाती हैं।

अब कोई किसी प्यासे को
पानी नहीं पिलाता
और तो और
अब तो कोई प्यासा
पानी पीने के लिए
किसी का
दरवाज़ा भी नहीं खटखटाता।

शाहदरा और
उत्तम नगर की
कस्बाई गलियाँ
धड़धड़ाती मैट्रो में सवार होकर
गड्ड-मड्ड हो जाती हैं
साउथ-एक्स
और नेहरू प्लेस की
शहरी भीड़ में।

अब इन गलियों के पास
नहीं बचा है वक़्त
चाय की चुस्कियों के साथ
‘जनसत्ता’ पढ़ने का।

अब तो
फटाफट न्यूज़ का
दस मिनिट का बुलेटिन
देख पाते हैं
बमुश्किल।

दरियागंज की हवेलियों में
अब गोदाम हैं
किताबों के
काग़ज़ के
और रुपयों के।

पुरानी दिल्ली की तंग गलियाँ
अब तंग आ चुकी हैं
अजनबियों से।

हुक्के की गुड़गुड़ाहट पर
कब्ज़ा कर लिया है
‘आइए भैनजी,
सूट देखिये!’
-की आवाज़ ने।

मुद्दतों से
ग़ज़ल नहीं इठलाई है
बल्लीमारान की
गली क़ासिम में
अब यहाँ
जूतियों का
इंटरनेशनल बाज़ार है।

✍️ चिराग़ जैन

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