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सांस्कृतिक ह्रास

संस्कार अवरोही हो चुके हैं। मेरे पिता का संहनन मुझमें नहीं है। और मैं इस बात के लिए भी आश्वस्त हूँ कि मेरी संतति मेरे जीवन सिद्धान्तों को पुराना कहकर नकार देगी। पीढ़ियों का यह अनवरत संघर्ष हमें बैलगाड़ियों से अंतरिक्ष यान तक भी लाया है और नाड़ी विज्ञान से पैथोलॉजी लैब तक भी।
संस्कार की पाठशालाएँ बोलती हैं, कि चूल्हे की रोटी में जो स्वाद था वो फाइव स्टार के कैंडल लाइट डिनर में नहीं है लेकिन विकास की ऊँची मचान पर बने एयर कंडिशनड इंस्टिट्यूट्स बोलते हैं कि जब रेडीमेड से काम चल सकता है तो सिलाई मशीन में माँ की आँखें फुड़वाने का क्या तुक है।
यह सवाल ऐसा ही है जैसे बुद्धि और हृदय किसी विषय पर द्विपक्षीय वार्ता कर रहे हों। दिल के तर्क परंपरागत व्यवस्थाओं की तरफ़दारी करते हैं और दिमाग़ पैसे से सारे सुख खरीदने का पक्षधर रहता है। बुखार में माँ की गीली पट्टी मेडिकली शायद शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता न बढ़ाती हो, लेकिन उस स्पर्श से दिल को जो आत्मबल मिलता है, उससे क्रोसिन से थोडा फ़ास्ट ही असर होता है।
सामाजिक दिखावे के चलते हमने अपनी पीढ़ियों को कॉन्वेंट कल्चर में तो ला पटका लेकिन इस बात पर चिंतन न कर सके कि जब नई गाड़ी पर रोली से स्वस्तिक बनाने की बात पर ये पीढ़ी नाक-भौं चढ़ाएगी तो हम अपने उस बचपन को क्या उत्तर देंगे जिसकी हर सुबह पर एक डिठौना जड़ा हुआ है। अपने बच्चों को अच्छी नौकरी दिलाने की चाह में हमने इस बात को बिसार दिया कि इनको मालिक भी बनाया जा सकता है।
हमने अपने हाथ से अपनी संस्कृति की जड़ों में मट्ठा डाला है। इसलिए जर्जर होते इस वटवृक्ष को देखकर दुःखी होने का हमें कोई अधिकार नहीं। सौ साल की सोच रखकर नीम बोनेवाले पुरखों को उनकी पीढ़ियों से साल भर में दम तोड़नेवाली गुलदावरी का उपहार मिल रहा है। करौंदे भी धड़ी के हिसाब से ख़रीदनेवालों के वंशज जब पाव भर सीताफल तुलवाते हैं तो तराजू का पलड़ा ठहाका मारकर हँसता है और चिढ़ाते हुए कहता है कि अहले जहाँ हमारा सदियों दुश्मन रहा तो हमारी हस्ती बच गई लेकिन इस बार हमने ख़ुद ठानी है इस हस्ती से दुश्मनी।

✍️ चिराग़ जैन

ज़रा से तार में ख़ुशियाँ पिरोना

निभाना, सहन करना, बाट जोहना सीख लेती थीं
बिना आवाज़ के छुप-छुप के रोना सीख लेती थीं
कहाँ ग़ुम हो गईं वो पीढ़ियाँ जब बेटियाँ माँ से
ज़रा से तार में ख़ुशियाँ पिरोना सीख लेती थीं

✍️ चिराग़ जैन

फ्रेंडशिप

“भाई नी है… दिखा दे ना।” उसने मेरे ठीक पीछे वाले बेंच पर से फुसफुसा कर कहा। मैं थोड़ा सा सरक गया।
“साले ढंग से दिखा वरना रहने दे।”
“अबे तो मैं अपना न लिखूँ।”
“अच्छा बस एक मिनिट।”
“एक बार में देख ले, फिर नहीं दिखाऊंगा। इत्ता लम्बा पेपर है, तेरे कारण मेरा भी रह जाएगा।”
“अबे मैं फेल हो गया तो तुझे अच्छा लगेगा।”
मेरी शीट उसके पास थी और मैं एक्स्ट्रा शीट पर अगला आन्स्वर लिखने लगा।

ये मेरी स्मृतियों में मौज़ूद दोस्ती का पहला एहसास है। जिसने मुझे अपनत्व के अधिकार का सुख महसूस करना सिखाया।
दोस्ती अद्भुत रिश्ता है। अपने लिए जीने की तमाम व्यवहारिक-नैतिक शिक्षा के बीच दोस्ती का अध्याय हमें दूसरों की संवेदनाओं का सम्मान करना सिखाता है। मेरे पास इस रिश्ते का भरपूर एहसास है।
दो-दो रुपयों के लिए लड़ते हुए शुरू हुई दोस्तियाँ आज बीस-बीस हज़ार की बेहिसाबी तक पहुँच गयी है। नोटबुक मांगने का अधिकार आज गाड़ी मांगने तक पहुँच गया है। सफ़र ज़ारी है। बड़ी ज़ोरदार ग्रिप है इस रिश्ते की। तेज़ दौड़ते रास्तों पर कई झटकों ने हाथ छुड़वाने की कोशिश की; पर….. सफ़र ज़ारी है।

✍️ चिराग़ जैन

चाँद को नहीं पता

कहीं भी तो अंतर नहीं है यार! चांद को नहीं पता कि उसे देखकर कोई रोज़ा, ईद की ख़ुशी में तब्दील होगा या कोई उपवास, महाशिवरात्रि के उल्लास का रूप धरेगा। गाय को भी नहीं पता कि उसके थनों में जो धार उतरी है, वो सेवइयों की मिठास में घुलेगी या शिवलिंग पर ढलक कर पावन होवेगी। यहाँ तक कि सड़क किनारे पट्टा बिछाकर बैठे मेहंदीवाले को भी नहीं पता कि वह अपने सामने पसरा जो हाथ, मेहंदी के बूटों से सिंगार रहा है, वो किसी दुआ को महकायेगा या किसी अर्पण को।
देहरी ने कब पूछा किसी पायल से कि वो अपनी रुनझुन ईद के मेले में बाँटने जायेगी या हरियाली तीज के झूलों में! फिर हमें किसने बता दिया ये सब? उत्सवों की चौपाल में नफ़रतों की सुगबुगाहट फैलानेवाली हवा कौन दिसा से आई रे बटोही। सेवइयाँ खाओ बाबू, अम्मी ने भेजी हैं। और ये भी कहा है, बेर लेता अइयो लौटती बेर, पण्डित जी से।

✍️ चिराग़ जैन

शर्मिंदगी

“ओहो!
कितना कूड़ा हो गया।
आग लगे इस मौसम में।
मार आंधी-तूफ़ान…
सारे आंगन में कीचड़ हो गई।

देखियो,
उधर सारी अंबियाँ झड़ गईं।
कैसी हरी डाल टूट गई नीम की!

…इस रामजी को भी चैन ना है!
कै तो पसीना चुआवै
कै ऐसा तूफान मचावै।”

अपने आपसे बतियाती हुई
पानी सूँत रही है नानी।
और
हौले से सूरज चमका कर
हैल्प कर रहे हैं
शर्मिंदा रामजी!

✍️ चिराग़ जैन

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